हवन विधि

॥ पूर्वाङ्ग ॥

हवन या यज्ञ की विधि में तीन मुख्य भाग होते हैं — पूर्वाङ्ग, मध्याङ्ग, और उत्तराङ्ग ये तीनों मिलकर सम्पूर्ण हवन विधि का क्रम बनाते हैं। पूर्वाङ्ग हवन की शुभ शुरुआत का पवित्र चरण है, जिसमें साधक स्वयं, स्थान और देवताओं को यज्ञ के लिए तैयार करता है। मध्याङ्ग हवन का मुख्य भाग होता है, जिसमें प्रधान देवता की आहुति दी जाती है। उत्तराङ्ग हवन का अंतिम भाग होता है। इसमें यज्ञ की पूर्णाहुति दी जाती है और देवताओं से क्षमा प्रार्थना की जाती है।

पञ्चभूसंस्कार

परिसमूह्य : कुशाओं से बुहार कर (गन्दगी- कचरा साफ करें)।तीन कुशाओं के परिसमूहन (सफाई) करके उसे ईशानकोण में त्यागा जाता है। 2.उपलिप्य : पूर्वसमय में इन्द्र ने वज्र से वृत्रासुर का वध किया था जिसके रक्त से पृथ्वी व्याप्त हो गई इसलिए गोमय से तीन बार उपलेपन करना चाहिए। 3.उल्लिख्य - स्रुवा के मूल से उत्तरोत्तर तीन रेखा खींच कर (चिह्नित करें) 4.उद्धृत्य - अनामिका एवं अँगूठे से सभी रेखाओं से मिट्टी उठाकर ईशानकोण में ही त्याग करे 5.अभ्युक्ष्य - तीन बार जल पवित्र करें

अग्नानयन व क्रव्यदांश त्याग

कांस्यपात्र या हस्तनिर्मित मृण्मयपात्र में अन्य पात्र से ढंकी हुई अग्नि मंगाकर अग्निकोण में रखवाए । ऊपर का पात्र हटाकर थोड़ी सी क्रव्यदांश अग्नि (ज्वलतृण) लेकर नैर्ऋत्यकोण में त्याग कर जल से बुझा दे ।।

अग्निस्थापन

अग्नानयन पात्र में अक्षत-जल छिरके।

ॐ अग्निं दूतं पुरोदधे हव्यवाहमुपब्रुवे । देवां२ आसादयादिह ॥

कुशकण्डिका

कुश पवित्रता और प्रखरता के प्रतीक माने जाते हैं। कुशकण्डिका के अन्तर्गत निर्धारित क्षेत्र के चारों दिशाओं में कुश बिछाये जाते हैं। बड़े यज्ञों और विशिष्ट कर्मकाण्डों में यज्ञशाला, यज्ञकुण्ड अथवा पूजा क्षेत्र के चारों ओर मन्त्रों के साथ कुश स्थापित किये जाते हैं क्रम व्यवस्था- कुश कण्डिका में प्रत्येक दिशा के लिए चार- चार कुश लिये जाते हैं। पूरे क्षेत्र को इकाई मानकर उसके चारों ओर एक ही व्यक्ति से कुश स्थापित कराने हैं, तो कुल १६ कुशाएँ चाहिए। यदि प्रत्येक कुण्ड या वेदी पर कराना है, तो प्रत्येक के लिए १६- १६ कुशाएँ चाहिए। क्रिया और भावना- कुश स्थापना करने वाले व्यक्ति एक बार में चार कुश हाथ में लें। मन्त्रोच्चार के साथ कुशाओं सहित उस दिशा में हाथ जोड़कर मस्तक झुकाएँ और एक- एक करके चारों कुशाएँ उसी दिशा में स्थापित कर दें। कुश स्थापित करते समय कुश का ऊपरी नुकीला भाग पूर्व या उत्तर की ओर रहे तथा मूल (जड़) भाग पश्चिम या दक्षिण की ओर रहे। प्रत्येक मन्त्र के साथ दिशा विशेष के लिए यही क्रम अपनाया जाए। भावना की जाए कि इस दिशा में व्याप्त देवशक्तियों को नमस्कार करते हुए उनके सहयोग से दिव्य प्रयोजन के लिए कुशाओं जैसी पवित्रता और प्रखरता का जागरण और स्थापन किया जा रहा है।

अग्निका ध्यान तथा पूजन

अग्नि प्रज़्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशनम् । सुवर्णवर्णममलं समिध्दं सर्वतोमुखम् ॥

ॐ बलवर्धननामाग्नयेनमः - मंत्र द्वारा गन्ध पुष्प आदि से पूजा करे

प्रजापति देवता होम

घी से हवन करे ।

ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम॥

ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राये न मम॥

ॐ अग्नये स्वाहा, इदं अग्नये न मम॥

ॐ सोमाय स्वाहा, इदं सोमायन मम॥

ॐ भूः स्वाहा, इदं भूः॥

ॐ भुवः स्वाहा, इदं भुवः॥

ॐ स्वः स्वहा, इदं स्वः ॥

द्रव्यत्याग

होता के हाँथमे जल देकर निम्न मंत्र से जल छोड़वाएं

अस्मिन् होमकर्मणि याः याः यक्षमाणदेवता: ताभ्य: ताभ्य: ईदं हवानीयद्रव्यं मया परित्यक्तं तत्सद्यथादैवतमस्तु न मम ॥

वराहुति होम

ॐ गणानांत्वा गणपति गुंग हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति गुंग हवामहे, निधीनां त्वा निधिपति गुंग हवामहे। वसो: मम आहमजानि गर्भधम् त्वमजासि गर्भधम् ॥ स्वाहा ॥

ॐ अम्बे अम्बिके अम्बालिके नमानयति कश्चन । ससत्स्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीं॥ स्वाहा ॥

नवग्रह आदि देवता होम

मंत्र पढ़ने के लिए नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें।

हर मंत्र के अंत में “स्वाहा” कहें और हवन सामग्री को अग्निकुंड में डालें। उदाहरण स्वरूप, “ॐ भूर्भुवःस्वः विष्णवे नमः, इहागच्छ, इह तिष्ठ।” को इस प्रकार पढे “ॐ भूर्भुवःस्वः विष्णवे नमः स्वाहा”

  1. नवग्रह होम
  2. अधिदेवता प्रत्यादिदेवता होम
  3. पञ्चलोकपाल होम
  4. वास्तुदेवता होम
  5. सर्वतोभद्र देवता होम
  6. चतुर्लिंगतो देवता होम
  7. योगिनी होम
  8. षोडशमातृका होम
  9. सप्तघृतमातृका होम
  10. क्षेत्रपाल होम

॥ मध्याङ्ग ॥

तत्पश्चात मुख्य देवता की निश्चित संख्या में मंत्र द्वारा विहित द्रव्य से आहूति दे। उदाहरण स्वरूप यदि पूजा भगवान विष्णु की है तो प्रधान देवता विष्णु भगवान माने जाएंगे, तब इस मंत्र **“ॐ नमो भगवाते वसुदेवाय”** द्वारा १०८ माल अथवा निश्चित संख्या मे हवन करे।

॥ उत्तराङ्ग ॥

प्रधान हवन के अनन्तर हवन की सफलता की सिद्धि के लिये इस मंत्र से अग्नि देव का गन्ध आदि से उत्तर-पूजन करे **“ॐ स्वाहास्वधायुताय बलवर्धननामाग्नये नमः”**

प्रार्थना

श्रध्दां मेधां यशः प्रज्ञां विधां बुद्धि बलं श्रियम् । आयुष्यं द्रव्यमारोग्यं देहि मे हव्यवाहन ॥

अग्नि धरण

हाथ से मंत्र द्वारा अग्नि देव को सम्पूर्ण शरीर में धारण करें। मंत्र पढ़ते समय कल्पना करें कि पवित्र अग्नि आपकी पूरी देह में उठ रही है, और सभी अशुद्धि, नकारात्मकता, रोग और बाधाएँ जलकर समाप्त हो रही हैं। यजमान अपनी कल्पना का पूर्ण उपयोग करें इस प्रक्रिया से मन, शरीर और वातावरण शुद्ध और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है।

ॐ अङ्गानि च मा आप्यायन्ताम्

स्विष्टकृद्धोम

शेष घृत प्रोक्षणी मे डाले

ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदं अग्नयेस्विष्टकृते न मम।

भू : आदि नव आहुतियाँ

ॐ भूः स्वाहा, इदं भूः॥

ॐ भुवः स्वाहा, इदं भुवः॥

ॐ स्वः स्वहा, इदं स्वः ॥

ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अवयासि सीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाᳪसि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्याम् ॥

ॐ स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ। अवयक्ष्व नो वरुणᳪरराणो वीहि मृडीकᳪसुहवो न एधि स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्याम् ॥

ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य नभिशस्तिपाश्च सत्यमित्त्वमया असि । अया नो यज्ञᳪवहास्ययानो धेहि भेषज ᳪ स्वाहा, इदमग्नये॥

ॐ ये ते शतँवरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभिर्न्नो अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुञ्चन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा, इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यः॥

ॐ उदुत्तमँव्वरुण पाशमस्मदवाधमं विमध्यमᳪश्रथाय । अथा व्वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा, इदं वरुणाय ॥

ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये॥

बलिदान

बलिदान के लिये एक **घी का दीपक (दीया)** तैयार करे। दीपक में **थोड़ा दही और कुछ उड़द की दाने** डालें। अब निम्न देवताओं को बाली निम्न मंत्रों से दें।

इन्द्रादि दशदिक्पालबलि

बलिदान के लिये तैयार की गई दही, उरद सहित घी के दस दीपक को उनके मंत्रों द्वारा दसों दिसाओं मे रखे।

ॐ प्राच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहा दक्षिणायै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहा प्रतीच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहोदीच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहोर्ध्वायै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहावाच्यै दिशे स्वाहार्वाच्यै दिशे स्वाहा ॥ ॐ इन्द्रादिभ्यो दशभ्यो दशदिक्पालेभ्यो नमः । ॐ इन्द्रादि दशदिक्पालेभ्यः साङ्गेभ्यः सपरिवारेभ्यः सायुद्धेभ्यः सशक्तिकेभ्यः इमान् सदीपदधिमाषभक्तबलीन् समर्पयामि। भो भो इन्द्रादि दशदिक्पालाः! स्वां स्वां दिशं रक्षत बलिं भक्षत मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य आयुः कर्तारः क्षेमकर्तारः शान्तिकर्तारः पुष्टिकर्तारः तुष्टिकर्तारः वरदा: भवत। अनेन बलिदानेन इन्द्रादिदशदिक्पालाः प्रियन्ताम् ।

नवग्रह बलि

बलिदान के लिये तैयार की गई दही, उरद सहित घी के दीपक को निम्न मंत्र उचारण कर नवग्रह मण्डल के पास रखे।

ॐ ग्रहा ऽऊर्जाहुतयो व्यन्तो विप्राय मतिम् । तेषाँविशिप्रियाणाँवो हमिषमूर्जँ समग्रभमुपयामगृहीतो सीन्द्राय त्वा जुष्टङ्गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम् ॥ ॐ सूर्यादिनवग्रहेभ्यो नमः । सूर्यादिनवग्रहेभ्य: साङ्गेभ्यः सपरिवारेभ्यः सायुद्धेभ्यः सशक्तिकेभ्यः अधिदेवता-प्रत्यधिदेवता-गणपत्यादिपञ्चलोकपालवास्तोष्पतिसहितेभ्यः इमं सदीपदधिमाषभक्तबलिं समर्पयामि । भो भो सूर्यादिनवग्रहा: ! साङ्गा :सपरिवारा: सायुधा: सशक्तिका: अधिदेवता-प्रत्यधिदेवता: गणपत्यादिपञ्चलोकपाल-वास्तोष्पतिसहिता: इमं बलि गृह्णीत मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य आयुः कर्तारः क्षेमकर्तारः शान्तिकर्तारः पुष्टिकर्तारः तुष्टिकर्तारो वरदा भवत। अनेन बलिदानेन साङ्गा सूर्यादिनवग्रहा: प्रियन्ताम् ।

वास्तुबलि

बलिदान के लिये तैयार की गई दही, उरद सहित घी के दीपक को निम्न मंत्र उचारण कर वास्तु मण्डल के पास रखे।

ॐ वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥ शिख्यादिसहितावास्तोष्पते साङ्गाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्तिकाय इमं सदीपदधिमाषभक्तबलिं समर्पयामि। भो शिख्यादिसहितावास्तोष्पते! इमं बलि गृह्णीत मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य आयुकर्ता क्षेमकर्ता पुष्टिकर्ता तुष्टिकर्ता वरदो भवत। अनेन बलिदानेन शिख्यादिसहितावास्तोष्पति: प्रियन्ताम् ।

योगिनीबलि

बलिदान के लिये तैयार की गई दही, उरद सहित घी के दीपक को निम्न मंत्र उचारण कर चतुष्षष्टि योगिनी मण्डल के पास रखे।

ॐ योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे। सखाय इन्द्रमूतये॥ महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतीसहितगजाननाद्यावाहितचतु:षष्टियोगिन्यः साङ्गाभ्यः सपरिवाराभ्यः सायुधाभ्यः सशक्तिकाभ्यः इमं सदीपदधिमाषभक्तबलिं समर्पयामि। भो महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतीसहितचतु:षष्टियोगिन्यः ! इमं बलि गृह्णीत मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य आयुः कर्त्र्यः, क्षेमकर्त्र्यः, शान्तिकर्त्र्यः, पुष्टिकर्त्र्यः तुष्टिकर्त्र्यः वरदा भवत। अनेन बलिदानेन महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वतीसहितगजाननाद्यावाहितचतु:षष्टियोगिन्यः प्रियन्ताम् ।

प्रधानदेवता बलि

बलिदान के लिये तैयार की गई दही, उरद सहित घी के दीपक को प्रधान देवता के मंत्र उचारण कर प्रधान देवता के पास रखे।

क्षेत्रपाल बलि विधि

क्षेत्रपाल बलि हेतु निम्न प्रकार से संकल्प करे -

देशकालौ सङ्गीर्त्य, ...अमुकगोत्रोंऽमुकशर्माहम् सपत्नीकोऽहं अस्य ...अमुकयागकर्मणः साङ्गता सिद्धयर्थं क्षेत्रपालादिप्रीत्यर्थं भूत-प्रेत पिशाचादिनिवृत्यर्थं च सार्वभौतिकबलिप्रदानं कारिष्ये ।

आवाहन

एक मिट्टी का बडा दीपक लेकर उसमें चार मुंह की ज्योत लगावें । दीपक में सरसों का तेल डालें, उसमें सिन्दूर , उडद , पापड , दही , गुड , सुपारी आदिरखकर दीप प्रज्वलित करें और क्षेत्रपाल का आवाहन करें ।

ॐ नहि स्पशमविदन्नन्यमस्माद्वैश्र्वानरात्पुरएतारमग्ने:। एमेनमवृधन्नमृता अमर्त्यं वैश्र्वानरं क्षैत्रजित्याय देवा:।।

क्षेत्रपाल पूजा

अब निम्न मंत्र द्वारा गन्ध पुष्प आदि से क्षेत्रपाल देवताओं की पूजा करे।

ॐ क्षेत्रपालाय नमः

क्षेत्रपाल प्रार्थना

नमो वै क्षेत्रपालस्त्वं भूतप्रेतगणै: सह । पुजां बलिं गृहाणेमं सौम्यो भव च सर्वदा ॥ पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्र्च देहि मे । आयुरारोग्यं मे देहि निर्विघ्नं कुरु सर्वदा ॥

क्षेत्रपाल बलि

क्षेत्रपालाय साङ्गाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्तिकाय मारीगण-भैरव-राक्षस-कूष्माण्ड-वेताल -भूत-प्रेत-पिशाच-डाकिनी-शाकिनी-पिशाचिनी-ब्रह्मराक्षस-गणसहिताय इमं कुङ्कुमरक्तपुष्पादियुतं सदीपं सताम्बूलं सदक्षिणं दधिमाष-भक्तबलिं समर्पयामि । भो क्षेत्रपाल ! सर्वतो दिशं रक्ष बलिं भक्ष मम सकुटुम्बस्य सपरिवारस्य आयु: कर्ता क्षेमकर्ता शान्तिकर्ता पुष्टिकर्ता वरदो भव। अनेन बलिदानेन क्षेत्रपाल: प्रियन्ताम् ।

अब इस दीपक को उठाकर यजमान की तरफ आवृत कर बिना पीछे मुडे बाहर दीपक को चौराहे पर रखावें । ब्राह्मण शांतिपाठ करें । ब्रह्मा जी द्वार तक जल छोडें दीपक को रखकर आने वाला व्यक्ति नहाकर या हाथ पैर धोकर आवे ।

वसोर्धारा

स्रुचि से घृत की अविच्छन्न धारा अग्नि में इस मंत्र से करे

ॐ वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्। देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्वा कामधुक्षः स्वाहा ॥

अग्निप्रार्थना

ॐ श्रद्धां मेधां यशः प्रज्ञां विद्यां पुष्टिं श्रियं बलम् । तेज आयुष्यमारोग्यं देहि मे हव्यवाहन ॥ १ ॥ भो भो अग्ने ! महाशक्ते सर्वकर्मप्रसाधन । कर्मान्तरेऽपि सम्प्राप्ते सान्निध्यं कुरु सर्वदा ॥

भस्म धारण

ॐ त्र्यायुषम्जमदग्नेः (ललाट पर) । ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषं (कंठ में) । ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषं (दक्षिण बाहु पर) । ॐ तन्नोऽअस्तु त्र्यायुषं (हृदय में) यदि किसी अन्य को लगाये तो ॐ तत्तेऽअस्तु त्र्यायुषं। और फिर बांये बांह पर भी लगा ले ।

संसव प्राशन

हवन में जो अग्नि में डाली गई सामग्री बची हुई है (प्रोक्षणी), उसमें से आज्याहुति का थोड़ा भाग अपनी अनामिका और अंगूठे से छूकर ग्रहण करें, यानी थोड़ा सा पवित्र आहुति निम्न मंत्र द्वारा स्वयं ग्रहण करें।

ॐ यस्माद्यज्ञपुरोडाशाद्यज्वानो ब्रह्मरूपिणः । तं संस्रवपुरोडाशं प्राश्नामि सुखपुण्यदम् ।।

पूर्णपात्र

ॐ अद्य कृतैतत् ……. होमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप ब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापति दैवतम् …..गोत्राय ……शर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ।

ब्राह्मण को पूर्णपात्र प्रदान करे, ब्राह्मण **ॐ स्वस्ति** कहकर ग्रहण करे। फिर दाहिना हाथ पकरकर ब्राह्मण को प्रदक्षिण क्रम से उठाए।

तर्पण

ॐ साङ्गं सपरिवारं (महामृत्युञ्जयं/विष्णु/शिवं देवतानुसार) तर्पयामि ॥

मार्जन

अपने सिर का मार्जन करे, सिर पर निम्न मंत्र द्वारा पनि डाले।

ॐ मार्जयामि ॥

विसर्जन

ॐ यान्तु देवगणा: सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनर्अपि पुनरागमनाय च॥ गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर। यत्र ब्रम्हादयो देवास्तत्र गच्छ हुताशन ॥

छायापात्र दान

तिलपुञ्ज पर छायापात्र (कांस्यपात्र) स्थापित करके गोघृत (द्रवित) भरे फिर उसमें मुखावलोकन करे

ॐ आज्यं सुराणामाहारमाज्यं पापहरं परम् । आज्यमध्ये मुखं दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ घृतं नाशयते व्याधि घृतञ्च हरते रुजम् । घृतं तेजोऽधिकरणं घृतमायुः प्रवर्द्धते ॥ इस प्रकार मुखावलोकन करके स्वर्ण या पञ्चरत्न प्रक्षेप करे । छायापात्र पर ३ बार पुष्पाक्षत छिड़के – ॐ छायापात्राय नमः ॥३॥ फिर ३ बार उत्तराग्र कुशा (त्रिकुशा) पर छिड़के – ॐ ब्राह्मणाय नमः ।।३।। जल से सिक्त करे। तिल-जल लेकर उत्सर्ग करे – ॐ अद्य …….. गोत्रोत्पन्नः ……… शर्माऽहं आयुरारोग्यप्राप्त्यर्थं श्री …….. देवताप्रीत्यर्थं च इदं स्वछायावलोकितंघृतपूरितंकांस्यपात्रं चन्द्रप्रजापतिबृहस्पति दैवतं यथानाम गोत्राय ब्राह्मणाय अहं ददे॥ पूर्वपूजित त्रिकुशा पर छोड़ दे ।

ॐ अद्य कृतैतच्छायापात्र दान प्रतिष्ठार्थं एतावद्द्रव्यमूल्यकहिरण्यं अग्निदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय दक्षिणां दातुमहमुत्सृजे ॥

दक्षिणा

ॐ अद्य कृतैतच्छायापात्र दान प्रतिष्ठार्थं एतावद्द्रव्यमूल्यकहिरण्यं अग्निदैवतं यथानामगोत्रायब्राह्मणाय दक्षिणां दातुमहमुत्सृजे ॥

क्षमाप्रार्थना

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन । यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ नमो ब्रह्मण्देवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम: ॥ यदक्षरपदभ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्वं क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर ॥

पूजा की आवश्यक सामग्री / Puja Essentials

इन वस्तुओं का प्रयोग ऊपर वर्णित अनुष्ठान में परंपरागत रूप से किया जाता है।

बाँस रहित धूप कोन

पूजा और ध्यान के दौरान सुगंध के लिए सामान्य रूप से उपयोग किए जाने वाले धूप कोन।

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सुगंधित अगरबत्ती (विविध सुगंध)

पूजा के समय वातावरण को सुगंधित रखने के लिए उपयोग की जाने वाली अगरबत्ती।

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कपूर सुगंधित तिल का पूजा तेल

दीया जलाने के लिए पूजा में उपयोग किया जाने वाला कपूर सुगंधित तिल का तेल।

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कपूर की गोलियाँ (Camphor)

पूजा, हवन और आरती के दौरान कपूर जलाने के लिए उपयोग की जाने वाली कपूर की गोलियाँ।

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प्रसाद दाना (सकरिया)

पूजा और भोग के लिए प्रसाद रूप में अर्पित की जाने वाली सकरिया।

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सूती दीया बत्ती (Jyot Batti)

दीपक और दीया प्रज्वलन के लिए पूजा और आरती में उपयोग की जाने वाली सूती बत्ती।

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पीतल का अखंड ज्योति दीया

घी या तेल से दीपक प्रज्वलन के लिए पूजा और आरती में उपयोग किया जाने वाला पीतल का दीया।

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पंचमुखी रुद्राक्ष जप माला (108 मनके)

जप, ध्यान और पूजा के दौरान मंत्र जाप के लिए उपयोग की जाने वाली रुद्राक्ष माला।

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श्री सत्यनारायण स्वामी फोटो फ्रेम

घर या पूजा स्थल में दर्शन और पूजा के लिए उपयोग की जाने वाली श्री सत्यनारायण स्वामी की छवि।

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पूजा आसन

पूजा, जप और ध्यान के समय बैठने के लिए उपयोग किया जाने वाला आसन।

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पूजा घंटी (Ghanti)

पूजा और आरती के समय ध्वनि के माध्यम से ध्यान केंद्रित करने के लिए उपयोग की जाने वाली घंटी।

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इलेक्ट्रिक कपूर दानी (गणेश-ॐ डिजाइन)

पूजा, आरती एवं ध्यान के समय कपूर प्रज्वलन हेतु उपयोग की जाने वाली विद्युत कपूर दानी। यह सुगंध प्रसार के साथ नाइट लैंप के रूप में भी कार्य करती है तथा घर, मंदिर एवं पूजा कक्ष में सकारात्मक वातावरण बनाती है।

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सूती फूल बत्ती (हस्तनिर्मित)

दीपक एवं दीया प्रज्वलन हेतु उपयोग की जाने वाली हस्तनिर्मित सूती फूल बत्ती। यह पूजा, आरती, नवरात्रि एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में नियमित रूप से प्रयुक्त होती है तथा स्थिर व शुद्ध ज्योति प्रदान करती है।

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