चतुष्षष्टि योगिनीपूजनम् : स्वरूप, तत्त्व और साधनात्मक अर्थ
चतुष्षष्टि योगिनीपूजन सनातन परंपरा में शक्ति, साधना और संरक्षण की व्यापक उपासना मानी जाती है। चतुष्षष्टि योगिनियाँ देवी की विविध शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो सृष्टि, संहार, संरक्षण और परिवर्तन—इन सभी प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से कार्य करती हैं। यह पूजन शक्ति के स्थूल, सूक्ष्म और उग्र सभी रूपों का समन्वित स्मरण है।
योगिनियाँ केवल उग्र या रहस्यमय शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि वे साधक के जीवन में चेतना, साहस, नियंत्रण और रूपांतरण की प्रक्रियाओं को संचालित करने वाली दिव्य सत्ताएँ हैं। इस पूजा का उद्देश्य शक्ति से भय नहीं, बल्कि शक्ति के साथ सामंजस्य स्थापित करना है।
महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का स्थान
चतुष्षष्टि योगिनीपूजन का आधार महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती हैं। ये तीनों शक्तियाँ समय, समृद्धि और ज्ञान के मूल तत्त्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- महाकाली परिवर्तन, संहार और चेतना की जागृति की शक्ति हैं
- महालक्ष्मी स्थिरता, ऐश्वर्य और पालन का भाव प्रदान करती हैं
- महासरस्वती ज्ञान, विवेक और साधनात्मक स्पष्टता की अधिष्ठात्री हैं
इन तीनों के समन्वय से योगिनी शक्तियाँ पूर्णता को प्राप्त करती हैं।
योगिनियों का स्वरूप और कार्यक्षेत्र
चतुष्षष्टि योगिनियाँ जीवन के विविध स्तरों पर कार्य करती हैं—
कहीं वे रक्षा और नियंत्रण की शक्ति हैं,
कहीं वे सिद्धि, मेधा और सामर्थ्य का आधार हैं,
और कहीं वे साधक के आंतरिक अवरोधों को भेदकर चेतना को उच्च स्तर पर स्थापित करती हैं।
प्रत्येक योगिनी किसी न किसी मानसिक, भौतिक या आध्यात्मिक अवस्था का प्रतिनिधित्व करती है। उनका आवाहन साधक के भीतर छिपी शक्तियों को जाग्रत और सुव्यवस्थित करता है।
आवाहन, ध्यान और प्राणप्रतिष्ठा का भाव
योगिनीपूजन में आवाहन का अर्थ आदेश देना नहीं, बल्कि साधना-क्षेत्र में शक्ति की उपस्थिति स्वीकार करना है। ध्यान और प्राणप्रतिष्ठा के माध्यम से योगिनी शक्तियों को चेतन रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है, जिससे पूजा केवल पाठ नहीं, बल्कि अनुभव बन जाती है।
षोडशोपचार पूजन यह स्मरण कराता है कि जीवन के सभी साधन—शरीर, प्राण, अन्न, प्रकाश और चेतना—देवीशक्ति से अनुप्राणित हैं।
चतुष्षष्टि योगिनीपूजन का साधनात्मक उद्देश्य
इस पूजन का उद्देश्य त्वरित सिद्धि नहीं, बल्कि आंतरिक दृढ़ता, निर्भयता और संतुलन की स्थापना है। योगिनियाँ साधक को यह बोध कराती हैं कि शक्ति तभी कल्याणकारी होती है, जब वह अनुशासन, विवेक और साधना से संयुक्त हो।
यह पूजा जीवन में—
- मानसिक साहस
- आत्मनियंत्रण
- कर्म में स्पष्टता
- और आध्यात्मिक स्थिरता
को क्रमशः पुष्ट करती है।
महाकाली
ॐ अम्बेऽअम्बकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ॥ ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महाकालि इहाऽगच्छ इह तिष्ठ ।। ॐ भूर्भुवः स्वः महाकाल्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका! कोई भी मुझे मार्ग से विचलित न करे। अश्वयुक्त रथ वाली, कल्याणस्वरूपिणी, काम्पील में निवास करने वाली देवी की हम स्तुति करते हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में महाकाली को त्रिविध मातृस्वरूप में स्मरण किया गया है। यहाँ साधक देवी से मार्गभ्रंश से रक्षा और कल्याण की प्रार्थना करता है। अश्वरथ और निवास-स्थल का उल्लेख देवी की गतिशील, संरक्षक और लोकव्यापी शक्ति को दर्शाता है।
महालक्ष्मी
ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्त्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् ॥ इष्णन्निषाणामुम्मऽइषाण सर्वलोकं मऽइषाण ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मि इहाऽगच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे देवी! श्री और लक्ष्मी आपकी दोनों पत्नियाँ हैं। अहोरात्र आपके पार्श्व में स्थित हैं। नक्षत्र आपके रूप हैं और अश्विनीकुमार आपके विस्तृत नेत्र हैं। आप समस्त कामनाओं को प्रेरित करने वाली हैं; आप समस्त लोकों पर ऐश्वर्य और शासन प्रदान करने वाली हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में महालक्ष्मी को समग्र ऐश्वर्य, श्री और सत्ता की अधिष्ठात्री के रूप में स्मरण किया गया है। अहोरात्र, नक्षत्र और अश्विनीकुमारों का उल्लेख यह दर्शाता है कि लक्ष्मी की शक्ति समय, गति और सौंदर्य—तीनों में निरंतर प्रवाहित होती है। उनका आवाहन स्थिर समृद्धि और सुव्यवस्थित जीवन के लिए किया जाता है।
महासरस्वती
ॐ पावका नः सरस्वती व्वाजैभिर्वाजिनीवती ॥ यज्ञं व्यष्टु धिवावसुः ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः महासरस्वत्यै नमः।
ॐ भूर्भुवः स्वः महासरस्वति इहाऽगच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः महासरस्वत्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — तेजस्विनी और पवित्र करने वाली सरस्वती हमें बल और अन्न प्रदान करें। वे यज्ञ को पूर्ण रूप से विस्तार दें और अपने दिव्य प्रकाश से उसे आलोकित करें। महासरस्वती को नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में महासरस्वती को पवित्रता, ज्ञान और यज्ञीय शक्ति की अधिष्ठात्री के रूप में स्मरण किया गया है। यहाँ सरस्वती केवल वाणी की देवी नहीं, बल्कि यज्ञ, विद्या और बौद्धिक सामर्थ्य को पुष्ट करने वाली चेतन शक्ति हैं। उनका आवाहन साधना में स्पष्टता, ज्ञान की तीव्रता और कर्म की शुद्धि के लिए किया जाता है।
१. दिव्ययोगिनी
ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दिव्ययोगिनि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः दिव्ययोगिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हम उस ईश्वर का आह्वान करते हैं जो इस चराचर जगत् के अधिष्ठाता और स्वामी हैं, जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करते हैं और रक्षा के लिए पूज्य हैं। पूषा हमें वेदों के मार्ग में समृद्ध करे, हमारी रक्षा करे और हमें कल्याण प्रदान करे, जो अचूक और अविनाशी रक्षक हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में दिव्ययोगिनी को जगत्-नियामक ईश्वरीय चेतना से संयुक्त करके स्मरण किया गया है। यहाँ साधक बुद्धि-प्रेरणा, संरक्षण और वेदसम्मत कल्याण की कामना करता है। दिव्ययोगिनी का स्वरूप साधना में दिशा, सुरक्षा और आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करने वाला माना गया है।
२. महायोगिनी
ॐ आ ब्रह्मण ब्राह्मणो बह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योति व्याधी महारथो जायताम् दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरंध्रिर्योषा जिष्णूरथेष्ठाः सभेयो युवाऽस्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्ताम् योगक्षेमो नः कल्पताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महायोगिनि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः महायोगिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे ब्रह्मन्! हमारे राष्ट्र में ब्रह्मतेज से युक्त ब्राह्मण उत्पन्न हों, शूरवीर, बाणधारी और व्याध (युद्ध-कुशल) राजन्य उत्पन्न हों, महान रथी योद्धा उत्पन्न हों। दुहने वाली गौ, वहन करने वाला बलवान बैल, वेगवान अश्व उत्पन्न हों। गृहस्थ स्त्री, विजयशील रथारोही, सभा में प्रतिष्ठित युवक और इस यजमान के यहाँ पराक्रमी पुत्र बार-बार उत्पन्न हों। हमारे लिए पर्जन्य समय-समय पर वर्षा करें, औषधियाँ फलयुक्त होकर परिपक्व हों और हमारा योग-क्षेम (कल्याण और संरक्षण) सिद्ध हो।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में महायोगिनी को समष्टि-कल्याण, सामाजिक संतुलन और राष्ट्र-शक्ति की अधिष्ठात्री के रूप में स्मरण किया गया है। यहाँ साधक केवल व्यक्तिगत सिद्धि नहीं, बल्कि समाज, प्रकृति और वंश की समृद्धि की कामना करता है। महायोगिनी का स्वरूप योग, क्षेम और लोकव्यवस्था को संतुलित करने वाली व्यापक शक्ति का द्योतक है।
३. सिद्धयोगिनी
ॐ महाँ२ ऽइन्द्रो वज्रहस्तः षोडशी शर्म्म यच्छतु । हन्तु पाप्मानं योनिर्महेन्द्राय त्वा ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धयोगिनी इहागच्छ इह तिष्ठ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धयोगिनि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धयोगिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — महान वज्रधारी इन्द्र हमें षोडश प्रकार का कल्याण प्रदान करें और पाप का विनाश करें। हे महेन्द्र! आपकी यह शक्ति (योनि/उत्पत्ति-कारक शक्ति) हमारे लिए कल्याणकारी हो। हे सिद्धयोगिनी! यहाँ आगमन करें और यहाँ स्थिर होकर विराजमान हों।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में सिद्धयोगिनी को इन्द्र की वज्रशक्ति और पापनाशक सामर्थ्य से संयुक्त करके आवाहित किया गया है। यहाँ साधक सिद्धि, रक्षा और पापक्षय की कामना करता है। सिद्धयोगिनी का स्वरूप साधना में प्राप्त होने वाली दिव्य उपलब्धियों और स्थिर सिद्धावस्था का प्रतीक है।
४. माहेश्वरी
ॐ आयङ्गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः । पितरञ्च प्रयन्त्स्वः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः माहेश्वरि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः माहेश्वर्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह गौ (देवी) पृश्नि से उत्पन्न होकर आगे बढ़ी, माता के समीप आई और पिता की ओर भी प्रयत्नपूर्वक अग्रसर हुई।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में माहेश्वरी को आदि मातृशक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जो माता और पिता—दोनों तत्त्वों को जोड़ते हुए सृष्टि की गति को आगे बढ़ाती हैं। यहाँ गौ का उल्लेख पोषण, उर्वरता और जीवनदायिनी शक्ति का सूचक है। माहेश्वरी का आवाहन जीवन में संतुलित सृजन, संरक्षण और पारिवारिक स्थिरता के लिए किया जाता है।
५. प्रेताक्षी
ॐ आदित्यं गर्भं पयसा समङ्घ्रि हरसा मामि म ᳪ स्त्थाः शतायुषं कृणुहि धीयमानः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः प्रेताक्षि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः प्रेताक्ष्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — आदित्य को गर्भ रूप में धारण करने वाली, दुग्ध (पोषण) से समृद्ध करने वाली देवी हमें अपने तेज से आच्छादित करें; हे धारण करने वाली शक्ति! हमें शतायु बनाइए।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में प्रेताक्षी को जीवन-धारण और आयु-वृद्धि की शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। आदित्य-गर्भ का उल्लेख तेज, चेतना और प्राणशक्ति के संरक्षण का संकेत देता है। प्रेताक्षी का आवाहन आयु, बल और आंतरिक स्थैर्य की प्राप्ति हेतु किया जाता है।
६. डाकिनी
ॐ स्वर्णघर्मः स्वाहा स्वर्णार्कः स्वाहा स्वर्णशुक्रः स्वाहा स्वर्णज्योतिः स्वाहा स्वर्णसूर्यः स्वाहा।।
ॐ भूर्भुवः स्वः डाकिनि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः डाकिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — स्वर्णमय घर्म (तेज) को स्वाहा, स्वर्णमय सूर्य को स्वाहा, स्वर्णमय शुक्र (दीप्त तत्त्व) को स्वाहा, स्वर्णमय ज्योति को स्वाहा, स्वर्णमय सूर्य को स्वाहा।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में डाकिनी को स्वर्णतुल्य तेज, प्रकाश और ऊर्जात्मक शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। बार-बार ‘स्वर्ण’ का प्रयोग दिव्य प्रकाश, उग्र चेतना और रूपांतरण की शक्ति का द्योतक है। डाकिनी का आवाहन साधक के भीतर निहित सुप्त ऊर्जा को जाग्रत करने और साधना में तीव्रता एवं स्पष्टता प्रदान करने के लिए किया जाता है।
७. काली
ॐ सत्यञ्च मे श्रद्धा च मे जगच्च मे धनञ्च मे व्विश्वञ्च मे महश्च मे क्रीडा च मे मोदश्च मे जातञ्च मे जनिष्यमाणञ्च मे सूक्तञ्च मे सुकृत मे यज्ञेन कल्प्यन्ताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कालि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः काल्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — मेरे लिए सत्य हो, मेरे लिए श्रद्धा हो, मेरे लिए जगत् हो, मेरे लिए धन हो, मेरे लिए विश्व हो, मेरे लिए महानता हो, मेरे लिए क्रीड़ा हो, मेरे लिए आनंद हो, मेरे लिए जो उत्पन्न हो चुका है वह हो और जो उत्पन्न होने वाला है वह भी हो, मेरे लिए सूक्त (उत्तम वचन) हों और मेरे लिए सुकृत (शुभ कर्म) हों—ये सभी यज्ञ के द्वारा सिद्ध हों।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में काली को समग्र जीवन-शक्ति की अधिष्ठात्री के रूप में स्मरण किया गया है। सत्य, श्रद्धा, धन, आनंद, वर्तमान और भविष्य—जीवन के सभी पक्षों को यज्ञभाव से काली को अर्पित किया गया है। काली का आवाहन जीवन को विखंडित नहीं, बल्कि पूर्ण और अखण्ड रूप में स्वीकार करने की साधना का प्रतीक है।
८. कालरात्री
ॐ भायै दार्व्वाहारं प्रभाया ऽअग्न्येधं बुध्नस्य वृष्टृपायाभिषेक्तारं व्वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारं देवलोकाय पेशितारं मनुष्यलोकाय प्रकरितार ᳪ सर्व्वेब्भ्यो लोकेब्भ्य ऽउपसेक्तामव ऽॠत्यै व्वधायोपमन्थितारं मेधाय व्वासः पल्प्पूलीं प्रकामाय रजयित्त्रीम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कालरात्रि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कालरात्र्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — भय के लिए आहार रूप, प्रकाश के लिए अग्नि को प्रज्वलित करने वाली, मूल से वर्षा करने वाली, उत्तम रूप से सींचने वाली, आकाश को आवृत करने वाली, देवलोक को प्रेरित करने वाली, मनुष्यलोक को प्रवर्तित करने वाली, समस्त लोकों में सिंचन करने वाली, ऋत (नियम) की रक्षा के लिए विनाश करने वाली, मेधा के लिए वस्त्रस्वरूपिणी, इच्छा की पूर्ति के लिए प्रेरणा देने वाली देवी का स्मरण करता हूँ।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में कालरात्री को उग्र, व्यापक और नियामक शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। वह भय, प्रकाश, वर्षा, लोक-व्यवस्था और ऋत के संरक्षण—सभी में सक्रिय है। कालरात्री का आवाहन अव्यवस्था, अज्ञान और भय के नाश तथा साधक की मेधा और संकल्प-शक्ति को प्रखर करने के लिए किया जाता है।
९. निशाकरी
ॐ जिह्वां मे भेद्द्रं व्वाङ्महो मनो मन्युः स्वराड् भामः ॥ मोदाः प्रमोदा ऽअङ्गुलोरङ्गानि मित्त्रं मे सहः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः निशाकरि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः निशाकर्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — मेरी जिह्वा भद्र हो, मेरी वाणी महान हो; मन और मन्यु (आन्तरिक प्रेरणा) स्वराज्ययुक्त और दीप्त हों। मेरे लिए आनंद और विशेष आनंद हों; मेरी अंगुलियाँ और अंग सुदृढ़ हों; मित्रभाव और बल मेरे भीतर स्थापित हों।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में निशाकरी को आन्तरिक चेतना, वाणी और मानसिक बल की अधिष्ठात्री के रूप में स्मरण किया गया है। जिह्वा, वाणी, मन और अंगों का उल्लेख यह दर्शाता है कि साधना केवल मन तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व को आलोकित करती है। निशाकरी का आवाहन आत्मबल, सौहार्द और आन्तरिक प्रसन्नता की स्थापना के लिए किया जाता है।
१०. हुङ्कारी
ॐ हिङ्काराय स्वाहा हिङ्कृताय स्वाहा वक्रन्दते स्वाहोऽवक्कन्द्राय स्वाहा प्प्रोथते स्वाहा प्प्रप्पोथाय स्वाहा गन्धाय स्वाहा घ्राताय स्वाहा निविष्टाय स्वाहोपविष्टाय स्वाहा सन्दिताय स्वाहा वल्गते स्वाहासीनाय स्वाहा शयानाय स्वाहा स्वपते स्वाहा जाग्ग्रते स्वाहा कूजते स्वाहा प्प्रबुद्धाय स्वाहा व्विजृम्भमाणाय स्वाहा व्विचृत्ताय स्वाहा स ᳪ हानाय स्वाहोपस्थिताय स्वाहाऽयनाय स्वाहा प्प्रायणाय स्वाहा।।
ॐ भूर्भुवः स्वः हुङ्कारि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः हुङ्कार्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हिङ्कार के लिए स्वाहा, हिङ्कृत ध्वनि के लिए स्वाहा, क्रन्दन करने वाले के लिए स्वाहा, उलट-पलट ध्वनि करने वाले के लिए स्वाहा, प्रस्फुटित होने वाले के लिए स्वाहा, प्रथित होने वाले के लिए स्वाहा, गन्ध के लिए स्वाहा, गन्ध ग्रहण करने वाले के लिए स्वाहा, स्थित होने वाले के लिए स्वाहा, उपविष्ट होने वाले के लिए स्वाहा, संहित होने वाले के लिए स्वाहा, गति करने वाले के लिए स्वाहा, आसन में स्थित होने वाले के लिए स्वाहा, शयन करने वाले के लिए स्वाहा, स्वप्न देखने वाले के लिए स्वाहा, जाग्रत होने वाले के लिए स्वाहा, नाद करने वाले के लिए स्वाहा, प्रबुद्ध होने वाले के लिए स्वाहा, विस्तार पाने वाले के लिए स्वाहा, विचरण करने वाले के लिए स्वाहा, संहार करने वाले के लिए स्वाहा, समीप स्थित होने वाले के लिए स्वाहा, आगमन के लिए स्वाहा और प्रस्थान के लिए स्वाहा।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में हुङ्कारी योगिनी को ध्वनि, गति, स्थिति, जागरण, शयन, विस्तार और संहार—जीवन की प्रत्येक क्रिया और अवस्था में व्याप्त शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। यहाँ साधक अपने सम्पूर्ण अस्तित्व की सभी चेष्टाओं को देवी को समर्पित करता है। हुङ्कारी का आवाहन साधना में उग्रता, जागरूकता और सम्पूर्ण नियंत्रण की स्थापना का प्रतीक है।
११. सिद्धवेतालिका
ॐ अग्निश्चमे घर्म्मश्चमेऽर्कश्च मे सूर्य्यश्चमे प्राणश्च मेऽश्वमेधश्चमे पृथिवी च मेऽदितिश्चमे दितिश्चमे द्यौश्चमेऽङ्गुल्यः शक्व्वरयो दिशश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम् ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिवैतालिके इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धवैतालिकायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — मेरे लिए अग्नि हो, मेरे लिए घर्म (तप) हो, मेरे लिए अर्क (सूर्य का तेज) हो, मेरे लिए सूर्य हो, मेरे लिए प्राण हो, मेरे लिए अश्वमेध यज्ञ हो, मेरे लिए पृथ्वी हो, मेरे लिए अदिति हो, मेरे लिए दिति हो, मेरे लिए द्यौ (आकाश) हो, मेरे लिए अंगुलियाँ हों, मेरे लिए दिशाएँ हों—ये सभी यज्ञ के द्वारा सिद्ध हों।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में सिद्धवेतालिका को समस्त तत्त्वों—अग्नि, सूर्य, प्राण, पृथ्वी, आकाश और दिशाओं—को एकसूत्र में साधित करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। यहाँ साधक जीवन, शरीर, लोक और यज्ञीय व्यवस्था—सबको देवी के माध्यम से पूर्ण और समर्थ बनाने की कामना करता है। सिद्धवेतालिका का आवाहन व्यापक सिद्धि और तत्त्व-सामंजस्य का प्रतीक है।
१२. ह्रींकारी
ॐ पूषन् तव व्व्रते व्वयं न रिष्येम कदाचन । स्तोतारस्तऽइहस्म्मसि ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः ह्रींकारि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः ह्रींकार्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे पूषन् (पोषण करने वाले देव), आपके व्रत में स्थित होकर हम कभी नष्ट न हों। हम यहाँ आपके स्तोता और उपासक हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ह्रींकारी योगिनी को संरक्षण, पोषण और साधना में स्थिरता प्रदान करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। पूषन् का आह्वान यह दर्शाता है कि साधक देवी-व्रत में स्थित रहकर क्षय और विघ्न से सुरक्षित रहे। ह्रींकारी का आवाहन साधना में अखण्डता, रक्षण और निरन्तर आध्यात्मिक पोषण का भाव स्थापित करता है।
१३. भूतडामर
ॐ व्वेद्या व्वेदिः समाप्यते बर्हिषा बर्हिरिन्द्रियम् । यूपेन यूपऽआप्प्यते प्प्रणीतोऽअग्निऽग्निना ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः भूतडामरे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः भूतडामरायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — वेद्या (यज्ञवेदी) वेदि के द्वारा सम्पन्न होती है, बर्हि (कुश) के द्वारा इन्द्रियबल स्थापित होता है। यूप के द्वारा यूप की प्राप्ति होती है; अग्नि द्वारा प्रेरित अग्नि यज्ञ में प्रतिष्ठित होती है।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में भूतडामर योगिनी को यज्ञीय संरचना, साधन और क्रिया को सिद्ध करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। वेदी, बर्हि, यूप और अग्नि—ये सभी साधना के स्थूल आधार हैं। भूतडामर का आवाहन यह दर्शाता है कि जब साधन, विधि और चेतना एकरूप होते हैं, तब साधना पूर्ण और प्रभावशाली होती है।
१४. ऊर्ध्वकेशी
ॐ अयमग्ग्निः सहस्रिणो व्वाजस्य शतिनस्प्पतिः ।मूर्द्धा कवी रयीणाम् ।। ॐ भूर्भुवः स्वः उर्ध्वकेशि इहागच्छ इह तिष्ठ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः ऊर्ध्वकेशिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह अग्नि सहस्रों का स्वामी है, वह अन्न और बल के शतकों का अधिपति है; यह कवि (प्रज्ञावान अग्नि) समस्त ऐश्वर्यों और संपदाओं का शिरोभाग (मूर्धा) है।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऊर्ध्वकेशी योगिनी को उर्ध्वगामी चेतना और उत्कर्ष की शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। अग्नि को सहस्रों और शतकों का स्वामी कहकर उसकी व्यापक सामर्थ्य और ऐश्वर्यजनक भूमिका प्रकट की गई है। मूर्धा कवी का भाव यह दर्शाता है कि प्रज्ञा और तेज ही समस्त समृद्धि का शिखर है। ऊर्ध्वकेशी का आवाहन साधक में उन्नयन, तेज और चेतन उत्कर्ष की स्थापना के लिए किया जाता है।
१५. विरूपाक्षी
ॐ इमम्मे व्वरुणश्श्रुधी हवमद्या च मृडय । त्वामवस्युराचके ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः विरूपाक्षि इहागच्छ इह तिष्ठ।
ॐ भूर्भुवः स्वः विरूपाक्ष्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वरुण, आज मेरे इस आह्वान को सुनिए और मुझ पर कृपा कीजिए। मैं आपकी शरण में आया हुआ आपकी अनुकम्पा की याचना करता हूँ।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में विरूपाक्षी योगिनी का आवाहन वरुण-तत्त्व के माध्यम से किया गया है, जो ऋत, नियम और नैतिक व्यवस्था के अधिष्ठाता हैं। साधक स्वयं को वरुण की शरण में अर्पित करते हुए करुणा और क्षमा की प्रार्थना करता है। विरूपाक्षी का स्वरूप यह संकेत देता है कि देवी बाह्य और आंतरिक दोनों दृष्टियों से कर्मों का निरीक्षण कर उन्हें शुद्ध और संतुलित करती हैं।
१६. शुष्काङ्गी
ॐ यमाय यमसूमथर्व्वभ्योऽवतोकाᳪ संव्वत्सराय पर्या॒यिणी परिवत्सरायाविजाता-मिदावत्सरायातीत्वरीमद्वित्सरायातिष्व्वद्वरीव्वत्सराय व्विजर्ज्जराᳪ सम्वत्सराय पलिक्नीमृभुब्भ्यो ऽजिनसन्ध ᳪ साद्ध्येब्भ्यश्च्चर्मम्नम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शुष्काङ्गि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः शुष्काङ्ग्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — यह आहुति यम के लिए है, यमपुत्रों और अथर्वणों के लिए है; संतानरहित अवस्था के लिए, संवत्सर के लिए, परिवत्सर के लिए, अविजात, इदावत्सर, अतीतवत्सर और अद्वितीय वर्ष के लिए है; जीर्ण-शीर्ण होते हुए संवत्सर के लिए, पलिक्नी (जरा) के लिए, ऋभुओं के लिए तथा साध्यगणों के लिए चर्म (आवरण) अर्पित किया जाता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में शुष्काङ्गी योगिनी को काल, जरा और क्षय के तत्त्व से संयुक्त शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। यम, संवत्सर और विभिन्न कालावधियों का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह देवी समय के क्षरण, शरीर की नश्वरता और जीवन की सीमाओं का बोध कराती हैं। शुष्काङ्गी का आवाहन साधक को मृत्यु-बोध, वैराग्य और काल के प्रति जागरूक बनाकर आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करता है।
१७. नरभोजनी
ॐ असियमो ऽअस्यादित्यो ऽवन्नसिषित्रितो गुह्येन व्व्रतेन ॥ असि सोमेन समया व्विपृक्त ऽआहुस्ते त्रीणि दिवि बन्धनानि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः नरभोजनि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः नरभोजन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह (देवी/तत्त्व) असि-रूप है, यही आदित्य है, यह अन्न से पालन करने वाला है और गुप्त व्रत से युक्त है। यह सोम के साथ संयुक्त है, उससे पृथक भी कहा गया है; इसके तीन बंधन दिव्य लोक में बताए गए हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में नरभोजनी शक्ति को गूढ़ और रहस्यमय तत्त्व के रूप में स्मरण किया गया है। ‘असि’ और ‘आदित्य’ के उल्लेख से इसमें तेज, दंड और नियमन की शक्ति का संकेत मिलता है, जबकि अन्न और सोम के संदर्भ से पोषण तथा तृप्ति का भाव प्रकट होता है। गुप्त व्रत और दिवि स्थित तीन बंधन यह दर्शाते हैं कि यह शक्ति स्थूल भोग से परे, सूक्ष्म नियमों और आन्तरिक अनुशासन से जुड़ी है। नरभोजनी का स्मरण साधक को संयम, रहस्य-बोध और दिव्य मर्यादाओं के प्रति सजग करता है।
१८. फेत्कारी
ॐ मित्त्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि ॥ द्युम्नं चित्त्रश्र्श्रवस्तमम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः फेत्कारि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः फेत्कार्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह मित्र देव के द्वारा धारण की गई शक्ति है, वह देव की सहायता और कृपा है। उसका यश और तेज अत्यन्त उज्ज्वल तथा विचित्र कीर्ति वाला है। ॐ भूः भुवः स्वः — हे फेत्कारी, यहाँ आओ, यहाँ स्थित हो जाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में फेत्कारी शक्ति का आवाहन मित्र देव के तेज, संरक्षण और सौहार्द के तत्त्व के साथ किया गया है। ‘द्युम्न’ और ‘चित्रश्रवस्’ के उल्लेख से यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति प्रकाश, यश और व्यापक प्रभाव से युक्त है। भूर्-भुवः-स्वः के प्रयोग द्वारा इसे तीनों लोकों में व्याप्त शक्ति के रूप में स्थापित किया गया है। फेत्कारी का आवाहन साधक के जीवन में प्रकाश, संरक्षण और दिव्य ऊर्जा की स्थिर उपस्थिति का संकेत करता है।
१९. वीरभद्रा
ॐ अग्रे बृहन्नुषसामूर्ध्वो ऽअस्त्थान्निर्ज्जगन्वान् तमसो ज्ज्योतिषागात् ॥ अग्निर्भानुना रुशता स्वङ्ग ऽआजातो व्विश्वा सद्मान्यप्प्रा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वीरभद्रे इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः वीरभद्रायै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — जो उषाओं के अग्रभाग में महान् होकर ऊर्ध्व स्थित हुआ, वह अन्धकार से प्रकाश में प्रकट हुआ। अग्नि अपने दीप्तिमान तेज से, उज्ज्वल रूप में उत्पन्न होकर समस्त धामों को पूर्ण करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वीरभद्रा शक्ति को उदित होती हुई अग्नि और प्रकाश के तत्त्व से जोड़ा गया है। उषा, तमस और ज्योति के संदर्भ यह दर्शाते हैं कि यह शक्ति अज्ञान और अन्धकार को भेदकर तेजस्वी रूप में प्रकट होती है। अग्नि के माध्यम से वीर्य, साहस और रूपान्तरण की क्षमता का बोध कराया गया है। वीरभद्रा का स्मरण साधक में निर्भयता, आन्तरिक शक्ति और प्रकाशमय चेतना की स्थापना करता है।
२०. धूम्राक्षी
ॐ भगप्प्रणेतर्भग सत्यराधो भगे मान्धियमुदवाददन्नः । भग प्प्र नो जनय गोभिरश्वैर्भग प्प्र नृभिर्न्नृवन्तः स्याम ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः धूम्राक्षि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः ध्रूम्राक्ष्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे भग! तू मार्गदर्शक है, सत्य से आराध्य है। भग के द्वारा ही हमें बुद्धि और अन्न की प्राप्ति हो। हे भग! हमें गौओं और अश्वों से सम्पन्न कर, और हे भग! हम श्रेष्ठ मनुष्यों से युक्त हों।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में धूम्राक्षी शक्ति का स्मरण भग देवता के माध्यम से किया गया है, जो सौभाग्य, मार्गदर्शन और ऐहिक समृद्धि के दाता माने गए हैं। गौ, अश्व, अन्न और प्रज्ञा के उल्लेख से जीवन की पोषणात्मक और सामाजिक पूर्णता का संकेत मिलता है। धूम्राक्षी का आवाहन साधक के लिए भौतिक संसाधनों के साथ-साथ विवेक, सत्यनिष्ठा और संतुलित जीवन की कामना को अभिव्यक्त करता है।
२१. कलहप्रिया
ॐ सुप्रर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो गाय॒त्त्रं चक्षुर्बृहद्रयन्तरे प॒क्षौ ॥ स्तोम ऽआ॒त्मा छन्दाᳪस्यङ्गानि यजूᳪ षि नाम ॥ साम ते त॒नूर्व्वामदे॒व्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः श॒फाः सुप॒र्णोऽसि गरुत्मान्दिवंं गच्छ स्वः पत॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कलहप्रिये इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कलहप्रियायै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — तू सुपर्ण है, गरुड़स्वरूप है। त्रिवृत् तेरा सिर है, गायत्री तेरा नेत्र है, बृहद् और रयन्तर तेरे पंख हैं। स्तोम तेरा आत्मा है, छन्द तेरे अंग हैं, यजुष् तेरे नाम हैं। साम तेरा शरीर है, वामदेव्य तेरा स्वरूप है; यज्ञ के योग्य तेरा पुच्छ है, धिष्ण्य तेरे खुर हैं। हे सुपर्ण गरुत्मान्! स्वर्गलोक को जा, स्वः का स्वामी हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कलहप्रिया शक्ति का निरूपण गरुड़रूप, वैदिक छन्दों और यज्ञीय तत्त्वों के समन्वय के रूप में किया गया है। सुपर्ण और गरुत्मान् के उल्लेख से इसमें वेग, प्रभुत्व और ऊर्ध्वगमन की शक्ति व्यक्त होती है, जबकि गायत्री, साम, यजुष् और स्तोम का समावेश इसे यज्ञ और वाणी के पवित्र विधान से जोड़ता है। कलहप्रिया का स्मरण दर्शाता है कि यह शक्ति विरोध, गतिशीलता और तीव्रता के माध्यम से साधक को कर्मपथ पर अग्रसर करती है और उसे उच्च लोकों की ओर उन्मुख करती है।
२२. राक्षसी
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेब्भ्यः स्वधायिब्भ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिब्भ्यः स्व॒धा नमः॥ अक्षन्न्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धद्ध्वम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः राक्षसि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः राक्षस्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — स्वधा के अधिकारी पितरों को स्वधा नमस्कार है। स्वधा के अधिकारी पितामहों को स्वधा नमस्कार है। स्वधा के अधिकारी प्रपितामहों को स्वधा नमस्कार है। ये पितर तृप्त होकर भक्षण करते हैं, पितर संतुष्ट होते हैं; हे पितरो, हे पितरो, आप शुद्ध और पवित्र हों।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में राक्षसी शक्ति का संदर्भ पितृलोक और पितृयज्ञ के विधान से जुड़ा हुआ है। स्वधा के उच्चारण के साथ पितृ, पितामह और प्रपितामह का स्मरण वंशानुक्रम, ऋण-बोध और परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। पितरों की तृप्ति और शुद्धि का भाव यह संकेत करता है कि यह शक्ति सूक्ष्म लोकों में स्थित होकर वंश, संस्कार और कर्मफल से संबद्ध है। राक्षसी का स्मरण साधक को पितृऋण, कर्तव्य-बोध और आध्यात्मिक शुद्धि की ओर उन्मुख करता है।
२३. घोररक्ताक्षी
ॐ भूर्भुवः स्वः घोररक्ताक्षि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः घोररक्ताक्ष्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे घोररक्ताक्षी, यहाँ आओ, यहाँ स्थित हो जाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में घोररक्ताक्षी शक्ति का आवाहन वरुण देवता के तत्त्व के साथ किया गया है। वरुण ऋत, नियम और नैतिक अनुशासन के अधिष्ठाता माने जाते हैं; अतः इस शक्ति का स्वरूप भी गम्भीर, अनुशासक और उग्र है। भूर्-भुवः-स्वः के प्रयोग से इसे त्रिलोकव्यापी माना गया है। घोररक्ताक्षी का स्मरण साधक को नियम, सत्य और कर्म के बन्धनों के प्रति सजग करते हुए आन्तरिक भय और अव्यवस्था का शमन करता है।
२४. विशालाक्षी
ॐ व्वरुणः प्प्राविता भुवन्न्मित्त्रो व्विश्श्वाभिरूतिभिः । करतान्नः सुराधसः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विशालाक्षि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः विशालाक्ष्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — वरुण हमारी रक्षा करें, मित्र अपनी समस्त सहायता से हमारी रक्षा करें। वे हमें उत्तम अन्न और शुभ संपत्ति प्रदान करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में विशालाक्षी शक्ति का आवाहन वरुण और मित्र दोनों देवताओं के माध्यम से किया गया है। वरुण संरक्षण, नियम और व्यापक दृष्टि के प्रतीक हैं, जबकि मित्र सौहार्द, सहयोग और सामाजिक संतुलन का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन दोनों के संयुक्त स्मरण से विशालाक्षी का स्वरूप सर्वव्यापी संरक्षण और कल्याणकारी शक्ति के रूप में प्रकट होता है। विशालाक्षी का ध्यान साधक के जीवन में सुरक्षा, समरसता और पर्याप्त संसाधनों की स्थापना करता है।
२५. कौमारी
ॐ ह ᳪ सः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता व्वेदिषदतिथिर्द्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसद्व्योम-सदब्जागोजा ऽऋतजा ऽअद्रिजा ऽऋतं बृहत् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कौमारि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः कौमार्य नमः॥
हिन्दी अर्थ — जो शुद्ध में स्थित है, जो वसु है, अन्तरिक्ष में स्थित है; जो होता है, वेदि पर स्थित है, अतिथि के रूप में गृह में निवास करता है। जो मनुष्यों में श्रेष्ठ आसन पर स्थित है, ऋत में स्थित है, आकाश में स्थित है; जो जल में उत्पन्न है, गो से उत्पन्न है, पर्वत से उत्पन्न है, ऋत से उत्पन्न है—वह महान् ऋत है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कौमारी शक्ति का निरूपण सर्वव्यापक और पवित्र अग्नि-तत्त्व के रूप में किया गया है। शुचि, होता, वेदि और अतिथि जैसे शब्द इसे यज्ञीय व्यवस्था और अतिथि-सत्कार की पवित्र परंपरा से जोड़ते हैं। ऋत, द्यौ, अन्तरिक्ष, जल, गो और पर्वत के उल्लेख से इसका स्वरूप सृष्टि के प्रत्येक स्तर में व्याप्त नियम और शुद्धता का प्रतीक बनता है। कौमारी का स्मरण साधक के जीवन में पवित्रता, अनुशासन और वैदिक ऋत के अनुसार आचरण की प्रेरणा देता है।
२६. चण्डी
ॐ सुसन्दृशन्त्वा व्वयं मधवन् वन्दिषीमहि । प्रनूनं पूर्णबन्धुरस्तुतो या सि व्वशाँ२ ऽअनु योजान्विन्द्र ते हरी ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चण्डे इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः चण्ड्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे मधवन्! हम तुम्हें सुन्दर रूप में देखते हुए स्तुति करते हैं। जो पूर्ण रूप से सम्बद्ध और प्रशंसित है, वह तुम्हारे वश में है। हे इन्द्र! अपने दोनों हरि (अश्वों) को हमारे लिए युक्त करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में चण्डी शक्ति का स्मरण इन्द्र के पराक्रम और सौन्दर्ययुक्त तेज के माध्यम से किया गया है। स्तुति, वशत्व और हरि के संदर्भ से इसमें सामर्थ्य, गति और विजय का भाव निहित है। चण्डी का स्वरूप यहाँ उग्र होते हुए भी संरक्षण और साहस प्रदान करने वाला है, जो साधक को बाधाओं पर नियंत्रण और कर्म में दृढ़ता देता है। इस मंत्र का जप आन्तरिक शक्ति, आत्मविश्वास और संकटों पर विजय की चेतना को प्रबल करता है।
२७. वाराही
ॐ प्प्रतिपदसि प्प्रतिपदे त्त्वानुपदस्यनुपदे त्त्वा सम्पदसि सम्पदे त्वा तेजोऽसि तेजसे त्त्वा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वाराहि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः वाराह्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — तू प्रतिपद् है, प्रतिपद् के लिए तुझे अर्पित किया जाता है। तू अनुपद् है, अनुपद् के लिए तुझे अर्पित किया जाता है। तू सम्पद् है, सम्पद् के लिए तुझे अर्पित किया जाता है। तू तेज है, तेज के लिए तुझे अर्पित किया जाता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वाराही शक्ति को क्रम, प्रगति और तेज के तत्त्व के रूप में स्मरण किया गया है। प्रतिपद, अनुपद और सम्पद के उल्लेख से साधना के चरणबद्ध विकास और उपलब्धि का संकेत मिलता है, जबकि तेज का संदर्भ शक्ति और प्रभाव को दर्शाता है। वाराही का आवाहन साधक को निरन्तर उन्नति, स्थिरता और तेजस्वी संकल्प प्रदान करता है, जिससे साधना और जीवन दोनों में क्रमबद्ध सफलता प्राप्त होती है।
२८. मुण्डधारिणी
ॐ देवीरापो ऽअपान्नपाद्यो व ऽऊर्मिर्हविष्य ऽइन्द्रियावान्मदिन्तमः॥ तं देवेभ्यो देवत्त्रा दत्त शुक्क्रपेब्भ्यो येषां भाग स्थ स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मुण्डधारिणि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः मुण्डधारिण्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे देवियों रूपी आपः! आप अपान्नपाद् और ऊर्मि हैं, हव्यरूप हैं, इन्द्रिययुक्त और अत्यन्त आनन्ददायक हैं। उस (हवि) को देवों के लिए देवताओं द्वारा दत्त रूप में, शुद्ध पान करने वालों को अर्पित किया जाता है; जिनका इसमें भाग है, उनके लिए स्वाहा।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मुण्डधारिणी शक्ति का स्मरण आपः (जल) और हव्य के माध्यम से किया गया है। जल यहाँ जीवन, शुद्धि और प्रवाह का प्रतीक है, जबकि इन्द्रिय और मद का उल्लेख सूक्ष्म आनन्द और चेतना-विस्तार की ओर संकेत करता है। देवों को अर्पण और भाग-विधान से यह शक्ति यज्ञीय त्याग और वितरण के सिद्धान्त से जुड़ती है। मुण्डधारिणी का आवाहन साधक में शुद्धि, त्याग और आन्तरिक आनन्द की जागृति करता है।
२९. भैरवी
ॐ देवीद्वारो ऽअश्विना भिषजेन्द्रे सरस्वती ॥ प्प्राणं न वीर्य्यं नसि द्वारो दधुरिन्द्रियं व्वसुवने व्वसुधेयस्य व्यन्तु यज ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भैरवि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः भैरव्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे देवीद्वारो! अश्विनीकुमार, इन्द्र और सरस्वती (इन द्वारों पर स्थित हैं)। हे द्वारो! तुम हमारे प्राण और वीर्य को धारण करती हो, इन्द्रिय-शक्ति को स्थापित करती हो। वसु-प्राप्ति और धन-स्थापन के लिए (इन द्वारों से) यज्ञ सम्पन्न हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में भैरवी शक्ति का निरूपण देवीद्वार के रूप में किया गया है, जहाँ से प्राण, वीर्य और इन्द्रिय-शक्ति का प्रवाह होता है। अश्विनीकुमारों की चिकित्सा-शक्ति, इन्द्र की सामर्थ्य और सरस्वती की वाणी एवं प्रज्ञा—इन तीनों का संयोग इसे सशक्त और उग्र चेतना से युक्त करता है। भैरवी का स्मरण साधक के भीतर ऊर्जा के द्वारों को जाग्रत कर प्राणबल, साहस और साधना में तीव्रता प्रदान करता है, जिससे यज्ञीय और आध्यात्मिक प्रयोजन सिद्ध होते हैं।
३०. वीरा
ॐ देवी जोष्ट्री सरस्वत्यश्विनेन्द्रमवर्द्धयन्॥ श्र्श्रोत्त्रं न कर्णयोर्य्यशो जोष्ट्रीब्भ्यां दधुरिन्द्रियं व्वसुवने व्वसुधेयस्य व्यन्तु यज ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वीरे इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः वीरायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे देवी जोष्ट्री! तुम सरस्वती, अश्विनीकुमार और इन्द्र का वर्धन करती हो। तुम हमारे श्रवण को कानों में यशस्वी बनाती हो; जोष्ट्री शक्तियाँ इन्द्रिय-बल को धारण करती हैं। वसु-प्राप्ति और धन-स्थापन के लिए यज्ञ सम्पन्न हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वीरा शक्ति का स्मरण पोषण, संवर्धन और इन्द्रिय-सामर्थ्य के रूप में किया गया है। सरस्वती, अश्विनीकुमार और इन्द्र—तीनों के वर्धन का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति ज्ञान, चिकित्सा और पराक्रम को एक साथ पुष्ट करती है। श्रवण और इन्द्रिय-बल का संदर्भ साधक में ग्रहणशीलता, यश और कार्यक्षमता के विकास की ओर संकेत करता है। वीरा का आवाहन साधक को आन्तरिक दृढ़ता, इन्द्रिय-संतुलन और साधन-संपन्नता प्रदान करता है।
३१. भयङ्करी
ॐ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे ऽश्विनोर्बाहुब्भ्यां पूष्णो हस्ताब्भ्याम् । अश्विनोर्भैषज्ज्येन तेजसे ब्रह्मवर्चसायाऽभिषिञ्चामि सरस्वत्यै भैषज्ज्येन वीर्य्यायान्नाद्यायाऽभिषिञ्चामीन्द्रस्येन्द्रियेण वलोय श्र्श्रियै यशसे ऽभिषिञ्चामि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भयङ्करि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः भयङ्कर्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — सविता देव के प्रेरण से, अश्विनीकुमारों की भुजाओं द्वारा और पूषा के हाथों से तुझे अभिषिक्त करता हूँ। अश्विनीकुमारों की औषधि-शक्ति से तेज और ब्रह्मवर्चस के लिए अभिषेक करता हूँ; सरस्वती की औषधि-शक्ति से वीर्य और अन्न-समृद्धि के लिए अभिषेक करता हूँ; इन्द्र की इन्द्रिय-शक्ति से बल, श्री और यश के लिए अभिषेक करता हूँ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में भयङ्करी शक्ति का आवाहन अभिषेक और सशक्तिकरण के माध्यम से किया गया है। सविता की प्रेरणा, अश्विनीकुमारों की भैषज्य-शक्ति, सरस्वती की पोषणात्मक और इन्द्र की इन्द्रिय-शक्ति—इन सभी का समन्वय इसे अत्यन्त प्रभावशाली बनाता है। भयङ्करी का स्वरूप यहाँ भय को उत्पन्न करने वाला नहीं, बल्कि भय को नष्ट कर साधक को तेज, बल, श्री और यश से अभिषिक्त करने वाली शक्ति के रूप में प्रकट होता है। इसका जप साधक में आत्मबल, संरक्षण और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को दृढ़ करता है।
३२. वज्रधारिणी
ॐ कदाचन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे ॥ उपोपेन्नु सघवन्नमूल ऽइन्नु ते दानंं देवस्य पृच्यते ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वज्रधारिणि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः वज्रधारिण्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे इन्द्र! तुम कभी दुर्बल नहीं होते और दाता से विमुख नहीं होते। हे उदार दानवीर! तुम्हारे दान का मूल कभी नष्ट नहीं होता; तुम्हारा यह दान देवता के द्वारा मान्य और प्रशंसित होता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वज्रधारिणी शक्ति का स्मरण इन्द्र के अडिग पराक्रम और अक्षय दानशीलता के तत्त्व के साथ किया गया है। दुर्बलता के अभाव और दान के अविनाशी मूल का उल्लेख इस शक्ति को स्थैर्य, सामर्थ्य और संरक्षण से युक्त दर्शाता है। वज्रधारिणी का आवाहन साधक को अटल संकल्प, निर्भयता और पुण्यकारी कर्म में निरन्तरता प्रदान करता है, जिससे आध्यात्मिक और लौकिक दोनों स्तरों पर दृढ़ता स्थापित होती है।
३३. क्रोधा
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ᳪ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः क्रोधे इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः क्रोधायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे देवो! हम कानों से कल्याणकारी वचन सुनें, नेत्रों से पूजनीय कल्याण को देखें। स्थिर अंगों और स्वस्थ शरीर के साथ स्तुति करते हुए हम वह आयु प्राप्त करें जो देवों के लिए हितकारी हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में क्रोधा शक्ति का स्मरण शान्ति, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना के रूप में किया गया है। श्रवण और दर्शन के शुद्ध होने का भाव यह दर्शाता है कि यह शक्ति उग्रता को संयम और स्थिरता में रूपान्तरित करती है। स्थिर अंग, तुष्टि और देवहित आयु का उल्लेख साधक के जीवन में संतुलन, दीर्घायु और दिव्य उद्देश्य की पूर्ति की ओर संकेत करता है। क्रोधा का ध्यान साधक को आन्तरिक विक्षोभ से मुक्त कर सात्त्विक स्थिरता प्रदान करता है।
३४. दुर्मुखी
ॐ इषे त्त्वोर्जे त्वा व्वायव स्त्थ देवो वः सविता प्प्रार्प्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण ऽआप्यायध्द्वमग्ध्न्या ऽइन्द्राय भागंप्प्रजावतीरनमीवा ऽअयक्ष्मा सा वस्तेन ऽईशत माघशᳪ सो द्ध्रुवा ऽअस्मिन्गोपतौ स्यात बह्वीर्य्यजमानस्य पशून्पाहि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्मुखि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्मुख्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — इषा के लिए तुझे अर्पित करता हूँ, ऊर्ज के लिए तुझे अर्पित करता हूँ। हे वायो! स्थिर रहो। देव सविता तुम्हें श्रेष्ठतम कर्म के लिए प्रेरित करे। हे अग्निहीन गौओ! तुम पुष्ट होओ। इन्द्र के लिए भाग प्रदान करने वाली, प्रजावती, रोगरहित और क्षय-रहित बनो। जो धन से युक्त है, वह इस गोपति में स्थिर रहे। हे इन्द्र! यजमान के अनेक पशुओं की रक्षा करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में दुर्मुखी शक्ति का आवाहन पोषण, ऊर्जा और कर्म-सिद्धि के व्यापक संदर्भ के साथ किया गया है। इषा और ऊर्ज जीवन-शक्ति के प्रतीक हैं, जबकि सविता का प्रेरण तत्त्व श्रेष्ठ कर्म की दिशा को इंगित करता है। गौ, प्रजा, पशु और गोपति के उल्लेख से यह शक्ति ऐहिक समृद्धि, स्वास्थ्य और संरक्षण से जुड़ी हुई प्रकट होती है। दुर्मुखी का स्मरण साधक को कर्मठता, स्थिरता और संसाधनों की रक्षा के भाव से युक्त करता है, जिससे जीवन में अवरोधों का निराकरण होकर समृद्धि स्थिर होती है।
३५. प्रेतवाहिनी
ॐ देवी द्यावापृथिवी मखस्य वामद्य शिरो राद्ध्यासं देवयजने पृथिव्याः ॥ मखाय त्त्वा मखस्य त्त्वा शीर्ष्णे ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः प्रेतवाहिनि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः प्रेतवाहिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे देवी द्यावा और पृथिवी! तुम यज्ञ (मख) के लिए सुखद हो; देवयजन में पृथिवी का यह शिरः (प्रधान भाग) सम्पन्न हो। मख के लिए तुझे अर्पित करता हूँ, मख के शिरः के लिए तुझे अर्पित करता हूँ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में प्रेतवाहिनी शक्ति का स्मरण द्यावा–पृथिवी और यज्ञीय मख के शिरोभाग के रूप में किया गया है। द्यावा और पृथिवी का संयुक्त आवाहन स्थूल और सूक्ष्म लोकों के संयोग का संकेत देता है, जबकि मख और शीर्ष का उल्लेख यज्ञ की केन्द्रीय, संचालक शक्ति को प्रकट करता है। प्रेतवाहिनी का स्वरूप यहाँ वहन और संक्रमण से जुड़ा है—जो एक अवस्था से दूसरी अवस्था तक ऊर्जा और कर्मफल को ले जाने वाली शक्ति है। इसका स्मरण साधक को यज्ञीय अनुशासन, कर्तव्य-बोध और आध्यात्मिक रूपान्तरण की प्रक्रिया के प्रति सजग करता है।
३६. कर्का
ॐ व्विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव॥ यद्भद्रं तन्नऽआसुव ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कर्के इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कर्कायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे देव सविता! हमारे सभी दुःख और पाप दूर कर दो। जो कल्याणकारी है, वही हमें प्रदान करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कर्का शक्ति का स्मरण सविता देव के शुद्धिकरण और कल्याणकारी अनुग्रह के साथ किया गया है। ‘दुरित’ के परासरण और ‘भद्र’ के आस्वादन की कामना यह दर्शाती है कि यह शक्ति नकारात्मक कर्मफल और बाधाओं को दूर कर शुभता की स्थापना करती है। कर्का का आवाहन साधक के जीवन में शुद्धि, सुरक्षा और मंगलमय प्रवृत्तियों को दृढ़ करता है।
३७. दीर्घलम्बोष्ठी
ॐ असुन्वन्तमयजमानमिच्छस्तेनस्येत्यामन्विहि तस्क्करस्य ॥ अन्यमस्मदिच्छ सा त ऽइत्या नमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः दीर्घलम्बोष्ठि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः दीर्घलम्बोष्ठयै नमः॥
हिन्दी अर्थ — जो यज्ञ नहीं करता और सोम नहीं निचोड़ता, ऐसे यजमान को चाहने वाले, हे देवि! उस चोर का पीछा करो। हमारे से भिन्न किसी अन्य को खोजो; हे निर्ऋति देवि! तुम्हें नमस्कार हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में दीर्घलम्बोष्ठी शक्ति का आवाहन निर्ऋति देवी के माध्यम से किया गया है। निर्ऋति का तत्त्व अव्यवस्था, हानि और अधर्म से जुड़ा माना जाता है; यहाँ उसका स्मरण रक्षक और निवारक रूप में किया गया है। यज्ञ-विरोधी और चौर्य की प्रवृत्ति का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति अधर्म की ओर उन्मुख शक्तियों को दूर हटाकर साधक की रक्षा करती है। दीर्घलम्बोष्ठी का ध्यान साधक को अनुशासन, धर्मनिष्ठा और बाह्य-अन्तरिक सुरक्षा प्रदान करता है।
३८. मालिनी
ॐ अग्निश्च मे घर्म्मश्च मेऽर्क्कश्च मे सूर्य्यश्च मे प्प्राणश्च मेऽश्वमेधश्च मे पृथिवी च मेऽदितिश्च मे दितिश्च मे द्यौश्च मेऽङ्गुलयः शक्वरयो दिशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मालिनि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः मालिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — अग्नि और घर्म मेरे लिए हों, अर्क और सूर्य मेरे लिए हों; प्राण और अश्वमेध मेरे लिए हों। पृथिवी और अदिति मेरे लिए हों, दिति और द्यौ मेरे लिए हों; अंगुलियाँ, शक्वर और दिशाएँ—ये सभी यज्ञ के द्वारा मेरे लिए सिद्ध हों।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मालिनी शक्ति का स्मरण समग्र सृष्टि और यज्ञीय व्यवस्था के एकीकरण के रूप में किया गया है। अग्नि, सूर्य और प्राण जीवन-ऊर्जा के मूल स्रोत हैं, जबकि पृथिवी, द्यौ, अदिति और दिति सृष्टि के आधार और विस्तार को सूचित करते हैं। अंगुलियों, दिशाओं और छन्दों का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति स्थूल से सूक्ष्म तक सभी तत्त्वों को यज्ञ में समर्पित कर समन्वित करती है। मालिनी का ध्यान साधक के जीवन में समग्रता, संतुलन और यज्ञभाव की स्थापना करता है।
३९. मन्त्रयोगिनी
ॐ बह्वीनां पिता ब्बहुरस्य पुत्त्रश्ञ्चिश्चा कृणोति समनाव गत्य ॥ इषुधिः सङ्काः पृतनाश्ञ्च सर्व्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्प्रसूतः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मन्त्रयोगिनि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः मन्त्रयोगिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — वह अनेक का पिता है और अनेक उसका पुत्र हैं; वह सबको समान गति प्रदान करता है। तरकश में बाणों से युक्त होकर, समस्त सेनाओं के बीच, पीठ पर बँधा हुआ वह उत्पन्न होकर विजय प्राप्त करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मन्त्रयोगिनी शक्ति का निरूपण नेतृत्व, संगठन और विजय के तत्त्व के रूप में किया गया है। पिता–पुत्र और समान गति का उल्लेख सामूहिक समन्वय और अनुशासन को दर्शाता है, जबकि तरकश, बाण और पृतना के संदर्भ युद्धात्मक सामर्थ्य और रणनीति का संकेत देते हैं। मन्त्रयोगिनी का स्मरण साधक को वाणी, संकल्प और मंत्रबल के द्वारा अवरोधों पर विजय तथा कार्य-सिद्धि की क्षमता प्रदान करता है।
४०. कालमोहिनी
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः॥ बाहुब्भ्यामुत ते नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कालाग्निमोहिनि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कालाग्निमोहिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे रुद्र! तुम्हारे क्रोध को नमस्कार है, और तुम्हारे बाण को भी नमस्कार है। तुम्हारी भुजाओं को भी नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कालमोहिनी शक्ति का स्मरण रुद्र के उग्र और नियंत्रक तत्त्व के साथ किया गया है। मन्यु (क्रोध), इषु (बाण) और बाहु (भुजाएँ) रुद्र की संहारक तथा अनुशासक शक्तियों के प्रतीक हैं। यहाँ नमस्कार के माध्यम से उग्रता को स्वीकार कर उसे संतुलित करने का भाव निहित है। कालमोहिनी का आवाहन साधक को काल, भय और मोह से मुक्त कर रुद्र-तत्त्व के प्रति श्रद्धा, संयम और आन्तरिक जागरूकता प्रदान करता है।
४१. मोहिनी
ॐ ऋतञ्च मेऽमृतञ्च मेऽयक्ष्मञ्च मेऽनामयञ्च मे जीवातुश्च मे दीर्घायुत्त्वं च मेऽनमित्रञ्च मेऽभयञ्च मे सुखञ्च मे शयनञ्च मे सुषाश्च मे सुदिनञ्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मोहिनि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः मोहिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — ऋत और अमृत मेरे लिए हों; रोग और व्याधि का अभाव मेरे लिए हो। जीवन-शक्ति और दीर्घायु मेरे लिए हों; शत्रु-रहितता और अभय मेरे लिए हों। सुख, शयन, उत्तम विश्राम और शुभ दिन—ये सभी यज्ञ के द्वारा मेरे लिए सिद्ध हों।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मोहिनी शक्ति का स्मरण कल्याण, स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन की समग्र कामना के रूप में किया गया है। ऋत और अमृत से जीवन के नियम और अमरत्व-सदृश तत्त्व का बोध होता है, जबकि अभय, सुख और सुदिन जीवन की सात्त्विक पूर्णता को दर्शाते हैं। यज्ञ के द्वारा इन सभी की सिद्धि यह संकेत देती है कि मोहिनी शक्ति साधक को आकर्षण या भ्रम में नहीं, बल्कि संतुलन, स्वास्थ्य और आनन्दपूर्ण जीवन में स्थिर करती है।
४२. चक्रा
ॐ ते ऽआवरन्ति समनेव योषा मातेव पुत्रं बिव्भृतामुपस्थे ॥ अप शत्रून् व्विद्ध्यताᳪ सम्विदाने ऽआर्त्नी ऽइमे व्विष्फुरन्ती ऽअमित्यान् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चक्रे इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः चक्रायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — जैसे स्त्रियाँ एकत्र होकर (अपने को) घेर लेती हैं, जैसे माता पुत्र को गोद में धारण करती है। हे (अस्त्र)! संग्राम में शत्रुओं को दूर करो; ये भुजाएँ शत्रुओं को नष्ट करते हुए प्रहार करती हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में चक्रा शक्ति का निरूपण संरक्षण और संहार—दोनों रूपों में किया गया है। माता–पुत्र का उपमान सुरक्षा, आश्रय और करुणा को दर्शाता है, जबकि संग्राम और शत्रु-विनाश का भाव उग्र और रक्षात्मक सामर्थ्य को प्रकट करता है। चक्रा का स्मरण साधक को आन्तरिक सुरक्षा-वृत्त के साथ-साथ बाह्य बाधाओं को काटने वाली निर्णायक शक्ति प्रदान करता है, जिससे जीवन-पथ निर्भय और संरक्षित बनता है।
४३. कुण्डलिनी
ॐ वेद्य व्वेदिः समाप्यते बर्हिषारिन्द्रियम्। यूपेन यूपी ऽआप्प्यते प्रणीतोऽअग्निरग्निना ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कुण्डलिनि इहागच्छ इह तिष्ठ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कुण्डलिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — वेदि द्वारा वेदि पूर्ण होती है, बर्हि से इन्द्रिय-बल सम्पन्न होता है। यूप के द्वारा यूप की स्थापना होती है; प्रणीता अग्नि अग्नि से संयुक्त होती है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कुण्डलिनी शक्ति का संकेत यज्ञीय उपकरणों और अग्नि-तत्त्व के समन्वय से किया गया है। वेदि, बर्हि, यूप और अग्नि—ये सभी क्रमबद्ध स्थापना और जागरण के प्रतीक हैं। जैसे यज्ञ में अग्नि का प्रज्वलन भीतर की अग्नि को सक्रिय करता है, वैसे ही कुण्डलिनी का आवाहन साधक में सुप्त ऊर्जा को अनुशासित क्रम से ऊपर उठाता है। यह शक्ति साधना में स्थिरता, क्रम और आन्तरिक तेज की सिद्धि प्रदान करती है।
४४. बालुका
ॐ पावका नः सरस्वती व्वाजेभिर्व्वाजिनीवती यम व्वष्टु धियावसुः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बालुके इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः बालुकायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — पवित्र करने वाली सरस्वती हमें अन्न और बल से युक्त करें; वह बुद्धि-रूप वसु हमारे लिए यज्ञ को सिद्ध करे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में बालुका शक्ति का स्मरण सरस्वती के पावक और पोषक स्वरूप के साथ किया गया है। वाज और वाजिनीवती के उल्लेख से अन्न, ऊर्जा और सामर्थ्य का बोध होता है, जबकि धिया-वसु बुद्धि और विवेक की शुद्धता को दर्शाता है। बालुका का आवाहन साधक के जीवन में शुद्ध वाणी, पोषक ज्ञान और यज्ञीय चेतना की कोमल किन्तु स्थिर स्थापना करता है।
४५. कौबेरी
ॐ अस्क्कन्नमद्य देवेब्भ्य ऽआज्यᳪ संभ्रियासमघृणा व्विष्ष्णो मा त्त्वावक्क्रमिषं व्वसुमतीमग्ने ते च्छायामुपस्त्थेषं विष्णोः स्त्थानमसीतऽइन्द्रो वीर्य्यमकृष्णोदूर्ध्द्वोऽध्द्वर ऽआस्त्थात् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कौबेरि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कौबेर्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — आज देवताओं के लिए घृत युक्त आहुति एकत्र की गई है। हे विष्णो! मुझे उससे वंचित न करना। हे अग्ने! मैं तुम्हारी छाया में स्थित होऊँ; यह विष्णु का स्थान है। इन्द्र ने अपना वीर्य प्रकट किया और अध्वर में ऊर्ध्व स्थित हुआ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कौबेरी शक्ति का स्मरण यज्ञ, आहुति और ऐश्वर्य के संरक्षण के भाव से किया गया है। घृत, विष्णु और अग्नि के संदर्भ से यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति पोषण, स्थिरता और दैवी आश्रय से जुड़ी है। विष्णु का स्थान और इन्द्र का वीर्य ऐश्वर्य, सामर्थ्य और उन्नति के प्रतीक हैं। कौबेरी का आवाहन साधक को वैध साधनों से प्राप्त समृद्धि, संरक्षण और स्थिर ऐश्वर्य की दिशा में स्थापित करता है।
४६. यमदूती
ॐ ते ऽआचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं व्विब्भृतामुपस्त्थे ॥ अप शत्रून् व्विद्ध्यता ᳪ संव्विदाने आर्त्नी ऽइमे व्विष्फुरन्ती ऽअमित्रान् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः यमदूति इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः यमदूत्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — जैसे स्त्रियाँ एकत्र होकर चारों ओर से (किसी को) घेर लेती हैं, जैसे माता पुत्र को अपनी गोद में धारण करती है। संग्राम में शत्रुओं को दूर करो; ये भुजाएँ शत्रुओं को प्रहार करके नष्ट करती हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में यमदूती शक्ति का स्वरूप रक्षण और दण्ड—दोनों के संयुक्त भाव में प्रकट होता है। माता–पुत्र का उपमान संरक्षण, निग्रह और अपने अधिकार में रखने की शक्ति को दर्शाता है, जबकि शत्रु-विनाश का संदर्भ कठोर अनुशासन और न्याय का बोध कराता है। यमदूती का स्मरण साधक को अनुचित, विरोधी और बाधक तत्त्वों से रक्षा प्रदान करते हुए कर्मफल और मर्यादा के प्रति सजग करता है।
४७. करालिनी
ॐ मही द्यौः पृथिवी च नऽइमं यज्ञं मिमिक्षताम् ॥ पिपृतान्नो भरीमभिः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः करालिनि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः करालिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — महान् द्यौ और पृथिवी हमारे इस यज्ञ को संयुक्त रूप से सींचें और पुष्ट करें। वे हमें पोषण प्रदान करने वाले भारों (सहायताओं) से पूर्ण करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में करालिनी शक्ति का स्मरण द्यौ और पृथिवी के व्यापक, धारणात्मक तत्त्व के साथ किया गया है। द्यौ–पृथिवी का संयुक्त उल्लेख सृष्टि के ऊर्ध्व और अधः—दोनों आधारों से यज्ञ के पोषण का संकेत देता है। यज्ञ का “मिमिक्षण” और “पिपृतान्” भाव यह दर्शाता है कि यह शक्ति कर्म को बल, विस्तार और स्थिरता प्रदान करती है। करालिनी का आवाहन साधक को व्यापक समर्थन, सहनशक्ति और यज्ञीय कर्म में दृढ़ आधार प्रदान करता है।
४८. कौशिकी
ॐ उपामगृहीतोऽसि सावित्रोऽसि चनोभाश्श्चनोधा ऽअसि च नो महि धेहि ॥ जिन्व यज्ञं जिन्व यज्ञपतिं भगाय देवाय त्त्वा सवित्रे।
ॐ भूर्भुवः स्वः कौशिकि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कौशिक्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — तुम सविता द्वारा ग्रहण किए गए हो; तुम हमारे लिए प्रकाश और आधार हो। हमें महान् शक्ति प्रदान करो। यज्ञ को पुष्ट करो, यज्ञपति को पुष्ट करो; हे भग देव! सविता के लिए तुझे अर्पित किया जाता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कौशिकी शक्ति का स्मरण सविता और भग देवता के पोषणात्मक तथा प्रकाशमय तत्त्व के साथ किया गया है। ग्रहण, प्रकाश और आधार के संकेत से यह शक्ति स्थिरता और प्रेरणा प्रदान करने वाली बनती है। यज्ञ और यज्ञपति के संवर्धन का भाव यह दर्शाता है कि कौशिकी साधक के कर्म, साधना और नेतृत्व—तीनों को बल देती है। इसका आवाहन जीवन में प्रकाश, समर्थन और कार्य-सिद्धि की निरन्तरता स्थापित करता है।
४९. यक्षिणी
ॐ आप्यायस्य समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा व्वाजस्य सङ्गथे ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः यक्षिणि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः यक्षण्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सोम! तुम्हारा पोषण सर्वत्र से तुम्हारे पास आए; तुम्हारी वीर्यशक्ति (वृष्ण्य) पूर्ण हो। तुम अन्न और बल की प्राप्ति में सहायक बनो।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में यक्षिणी शक्ति का स्मरण सोम के पोषणकारी और बलवर्धक तत्त्व के साथ किया गया है। ‘आप्याय’ और ‘वृष्ण्य’ से वृद्धि, पुष्टि और ऊर्जा का बोध होता है, जबकि वाज-संगति अन्न, सामर्थ्य और सिद्धि को दर्शाती है। यक्षिणी का आवाहन साधक के जीवन में वृद्धि, संसाधन-संपन्नता और स्थिर बल की स्थापना करता है।
५०. भक्षिणी
ॐ कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि। समापोऽअद्भिरग्मतसमोषधीभिरोषधीः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भक्षिणि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः भक्षिण्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — तू समुद्र का अंश है; तुझे पृथ्वी से ऊपर उठाता हूँ। यह जल, जलों के साथ गया है और ये ओषधियाँ, ओषधियों के साथ गई हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में भक्षिणी शक्ति का स्मरण समुद्र, जल और ओषधि के पारस्परिक संबंध के माध्यम से किया गया है। समुद्र का अंश, जल का जल से और ओषधियों का ओषधियों से संयुक्त होना पोषण, ग्रहण और रूपान्तरण की स्वाभाविक प्रक्रिया को दर्शाता है। भक्षिणी का स्वरूप यहाँ उपभोग मात्र न होकर जीवन-तत्त्वों के सम्यक् अवशोषण और संतुलन का है। इसका आवाहन साधक में उचित ग्रहण, पाचन और जीवन-ऊर्जा के समन्वित प्रवाह की स्थापना करता है।
५१. कौमारी
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कौमारि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः कौमार्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हम त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले) की उपासना करते हैं, जो सुगन्धित हैं और पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। जैसे पक्व फल बेल से स्वतः मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम बन्धन से मुक्त हों, मृत्यु से नहीं।
हे कौमारि, यहाँ आओ, यहाँ स्थित हो जाओ। कौमारी को नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कौमारी शक्ति का स्मरण महामृत्युञ्जय भाव के साथ किया गया है। त्र्यम्बक का उल्लेख संरक्षण, करुणा और अमृतत्व के तत्त्व को प्रकट करता है, जबकि उर्वारुक के उपमान से सहज मुक्ति और स्वाभाविक विमोचन का संकेत मिलता है। भूर्-भुवः-स्वः के द्वारा कौमारी को त्रिलोकव्यापी शक्ति के रूप में आवाहित किया गया है। कौमारी का ध्यान साधक को पुष्टि, दीर्घायु, रोग-निवारण और भयमुक्त चेतना प्रदान करता है।
५२. मन्त्रवाहिनी
ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुम्म ऽइषाण सर्वलोकं मऽइषाण॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मन्त्रवाहिनि इहागच्छ इह तिष्ठ ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः मन्त्रवाहिन्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — श्री और लक्ष्मी तुम्हारी पत्नियाँ हैं; अहोरात्र तुम्हारे पार्श्व में स्थित हैं। नक्षत्र तुम्हारा रूप हैं और अश्विनीकुमार तुम्हारा मुख हैं। तुम अन्न प्रदान करने वाले हो; हमें अन्न दो, सब लोकों में हमें अन्न प्रदान करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मन्त्रवाहिनी शक्ति का स्मरण ऐश्वर्य, काल और लोकव्यापी पोषण के तत्त्व के साथ किया गया है। श्री और लक्ष्मी से समृद्धि तथा सौभाग्य का बोध होता है, जबकि अहोरात्र और नक्षत्र कालचक्र और विश्व-व्यवस्था को दर्शाते हैं। अश्विनीकुमारों का उल्लेख जीवनदायी और चिकित्सात्मक शक्ति का संकेत देता है। मन्त्रवाहिनी का आवाहन साधक के जीवन में मंत्रबल के माध्यम से ऐश्वर्य, निरन्तरता और सर्वव्यापी पोषण की स्थापना करता है।
५३. विशालाक्षी
ॐ व्विष्णोरराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्त्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोध्रुवोसि वैष्णवमसि विष्णवे त्वा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विशालाक्षि इहागच्छ इह तिष्ठ।। ॐ भूर्भुवः स्वः विशालाक्ष्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — तू विष्णु का चिह्न है, विष्णु के अस्त्र में स्थित है। तू विष्णु की शक्ति है, विष्णु का ध्रुव तत्त्व है। तू वैष्णव है; विष्णु के लिए तुझे अर्पित किया जाता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में विशालाक्षी शक्ति का स्मरण विष्णु-तत्त्व के पूर्ण आश्रय और स्थैर्य के रूप में किया गया है। विष्णु के चिह्न, अस्त्र, शक्ति और ध्रुवत्व का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति संरक्षण, पालन और अविचल आधार से जुड़ी हुई है। वैष्णव-भाव के माध्यम से इसे धर्म, मर्यादा और लोक-संरक्षण की शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। विशालाक्षी का ध्यान साधक को स्थिर दृष्टि, व्यापक संरक्षण और विष्णु-तत्त्व से अनुप्राणित संतुलित जीवन प्रदान करता है।
५४. कार्मुकी
ॐ ब्राह्मणमद्य विदेयं पितृमन्तं पैतृमत्यमृषिमार्षेय ᳪ सुधातुदक्षिणम्। अस्मद्राता देवत्रा गच्छत प्रदातारमाविशत ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कार्मुकि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः कार्मुक्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — आज हम ब्राह्मण को प्रदान करते हैं, जो पितृसम्बद्ध है, पितृपरंपरा से युक्त है, ऋषि-परंपरा से सम्बद्ध है और उत्तम दक्षिणा से युक्त है। हे देवों! यह दान तुम तक पहुँचे; दान देने वाले में प्रविष्ट हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कार्मुकी शक्ति का स्मरण दान, परंपरा और कर्मफल के संचार के माध्यम से किया गया है। ब्राह्मण, पितृ और ऋषि का उल्लेख वैदिक उत्तराधिकार और यज्ञीय अनुशासन को दर्शाता है, जबकि दक्षिणा कर्म की पूर्णता का संकेत है। देवत्रा गमन और दाता में प्रविष्ट होने का भाव यह स्पष्ट करता है कि यह शक्ति दान को निष्फल नहीं होने देती, बल्कि उसे देव-लोक और दाता—दोनों में प्रतिष्ठित करती है। कार्मुकी का ध्यान साधक को कर्तव्यनिष्ठा, पुण्य-संचय और कर्म के शुद्ध प्रवाह की समझ प्रदान करता है।
५५. व्याघ्री
ॐ या व्याघ्रं विषूचिकोभौ वृकं च रक्षति। श्येनं पतत्रिण ᳪ सि ᳪसेमं पात्व ᳪ हसः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः व्याघ्रि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः व्याघ्र्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — जो व्याघ्र और विषूचिका, दोनों से रक्षा करती है; जो वृक (भेड़िया) से भी रक्षा करती है; जो श्येन (गरुड़/बाज) और अन्य पंखधारी प्राणियों से रक्षा करती है—वह हमें हिंसा से सुरक्षित रखे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में व्याघ्री शक्ति का स्मरण रक्षक और निग्रहकारी तत्त्व के रूप में किया गया है। व्याघ्र, वृक और पतत्रियों का उल्लेख बाह्य हिंसा, भय और आकस्मिक आघातों के प्रतीक हैं, जिनसे यह शक्ति संरक्षण प्रदान करती है। व्याघ्री का स्वरूप उग्र होते हुए भी रक्षात्मक है, जो साधक को प्राकृतिक, सामाजिक और आन्तरिक संकटों से बचाने वाली जागरूक शक्ति के रूप में कार्य करता है। इसका आवाहन निर्भयता, सतर्कता और सुरक्षित जीवन-पथ की स्थापना करता है।
५६. महाराक्षसी
ॐ एका च मे तिस्रश्च मे तिस्रश्च मे पञ्च मे पञ्च मे सप्त च मे सप्त च मे नव च मे नव च मऽएकादश च मऽएकादश च मे त्रयोदश च मे त्रयोदश च मे पञ्चदश च मे पञ्चदश च मे सप्तदश च मे सप्तदश च मे नवदश च मे नवदश च मऽएकवि ᳪ शतिश्च्च म ऽएकवि ᳪ शतिश्च्च मे त्रयोवि ᳪ शतिश्च्च मे त्रयोवि ᳪ शतिश्च्च मे पञ्चवि ᳪ शतिश्च्च मे पञ्चवि ᳪ शतिश्च्च मे सप्तवि ᳪ शतिश्च्च मे सप्तवि ᳪ शतिश्च्च मे नववि ᳪ शतिश्च्च मे नववि ᳪ शतिश्च्च म ऽएकत्रि ᳪ शश्च्च म ऽएकत्रि ᳪ शश्च्च मे त्रयस्त्रि ᳪ शश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महाराक्षसि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः महाराक्षस्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — एक और तीन, तीन और पाँच, पाँच और सात, सात और नौ; नौ और ग्यारह, ग्यारह और तेरह, तेरह और पन्द्रह, पन्द्रह और सत्रह, सत्रह और उन्नीस; उन्नीस और इक्कीस, इक्कीस और तेईस, तेईस और पच्चीस, पच्चीस और सत्ताईस, सत्ताईस और उनतीस, उनतीस और इकतीस, इकतीस और तैंतीस—ये सभी यज्ञ के द्वारा सिद्ध हों।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में महाराक्षसी शक्ति का स्मरण संख्यात्मक क्रम और विस्तार के माध्यम से किया गया है। क्रमशः बढ़ती संख्याएँ वृद्धि, विस्तार और समग्रता का बोध कराती हैं, जो यज्ञीय विधान में पूर्णता और सिद्धि का प्रतीक है। यहाँ संख्या केवल गणना नहीं, बल्कि शक्ति के क्रमिक प्रसार और नियंत्रण का संकेत है। महाराक्षसी का आवाहन साधक को विशाल सामर्थ्य, व्यवस्थित वृद्धि और कर्म-सिद्धि की व्यापक क्षमता से युक्त करता है।
५७. प्रेतभक्षिणी
ॐ प्रेता जयता नर ऽइन्द्रो वः शर्म्म यच्छतु। उग्रावः सन्तु बाहवो नाधृष्या यथासथ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः प्रेतभक्षिणि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः प्रेतभक्षिण्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे मनुष्यो! प्रेतों पर विजय प्राप्त करो; इन्द्र तुम्हें कल्याण और आश्रय प्रदान करें। तुम्हारी भुजाएँ उग्र हों, अजेय हों और दृढ़ रहें।
ॐ भूः भुवः स्वः — हे प्रेतभक्षिणि, यहाँ आओ, यहाँ स्थित हो जाओ। ॐ भूः भुवः स्वः — प्रेतभक्षिणी को नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में प्रेतभक्षिणी शक्ति का स्मरण विजय, संरक्षण और उग्र सामर्थ्य के रूप में किया गया है। इन्द्र के द्वारा शर्म (आश्रय/कल्याण) की कामना और उग्र, अजेय भुजाओं का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति भय, प्रेत-बाधा और दुर्बलता पर नियंत्रण स्थापित करती है। भूर्-भुवः-स्वः के माध्यम से इसे त्रिलोकव्यापी रूप में आवाहित किया गया है। प्रेतभक्षिणी का ध्यान साधक को निर्भयता, रक्षा और बाधा-निवारण की दृढ़ चेतना प्रदान करता है।
५८. धूर्जटी
ॐ असङ्ख्याता सहस्राणि ये रुद्द्राऽअधिभूम्म्याम्। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः धूर्जटि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः धूर्जट्यै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — जो असंख्य सहस्र रुद्र पृथ्वी पर स्थित हैं, उन सबके सहस्र योजन दूर तक फैले बाण—तू वही है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में धूर्जटी शक्ति का स्मरण रुद्र के व्यापक, उग्र और सर्वव्यापी सामर्थ्य के साथ किया गया है। असंख्य रुद्रों और उनके दूरगामी बाणों का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति सीमित नहीं, बल्कि व्यापक प्रभाव रखने वाली है। धूर्जटी का स्वरूप यहाँ संहार और संरक्षण—दोनों का संयुक्त प्रतीक है, जो अधर्म और अव्यवस्था को दूर कर संतुलन स्थापित करता है। इसका आवाहन साधक को रुद्र-तत्त्व की व्यापक चेतना, निर्भयता और दृढ़ आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।
५९. विकटा
ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो गायत्रं चक्षुबृहद्रथन्तरे पक्षौ। स्तोमऽआत्मा छन्दा ᳪ स्यङ्गानि यजू ᳪ षि नाम। साम ते तनूर्वामदेव्यं यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः। सुपर्णोऽसि गरुत्मान्दिवं गच्छ स्वः पत ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विकटे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः विकटायै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — तू सुपर्ण है, गरुत्मान् है। त्रिवृत् तेरा शिर है, गायत्री तेरा नेत्र है, बृहद् और रथन्तर तेरे पंख हैं। स्तोम तेरा आत्मा है, छन्द तेरे अंग हैं, यजुष् तेरे नाम हैं। साम तेरा शरीर है, वामदेव्य तेरा स्वरूप है; यज्ञ के योग्य तेरा पुच्छ है, धिष्ण्य तेरे खुर हैं। हे सुपर्ण गरुत्मान्! स्वर्गलोक को जा, स्वः का स्वामी हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में विकटा शक्ति का निरूपण गरुत्मान् के विराट और समन्वयात्मक स्वरूप के रूप में किया गया है। वेद, छन्द, स्तोम और यज्ञीय अवयवों का एकीकृत वर्णन यह दर्शाता है कि यह शक्ति विविध तत्त्वों को समेटकर एक प्रबल, गतिशील और ऊर्ध्वगामी चेतना का निर्माण करती है। विकटा का स्मरण साधक को वेदात्मक अनुशासन, तीव्र गति और उच्च लोकों की ओर उन्मुख करने वाली व्यापक शक्ति से जोड़ता है।
६०. घोररूपा
ॐ या ते रुद्द्र शिवातनूरघोराऽपापकाशिनी। तयानस्तन्न्वाशन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः घोररूपे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः घोररूपायै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे रुद्र! तुम्हारी जो शिव और अघोर, पापों को नष्ट करने वाली तनु है, उसी से हमें कल्याण प्रदान करो। हे गिरिशन्त! उसी शुभ दृष्टि से हमारी ओर देखो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में घोररूपा शक्ति का स्मरण रुद्र के अघोर और शिव—दोनों तत्त्वों के समन्वय के रूप में किया गया है। यद्यपि नाम घोररूपा है, किंतु यहाँ उग्रता का उद्देश्य संहार नहीं, बल्कि पाप-नाश और कल्याण की स्थापना है। गिरिशन्त की कृपादृष्टि साधक के प्रति रक्षक और शुद्धिकारक भाव को दर्शाती है। घोररूपा का ध्यान साधक को भय से पार ले जाकर रुद्र की अघोर, शान्त और कल्याणकारी शक्ति में स्थापित करता है।
६१. कपालिका
ॐ देवी द्यावापृथिवी मखस्य वामद्य शिरो राद्ध्यासं देवयजने पृथिव्याः। मखाय त्त्वा मखस्य त्त्वा शीर्ष्णे।।
ॐ भूर्भुवः स्वः कपालिके इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः कपालिकायै नमः।।
हिन्दी अर्थ — हे देवी द्यावा और पृथिवी! तुम यज्ञ (मख) के लिए अनुकूल हो; देवयजन में पृथिवी का यह शिरः (प्रधान भाग) सिद्ध हो। मख के लिए तुझे अर्पित करता हूँ, मख के शिरः के लिए तुझे अर्पित करता हूँ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कपालिका शक्ति का स्मरण यज्ञ के शिरोभाग और आधार-तत्त्व के रूप में किया गया है। द्यावा–पृथिवी का संयुक्त आवाहन ऊर्ध्व और अधः—दोनों लोकों की सहभागिता को दर्शाता है, जबकि मख और शीर्ष का उल्लेख यज्ञ की केन्द्रीय, धारक शक्ति को प्रकट करता है। कपालिका का स्वरूप यहाँ धारण, नियंत्रण और संक्रमण से जुड़ा है, जो यज्ञीय कर्म को पूर्णता तक ले जाता है। इसका ध्यान साधक को साधना में गम्भीरता, कर्तव्य-बोध और आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करता है।
६२. निकला
ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदं। समूढमस्य पा ᳪ सुरे ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः निकले इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः निकलायै नमः।।
हिन्दी अर्थ — यह विष्णु है, जिसने तीन प्रकार से अपने पद स्थापित किए। उसका परम पद देवताओं के लिए स्पष्ट रूप से प्रकाशित है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में निकला शक्ति का स्मरण विष्णु के त्रिविक्रम तत्त्व के साथ किया गया है। तीन पदों का विस्तार सृष्टि, संरक्षण और संतुलन के सिद्धान्त को दर्शाता है, जबकि परम पद का उल्लेख दिव्य आश्रय और अंतिम लक्ष्य की ओर संकेत करता है। निकला का स्वरूप यहाँ मार्गदर्शक और स्थिर आधार के रूप में प्रकट होता है, जो साधक को क्रमबद्ध प्रगति और विष्णु-तत्त्व में प्रतिष्ठा प्रदान करता है।
६३. अमला
ॐ व्वृष्ण ऽउर्म्मिरसि राष्ट्रंदा मे देहि स्वाहा व्वृष्ण ऽउर्म्मिरसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि व्वृषसेनोऽसि राष्ट्रदा राष्ट्रं मे देहि स्वाहा व्वृषसेनोऽसि राष्ट्रदा राष्ट्रममुष्मै देहि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अमले इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः अमलायै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — तू वृष्णि-ऊर्मि है, राष्ट्र देने वाली है; मुझे राष्ट्र प्रदान कर, स्वाहा। तू वृष्णि-ऊर्मि है, राष्ट्र देने वाली है; अमुक के लिए राष्ट्र प्रदान कर। तू वृषसेन है, राष्ट्र देने वाला है; मुझे राष्ट्र प्रदान कर, स्वाहा। तू वृषसेन है, राष्ट्र देने वाला है; अमुक के लिए राष्ट्र प्रदान कर।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अमला शक्ति का स्मरण राष्ट्र, स्थैर्य और सामूहिक कल्याण के तत्त्व के रूप में किया गया है। वृष्णि-ऊर्मि और वृषसेन के उल्लेख से शक्ति, संगठन और नेतृत्व का बोध होता है, जबकि ‘राष्ट्रदा’ पद सामूहिक व्यवस्था और संरक्षण की क्षमता को दर्शाता है। अमला का स्वरूप यहाँ शुद्ध, स्थिर और समाजधारण करने वाली शक्ति का है। इसका आवाहन साधक को व्यक्तिगत हित से आगे बढ़कर सामूहिक उत्तरदायित्व, स्थिर शासन-भाव और निष्कलंक कर्तव्यबोध की प्रेरणा देता है।
६४. सिद्धिप्रदा
ॐ भायै दार्व्वाहार प्रभाया ऽअग्न्येधं ब्रध्नस्य विष्टपायाभिषेक्तारं व्वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारं देवलोकाय पेशतारं मनुष्यलोकाय प्प्रकरितार ᳪ सर्वेभ्यो लोकेब्भ्य ऽउपसेक्तारमव ऽऋत्यै वृधायोपमन्थितारं मेधाय व्यासः पल्पूली प्रकामाय रजयित्त्रीम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिप्रदे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सिद्धिप्रदायै नमः ॥
हिन्दी अर्थ — भय से रक्षा करने वाली, आहार देने वाली, प्रभा प्रदान करने वाली; अग्नि-प्रदीपन करने वाली; ब्रध्न (सूर्य) के लोक में अभिषेक करने वाली; श्रेष्ठ नाक (स्वर्ग) को चारों ओर से आवृत करने वाली; देवलोक को प्रकाशित करने वाली और मनुष्यलोक को प्रवृत्त करने वाली; समस्त लोकों को सींचने वाली; अवऋति के लिए वृद्धि करने वाली; मेधा के लिए मन्थन करने वाली; कामना के लिए प्रेरित करने वाली—उसको (हम अर्पित करते हैं/स्मरण करते हैं)।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सिद्धिप्रदा शक्ति का निरूपण बहुस्तरीय लोक-संचालक और सिद्धिदायिनी तत्त्व के रूप में किया गया है। भय-निवारण, आहार, प्रभा, मेधा और कामना—ये सभी जीवन की मूल आवश्यक सिद्धियाँ हैं, जिन्हें यह शक्ति क्रमशः प्रदान करती है। देवलोक और मनुष्यलोक—दोनों में इसके कार्य का उल्लेख यह दर्शाता है कि सिद्धिप्रदा स्थूल और सूक्ष्म, दोनों स्तरों पर फल देने वाली है। इसका आवाहन साधक को बुद्धि, उन्नति, तेज और अभीष्ट सिद्धियों की समग्र प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है।
ध्यान
ॐ खड्गं चक्रगदेषुचापपरिधाञ्छूलं भुशुण्डीं शिरः। शङ्ख सन्दधर्तं करैस्त्रिनयनां सर्वाङ्गभूषावृताम् ॥ नीलाश्मद्युतिभास्यपाददशकां सेवे महाकालिकां ।
यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधुं कैटभम् ॥ ॐ अक्षस्रक्परशुं गदेषुकुलिशं पद्यं धनुष्कुण्डिकां । दण्डं शक्तिमसिं च चर्म जलजं घण्टां सुराभाजनं ।।
शूलं पाशसुदर्शने च दधतीं हस्तैः प्रसन्नाननां । सेवे सैरिभमर्दिनीमिह महालक्ष्मीं सरोजस्थिताम् ॥
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं । हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् ॥ गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतामहा ।
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ।।
हिन्दी अर्थ —
(प्रथम ध्यान) मैं उस महाकालिका का ध्यान करता हूँ जिनके हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, शूल, भुशुण्डी और शिर हैं; जो शंख धारण किए हुए, त्रिनेत्रा हैं और समस्त अंगों में आभूषणों से विभूषित हैं। जिनके चरण नीलाश्म के समान दीप्त हैं। वही देवी तब स्तुति की गईं जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में स्थित थे और ब्रह्मा मधु–कैटभ का वध करने हेतु उद्यत हुए।
(द्वितीय ध्यान) जिनके हाथों में अक्षसूत्र, परशु, गदा, बाण, कुलिश, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, चर्म, कमल, घण्टा और सुरापात्र है; जो शूल, पाश और सुदर्शन भी धारण करती हैं; जिनका मुख प्रसन्न है—उन सैरिभमर्दिनी महालक्ष्मी का मैं ध्यान करता हूँ, जो कमल पर स्थित हैं।
(तृतीय ध्यान) जिनके हाथों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मुसल, चक्र, धनुष और बाण हैं; जो घनघोर मेघों के मध्य चमकते चन्द्रमा के समान प्रभा से युक्त हैं; जो गौरी के शरीर से उत्पन्न होकर तीनों लोकों का आधार हैं—उन शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली पूर्वाम्नाय की अधिष्ठात्री सरस्वती का मैं ध्यान करता हूँ।
संक्षिप्त टीका—
यह ध्यान तीन महाशक्तियों—महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती—के संयुक्त स्वरूप का निरूपण करता है। महाकाली संहार, काल और उग्र संरक्षण की अधिष्ठात्री हैं; महालक्ष्मी ऐश्वर्य, शक्ति और विजय की दायिनी हैं; तथा महासरस्वती ज्ञान, वाणी और दैत्य-विनाश की चेतन शक्ति हैं। विविध आयुध, आभूषण और मुद्राएँ यह दर्शाती हैं कि ये देवियाँ केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि सृष्टि, स्थिति और संहार—तीनों कर्मों में सक्रिय हैं। इस ध्यान का उद्देश्य साधक को भय, अभाव और अज्ञान से मुक्त कर उसे पूर्ण शक्ति, ऐश्वर्य और प्रज्ञा में प्रतिष्ठित करना है।
प्राणप्रतिष्ठा
ॐ मनो जूतिर्ज्जुषतामाज्ज्यस्य बृहस्पतिर्य्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं य्यज्ञ ᳪ समिमं दधातु। विश्वे देवासऽइह मादयन्तामों प्रतिष्ठ ॥ ॐ आवाहयाम्यहं देवी योगिनीं परमेश्वरीम् । योगाभ्यासेन संतुष्टा परं ध्यानसमन्विता ॥
दिव्यकुण्डल संकाशा दिव्यज्वाला त्रिलोचना। मूर्तिमती ह्यमूर्त्ता च उग्राचैवोग्ररूपिणी ॥ अनेक भावसंयुक्ता संसारार्णवतारिणी ॥ यज्ञे कुर्वन्तु निर्विघ्नं श्रेयो यच्छन्तु मातरः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती सहिताः दिव्ययोगिन्यादि चतुष्षष्टि योगिन्यः इहागच्छत इह तिष्ठत।
हिन्दी अर्थ —
घृत के साथ संयुक्त मन और तेज इस यज्ञ को स्वीकार करें। बृहस्पति इस यज्ञ का विस्तार करें और इस यज्ञ को अविनाशी रूप से स्थापित करें। समस्त देवगण यहाँ आनन्दित हों—प्रतिष्ठा हो।
मैं परमेश्वरी योगिनी देवी का आवाहन करता हूँ, जो योगाभ्यास से संतुष्ट हैं और परम ध्यान से युक्त हैं। जो दिव्य कुण्डल के समान कान्तियुक्त, दिव्य ज्वाला से युक्त, त्रिनेत्री हैं; जो मूर्त और अमूर्त दोनों हैं; उग्र और उग्ररूपिणी हैं; अनेक भावों से संयुक्त हैं और संसार-सागर से तारने वाली हैं। ये मातृशक्तियाँ हमारे यज्ञ को निर्विघ्न करें और कल्याण प्रदान करें।
ॐ भूः भुवः स्वः — महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती सहित दिव्य योगिन्यादि चौंसठ योगिनियाँ यहाँ आएँ और यहाँ प्रतिष्ठित हों।
संक्षिप्त टीका—
यह प्राणप्रतिष्ठा मंत्र देवी-तत्त्व में चेतना के आवाहन और स्थापन की विधि को व्यक्त करता है। यज्ञ, घृत, मन और बृहस्पति का उल्लेख यह दर्शाता है कि प्रतिष्ठा केवल बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि बौद्धिक, मानसिक और यज्ञीय समन्वय से सम्पन्न होती है। योगिनी देवी का योगाभ्यास, ध्यान, उग्रता और करुणा—इन सबका समावेश यह स्पष्ट करता है कि प्रतिष्ठित शक्ति स्थूल मूर्ति तक सीमित न होकर जीवित, क्रियाशील और मार्गदर्शक चेतना बनती है। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती सहित चौंसठ योगिनियों का आवाहन साधना को संपूर्णता प्रदान करता है, जिससे साधक के लिए संरक्षण, सिद्धि और कल्याण सुनिश्चित होता है।
षोडशोपचारैः पूजनम्
आसनार्थेऽक्षतान समर्पयामि । पादयोः पाद्यं समर्पयामि । हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । स्नानाङ्गाचमनं समर्पयामि । वस्त्रम् समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्रं समर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । अक्षतान समर्पयामि । पुष्पमालां समर्पयामि । नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । धूपमाध्रापयामि । दीपं दर्शयामि । हस्तप्रक्षालनम् । नैवेद्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मध्ये पानीयम् उत्तरापोशनं च समर्पयामि । ताम्बूलं समर्पयामि । पूगीफलं समर्पयामि । कृतायाः पूजायाः पाड्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । अनया पूजया गणपत्यादि पञ्चदेवता: प्रीयन्ताम् न मम ।
चतुष्षष्टि योगिनी प्रार्थना
ॐ दिव्ययोगी-महायोगी सिद्धयोगी गणेश्वरी । प्रेताशी डाकिनी काली कालरात्री निशाचरी । हुङ्कारी सिद्धवेताली खर्परी भूतगामिनी ॥
उर्ध्वकेशी विरूपाक्षी शुष्कांगी मांसभोजिनी । फूत्कारी वीरभद्राक्षी धूम्राक्षी कलहप्रिया ॥ रक्ता च घोररक्ताक्षी विरूपाक्षी भयंकरी ।
चौरिका भारिका चण्डी वाराही मुण्डधारिणी । भैरवी चक्रिणी क्रोधा दुर्मुखी प्रेतवासिनी । कालाक्षी मोहिनी चक्री कंकाली भुवनेश्वरी ।
कुण्डला तालकौमारी यमदूती करालिनी ॥ कौशिकी यक्षिणी यक्षी कौमारी यन्त्रवाहिनी || दुर्घटा विकटा घोरा कपाला विषलङ्घना ।
चतुःषष्टिः समाख्याता योगिन्यो हि वरप्रदाः ॥ त्रैलोक्यपूजिता नित्यं देवमानुषयोगिभिः ॥