॥ चतुर्लिंगतो भद्र पूजन ॥
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन : परिचय, विधि और आध्यात्मिक महत्व
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन भगवान शिव की विशेष उपासना है, जिसमें चार दिशाओं में स्थित शिवलिङ्गों के माध्यम से शिवतत्त्व का आवाहन किया जाता है। यह पूजन सृष्टि के चारों ओर व्याप्त शिवशक्ति को स्वीकार करने और जीवन में स्थिरता, संरक्षण तथा कल्याण की कामना से किया जाता है। चतुर्लिङ्ग पूजन यह दर्शाता है कि शिव केवल एक स्थान या रूप में सीमित नहीं, बल्कि समस्त दिशाओं और आयामों में व्याप्त चेतना हैं।
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन क्यों किया जाता है
यह पूजन विशेष रूप से बाधा-निवारण, ग्रहदोष शमन और जीवन में संतुलन की स्थापना के लिए किया जाता है। चार दिशाओं में शिवलिङ्गों की स्थापना का भाव यह है कि साधक अपने जीवन के प्रत्येक पक्ष—शरीर, मन, कर्म और चेतना—को शिवतत्त्व के संरक्षण में समर्पित करता है।
चतुर्लिङ्ग पूजन के माध्यम से यह प्रार्थना की जाती है कि किसी भी दिशा से आने वाला अशुभ प्रभाव जीवन को प्रभावित न कर सके।
चतुर्लिङ्ग पूजन का स्वरूप और अर्थ
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन में चार लिङ्ग चार दिशाओं—पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर—का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक लिङ्ग शिव के उस स्वरूप का प्रतीक है जो सृष्टि की रक्षा, संहार और पुनः सृजन का संतुलन बनाए रखता है।
यह पूजन यह संकेत देता है कि जब जीवन में सभी दिशाएँ संतुलित होती हैं, तभी ‘भद्र’ अर्थात् मंगल और शुभता की स्थापना होती है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन का महत्व
इस पूजन का मूल भाव भय और अस्थिरता से मुक्ति है। चारों दिशाओं में शिव का आवाहन यह स्मरण कराता है कि साधक किसी एक परिस्थिति या संकट से घिरा नहीं, बल्कि चारों ओर से ईश्वर की कृपा से सुरक्षित है।
चतुर्लिङ्ग पूजन साधक के भीतर स्थैर्य, धैर्य और निर्भयता का विकास करता है, जिससे जीवन के संकट सहज रूप से शांत होने लगते हैं।
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन के लाभ
- चारों दिशाओं से आने वाले अशुभ प्रभावों का शमन
- ग्रहदोष और वास्तुदोष में संतुलन
- भय, असुरक्षा और मानसिक अशांति से मुक्ति
- परिवार और कार्यक्षेत्र में स्थिरता
- जीवन में मंगल और भद्रता की स्थापना
यह पूजन साधक को यह अनुभव कराता है कि शिव की कृपा सीमित नहीं, बल्कि सर्वव्यापी है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन कब किया जाता है
चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन विशेष रूप से महाशिवरात्रि, सोमवार, प्रदोष व्रत तथा विशेष संकट या ग्रहदोष की स्थिति में किया जाता है।
गृहशांति, व्यवसाय आरंभ, स्थान परिवर्तन या दीर्घकालिक बाधाओं के निवारण हेतु भी यह पूजन अत्यंत फलदायी माना गया है।
सामान्य भक्तों के लिए मार्गदर्शन
इस पूजन में दिए गए मंत्र और विधियाँ शास्त्रीय परंपरा पर आधारित हैं। यदि साधक सम्पूर्ण विधि न भी कर सके, तो श्रद्धा और शिव-स्मरण के भाव से किया गया चतुर्लिङ्गतो भद्र पूजन भी मंगल फल प्रदान करता है। इस पूजा का सार विधि में नहीं, बल्कि भयमुक्त मन और शिव में पूर्ण विश्वास में निहित है।
१. असिताङ्गभैरव
ॐ नमः कृत्स्नायतया धावते सत्त्वनाम्पतये नमोनमः सहमानायनिव्व्याधिनऽ आव्व्याधिनीनाम्पतये नमोनमो निषङ्गिणे ककुभायस्तेनानाम्पतये नमोनमो निचेरवे परिचरायारण्ण्यानाम्पतये नमोनमो वञ्चते ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः असिताङ्गभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः असिताङ्गभैरवाय नमः ॥१॥
हिन्दी अर्थ
जो समस्त दिशाओं में पूर्ण रूप से विचरण करने वाले हैं, जो समस्त सत्त्वों के स्वामी हैं—उन्हें बार-बार नमस्कार है।
जो व्याधियों और बाधाओं को सहने और नष्ट करने वाले हैं, उन रोगों और विघ्नों के अधिपति को नमस्कार है।
जो शस्त्र धारण करने वाले, दिशाओं के रक्षक, चोरों और अराजक तत्त्वों पर नियंत्रण रखने वाले हैं—उन्हें नमस्कार है।
जो निर्भय होकर विचरण करते हैं, वन और निर्जन स्थलों के रक्षक हैं—ऐसे असिताङ्ग भैरव को बार-बार नमस्कार है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के अंतर्गत प्रथम रूप में असिताङ्ग भैरव का आवाहन किया गया है। असिताङ्ग भैरव भगवान शिव के उग्र और रक्षक स्वरूप हैं, जिनका कार्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि अव्यवस्था, भय और अराजकता का शमन करना है। मंत्र में उन्हें सत्त्वों का स्वामी, व्याधियों और बाधाओं का अधिपति तथा दिशाओं का रक्षक कहा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भैरव तत्त्व जीवन की बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार की असुरक्षाओं पर नियंत्रण रखता है।
असिताङ्ग भैरव की उपासना का भाव यह है कि साधक अपने भीतर और आसपास व्याप्त भय, रोग, नकारात्मक प्रवृत्तियों और अराजक विचारों से मुक्त हो सके। यह मंत्र यह बोध कराता है कि जब चेतना अनुशासन और साहस से युक्त होती है, तब उग्र शक्ति भी रक्षक बन जाती है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में असिताङ्ग भैरव का स्थान यह संकेत देता है कि किसी भी साधना या अनुष्ठान की सिद्धि के लिए पहले रक्षा, निर्भयता और व्यवस्था की स्थापना आवश्यक है। भैरव की आराधना साधक को आंतरिक दृढ़ता और बाह्य सुरक्षा—दोनों प्रदान करती है।
२. रुरुभैरव
ॐ श्वित्त्र ऽआदित्यानामुष्ट्रो घृणीवान् वार्घीनसस्ते मत्या ऽअरण्याय सृमरो रुरू रौद्रः क्वयिः कुटरुर्द्दात्यौहस्ते वाजिनां कामाय पिकः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः रुरुभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः रुरुभैरवाय नमः ॥२॥
हिन्दी अर्थ
जो आदित्यों के बीच प्रकाशमान शक्ति के समान हैं, तेजस्वी और ऊर्जा से परिपूर्ण हैं।
जो वन, निर्जन स्थानों और गूढ़ मार्गों में निर्भय होकर विचरण करते हैं, जो रौद्र स्वरूप में शत्रुओं और विघ्नों का नाश करते हैं।
जो वज्र के समान कठोर, वेगवान अश्वों की शक्ति के अधिपति और साधक की अभिलाषा को पूर्ण करने वाले हैं—ऐसे रुरुभैरव को नमन है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के द्वितीय रूप में रुरुभैरव का आवाहन किया गया है। रुरुभैरव भैरव के उस उग्र किंतु जाग्रत स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो अज्ञान, भय और आलस्य को चीरकर चेतना में तीव्रता उत्पन्न करता है। मंत्र में उनका संबंध आदित्यों, तेज और रौद्रता से जोड़ा गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि रुरुभैरव प्रकाश और उग्रता—दोनों के समन्वय हैं।
रुरुभैरव की उपासना का उद्देश्य साधक के भीतर छिपी हुई जड़ता, भय और भ्रम को समाप्त करना है। यह भैरव रूप उन परिस्थितियों में सक्रिय होता है जहाँ साधक को निर्णायक साहस, तीव्र क्रिया और निर्भीकता की आवश्यकता होती है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में रुरुभैरव का स्थान यह संकेत देता है कि साधना में केवल रक्षा ही नहीं, बल्कि आंतरिक जागरण और तेजस्वी संकल्प भी अनिवार्य है। रुरुभैरव की आराधना साधक को यह बोध कराती है कि जब चेतना तेजस्वी और सजग हो जाती है, तब कोई भी अवरोध टिक नहीं पाता।
३. चण्डभैरव
ॐ उग्ग्रं लोहितेन मित्र ᳪ सौव्व्रत्येन रुद्रं दौर्व्व्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साद्ध्यान् प्प्रमुदा॥ भवस्य कष्ठयᳪ रुद्रस्यान्तः पार्श्वं महादेवस्य यकृच्छर्व्वस्य व्वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चण्डभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः चण्डभैरवाय नमः ॥३॥
हिन्दी अर्थ
जो उग्र और रक्तवर्ण स्वरूप से युक्त हैं, मित्रभाव से भी युक्त हैं और रुद्र के तेज को धारण करते हैं।
जो इन्द्र के समान पराक्रमी, मरुतों के बल से संयुक्त और साध्य देवताओं को भी आनंदित करने वाले हैं।
जो भव, रुद्र, महादेव और पशुपति—इन समस्त शिवस्वरूपों के अंतरंग पक्ष में स्थित हैं—ऐसे चण्डभैरव को हम नमन करते हैं।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के तृतीय रूप में चण्डभैरव का आवाहन किया गया है। चण्डभैरव भैरव के उस अत्यंत उग्र और निर्णायक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ करुणा नहीं, बल्कि न्याय, संहार और त्वरित कर्मफल प्रधान होता है। मंत्र में उन्हें रुद्र, इन्द्र, मरुत और महादेव से संयुक्त बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चण्डभैरव केवल उग्र शक्ति नहीं, बल्कि समस्त दैवी बलों का समेकित रूप हैं।
चण्डभैरव की उपासना का उद्देश्य साधक के जीवन में व्याप्त अत्यधिक अव्यवस्था, अन्याय, अहंकार और अधर्म का शमन करना है। यह भैरव रूप उन स्थितियों में सक्रिय होता है जहाँ कोमलता पर्याप्त नहीं होती और कठोर निर्णय आवश्यक हो जाता है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में चण्डभैरव का स्थान यह संकेत देता है कि साधना के मार्ग में कभी-कभी उग्र अनुशासन और दृढ़ संकल्प भी आवश्यक होते हैं। चण्डभैरव की आराधना साधक को यह बोध कराती है कि जब धर्म की रक्षा के लिए कठोरता अपनाई जाती है, तब वह क्रूरता नहीं, बल्कि दिव्य न्याय बन जाती है।
४. क्रोधभैरव
ॐ इन्द्रस्य क्रडोऽदित्यै पाजस्यन्दिशाञ्जत्रवोऽदित्यै भसज्जीमूता हृदयौपशेनान्तरिक्ष पुरीतता नभ ऽउदर्येण चक्रवाकौ मतस्न्नाब्भ्यान्दिवं वृक्काभ्याङ्गिरीन्प्लाशिभिरुपलान्प्लीन्हा वल्मीकान् ल्कोमभिर्ग्लौर्गुल्मान् हिराभिः स्रवन्तीर्ह्रदान् कुक्षिब्भ्या ᳪ समुद्रमुदरेण व्वैश्श्वानरं भस्म्मना ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः क्रोधभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः क्रोधभैरवाय नमः ॥४॥
हिन्दी अर्थ
जो इन्द्र के क्रोध के समान तीव्र हैं, आदित्य की शक्ति से युक्त हैं और दिशाओं में व्याप्त शत्रुओं का दमन करने वाले हैं।
जो मेघों, आकाश, पर्वतों, नदियों, सरोवरों, समुद्र और वैश्वानर अग्नि तक में व्याप्त हैं—जो सम्पूर्ण सृष्टि को अपने उदर में धारण करने वाले हैं।
जो भस्म के समान सबको अपने में लीन कर लेते हैं—ऐसे क्रोधस्वरूप भैरव को नमस्कार है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के चतुर्थ रूप में क्रोधभैरव का आवाहन किया गया है। क्रोधभैरव भैरव के उस सर्वव्यापी और अत्यंत उग्र स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो केवल बाह्य शत्रुओं का नहीं, बल्कि आंतरिक विकारों—अहंकार, आसक्ति, लोभ और प्रमाद—का भी संहार करते हैं। मंत्र में उनका विस्तार आकाश, पर्वत, नदियों, समुद्र और अग्नि तक बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि क्रोधभैरव की शक्ति सीमित नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है।
क्रोधभैरव का ‘क्रोध’ साधारण आवेग नहीं, बल्कि धर्मरक्षा हेतु उत्पन्न दिव्य उग्रता है। यह वह शक्ति है जो सृष्टि में संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक विनाश करती है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में क्रोधभैरव का स्थान यह संकेत देता है कि जब साधक के भीतर अज्ञान और अव्यवस्था गहराने लगे, तब शुद्धिकरण के लिए उग्र तत्त्व का प्राकट्य आवश्यक होता है। इस भैरव की उपासना साधक को यह बोध कराती है कि जब क्रोध विवेक और धर्म के अधीन होता है, तब वह विनाशकारी नहीं, बल्कि मोक्षदायी शुद्धि का साधन बन जाता है।
५. उन्मत्तभैरव
ॐ उन्नत ऽऋषमो वामनस्त ऽऐन्द्राव्वैष्ष्णवा ऽउन्नतः शितिबाहुः शितिपृष्ष्ठ्ठास्त ऽऐन्द्राबार्हस्पत्याः शुकरूपा व्वाजिनाः कल्माषा ऽआग्निमारुताः श्यामाः पौष्ष्णाः ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः उन्मत्तभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः उन्मत्तभैरवाय नमः ॥५॥
हिन्दी अर्थ
जो ऊर्ध्वगामी और उन्नत स्वरूप वाले हैं, जो वामन रूप से लेकर ऐन्द्र और वैष्णव शक्तियों से युक्त हैं।
जो श्वेतभुज और विविध रूपों में प्रकट होने वाले हैं, जिनमें इन्द्र, बृहस्पति, शुक्र, अग्नि, मरुत और पूषा—इन दैवी शक्तियों का संयोग है।
जो श्याम, विविध वर्णों और वेग से युक्त अश्वों के समान गतिशील हैं—ऐसे उन्मत्तभैरव को नमस्कार है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के पंचम रूप में उन्मत्तभैरव का आवाहन किया गया है। उन्मत्तभैरव भैरव के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सामान्य सामाजिक मर्यादाओं और सीमाओं से परे दिखाई देता है, किंतु वास्तव में वह परम स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है। ‘उन्मत्त’ शब्द यहाँ उच्छृंखलता का नहीं, बल्कि बंधनों से मुक्त दिव्य अवस्था का बोध कराता है।
मंत्र में उन्मत्तभैरव को अनेक देवशक्तियों—इन्द्र, विष्णु, बृहस्पति, शुक्र, अग्नि, मरुत और पूषा—से युक्त बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे बहुआयामी दैवी ऊर्जा का समेकित रूप हैं। इस भैरव की उपासना साधक के भीतर जड़ हो चुकी धारणाओं, भय और सामाजिक आडंबरों को तोड़ती है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में उन्मत्तभैरव का स्थान यह संकेत देता है कि साधना के उच्च स्तर पर पहुँचने के लिए कभी-कभी रूढ़ियों और सीमाओं से ऊपर उठना आवश्यक होता है। उन्मत्तभैरव की आराधना साधक को यह बोध कराती है कि जब चेतना पूर्ण स्वतंत्रता और विवेक के साथ जागृत होती है, तब वही अवस्था परम शांति और आत्मबोध का द्वार खोलती है।
६. कपालभैरव
ॐ कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि।समापोऽअद्भिरग्मत समोषधीभिरोषधीः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कपालभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः कपालभैरवाय नमः॥६॥
हिन्दी अर्थ
तुम समुद्र के समान गूढ़ और अगाध स्वरूप वाले हो। मैं तुम्हें पृथ्वी पर प्रतिष्ठित करता हूँ।
तुम जल, औषधियों और वनस्पतियों के साथ संयुक्त होकर सर्वत्र व्याप्त हो और जीवन को पोषण प्रदान करते हो।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के षष्ठ रूप में कपालभैरव का आवाहन किया गया है। कपालभैरव भगवान शिव के उस उग्रतम् और वैराग्यपूर्ण स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ अहंकार, आसक्ति और भौतिक बंधनों का पूर्ण क्षय होता है। ‘कपाल’ यहाँ देह-अहंकार और नश्वरता का प्रतीक है—यह स्मरण कराता है कि शरीर और भौतिक पहचान क्षणभंगुर हैं, जबकि चेतना शाश्वत है।
मंत्र में कपालभैरव को समुद्र-सदृश गहन और सर्वव्यापी बताया गया है, जो जल, औषधि और वनस्पतियों के माध्यम से जीवन का संचालन करते हैं। यह संकेत करता है कि कपालभैरव केवल संहारक नहीं, बल्कि शुद्धिकरण और पुनर्संतुलन की शक्ति हैं। उनकी उपासना साधक के भीतर जमे हुए अहंकार, भय और आसक्ति को भस्म कर देती है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में कपालभैरव का स्थान यह दर्शाता है कि साधना के पथ पर आगे बढ़ने के लिए अंततः अहं-त्याग और वैराग्य अनिवार्य है। कपालभैरव की आराधना साधक को यह बोध कराती है कि जब अहंकार का कपाल गिरता है, तभी आत्मज्ञान और वास्तविक स्वतंत्रता का उदय होता है।
७. भीषणभैरव
ॐ उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च । सासह्वाँश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भीषणभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः भीषणभैरवाय नमः ॥७॥
हिन्दी अर्थ
जो उग्र हैं, जो भयानक स्वरूप वाले हैं, जो अज्ञान के अंधकार का नाश करने वाले हैं और जो सब कुछ ध्वस्त करने की शक्ति रखते हैं।
जो अत्यंत सहनशील, आक्रमणकारी, शत्रुओं को तितर-बितर करने वाले हैं—ऐसे भीषण स्वरूप को स्वाहा अर्पित है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के सप्तम रूप में भीषणभैरव का आवाहन किया गया है। भीषणभैरव भैरव के उस अत्यंत उग्र और भय उत्पन्न करने वाले स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसका उद्देश्य भय पैदा करना नहीं, बल्कि अज्ञान, प्रमाद और अधर्म का पूर्ण विनाश करना है। मंत्र में प्रयुक्त ‘उग्र’, ‘भीम’, ‘ध्वान्त’ और ‘धुनि’ शब्द यह संकेत देते हैं कि यह शक्ति अंधकार, जड़ता और आंतरिक दुर्बलताओं को जड़ से उखाड़ फेंकती है।
भीषणभैरव की उपासना का भाव यह है कि साधक अपने भीतर छिपे भय, आलस्य, पलायन और असत्य का सामना करने का साहस प्राप्त करे। यह भैरव रूप उन परिस्थितियों में प्रकट होता है जहाँ साधक को कठोर आत्मसंघर्ष और निर्णायक परिवर्तन की आवश्यकता होती है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में भीषणभैरव का स्थान यह दर्शाता है कि साधना के मार्ग में कभी-कभी भय का सामना करना ही मुक्ति का द्वार बनता है। भीषणभैरव की आराधना साधक को यह बोध कराती है कि जब भय का सामना विवेक और श्रद्धा से किया जाता है, तब वही भय आत्मिक शक्ति और निर्भयता में रूपांतरित हो जाता है।
८. संहारभैरव
ॐ नमः शम्भवाय च मयेभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः संहारभैरव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः संहारभैरवाय नमः ॥८॥
हिन्दी अर्थ
शम्भु को नमस्कार है और उनके मंगलमय स्वरूप को भी नमस्कार है।
शंकर को नमस्कार है और कल्याण करने वाले स्वरूप को नमस्कार है।
शिव को नमस्कार है और उनसे भी अधिक कल्याणकारी, परम शिव स्वरूप को नमस्कार है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के अष्टम रूप में संहारभैरव का आवाहन किया गया है। संहारभैरव भैरव के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं जहाँ संहार का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि परिवर्तन और पुनर्निर्माण होता है। मंत्र में शम्भु, शंकर और शिव—इन तीन नामों का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि संहार की प्रक्रिया भी अंततः मंगल, कल्याण और शुद्धि के लिए ही होती है।
संहारभैरव का कार्य जीवन में जड़ हो चुकी अवस्थाओं, अहंकार, भ्रम और अधर्म का अंत करना है, ताकि चेतना नवीन और शुद्ध स्वरूप में प्रकट हो सके। यह भैरव रूप यह बोध कराता है कि जो कुछ भी सत्य के मार्ग में बाधक बन जाता है, उसका नष्ट होना अनिवार्य है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में संहारभैरव का स्थान यह संकेत देता है कि साधना की पूर्णता के लिए केवल संरक्षण और अनुशासन ही नहीं, बल्कि आवश्यक संहार और त्याग भी उतना ही आवश्यक है। संहारभैरव की आराधना साधक को यह सिखाती है कि जब पुराना और असत्य नष्ट होता है, तभी नवीन, शुद्ध और शिवमय चेतना का उदय होता है।
९. भव
ॐ नमः श्वब्भ्यः श्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्व्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्ग्रीवाय च शितिकण्ठाय च नमः कपर्द्दिने ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भव इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः भवाय नमः ॥९॥
हिन्दी अर्थ
भव रूप में स्थित भगवान् को नमस्कार है,
उनके गणों और अधिपतियों को भी बार-बार नमस्कार है।
रुद्र स्वरूप को नमस्कार है,
शर्व और पशुपति को नमस्कार है।
नीलग्रीव (नीलकण्ठ) और जटाधारी भगवान् को भी प्रणाम है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल के नवम स्वरूप भव का आवाहन किया गया है। ‘भव’ शब्द का मूल अर्थ है—होना, प्रकट होना, संसार में स्थित होना। यह शिव का वह स्वरूप है जो संहार या उग्रता से अधिक संसार-व्यवस्था और अस्तित्व की निरंतरता का प्रतिनिधित्व करता है।
मंत्र में भव, रुद्र, शर्व, पशुपति, नीलग्रीव और कपर्दिन—ये सभी नाम शिव के भिन्न-भिन्न कार्यात्मक स्वरूपों को दर्शाते हैं। भव वह शक्ति है जो जीव को संसार में अनुभव, कर्म और भोग का अवसर देती है। पशुपति के रूप में शिव समस्त जीवों के अधिपति हैं, जबकि नीलकण्ठ और कपर्दिन उनके तप, त्याग और विष-धारण की स्मृति कराते हैं।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में भव का स्थान यह संकेत देता है कि साधना केवल उग्र संहार या कठोर अनुशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि संसार में रहकर धर्मपूर्वक जीवन जीना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। भव की आराधना साधक को यह बोध कराती है कि संसार स्वयं बंधन नहीं है—बंधन तब बनता है जब चेतना शिव से विमुख हो जाती है। भव स्वरूप की उपासना से साधक संसार में रहते हुए भी वैराग्य, विवेक और शिवभाव को जाग्रत कर सकता है।
१०. सर्व
ॐ अग्निᳪ हृदयेनाशनि ᳪ हृदयाग्रेण पशुपतिं कृत्स्नहृदयेन भवं यक्ना । शर्वं- मतस्नाभ्यामीशानं मन्युना महादेवमन्तः पर्शव्येनोग्रं देवं वनिष्ठुना वसिष्ठहनुः शिङ्गीनि कोश्याभ्याम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सर्व इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः सर्वाय नमः ॥१०॥
हिन्दी अर्थ
अग्नि के हृदय से, वज्र के अग्रभाग से,
सम्पूर्ण हृदय से भव को नमस्कार है।
अंतःकरण से शर्व को,
नाभि से ईशान को,
क्रोध-शक्ति से महादेव को,
पार्श्व से उग्र देव को,
और समस्त अंगों से शिव के सर्वव्यापक स्वरूप को प्रणाम है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल का दशम और समग्र स्वरूप ‘सर्व’ प्रतिष्ठित किया गया है। ‘सर्व’ शब्द का अर्थ है—सब कुछ, सर्वत्र, सम्पूर्णता। यह शिव का वह रूप है जो किसी एक दिशा, एक गुण या एक कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि समस्त सृष्टि में व्याप्त चेतना के रूप में स्थित है।
मंत्र में शरीर के विभिन्न अंगों—हृदय, नाभि, पार्श्व, मन्यु (क्रोध/ऊर्जा) आदि—के माध्यम से शिव के विविध नामों (भव, शर्व, ईशान, महादेव, उग्र) का स्मरण कराया गया है। इसका गूढ़ संकेत यह है कि शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि साधक के सम्पूर्ण अस्तित्व में अंतर्निहित हैं।
‘सर्व’ का आवाहन यह बोध कराता है कि शिव केवल संहारक या उग्र देवता नहीं हैं, बल्कि वही जीवन, ऊर्जा, चेतना और व्यवस्था भी हैं। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह स्वरूप साधक को समग्र दृष्टि प्रदान करता है—जहाँ भैरव, उग्रता, काल और संहार अंततः सर्वात्मभाव में लीन हो जाते हैं।
इस मंत्र का पाठ साधक के भीतर यह अनुभूति जाग्रत करता है कि उसका शरीर, मन और प्राण—सब शिवमय हैं। जब यह बोध स्थिर हो जाता है, तब साधना भय से नहीं, बल्कि अद्वैत और पूर्णता के अनुभव से आगे बढ़ती है।
११. पशुपति
ॐ उग्ग्रं लोहितेन मित्र ᳪ सौव्व्रत्येन रुद्रं दौर्व्व्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साद्ध्यान् प्प्रमुदा॥ भवस्य कष्ठयᳪ रुद्रस्यान्तः पार्श्वं महादेवस्य यकृच्छर्व्वस्य व्वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पशुपति इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः पशुपतये नमः ॥११॥
हिन्दी अर्थ
उग्र तेज के साथ, लोहित वर्ण से युक्त,
मित्रभाव से युक्त रुद्र को नमस्कार है।
विकट व्रत के द्वारा इन्द्र को,
क्रीड़ा-शक्ति से मरुद्गणों को,
बल से सिद्धगणों को आनंद देने वाले को प्रणाम है।
भव के कठोर स्वरूप में,
रुद्र के अंतरंग पार्श्व में,
महादेव के यकृत् (अंतरंग) में,
शर्व के वनिष्ठु रूप में
और समस्त प्राणियों के अधिपति पशुपति को नमस्कार है।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में पशुपति के उस गूढ़ स्वरूप का आवाहन किया गया है, जो केवल पशुओं के स्वामी के रूप में नहीं, बल्कि समस्त जीवों, इन्द्रियों और बन्धनों के अधिपति हैं। ‘पशु’ यहाँ केवल जीव-जंतु नहीं, बल्कि बंधन में बँधा हुआ जीवात्मा है, और ‘पति’ वह तत्व है जो इन बंधनों से मुक्त करने की सामर्थ्य रखता है।
मंत्र में उग्रता, लोहित वर्ण, रुद्रत्व, इन्द्रत्व और मरुतों के बल का उल्लेख यह दर्शाता है कि पशुपति केवल करुणामय ही नहीं, बल्कि अनुशासन और नियंत्रण की दिव्य शक्ति भी हैं। वे जीव को उसके अहंकार, वासना और अज्ञान के बंधन से मुक्त करते हैं।
‘भव’, ‘रुद्र’, ‘महादेव’ और ‘शर्व’—इन सभी नामों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि पशुपति कोई पृथक देवता नहीं, बल्कि शिव के ही विभिन्न अंतःस्वरूप हैं, जो साधक के भीतर कार्य कर रहे हैं। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में पशुपति का स्थान साधक को यह बोध कराता है कि जब तक जीव स्वयं को ‘पशु’ मानता है, तब तक बंधन है; और जब वही चेतना ‘पशुपति’ को पहचान लेती है, तब मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
इस मंत्र का जप साधक में आत्मसंयम, वैराग्य और बंधन-मुक्ति की भावना को जाग्रत करता है। यह भैरव और उग्र साधनाओं को करुणा और मोक्ष की दिशा प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण मंत्र है।
१२. ईशान
ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्। पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ईशान इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः ईशानाय नमः ॥१२॥
हिन्दी अर्थ
हम उस ईशान स्वरूप को आवाहन करते हैं, जो
चल और अचल समस्त जगत के स्वामी हैं।
हम अपनी बुद्धि को प्रेरित करने और संरक्षण के लिए
उनकी शरण लेते हैं।
जिस प्रकार पूषा देव हमारे पथ को जानकर
वेदसम्मत मार्ग में हमारी वृद्धि करते हैं,
उसी प्रकार ईशान हमें सुरक्षित रखें,
हमारी रक्षा करें और कल्याण प्रदान करें।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में ईशान को जगत के अधिष्ठाता, सर्वव्यापक और सर्वनियंता स्वरूप में स्मरण किया गया है। ईशान शिव का वह रूप है जो ज्ञान, दिशा और संरक्षण का प्रतीक है। चतुर्दिक् व्यवस्था में ईशान को उत्तर-पूर्व दिशा का अधिपति माना गया है, जो आध्यात्मिक उन्नति और सद्बुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
‘धियं जिन्वम्’—इस पद के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि ईशान केवल बाह्य सुरक्षा नहीं देते, बल्कि साधक की बुद्धि को जाग्रत और शुद्ध करते हैं, जिससे वह धर्म और सत्य के मार्ग पर अग्रसर हो सके। यहाँ पूषा देव का संदर्भ यह दर्शाता है कि जैसे वेदमार्ग में पूषा पथप्रदर्शक हैं, वैसे ही ईशान साधक को जीवन-पथ पर भटकने से बचाते हैं।
इस मंत्र का भाव यह है कि साधक अपने अहंकार और सीमित दृष्टि को त्यागकर, ईशान के सार्वभौम नियंत्रण को स्वीकार करता है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में ईशान का आवाहन यह सुनिश्चित करता है कि साधना केवल उग्रता या कर्मकाण्ड तक सीमित न रहे, बल्कि ज्ञान, सुरक्षा और कल्याण की दिशा में संतुलित रूप से प्रवाहित हो।
यह मंत्र साधक के जीवन में स्वस्ति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करने वाला माना गया है।
१३. रुद्र
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः॥ बाहुब्भ्यामुत ते नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः रुद्र इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः रुद्राय नमः ॥१३॥
हिन्दी अर्थ
हे रुद्र! आपके उग्र स्वरूप को नमस्कार है।
आपके क्रोध को भी नमस्कार है और आपकी बाणरूपी शक्ति को भी प्रणाम है।
आपके दोनों भुजाओं को भी बार-बार नमस्कार है,
जो संहार और संरक्षण—दोनों की सामर्थ्य रखती हैं।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र रुद्र के उग्र, तेजस्वी और शक्तिशाली स्वरूप का स्मरण कराता है। रुद्र शिव का वह रूप हैं जो प्रकृति के विनाशकारी पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं, किंतु यह विनाश नकारात्मक नहीं, बल्कि शुद्धिकरण और पुनर्सृजन के लिए होता है। ‘मन्युः’ अर्थात् रुद्र का क्रोध—यह अहंकार, अधर्म और अव्यवस्था के नाश का प्रतीक है।
मंत्र में रुद्र के इषु (बाण) और भुजाओं को नमस्कार किया गया है, जो यह दर्शाता है कि उनकी शक्ति केवल संहार तक सीमित नहीं, बल्कि साधक की रक्षा और मार्गदर्शन भी करती है। यहाँ भय नहीं, बल्कि आदर और समर्पण का भाव है—कि जो शक्ति संसार को कंपा सकती है, वही शक्ति साधक के लिए कल्याणकारी भी बन सकती है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में रुद्र का आवाहन यह सिखाता है कि जीवन में आने वाले संकट, पीड़ा और परिवर्तन भी साधना का ही अंग हैं। जब साधक रुद्र के उग्र स्वरूप को स्वीकार करता है, तब वह जीवन के कठोर अनुभवों से भागता नहीं, बल्कि उन्हें आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम बना लेता है।
इस मंत्र का भाव यह है कि रुद्र का क्रोध साधक को भयभीत करने के लिए नहीं, बल्कि अज्ञान, पाप और आंतरिक दुर्बलताओं के दहन के लिए है। उनके प्रति नम्र समर्पण से जीवन में साहस, स्पष्टता और आंतरिक शक्ति का संचार होता है।
१४. उग्ग्र
ॐ उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च । सासह्वाँश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः उग्ग्र इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः उग्ग्राय नमः ॥१४॥
हिन्दी अर्थ
हे उग्र स्वरूप वाले देव! आप अत्यंत भीषण हैं।
आप अंधकार का नाश करने वाले, कम्पन उत्पन्न करने वाले हैं।
आप असहनीय शक्ति से युक्त हैं, शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले और उन्हें तितर-बितर करने वाले हैं।
ऐसे उग्र देव को हमारा स्वाहा-स्वरूप नमस्कार अर्पित है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र उग्र रुद्र स्वरूप की अत्यंत प्रचंड और सक्रिय शक्ति को व्यक्त करता है। यहाँ ‘उग्र’ और ‘भीम’ शब्द उस दैवी ऊर्जा का संकेत हैं जो साधारण सीमाओं से परे है। ‘ध्वान्त’ अर्थात् अंधकार—यह केवल बाह्य अंधकार नहीं, बल्कि अज्ञान, भय और भ्रम का प्रतीक है। रुद्र का यह उग्र रूप उस अंधकार को जड़ से नष्ट करने वाला है।
‘धुनि’ और ‘विक्षिप’ जैसे शब्द यह दर्शाते हैं कि यह शक्ति निष्क्रिय नहीं, बल्कि गतिशील और परिवर्तनकारी है। यह जीवन में जमी हुई नकारात्मकता, पाप संस्कार और मानसिक जड़ता को झकझोर कर बाहर निकाल देती है। ‘अभियुग्वा’ अर्थात् जो स्वयं आगे बढ़कर आक्रमण करता है—यह बताता है कि ईश्वरीय शक्ति साधक की रक्षा के लिए संकटों से टकराने में संकोच नहीं करती।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में इस मंत्र का स्थान यह स्पष्ट करता है कि साधना केवल शांति और सौम्यता तक सीमित नहीं है। जब साधक उग्र देवता का आवाहन करता है, तब वह यह स्वीकार करता है कि जीवन में आने वाले कठोर अनुभव भी आत्मिक परिष्कार के लिए आवश्यक हैं।
इस मंत्र का गूढ़ भाव यह है कि उग्रता भय का कारण नहीं, बल्कि रक्षा, साहस और धर्म की स्थापना का साधन है। साधक जब इस उग्र शक्ति के सामने समर्पण करता है, तब उसका आंतरिक भय, दुर्बलता और अस्थिरता स्वयं ही शांत होने लगती है।
१५. भीम
ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते यनाय ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भीम इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः भीमाय नमः ॥१५॥
हिन्दी अर्थ
मैं उस महान पुरुष को जानता हूँ, जो सूर्य के समान तेजस्वी है और अंधकार से परे स्थित है।
उसी को भली-भाँति जानकर मनुष्य मृत्यु को पार कर जाता है।
उस परम सत्य को जानने के अतिरिक्त मुक्ति का कोई अन्य मार्ग नहीं है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र भीम स्वरूप को केवल उग्र या भयकारी रूप में नहीं, बल्कि परम सत्य और महाचेतना के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ ‘पुरुषं महान्तम्’ से अभिप्राय उस सर्वव्यापक चेतन तत्व से है, जो समस्त सृष्टि का आधार है। ‘आदित्यवर्णम्’ यह स्पष्ट करता है कि यह सत्ता सूर्य के समान स्वयं प्रकाशित है—इसे किसी बाह्य प्रकाश या प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
‘तमसः परस्तात्’ का अर्थ है—अज्ञान, मोह और मृत्यु-बोध से परे। भीम यहाँ मृत्यु का कारण नहीं, बल्कि मृत्यु को जीतने वाला तत्व है। इस मंत्र में यह गूढ़ संदेश निहित है कि भय और विनाश का जो रूप बाहर से भीषण प्रतीत होता है, वही भीतर से मोक्षदायक सत्य है।
‘तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति’—इस पंक्ति का केंद्रीय भाव यह है कि मुक्ति कर्मकांड या बाह्य आडंबर से नहीं, बल्कि तत्वज्ञान से प्राप्त होती है। भीम रूप यहाँ साधक को यह सिखाता है कि जब तक वह उस एक परम सत्ता को नहीं पहचानता, तब तक वह जन्म–मृत्यु के चक्र में बंधा रहता है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में इस मंत्र का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उग्र साधना को ज्ञान-साधना से जोड़ देता है। यह स्पष्ट करता है कि उग्र देवता का अंतिम लक्ष्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि साधक को उस परम सत्य तक पहुँचाना है, जहाँ मृत्यु, भय और सीमाएँ स्वतः लय हो जाती हैं।
इस मंत्र का सार यह है कि भीम वही है जो अज्ञान का नाश कर साधक को अमृतत्व की ओर ले जाए—और उस सत्य को जानने के अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
१६. महान्त
ॐ मानोमहान्तमुतमानोऽअर्ब्भकम्मानऽउक्षन्तमुतमानऽउक्षितम् । मानोव्वधीः पितरम्मोतमातरम्मानः प्प्रियास्तन्न्वो रुद्द्ररीरिषः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महान्त इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः महान्ते नमः ॥१६॥
हिन्दी अर्थ
हे रुद्र! आप हमारे महान जनों की रक्षा करें, हमारे छोटे बालकों की भी रक्षा करें।
आप हमारे युवाओं और वृद्धों की भी रक्षा करें।
हे देव! आप हमारे पिता, माता और प्रियजनों को किसी भी प्रकार से पीड़ा न पहुँचाएँ।
हम आपकी शरण में हैं, हमें किसी भी प्रकार का कष्ट न दें।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र महान्त स्वरूप को रुद्र की करुणामय और संरक्षक शक्ति के रूप में प्रकट करता है। यहाँ ‘महान्त’ का अर्थ केवल आकार या शक्ति की विशालता नहीं, बल्कि समष्टि की चिंता करने वाला ईश्वर है। इस मंत्र में साधक व्यक्तिगत हित से आगे बढ़कर पूरे परिवार और समाज की मंगलकामना करता है।
‘अर्ब्भक’ (बालक), ‘उक्षित’ (युवा) और ‘उक्षन्त’ (वृद्ध)—इन तीन अवस्थाओं का उल्लेख यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा जीवन के प्रत्येक चरण पर समान रूप से आवश्यक है। रुद्र को यहाँ संहारक नहीं, बल्कि पालक और रक्षक के रूप में पुकारा गया है।
पिता, माता और प्रियजनों का विशेष उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि वैदिक साधना केवल आत्मकल्याण तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संतुलन की भी कामना करती है। यह मंत्र यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति में भय नहीं, बल्कि विश्वास और आश्रय भाव होता है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल की साधना में यह मंत्र अत्यंत संतुलनकारी भूमिका निभाता है। जहाँ उग्र और भीषण मंत्र नकारात्मक शक्तियों का शमन करते हैं, वहीं यह मंत्र उस उग्रता को करुणा और संरक्षण में रूपांतरित कर देता है।
इस मंत्र का सार यह है कि महान्त ईश्वर वह है जो अपनी अपार शक्ति के साथ-साथ समस्त प्राणियों के प्रति वात्सल्य और सुरक्षा भी प्रदान करता है। साधक जब इस भाव से रुद्र का स्मरण करता है, तब भय का स्थान शांति और भरोसा ले लेता है।
१७. अनन्त
ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरानिवेशनी यच्छा नः शर्मसप्रथाः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अनन्त इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः अनन्ताय नमः ॥१७॥
हिन्दी अर्थ
हे पृथ्वी माता! आप हमारे लिए कल्याणकारी हों।
आप हमें ऐसा निवास स्थान प्रदान करें जो पीड़ा रहित और सुरक्षित हो।
आप हमें सुख, शांति और व्यापक मंगल प्रदान करें।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र अनन्त स्वरूप को स्थिरता, आधार और अखण्ड पोषण के प्रतीक के रूप में प्रकट करता है। यहाँ पृथ्वी को केवल भौतिक भूमि नहीं, बल्कि अनन्त धारण शक्ति के रूप में संबोधित किया गया है—जो समस्त जीवों को धारण करती है, पोषण देती है और आश्रय प्रदान करती है।
‘स्योंना’ शब्द पृथ्वी के उस स्वरूप को दर्शाता है जो कल्याणकारी और सौम्य है। यह संकेत करता है कि अनन्त शक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल उग्र या विराट नहीं, बल्कि शांत, सहनशील और पोषक भी है। ‘निवेशनी’ का अर्थ है—निवास प्रदान करने वाली—जो यह दर्शाता है कि जीवन की समस्त गतिविधियाँ इसी अनन्त आधार पर संभव होती हैं।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में इस मंत्र का स्थान अत्यंत अर्थपूर्ण है। उग्र, भीम और महान्त स्वरूपों के पश्चात यह मंत्र साधना को स्थिरता और संतुलन प्रदान करता है। यह बताता है कि संहार और उग्रता के बाद भी सृष्टि को थामे रखने वाली अनन्त शक्ति आवश्यक है।
इस मंत्र का गूढ़ भाव यह है कि साधक जब पृथ्वी रूपी अनन्त सत्ता से मंगल और शांति की कामना करता है, तब वह अपने जीवन में भी स्थायित्व, सुरक्षा और मानसिक संतुलन प्राप्त करता है। अनन्त यहाँ भय या सीमा का नहीं, बल्कि निरंतर संरक्षण और आधार का प्रतीक है।
इस प्रकार यह मंत्र साधना को एक ऐसी पूर्णता देता है जहाँ उग्रता, ज्ञान और करुणा के बाद स्थिर शांति और आश्रय स्थापित हो जाता है।
१८. वासुकि
ॐ देहि मे ददामि ते नि मे धेहि नि ते दधे । निहारश्च हरासि मे निहारं निहराणि ते स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वासुकि इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः वासुकये नमः ॥१८॥
हिन्दी अर्थ
हे देव! जो मेरे भीतर है, उसे मैं आपको समर्पित करता हूँ।
जो आपका है, उसे आप मुझमें स्थापित करें।
हे हरने वाले! मेरे भीतर जो दोष, बाधा और विष हैं, उन्हें आप दूर करें।
जो भी अहितकारी तत्व हैं, उन्हें मुझसे अलग करें—स्वाहा।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र वासुकि स्वरूप को शुद्धिकरण, विनिमय और संतुलन की दिव्य शक्ति के रूप में प्रकट करता है। वासुकि नाग केवल पौराणिक नागराज ही नहीं, बल्कि कुंडलिनी, विष और अमृत—तीनों का प्रतीक है। इस मंत्र में साधक एक अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक प्रक्रिया को शब्दों में व्यक्त करता है—देने और पाने की प्रक्रिया।
‘देहि मे ददामि ते’—मैं तुम्हें देता हूँ—यह अहंकार, दोष और नकारात्मक संस्कारों के त्याग का भाव है।
‘नि मे धेहि नि ते दधे’—जो तुम्हारा है, उसे मुझमें स्थापित करो—यह दैवी गुणों, संतुलन और चेतना के अवतरण की प्रार्थना है।
‘निहार’ शब्द यहाँ विष, रोग, भय और आंतरिक अशुद्धियों का संकेत देता है। वासुकि वह शक्ति है जो विष को भी धारण कर उसे नियंत्रित कर सकती है। अतः यह मंत्र केवल रक्षा का नहीं, बल्कि आत्मिक रूपांतरण का मंत्र है—जहाँ विष भी अमृत में परिवर्तित हो सकता है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में वासुकि का यह मंत्र यह दर्शाता है कि साधना का अंतिम चरण केवल उग्रता या संहार नहीं, बल्कि शुद्ध विनिमय और संतुलन है। साधक जब अपने भीतर की अशुद्धियों को ईश्वर को अर्पित करता है और उसके स्थान पर दिव्य चेतना को आमंत्रित करता है, तब वास्तविक साधना पूर्ण होती है।
इस मंत्र का सार यह है कि वासुकि वह शक्ति है जो साधक को सिखाती है—
त्याग के बिना ग्रहण संभव नहीं, और शुद्धिकरण के बिना उन्नति नहीं।
१९. तक्षक
ॐ नमस्तक्षब्भ्यो रथकारेब्भ्यश्च वो नमोनमः कुलालेब्भ्यः कर्म्मारेब्भ्यश्च वो नमोनमो निषादेब्भ्यः पुञ्जिष्ट्ठेब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वनिब्भ्योमृगयुब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वब्भ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः तक्षक इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः तक्षकाय नमः ॥१९॥
हिन्दी अर्थ
हे तक्षक! रथकारों (रथ बनाने वालों), कुम्हारों, लोहारों, निषादों, शिकारी समुदायों, वन में रहने वालों और श्वानों तक—सभी को हमारा नमस्कार है।
जो-जो कर्म, कला और जीविका से जुड़े हैं, उन सबको बार-बार प्रणाम है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र तक्षक स्वरूप को केवल एक नाग या भयकारी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि कर्म, कौशल और लोक-व्यवस्था के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ जिन वर्गों का उल्लेख है—रथकार, कुलाल, कर्मार, निषाद, मृगयु—ये सभी समाज की मूलभूत संरचना से जुड़े कर्मयोगी हैं।
तक्षक यहाँ उस शक्ति का प्रतीक है जो कर्म के माध्यम से जीवन को गति देती है। यह मंत्र यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर केवल देवालयों या उच्च लोकों में नहीं, बल्कि श्रम, कला और जीविका से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति में भी व्याप्त है।
‘नमोनमः’ की पुनरावृत्ति यह दर्शाती है कि साधक किसी एक वर्ग को नहीं, बल्कि समस्त समाज और उसके विविध कार्यों को समान श्रद्धा से स्वीकार करता है। यह वैदिक दृष्टि अत्यंत व्यापक है—जहाँ कर्म को ही पूजा माना गया है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में तक्षक का यह मंत्र यह संतुलन स्थापित करता है कि साधना केवल उग्र देवताओं, नागों या रहस्यमय शक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक व्यवस्था और कर्मशील जीवन भी उसी दैवी सत्ता का विस्तार है।
इस मंत्र का गूढ़ भाव यह है कि जब साधक प्रत्येक कर्म और कर्मी में ईश्वर का दर्शन करने लगता है, तब भय समाप्त होता है और जीवन समरसता और सम्मान से भर जाता है। तक्षक यहाँ भय का नहीं, बल्कि कर्म-संरक्षण और सामाजिक संतुलन का प्रतीक बन जाता है।
२०. कुलिश
ॐ पुरुषमृगश्चन्द्रमसो गोधा कालका दार्वाघाटस्ते व्वनस्प्पतीनां कृकवाकुः सावित्त्रो ह ᳪ सो व्वातस्य नाक्क्रो मकरः कुलीपयस्तेऽकूपारस्य ह्वियै शल्ल्यकः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कुलिश इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः कुलिशाय नमः ॥२०॥
हिन्दी अर्थ
हे कुलिश स्वरूप देवता!
आप पुरुष और मृग के समान बलवान हैं, चन्द्रमा के समान शीतल और काल के समान प्रभावशाली हैं।
आप वनस्पतियों, जल, वायु और समस्त प्राकृतिक शक्तियों से संयुक्त हैं।
आप सृष्टि के गहन, अगम और अपार तत्त्वों के अधिष्ठाता हैं—आपको हमारा नमस्कार है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र कुलिश स्वरूप को प्रकृति की समग्र, बहुआयामी और गूढ़ शक्ति के रूप में प्रकट करता है। यहाँ ‘कुलिश’ केवल वज्र या आयुध का संकेत नहीं है, बल्कि वह संयोजक शक्ति है जो भिन्न-भिन्न तत्त्वों को एक सूत्र में बाँधती है। पुरुष, मृग, चन्द्रमा, काल, वनस्पति, वायु और जल—इन सभी प्रतीकों का एक साथ उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति किसी एक रूप तक सीमित नहीं है।
‘कालका’ और ‘चन्द्रमसो’ जैसे शब्द विरोधी प्रतीत होने वाले गुणों—उग्रता और शीतलता—का समन्वय करते हैं। यही कुलिश का वास्तविक स्वरूप है: नियंत्रित शक्ति। यह न तो अराजक है और न ही निष्क्रिय। यह वह बल है जो आवश्यकता पड़ने पर कठोर बनता है और आवश्यकता पड़ने पर संतुलन स्थापित करता है।
वनस्पति, वायु और जल से इसका संबंध यह बताता है कि कुलिश शक्ति जीवन की आधारभूत प्रणालियों को संरक्षित करती है। यह नाश के लिए नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखने के लिए प्रहार करती है—जैसे इन्द्र का वज्र केवल दमन का नहीं, बल्कि ऋत (Cosmic Order) की रक्षा का साधन है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र साधना को यह बोध कराता है कि अंतिम शक्ति वही है जो विविधताओं को जोड़ सके। उग्र, भीम, नाग, रुद्र और भैरव स्वरूपों के बाद कुलिश यह सिखाता है कि सृष्टि का संचालन केवल भय या करुणा से नहीं, बल्कि संतुलित, विवेकयुक्त शक्ति से होता है।
इस मंत्र का सार यह है कि कुलिश वह दैवी चेतना है जो साधक के भीतर बिखरी हुई शक्तियों को एकत्र कर दृढ़ता, स्थिरता और आत्मनियंत्रण प्रदान करती है। जब साधक इस शक्ति को स्वीकार करता है, तब उसका जीवन दिशाहीन बल से हटकर सार्थक और संयमित सामर्थ्य में परिवर्तित हो जाता है।
२१. कर्कोटक
ॐ सोमाय कुलुङ्ग ऽआरण्योऽजो नकुलः शका ते पौष्ष्णाः क्रोष्ट्टा मायोरिन्द्रस्य गौरमृगः पिद्वो न्यङ्कुः कक्कटस्तेऽनुमस्यै प्प्रतिश्रुत्कायै चक्रवाकः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कर्कोटक इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः कर्कोटकाय नमः ॥२१॥
हिन्दी अर्थ
हे कर्कोटक स्वरूप देवता!
आप सोम से संबद्ध हैं और वन में विचरण करने वाले प्राणियों के अधिष्ठाता हैं।
अज, नकुल, शाक, क्रोष्टा (सियार), गौर, मृग, न्यंकु, कक्कट और चक्रवाक आदि—ये सभी आपके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
आप विविध रूपों में प्रकट होकर प्रकृति और जीव-जगत की रक्षा करते हैं—आपको हमारा प्रणाम है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र कर्कोटक स्वरूप को नाग-तत्त्व से आगे बढ़कर वन्य जीवन, जैव-विविधता और प्राकृतिक संतुलन के अधिष्ठाता के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ अनेक पशु-पक्षियों और वन्य जीवों का उल्लेख प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि यह दर्शाने के लिए है कि दैवी सत्ता प्रत्येक जीव रूप में समान रूप से व्याप्त है।
‘सोमाय’ शब्द यह संकेत करता है कि कर्कोटक का संबंध सोम—अर्थात् जीवन-रस, पोषण और संवेदनशीलता—से है। नाग-तत्त्व यहाँ भय का नहीं, बल्कि संरक्षण और संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है। वन्य प्राणी उस प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं जो मानव नियंत्रण से परे होकर भी सृष्टि को संतुलित रखती है।
इस मंत्र में उल्लिखित विविध जीव यह दर्शाते हैं कि साधना केवल मानव-केंद्रित नहीं है। चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल की दृष्टि से कर्कोटक वह शक्ति है जो प्रकृति के अनदेखे और उपेक्षित पक्षों की रक्षा करती है। जो प्राणी समाज के केंद्र में नहीं हैं, वे भी उतने ही आवश्यक हैं।
कर्कोटक का यह स्वरूप साधक को यह बोध कराता है कि सच्ची साधना में केवल अपने हित की कामना नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के प्रति सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना होनी चाहिए। जब साधक प्रत्येक जीव में दैवी व्यवस्था को देखना सीखता है, तब उसका अहंकार क्षीण होता है और करुणा का विस्तार होता है।
इस मंत्र का सार यह है कि कर्कोटक प्रकृति की बहुरूपता और जैव-संतुलन का रक्षक है। उसकी उपासना साधक को सिखाती है कि जीवन केवल मनुष्य का नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि का साझा उत्सव है—और उसी संतुलन में वास्तविक भद्रता निहित है।
२२. शङ्खपाल
ॐ अग्निर्ऋषिः पवमानः पाञ्चजन्न्यः पुरोहितः ॥ तमीमहे महागयम् ।। उपयामगृहीतोऽस्यग्ग्ग्नये त्वा व्वर्चस ऽएष ते योनिरग्ग्ग्नये त्त्वा व्वर्चसे ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शङ्खपाल इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः शङ्खपालाय नमः ॥२२॥
हिन्दी अर्थ
अग्नि इस मंत्र के ऋषि हैं। पवमान अग्नि पाँचों जनों के पुरोहित हैं।
हम उस महान अग्नि का आवाहन करते हैं।
यह आहुति अग्नि के लिए ग्रहण की गई है—यह तुम्हारा स्थान है, यह तुम्हारी योनि है,
हे अग्नि! तुम हमें तेज, बल और दिव्य ऊर्जा प्रदान करो।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र शङ्खपाल स्वरूप को अग्नि-तत्त्व से संयुक्त नाग-शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। शङ्खपाल यहाँ केवल नागराज नहीं, बल्कि वह दैवी सत्ता है जो तेज, शुद्धि और रूपांतरण की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है। अग्नि को ‘पवमान’ कहा गया है—अर्थात् जो स्वयं शुद्ध है और दूसरों को भी शुद्ध करता है।
‘पाञ्चजन्न्यः पुरोहितः’ यह दर्शाता है कि अग्नि समस्त मानव समाज की ओर से देवताओं के साथ सेतु का कार्य करती है। शङ्खपाल का यह रूप बताता है कि नाग-तत्त्व केवल भूमिगत या रहस्यमय नहीं, बल्कि यज्ञीय चेतना से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
‘वर्चस’ का विशेष उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्चस केवल बाहरी तेज नहीं, बल्कि आत्मबल, ओज और आंतरिक प्रभा का सूचक है। इस मंत्र के माध्यम से साधक अग्नि-नाग शक्ति से यह प्रार्थना करता है कि उसका जीवन निष्क्रिय न रहे, बल्कि सार्थक, तेजस्वी और उद्देश्यपूर्ण बने।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में शङ्खपाल का स्थान यह संकेत देता है कि साधना का एक आवश्यक चरण आत्मिक परिशोधन और ऊर्जा-संवर्धन है। उग्र, भीम और नाग स्वरूपों के बाद यह मंत्र साधक को यह सिखाता है कि शक्ति तभी कल्याणकारी बनती है जब वह अग्नि के समान नियंत्रित और पवित्र हो।
इस मंत्र का सार यह है कि शङ्खपाल वह दैवी शक्ति है जो अग्नि के माध्यम से साधक के भीतर छिपी सामर्थ्य को जाग्रत करती है और उसे जीवन-यज्ञ में दीप्त, जागरूक और उत्तरदायी बनाती है।
२३. कम्बल
ॐ सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिण ऽऊर्ष्णासूत्त्रेण कवयो व्वयन्ति ॥ अश्विना यज्ञ ᳪ सविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपं व्वरुणो भिषज्यन् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कम्बल इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः कम्बलाय नमः ॥२३॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानी पुरुष मन, बुद्धि और सूक्ष्म तंत्र के द्वारा इस सृष्टि के रहस्य को बुनते हैं।
ऋषि लोग उसे ऊष्मा और सूक्ष्म सूत्र से गूंथते हैं।
अश्विनीकुमार, यज्ञ, सविता, सरस्वती, इन्द्र और वरुण—
ये सभी उस दिव्य स्वरूप को प्रकट करते हैं और रोगों का शमन करते हैं।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र कम्बल स्वरूप को सृष्टि की सूक्ष्म, आवरणकारी और संरचनात्मक शक्ति के रूप में प्रकट करता है। ‘कम्बल’ यहाँ केवल नाग का नाम नहीं, बल्कि वह आवरण (Layer / Sheath) है जिसके माध्यम से ब्रह्मतत्त्व प्रकट होकर जगत का रूप लेता है। जैसे कम्बल शरीर को ढककर ऊष्मा बनाए रखता है, वैसे ही यह शक्ति सृष्टि को स्थिरता और निरंतरता प्रदान करती है।
‘सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिणः’—इस पंक्ति में यह गूढ़ संकेत है कि सृष्टि केवल स्थूल कर्म से नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और चेतना के तंत्र से संचालित होती है। ऋषि इसे ‘सूत्र’ की तरह बुनते हैं—यह सूत्र कर्म, ज्ञान और प्रकृति के नियमों का प्रतीक है।
अश्विनी कुमार (चिकित्सा), सविता (प्रेरणा), सरस्वती (ज्ञान), इन्द्र (बल) और वरुण (ऋत व चिकित्सा)—इन सभी का एक साथ उल्लेख यह दर्शाता है कि कम्बल स्वरूप समन्वयकारी शक्ति है। यह अलग-अलग देवतत्त्वों को जोड़कर जीवन को संतुलित और रोगमुक्त बनाती है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र यह स्पष्ट करता है कि उग्र और नाग स्वरूपों के बाद भी सृष्टि को संभालने के लिए सूक्ष्म, रक्षक और संयोजक शक्ति आवश्यक है। साधक के जीवन में यह शक्ति मानसिक संतुलन, बौद्धिक स्पष्टता और आंतरिक सुरक्षा के रूप में प्रकट होती है।
इस मंत्र का सार यह है कि कम्बल वह दैवी चेतना है जो साधक को यह बोध कराती है कि जीवन केवल बाहरी संघर्ष नहीं, बल्कि सूक्ष्म समन्वय और आंतरिक व्यवस्था से ही टिकता है। जब यह शक्ति जाग्रत होती है, तब साधक का मन, ज्ञान और कर्म एक ही सूत्र में बंधकर कल्याणकारी बन जाते हैं।
२४. अश्वतर
ॐ अश्वस्तूपरो गोमृगस्ते प्र्प्राजापत्याः कृष्णग्ग्रीव ऽआग्ग्नेयो रराटे पुरस्तात्सारस्वती मेष्यधस्ताद्धन्वीराश्श्विनावधोरामौ बाह्वोः सौमापौष्णः श्यामो नाब्भ्या ᳪ सौर्य्ययामौ श्श्वेतश्च्च कृष्णश्च्च पार्श्वयोस्त्वाष्ट्रौ लौमशसक्थौ सक्थ्यीर्वायव्यः श्वेतः पुच्छ ऽइन्द्राय स्वपस्याय व्वेहद्वैष्ष्णवो व्वामनः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अश्वतर इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः अश्वतराय नमः ॥२४॥
हिन्दी अर्थ
अश्वतर स्वरूप अनेक रूपों और दिशाओं में प्रकट होने वाला है।
घोड़े, गाय और मृग जैसे प्राणियों के गुण इसमें निहित हैं।
इसके विभिन्न अंग विभिन्न देवताओं से संबद्ध हैं—
मस्तक अग्नि से, वक्ष सरस्वती से, भुजाएँ अश्विनीकुमारों से,
नाभि सूर्य से, पार्श्व त्वष्टा से, जंघाएँ वायु से और पुच्छ इन्द्र से संबंधित है।
यह समस्त दिशाओं और देवशक्तियों से संयुक्त दिव्य स्वरूप है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र अश्वतर स्वरूप को अत्यंत गूढ़ और समग्र दैवी संरचना के रूप में प्रस्तुत करता है। ‘अश्वतर’ यहाँ केवल एक नाग या जीव नहीं, बल्कि बहु-देवात्मक, बहु-आयामी चेतना का प्रतीक है। इसमें घोड़े की गति, गाय की पोषण शक्ति और मृग की चपलता—तीनों का समन्वय दिखाई देता है।
मंत्र में शरीर के विभिन्न अंगों को अलग-अलग देवताओं से जोड़ा गया है। यह वैदिक दृष्टि का महत्वपूर्ण सिद्धांत है—सृष्टि एकीकृत है, और प्रत्येक अंग किसी न किसी दैवी शक्ति द्वारा संचालित है। अग्नि से तेज, सरस्वती से ज्ञान, अश्विनीकुमारों से चिकित्सा, सूर्य से प्राणशक्ति, वायु से गति और इन्द्र से सामर्थ्य—ये सभी मिलकर अश्वतर को पूर्ण बनाते हैं।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में अश्वतर का यह स्वरूप यह स्पष्ट करता है कि साधना केवल एक देवता या एक गुण तक सीमित नहीं है। वास्तविक भद्रता तब उत्पन्न होती है जब विभिन्न शक्तियाँ संतुलित होकर एक शरीर और एक चेतना में कार्य करें।
साधक के जीवन में अश्वतर का भाव यह सिखाता है कि मनुष्य स्वयं भी एक लघु ब्रह्माण्ड है। जब उसके भीतर ज्ञान, कर्म, गति, संयम और शक्ति—सभी संतुलित होते हैं, तब उसका जीवन दिशाहीन नहीं रहता।
इस मंत्र का सार यह है कि अश्वतर वह दैवी शक्ति है जो साधक को समग्रता, संतुलन और एकात्मबोध का अनुभव कराती है। यह समझ प्रदान करती है कि अलग-अलग शक्तियाँ विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य के विविध प्रकाश हैं।
२५. शूल
ॐ नमः श्वब्भ्यः श्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्व्वाच पशुपतये च नमो नीलग्ग्रीवाय च शितिकण्ठाय च नमः कपर्द्दिने ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शूल इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः शूलाय नमः ॥२५॥
हिन्दी अर्थ
हम श्वानों और उनके अधिपतियों को नमस्कार करते हैं।
भव, रुद्र, शर्व और पशुपति—इन सभी को हमारा बार-बार प्रणाम है।
नीलग्रीव (नीलकण्ठ) और शितिकण्ठ स्वरूप वाले, जटाधारी देव को भी हमारा नमस्कार है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र शूल स्वरूप को रुद्र के सर्वव्यापी और सर्वसमावेशी रूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ शूल केवल आयुध नहीं, बल्कि वह त्रिविध शक्ति है जो सृष्टि के स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों स्तरों पर कार्य करती है। शूल रुद्र की वह चेतना है जो आवश्यकता पड़ने पर संहार करती है, किंतु उसका अंतिम उद्देश्य संतुलन और रक्षा ही होता है।
श्वान और श्वपति का उल्लेख अत्यंत प्रतीकात्मक है। वैदिक दृष्टि में श्वान रक्षक, मार्गदर्शक और सीमाओं के प्रहरी माने गए हैं। इसका अर्थ यह है कि रुद्र की शक्ति केवल देवताओं या उच्च लोकों तक सीमित नहीं, बल्कि उन प्राणियों तक भी विस्तृत है जो सीमांत और रक्षक भूमिका में हैं।
भव, रुद्र, शर्व और पशुपति—ये सभी नाम रुद्र के भिन्न-भिन्न आयामों को दर्शाते हैं।
- भव: जो अस्तित्व प्रदान करता है
- रुद्र: जो दुःख को दूर करता है
- शर्व: जो संहार द्वारा शुद्धि करता है
- पशुपति: जो समस्त जीवों का स्वामी और रक्षक है
नीलग्रीव और शितिकण्ठ का स्मरण यह संकेत देता है कि यह शक्ति विष को भी धारण कर सकती है, किंतु उसे संसार के लिए अहितकारी नहीं बनने देती। यही शूल का वास्तविक स्वरूप है—विष को नियंत्रण में रखने वाली चेतना।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र यह स्पष्ट करता है कि शूल भय का नहीं, बल्कि धर्म-रक्षा और मर्यादा-स्थापन का प्रतीक है। साधक जब इस रूप का स्मरण करता है, तब उसके भीतर अनुशासन, साहस और सीमाओं की स्पष्टता उत्पन्न होती है।
इस मंत्र का सार यह है कि शूल वह दैवी शक्ति है जो साधक के जीवन में अराजकता को काटकर मार्ग को स्पष्ट करती है और उसे सुरक्षित, संयमित तथा धर्ममय दिशा प्रदान करती है।
२६. चन्द्रमौलि
ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रमौलि इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रमौलिने नमः ॥२६॥
हिन्दी अर्थ
चन्द्रमा मन से उत्पन्न हुआ, सूर्य नेत्रों से उत्पन्न हुआ।
कानों से वायु उत्पन्न हुई और मुख से अग्नि प्रकट हुई।
इस प्रकार समस्त इन्द्रियाँ और तत्त्व उस परम सत्ता से प्रकट हुए हैं।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र चन्द्रमौलि स्वरूप को सृष्टि के सूक्ष्म कारण और चेतन मूल के रूप में प्रकट करता है। चन्द्रमौलि—अर्थात् जिनके मस्तक पर चन्द्रमा विराजमान है—यह शिव का वह स्वरूप है जो मन, भावना और चेतना का अधिष्ठाता है। यहाँ चन्द्रमा को मन से उत्पन्न बताया गया है, क्योंकि मन का स्वभाव भी चन्द्र के समान परिवर्तनशील, शीतल और संवेदनशील होता है।
सूर्य का नेत्रों से उत्पन्न होना यह दर्शाता है कि दृष्टि और प्रकाश एक ही तत्त्व से जुड़े हैं। मनुष्य जो देखता है, वही उसके ज्ञान और अनुभव का आधार बनता है। श्रोत्र से वायु और मुख से अग्नि का उत्पन्न होना यह संकेत देता है कि श्रवण, प्राण और वाणी—ये सभी जीवन की गतिशील शक्तियाँ हैं, जो भीतर की चेतना को बाहर प्रकट करती हैं।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण संतुलन प्रदान करता है। जहाँ उग्र, भीम और शूल स्वरूप बाह्य और आंतरिक विघ्नों का नाश करते हैं, वहीं चन्द्रमौलि स्वरूप मानसिक संतुलन, शीतलता और विवेक प्रदान करता है। यह बताता है कि संहार के बाद भी सृष्टि का संचालन मन और चेतना के संतुलन से ही संभव है।
इस मंत्र का गूढ़ भाव यह है कि समस्त इन्द्रियाँ और तत्त्व किसी बाह्य सत्ता से नहीं, बल्कि उसी एक परम चेतना से उत्पन्न हैं जो शिव रूप में विद्यमान है। साधक जब इस भाव से चन्द्रमौलि का ध्यान करता है, तब उसका मन चंचलता से मुक्त होकर स्थिर और शुद्ध होने लगता है।
इस मंत्र का सार यह है कि चन्द्रमौलि शिव वह सत्ता हैं जो मन, इन्द्रियों और प्राणों को संतुलित कर साधक को आंतरिक शांति और आत्मबोध की ओर ले जाती हैं।
२७. चन्द्रमा
ॐ चुन्द्रमा ऽअप्स्वन्तरा सुपर्णो द्यावते दिवि । रयिं पिशङ्ग बहुलं पुरुस्पृह ᳪ हरि रेति कनिक्क्रदत् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रमा इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रमसे नमः ॥२७॥
हिन्दी अर्थ
चन्द्रमा जल के भीतर भी स्थित है और आकाश में भी विचरण करता है।
वह सुवर्ण पंखों वाले पक्षी के समान गतिशील है और आकाश में प्रकाशमान रहता है।
चन्द्रमा अनेक प्रकार के ऐश्वर्य, समृद्धि और सौंदर्य को प्रदान करने वाला है।
वह हरित आभा से युक्त होकर कल्याणकारी रूप में निरंतर गति करता है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र चन्द्रमा स्वरूप को केवल एक खगोलीय पिंड के रूप में नहीं, बल्कि रस, मन और समृद्धि के दैवी अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। वैदिक दृष्टि में चन्द्रमा जलतत्त्व से गहराई से जुड़ा है—इसी कारण इसे ‘अप्सु अन्तर’ कहा गया है। जल के समान ही चन्द्रमा मन, भावना और जीवन-रस को पोषित करता है।
‘सुपर्ण’ अर्थात् सुंदर पंखों वाला पक्षी—यह प्रतीक दर्शाता है कि चन्द्रमा स्थिर नहीं, बल्कि चक्रात्मक और गतिशील चेतना है। जैसे पक्षी आकाश में स्वतंत्र रूप से उड़ता है, वैसे ही चन्द्रमा मनुष्य के मन को प्रभावित करता हुआ वृद्धि और क्षय के चक्र में चलता है।
‘रयिं पिशङ्ग बहुलं’ का अर्थ है—प्रचुर ऐश्वर्य और पोषण देने वाला। यहाँ चन्द्रमा को केवल सौंदर्य का नहीं, बल्कि समृद्धि, संतुलन और तृप्ति का स्रोत बताया गया है। चन्द्रमा की शीतल किरणें उग्र शक्तियों को संतुलित करती हैं और साधक के भीतर कोमलता, करुणा और स्थिरता उत्पन्न करती हैं।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र विशेष संतुलनकारी भूमिका निभाता है। जहाँ उग्र, भीम और शूल स्वरूप कठोर विघ्नों का शमन करते हैं, वहीं चन्द्रमा स्वरूप साधना को भावनात्मक शुद्धि और मानसिक शांति प्रदान करता है।
इस मंत्र का सार यह है कि चन्द्रमा वह दैवी शक्ति है जो साधक के जीवन में रस, सौम्यता और संतुलन भर देती है। जब यह शक्ति जाग्रत होती है, तब मन की अस्थिरता शांत होती है और साधक भद्रता—अर्थात् शुभ, संतुलित और सौम्य अवस्था—की ओर अग्रसर होता है।
२८. वृषभध्वज
ॐ आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । संक्रन्दनोऽनिमिष ऽएकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वृषभध्वज इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः वृषभध्वजाय नमः ॥२८॥
हिन्दी अर्थ
वह देव अत्यंत तीव्र, प्रबल और वृषभ के समान शक्तिशाली हैं।
वे भयावह नहीं, बल्कि मेघों के समान गर्जन करने वाले और शत्रुओं को विचलित करने वाले हैं।
वे गर्जना करने वाले, जाग्रत, एकाकी वीर हैं।
ऐसे देव इन्द्र ने सौ सेनाओं के साथ मिलकर विजय प्राप्त की।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र वृषभध्वज स्वरूप को शक्ति, धर्म और अडिग साहस के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित करता है। वृषभ (नंदी) शिव का ध्वज है, जो केवल बाह्य बल का नहीं, बल्कि धैर्य, स्थिरता और धर्मपालन का प्रतीक माना गया है। यहाँ ‘आशुः शिशानः’ यह दर्शाता है कि यह शक्ति आवश्यकता पड़ने पर अत्यंत तीव्र और निर्णायक होती है।
‘वृषभो न भीमः’—यह पंक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका आशय यह है कि यह शक्ति भीषण अवश्य है, किंतु अराजक नहीं। यह धर्म के पक्ष में खड़ी वह शक्ति है जो मेघों के समान गर्जना कर अन्याय को विचलित कर देती है। ‘घनाघनः क्षोभणः’ शब्द यह स्पष्ट करते हैं कि यह चेतना जड़ता और अधर्म को हिला देने वाली है।
‘एकवीरः’ और ‘अनिमिषः’ का अर्थ है—जो सदा जाग्रत है और अकेले भी खड़ा रहने में सक्षम है। यह वृषभध्वज स्वरूप साधक को यह सिखाता है कि धर्म के मार्ग पर चलते समय कभी-कभी अकेला होना पड़ता है, किंतु सत्य और शक्ति साथ हों तो वही एक वीर पर्याप्त होता है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र यह संतुलन स्थापित करता है कि उग्र और भीम शक्तियों का अंतिम उद्देश्य विजय और व्यवस्था की स्थापना है। इन्द्र द्वारा सौ सेनाओं के साथ विजय का उल्लेख यह दर्शाता है कि जब दैवी शक्ति संगठित होती है, तब कोई भी विघ्न टिक नहीं सकता।
इस मंत्र का सार यह है कि वृषभध्वज वह दैवी चेतना है जो साधक को अडिगता, साहस और धर्मनिष्ठा प्रदान करती है। यह शक्ति सिखाती है कि सच्ची भद्रता केवल सौम्यता नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ और निर्णायक होना भी है।
२९. त्रिलोचन
ॐ सुगा वौ देवा सदना ऽअकर्म्म य ऽओजग्मेद ᳪ सवनं जुषाणाः ॥ भरमाणा व्वहमाना हवी ᳪ ष्ष्यस्म्मे धत्त व्वसवो व्वसूनि स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः त्रिलोचन इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः त्रिलोचनाय नमः ॥२९॥
हिन्दी अर्थ
हे देवताओं! आप शुभ मार्ग से हमारे यज्ञ-स्थान में पधारें।
आप हमारे निष्काम कर्म और यज्ञ को स्वीकार करें।
हमारी आहुतियों को वहन करते हुए और ग्रहण करते हुए
हे वसु देवताओं! हमें ऐश्वर्य, संपत्ति और कल्याण प्रदान करें—स्वाहा।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र त्रिलोचन स्वरूप को यज्ञ, विवेक और त्रिकालदर्शी चेतना के रूप में प्रतिष्ठित करता है। त्रिलोचन—अर्थात् तीन नेत्रों वाले शिव—के तीन नेत्र भूत, वर्तमान और भविष्य का बोध कराते हैं। इस मंत्र में साधक देवताओं से यह प्रार्थना करता है कि वे उसके कर्म को केवल बाह्य आडंबर के रूप में नहीं, बल्कि भाव और निष्ठा सहित स्वीकार करें।
‘सदना’ और ‘सवनं’ शब्द यह दर्शाते हैं कि यज्ञ केवल अग्निकुंड तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन स्वयं एक यज्ञ है, जहाँ प्रत्येक कर्म आहुति के समान है। त्रिलोचन स्वरूप यहाँ यह सिखाता है कि जब कर्म निष्काम और धर्मयुक्त होता है, तब वह देवताओं तक स्वतः पहुँच जाता है।
‘भरमाणा व्वहमाना हवी’—यह पंक्ति बताती है कि देवशक्तियाँ साधक की आहुतियों को स्वयं वहन करती हैं। इसका गूढ़ अर्थ यह है कि जब साधक सही मार्ग पर होता है, तब दैवी शक्तियाँ उसके प्रयासों को समर्थन और दिशा प्रदान करती हैं।
वसु देवताओं से ‘वसूनि’—अर्थात् ऐश्वर्य और स्थिर संपत्ति—की कामना केवल भौतिक धन तक सीमित नहीं है। यहाँ वसु का अर्थ है जीवन के आधारभूत मूल्य—स्वास्थ्य, शांति, संतुलन और सुरक्षा।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र अत्यंत संतुलनकारी भूमिका निभाता है। उग्र, भीम और संहारक स्वरूपों के बाद त्रिलोचन यह स्पष्ट करता है कि दैवी चेतना का अंतिम लक्ष्य कर्म की शुद्धि और फल की सम्यक प्राप्ति है।
इस मंत्र का सार यह है कि त्रिलोचन वह सत्ता है जो साधक के कर्म को तीनों कालों में परखकर उसे कल्याणकारी बनाती है। जब साधक इस भाव से यज्ञ और कर्म करता है, तब उसका जीवन स्वतः ही भद्र, संतुलित और समृद्ध हो जाता है।
३०. शक्तिधर
ॐ रुद्राः स ᳪ सृज्ज्य पृथिवी बृहज्ज्योतिः समीधिरं ॥ तेषां भानुरजस्रᳪ च्छुक्को देवेषु रोचते ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शक्तिधर इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः शक्तिधराय नमः ॥३०॥
हिन्दी अर्थ
रुद्रों ने पृथ्वी की सृष्टि की और महान प्रकाश को प्रज्वलित किया।
उनकी दीप्त शक्ति निरंतर प्रकाशित होती रहती है।
वह उज्ज्वल तेज देवताओं के मध्य सदा प्रकाशमान रहता है।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र शक्तिधर स्वरूप को सृष्टि, प्रकाश और दैवी ऊर्जा के वहनकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ ‘रुद्राः सृज्ज्य पृथिवी’ यह स्पष्ट करता है कि रुद्र केवल संहारक नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता और संरक्षक भी हैं। पृथ्वी का निर्माण और उस पर जीवन का संचार उसी उग्र–तेजस्वी शक्ति से संभव होता है।
‘बृहज्ज्योतिः’ अर्थात् महान प्रकाश—यह बाह्य सूर्यप्रकाश मात्र नहीं, बल्कि वह आंतरिक चेतना और प्राणशक्ति है जो समस्त सृष्टि को सक्रिय रखती है। शक्तिधर वह है जो इस ज्योति को धारण करता है और आवश्यकता अनुसार उसे प्रकट करता है।
‘भानुः अजस्रम्’—अर्थात् जो तेज निरंतर प्रकाशित रहता है—यह दर्शाता है कि दैवी शक्ति क्षणिक नहीं, बल्कि शाश्वत है। देवताओं के मध्य उसका तेज इसलिए रोचते है क्योंकि वही तेज धर्म, ऋत और सृष्टि-व्यवस्था को स्थिर रखता है।
चतुर्लिङ्गतो भद्र मण्डल में शक्तिधर का यह मंत्र यह संकेत देता है कि उग्र, भीम, संहारक और संतुलनकारी सभी रूपों का मूल आधार शक्ति ही है। बिना शक्ति के न सृष्टि संभव है, न संरक्षण और न ही संहार।
साधक के लिए यह मंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उसे यह बोध कराता है कि वास्तविक साधना शक्ति से भयभीत होने की नहीं, बल्कि उसे धारण करने योग्य बनने की प्रक्रिया है। जब साधक के भीतर यह शक्तिधर भाव जाग्रत होता है, तब उसका जीवन आलस्य, भय और जड़ता से मुक्त होकर तेजस्वी, सक्रिय और उद्देश्यपूर्ण बन जाता है।
इस मंत्र का सार यह है कि शक्तिधर वही है जो प्रकाश को वहन कर उसे कल्याण के लिए प्रकट करे—और यही शक्ति साधक को भद्र, संतुलित और धर्मनिष्ठ जीवन की ओर ले जाती है।
३१. महेश्वर
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महेश्वर इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः महेश्वराय नमः ॥३१॥
हिन्दी अर्थ
हम तीन नेत्रों वाले, सुगन्धि से युक्त और पुष्टि को बढ़ाने वाले महेश्वर की आराधना करते हैं।
जिस प्रकार पका हुआ ककड़ी फल अपने बन्धन से सहज रूप से मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हे प्रभु!
आप हमें बन्धनों से मुक्त करें और अमृतस्वरूप कल्याण प्रदान करें।
टीका / भावार्थ
यह मंत्र भगवान शिव के महेश्वर स्वरूप का गहन स्मरण कराता है, जहाँ वे केवल संहारक ही नहीं,
बल्कि करुणा, संरक्षण और मोक्ष के अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। ‘त्र्यम्बक’
शब्द उनके त्रिनेत्र स्वरूप को प्रकट करता है, जो भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों के
साक्षी हैं। यह संकेत करता है कि महेश्वर की दृष्टि सीमित नहीं, बल्कि सर्वव्यापक और
कालातीत है।
‘सुगन्धिं’ से आशय उस दिव्य चेतना से है जो जीवन को पवित्र, संतुलित और मंगलमय बनाती है।
यह सुगन्ध बाह्य नहीं, बल्कि वह आंतरिक अनुभूति है जो साधक के चित्त को स्थिर और निर्मल
करती है। ‘पुष्टिवर्द्धनम्’ जीवन-शक्ति, आयु और आत्मबल की वृद्धि का द्योतक है, जिससे
साधक सांसारिक और आध्यात्मिक—दोनों स्तरों पर सुदृढ़ होता है।
‘उर्वारुकमिव बन्धनात्’ उपमा अत्यंत सारगर्भित है। जैसे पका हुआ फल बिना पीड़ा के बेल से
स्वतः अलग हो जाता है, वैसे ही साधक भी अहंकार, भय और आसक्ति जैसे बन्धनों से सहज रूप में
मुक्त हो सके—यही इस मंत्र की मूल भावना है। यहाँ मुक्ति का अर्थ मृत्यु नहीं, बल्कि
जीवन में रहते हुए बन्धनों से विमुक्त होना है।
चतुरलिङ्गतो भद्र मण्डल में यह मंत्र साधना को गहराई प्रदान करता है और यह स्मरण कराता है
कि जब महेश्वर की कृपा साधक पर होती है, तब जीवन भय से नहीं, बल्कि विश्वास, संतुलन और
आध्यात्मिक परिपक्वता से संचालित होता है। यही महेश्वर-तत्त्व साधक को दीर्घायु, स्थिर
चित्त और अंततः मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।
३२. शूलपाणि
ॐ यावांकशामधुमत्यश्विना सूनृतावती तया यज्ञम्मिमिक्षताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शूलपाणि इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः शूलपाणये नमः ॥३२॥
हिन्दी अर्थ
हे शूलपाणि! मधुर रस से युक्त, कल्याणकारी और सत्यवाणी से सम्पन्न अश्विनीकुमारों की कृपा से
यह यज्ञ सम्पन्न हो। उनकी दिव्य शक्ति और मंगलभाव से यह कर्म पूर्णता को प्राप्त करे।
टीका / भावार्थ
इस मंत्र में भगवान शिव के शूलपाणि स्वरूप का स्मरण अप्रत्यक्ष रूप से यज्ञ-शक्ति और
दैवी सहयोग के माध्यम से किया गया है। शूलपाणि वह हैं जिनके हाथ में शूल है—जो अज्ञान, रोग
और अधर्म का नाश करने का प्रतीक है। अश्विनीकुमार वेदों में देवताओं के चिकित्सक और
कल्याणकर्ता माने गए हैं; अतः उनका आह्वान यज्ञ को शुद्ध, सफल और फलदायी बनाने के लिए किया
गया है।
‘मधुमती’ और ‘सूनृतावती’ शब्द यज्ञ के स्वरूप को स्पष्ट करते हैं—मधुमती अर्थात् मधुर,
रसपूर्ण और आनन्ददायक; तथा सूनृतावती अर्थात् सत्य और शुभ वाणी से युक्त। यह दर्शाता है कि
यज्ञ केवल द्रव्याहुति नहीं, बल्कि शुद्ध भाव, सत्य संकल्प और मंगल वाणी से ही सिद्ध होता
है।
शूलपाणि के तत्त्व से जुड़कर यह मंत्र यह बोध कराता है कि साधना में कठोरता और करुणा दोनों
का संतुलन आवश्यक है। शूल जहाँ एक ओर विघ्नों और दोषों का छेदन करता है, वहीं अश्विनीकुमारों
की कृपा साधक को आरोग्य, स्फूर्ति और जीवन-शक्ति प्रदान करती है।
चतुरलिङ्गतो भद्र मण्डल के संदर्भ में यह मंत्र यह संकेत देता है कि जब यज्ञ और साधना शुद्ध
भाव से सम्पन्न होते हैं, तब शूलपाणि की उग्र शक्ति भी कल्याणकारी बनकर साधक के जीवन में
संतुलन, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है।
षोडशोपचारैः पूजनम्
आसनार्थेऽक्षतान समर्पयामि । पादयोः पाद्यं समर्पयामि । हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । स्नानाङ्गाचमनं समर्पयामि । वस्त्रम् समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्रं समर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । अक्षतान समर्पयामि । पुष्पमालां समर्पयामि । नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । धूपमाध्रापयामि । दीपं दर्शयामि । हस्तप्रक्षालनम् । नैवेद्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मध्ये पानीयम् उत्तरापोशनं च समर्पयामि । ताम्बूलं समर्पयामि । पूगीफलं समर्पयामि । कृतायाः पूजायाः पाड्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । अनया पूजया गणपत्यादि पञ्चदेवता: प्रीयन्ताम् न मम ।
पूजा की आवश्यक सामग्री / Puja Essentials
इन वस्तुओं का प्रयोग ऊपर वर्णित अनुष्ठान में परंपरागत रूप से किया जाता है।
बाँस रहित धूप कोन
पूजा और ध्यान के दौरान सुगंध के लिए सामान्य रूप से उपयोग किए जाने वाले धूप कोन।
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पूजा के समय वातावरण को सुगंधित रखने के लिए उपयोग की जाने वाली अगरबत्ती।
View on Amazonकपूर सुगंधित तिल का पूजा तेल
दीया जलाने के लिए पूजा में उपयोग किया जाने वाला कपूर सुगंधित तिल का तेल।
View on Amazonकपूर की गोलियाँ (Camphor)
पूजा, हवन और आरती के दौरान कपूर जलाने के लिए उपयोग की जाने वाली कपूर की गोलियाँ।
View on Amazonसूती दीया बत्ती (Jyot Batti)
दीपक और दीया प्रज्वलन के लिए पूजा और आरती में उपयोग की जाने वाली सूती बत्ती।
View on Amazonपीतल का अखंड ज्योति दीया
घी या तेल से दीपक प्रज्वलन के लिए पूजा और आरती में उपयोग किया जाने वाला पीतल का दीया।
View on Amazonपंचमुखी रुद्राक्ष जप माला (108 मनके)
जप, ध्यान और पूजा के दौरान मंत्र जाप के लिए उपयोग की जाने वाली रुद्राक्ष माला।
View on Amazonश्री सत्यनारायण स्वामी फोटो फ्रेम
घर या पूजा स्थल में दर्शन और पूजा के लिए उपयोग की जाने वाली श्री सत्यनारायण स्वामी की छवि।
View on Amazonपूजा घंटी (Ghanti)
पूजा और आरती के समय ध्वनि के माध्यम से ध्यान केंद्रित करने के लिए उपयोग की जाने वाली घंटी।
View on Amazonइलेक्ट्रिक कपूर दानी (गणेश-ॐ डिजाइन)
पूजा, आरती एवं ध्यान के समय कपूर प्रज्वलन हेतु उपयोग की जाने वाली विद्युत कपूर दानी। यह सुगंध प्रसार के साथ नाइट लैंप के रूप में भी कार्य करती है तथा घर, मंदिर एवं पूजा कक्ष में सकारात्मक वातावरण बनाती है।
View on Amazonसूती फूल बत्ती (हस्तनिर्मित)
दीपक एवं दीया प्रज्वलन हेतु उपयोग की जाने वाली हस्तनिर्मित सूती फूल बत्ती। यह पूजा, आरती, नवरात्रि एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में नियमित रूप से प्रयुक्त होती है तथा स्थिर व शुद्ध ज्योति प्रदान करती है।
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