सप्तघृतमातृकापूजनम् : स्वरूप, तत्त्व और साधनात्मक अर्थ
सप्तघृतमातृकापूजन सनातन वैदिक परंपरा में पोषण, संरक्षण और जीवन-निरन्तरता से सम्बद्ध एक अत्यन्त सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण पूजन-विधान है। इस पूजन में सात मातृकाओं का स्मरण किया जाता है, जो घृत (घी) के माध्यम से जीवन-शक्ति, पुष्टि और स्थिरता प्रदान करने वाली शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
घृत यहाँ केवल द्रव्य नहीं, बल्कि तेज, स्मृति और प्राण का प्रतीक है।
यह पूजन जीवन की मूल आवश्यकताओं—अन्न, बल, बुद्धि, प्रजा, आयु और संरक्षण—को संतुलित रूप से स्थापित करने का साधन है।
घृत का तात्त्विक महत्त्व
वैदिक परंपरा में घृत को अत्यन्त पवित्र और तेजस्वी द्रव्य माना गया है।
घृत—
- यज्ञ का प्राण है
- अग्नि का पोषक है
- और देवताओं का प्रिय आहार है
सप्तघृतमातृकाओं का स्वरूप इसी घृत-तत्त्व से संयुक्त है, जो यह दर्शाता है कि जीवन का पोषण केवल स्थूल अन्न से नहीं, बल्कि सूक्ष्म तेज और संतुलन से होता है।
सप्त मातृकाएँ : संरक्षण और पुष्टि की शक्तियाँ
सप्तघृतमातृकाएँ जीवन के सात प्रमुख आधारों की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। ये शक्तियाँ—
- शारीरिक पोषण
- प्राणबल
- मानसिक स्थिरता
- वंश-रक्षा
- आयु-वृद्धि
- रोग-निवारण
- और यज्ञीय संतुलन
को सामूहिक रूप से नियंत्रित करती हैं।
इन मातृकाओं का स्वरूप उग्र नहीं, बल्कि पोषक, धारण करने वाला और स्थिर करने वाला है। वे जीवन को सम्भालने वाली शक्तियाँ हैं, न कि केवल संहार या परिवर्तन की।
साधना और यज्ञ में सप्तघृतमातृकाओं की भूमिका
जहाँ योगिनी और उग्र शक्तियाँ साधना में तीव्रता लाती हैं, वहीं सप्तघृतमातृकाएँ उस तीव्रता को स्थायित्व और संतुलन प्रदान करती हैं।
इसी कारण—
- यज्ञ
- प्राणप्रतिष्ठा
- दीक्षा
- और दीर्घकालिक साधना
में सप्तघृतमातृकापूजन का विशेष स्थान है।
यह पूजन यह सुनिश्चित करता है कि साधना केवल क्षणिक प्रभाव तक सीमित न रहे, बल्कि दीर्घकाल तक फलदायी हो।
साधनात्मक उद्देश्य
सप्तघृतमातृकापूजन का उद्देश्य त्वरित सिद्धि नहीं, बल्कि—
- जीवन में पोषण की निरन्तरता
- साधना में स्थिरता
- और साधक की आन्तरिक सुरक्षा
की स्थापना है।
यह पूजन साधक को यह बोध कराता है कि शक्ति तभी टिकती है, जब उसे पोषण और मर्यादा दोनों प्राप्त हों।
आध्यात्मिक संकेत
यह पूजन यह भी दर्शाता है कि देवी-शक्ति केवल उग्र या रहस्यमयी नहीं है, बल्कि वह—
- माता है
- पालनकर्त्री है
- और जीवन को धारण करने वाली शक्ति है
सप्तघृतमातृकाएँ साधक के जीवन में मातृत्व, करुणा और स्थायित्व का भाव स्थापित करती हैं।
निष्कर्ष
सप्तघृतमातृकापूजन साधना की पोषक आधार-भूमि है। यह पूजा यह सुनिश्चित करती है कि साधक की साधना, यज्ञ और जीवन—तीनों में संतुलन बना रहे।
जहाँ घृत है, वहाँ तेज है; और जहाँ मातृकाएँ प्रतिष्ठित हैं, वहाँ जीवन सुरक्षित और स्थिर रहता है।
षोडश मातृका पूजन के बाद सप्त घृत मातृका की पूजा की जाती है। सप्तघृत मातृका मंडल, सिंदूर में घी
मिलाकर बनायी जाती है। एवं इसे उर्ध्व स्थापित किया जाता है। सप्त घृत मातृका नाम - श्री, लक्ष्मी, धृति, मेधा, स्वाहा, प्रज्ञा और सरस्वती
इन सातों देवियों का पूजन सप्त घृत मातृका वेदी में किया जाता है। मातृका पूजन वामावर्त करने की विधि है। नीचे के सातों बिंदुओं पर दक्षिण
से आरम्भ करके उत्तर में समापन करना चाहिये।
१. श्री
ॐ मनसः काममाकूतिं वाचं सत्यमशीमहि । पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रिये इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः श्रियै नमः।
हिन्दी अर्थ — हम मन के कामना-तत्त्व और संकल्प को, तथा वाणी के सत्य को प्राप्त करें। पशुओं का रूप, अन्न का स्वरूप—ये सभी मेरे भीतर स्थित हों; श्री और यश मुझमें आश्रय ग्रहण करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में श्री शक्ति का स्मरण मन, वाणी, अन्न और यश—इन चारों के समन्वित रूप में किया गया है। मनसः काम और आकूति से संकल्प-शक्ति का संकेत मिलता है, जबकि वाणी का सत्य साधना की प्रामाणिकता को दर्शाता है। पशु और अन्न जीवन के पोषण और स्थायित्व के प्रतीक हैं। श्री का “श्रयताम्” भाव यह स्पष्ट करता है कि समृद्धि बाहर से नहीं, बल्कि साधक के भीतर प्रतिष्ठित होती है। इस मंत्र का जप मानसिक स्पष्टता, सत्यनिष्ठ वाणी, पोषण और स्थायी यश की स्थापना करता है।
२. लक्ष्मी
ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यावोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुं मऽइषाण सर्व्वलोकं मऽइषाण।
ॐ भूर्भुवः स्वः लक्ष्मि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः लक्ष्म्यै नमः।
हिन्दी अर्थ — श्री और लक्ष्मी तुम्हारी पत्नियाँ हैं। अहोरात्र तुम्हारे पार्श्व में स्थित हैं। नक्षत्र तुम्हारा रूप हैं और अश्विनीकुमार तुम्हारा मुख हैं। तुम अन्न प्रदान करने वाले हो; हमें अन्न दो, समस्त लोकों में हमें अन्न प्रदान करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में लक्ष्मी शक्ति का स्मरण समृद्धि, पोषण और विश्वव्यापी संतुलन के रूप में किया गया है। श्री और लक्ष्मी का युगल भाव ऐश्वर्य के स्थायित्व और शोभा को दर्शाता है, जबकि अहोरात्र समय-चक्र में निरन्तरता का संकेत देते हैं। नक्षत्रों का रूप होना ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और नियमन को, तथा अश्विनीकुमारों का मुख होना जीवनदायी और चिकित्सक तत्त्व को प्रकट करता है। ‘इष्णन्’ के माध्यम से अन्न और पोषण की सार्वभौमिक कामना व्यक्त होती है। इस मंत्र का जप साधक के जीवन में सतत् पोषण, समय-संतुलन और लोककल्याण से संयुक्त समृद्धि की स्थापना करता है।
३.धृति
ॐ भद्रं कर्ण्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्ष भिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ᳪ सस्तनूभिर्व्य शेमहि देवहितं यदायुः।
ॐ भूर्भुवः स्वः धृति इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः धृत्यै नमः।
हिन्दी अर्थ — हे देवो! हम कानों से कल्याणकारी वचन सुनें और नेत्रों से पूजनीय, मंगलमय को देखें। स्थिर अंगों और स्वस्थ शरीर के साथ स्तुति करते हुए हम वह आयु प्राप्त करें जो देवों के लिए हितकारी हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में धृति शक्ति का स्मरण स्थिरता, संतुलन और दीर्घकालिक कल्याण के रूप में किया गया है। शुभ श्रवण और पवित्र दर्शन साधक की चेतना को विक्षेप से मुक्त रखते हैं, जबकि स्थिर अंग और संतुष्ट शरीर आन्तरिक दृढ़ता का संकेत देते हैं। ‘देवहित आयु’ का भाव यह स्पष्ट करता है कि दीर्घायु केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य और लोककल्याण से संयुक्त होनी चाहिए। इस मंत्र का जप साधक में मानसिक धैर्य, शारीरिक स्थिरता और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण की स्थापना करता है—जो धृति का मूल तत्त्व है।
४. मेधा
ॐ मेधां मे व्वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः। मेधामिन्द्रश्च्च व्वायुश्च मेधा धाता दधातु मे स्वाहा।
ॐ भूर्भुवः स्वः मेधे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ मेधायै नमः।
हिन्दी अर्थ — वरुण मुझे मेधा प्रदान करें; अग्नि और प्रजापति मुझे मेधा प्रदान करें। इन्द्र और वायु भी मुझे मेधा प्रदान करें; धाता मुझे मेधा प्रदान करें। स्वाहा।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मेधा शक्ति का स्मरण देवताओं के सामूहिक अनुग्रह से होने वाली बुद्धि, स्मरण-शक्ति और विवेक के रूप में किया गया है। वरुण का ऋत-बोध, अग्नि की दीप्त चेतना, प्रजापति की सृजनशील बुद्धि, इन्द्र का निर्णय-बल, वायु की चंचल प्राण-शक्ति और धाता का नियामक तत्त्व—ये सभी मिलकर मेधा को पूर्ण बनाते हैं। ‘ददातु’ की पुनरावृत्ति यह दर्शाती है कि मेधा एकांगी नहीं, बल्कि बहुआयामी दैवी समन्वय का फल है। इस मंत्र का जप अध्ययन, स्मृति, निर्णय और साधनात्मक स्पष्टता को सुदृढ़ करता है।
५. स्वाहा
ॐ प्राणाय स्वाहा ऽपानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा वाचे स्वाहा मनसे स्वाहा।
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहायै नमः।
हिन्दी अर्थ — प्राण को स्वाहा, अपान को स्वाहा, व्यान को स्वाहा; नेत्रों को स्वाहा, कानों को स्वाहा, वाणी को स्वाहा और मन को स्वाहा।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में स्वाहा शक्ति का स्मरण समर्पण, संतुलन और प्राण-व्यवस्था के तत्त्व के रूप में किया गया है। प्राण, अपान और व्यान—ये तीनों जीवन-शक्ति के प्रवाह और नियंत्रण के मूल आधार हैं, जबकि चक्षु, श्रोत्र, वाणी और मन इन्द्रिय और चेतना के प्रमुख साधन हैं। प्रत्येक के साथ ‘स्वाहा’ का उच्चारण यह दर्शाता है कि साधक अपने प्राण, इन्द्रियों और मानसिक शक्तियों को यज्ञभाव से समर्पित करता है। इस मंत्र का जप आन्तरिक शुद्धि, प्राण-संतुलन और इन्द्रिय-नियमन को सुदृढ़ करता है, जिससे साधना स्थिर और फलप्रद बनती है।
६. प्रज्ञा
ॐ आयङ्गौः पृश्निरक्रमीदसदन्न्मातरं पुरः पितरञ्च प्रयन्त्स्वः।
ॐ भूर्भुवः स्वः प्रज्ञे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः प्रज्ञायै नमः।
हिन्दी अर्थ — यह गौ पृश्नि रूप होकर आगे बढ़ी, माता (पृथ्वी) और पिता (द्यौ) के सम्मुख स्थित हुई और स्वर्लोक की ओर प्रवृत्त हुई।
हे प्रज्ञे, यहाँ आओ, यहाँ स्थित हो जाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में प्रज्ञा शक्ति का स्मरण जाग्रत बुद्धि, दिशाबोध और ऊर्ध्वगामी चेतना के रूप में किया गया है। गौ का पृश्नि रूप ज्ञान-वहन और पोषण का प्रतीक है, जो माता-पिता अर्थात् पृथ्वी और द्यौ—स्थूल और सूक्ष्म—दोनों आधारों से सम्बद्ध होकर स्वर्लोक की ओर अग्रसर होती है। प्रज्ञा का आवाहन यह दर्शाता है कि विवेक केवल ज्ञान नहीं, बल्कि सही दिशा में गति भी है। इस मंत्र का जप साधक में बोध, निर्णय-क्षमता और आध्यात्मिक उन्नयन की स्पष्टता स्थापित करता है।
७. सरस्वती
ॐ पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवति। यज्ञं व्यष्टुधियावसुः।
ॐ भूर्भुवः स्वः सरस्वति इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ सरस्वत्यै नमः।
हिन्दी अर्थ — पावन स्वरूपिणी सरस्वती, जो बल और अन्न से सम्पन्न हैं, वे हमें अन्न और सामर्थ्य प्रदान करें। बुद्धि और धन से युक्त होकर हमारे यज्ञ का विस्तार करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सरस्वती शक्ति का स्मरण पवित्रता, वाणी, बुद्धि और यज्ञ-संवर्धन के रूप में किया गया है। ‘पावका’ शब्द सरस्वती के शुद्धिकारक स्वरूप को दर्शाता है, जो बुद्धि और वाणी को मलिनता से मुक्त करती हैं। वाज और वाजिनीवति से अन्न, बल और साधनात्मक क्षमता का बोध होता है। यज्ञ का ‘व्यष्टु’ होना यह संकेत देता है कि सरस्वती केवल ज्ञान की देवी नहीं, बल्कि साधना और कर्म को सुव्यवस्थित करने वाली चेतना भी हैं। इस मंत्र का जप साधक में स्पष्ट बुद्धि, शुद्ध वाणी और यज्ञीय अनुशासन की दृढ़ स्थापना करता है।
प्राण-प्रतिष्ठा
ऊँ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञ ᳪ समिमं दधातु।।
विश्वेदेवा स इह मादयंतामों३ प्रतिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः श्रियादि सप्तघृतमातरः इहागच्छत इह तिष्ठत।
षोडशोपचारैः पूजनम्
आसनार्थेऽक्षतान समर्पयामि । पादयोः पाद्यं समर्पयामि । हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । स्नानाङ्गाचमनं समर्पयामि । वस्त्रम् समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्रं समर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । अक्षतान समर्पयामि । पुष्पमालां समर्पयामि । नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । धूपमाध्रापयामि । दीपं दर्शयामि । हस्तप्रक्षालनम् । नैवेद्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मध्ये पानीयम् उत्तरापोशनं च समर्पयामि । ताम्बूलं समर्पयामि । पूगीफलं समर्पयामि । कृतायाः पूजायाः पाड्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । अनया पूजया गणपत्यादि पञ्चदेवता: प्रीयन्ताम् न मम ।