क्षेत्रपालपूजनम् : स्वरूप, तत्त्व और साधनात्मक अर्थ
क्षेत्रपालपूजन सनातन परंपरा में रक्षा, मर्यादा और अनुशासन से सम्बद्ध एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पूजन-विधान है। किसी भी यज्ञ, देवी-पूजन, योगिनी-साधना या धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व क्षेत्रपाल का स्मरण इसलिए किया जाता है, क्योंकि वे उस स्थान के अधिष्ठाता और रक्षक माने जाते हैं। यह पूजन साधना-क्षेत्र को सुरक्षित, शुद्ध और व्यवस्थित करने का प्रतीक है।
क्षेत्रपाल का अर्थ केवल बाह्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है; वे उस स्थान में विद्यमान सूक्ष्म अव्यवस्थाओं, विघ्नों और नकारात्मक प्रभावों को नियंत्रित करने वाली शक्ति हैं। इस पूजन का उद्देश्य शक्ति को वश में करना नहीं, बल्कि अनुशासन के साथ उसकी अनुमति और संरक्षण प्राप्त करना है।
क्षेत्रपाल का तात्त्विक स्वरूप
क्षेत्रपाल को प्रायः भैरव-तत्त्व से जोड़ा जाता है, जो शिव का उग्र, रक्षक और न्यायकारी स्वरूप है। वे नियम, सीमा और मर्यादा के अधिष्ठाता हैं।
- क्षेत्रपाल सीमा-निर्धारण करते हैं
- वे अनधिकृत, अशुद्ध या अवांछित प्रभावों को प्रवेश नहीं करने देते
- वे साधना-क्षेत्र को स्थिर और नियंत्रित बनाए रखते हैं
इस कारण क्षेत्रपालपूजन यह स्मरण कराता है कि साधना स्वतंत्रता के साथ-साथ अनुशासन की भी अपेक्षा करती है।
साधना और अनुष्ठान में क्षेत्रपाल की भूमिका
किसी भी पूजन में स्थान (क्षेत्र) का विशेष महत्त्व होता है। यदि क्षेत्र असंरक्षित या अव्यवस्थित हो, तो साधना का प्रभाव क्षीण हो जाता है। क्षेत्रपालपूजन द्वारा साधक यह स्वीकार करता है कि—
- यह क्षेत्र पवित्र कर्म के लिए समर्पित है
- यहाँ होने वाला प्रत्येक कर्म नियमपूर्वक होगा
- साधक स्वयं भी मर्यादा का पालन करेगा
इस प्रकार क्षेत्रपाल केवल बाह्य रक्षक नहीं, बल्कि साधक के आचरण के साक्षी भी होते हैं।
क्षेत्रपालपूजन और विघ्न-निवारण
क्षेत्रपालपूजन का एक प्रमुख उद्देश्य विघ्नों का निवारण है। विघ्न केवल बाह्य बाधाएँ नहीं होतीं, बल्कि—
- मानसिक अस्थिरता
- भय
- असावधानी
- और अनुशासन-भंग
भी साधना में विघ्न उत्पन्न करते हैं। क्षेत्रपाल का स्मरण साधक को सजग, संयमित और केन्द्रित बनाए रखता है।
साधनात्मक उद्देश्य और आध्यात्मिक संकेत
क्षेत्रपालपूजन का लक्ष्य कोई त्वरित फल या सिद्धि नहीं, बल्कि साधना के लिए अनुकूल वातावरण की स्थापना है। यह पूजन साधक को यह बोध कराता है कि—
- शक्ति का प्रयोग मर्यादा में होना चाहिए
- साधना अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है
- और संरक्षण के बिना उन्नति सम्भव नहीं
इस पूजन से साधक में विनय, कर्तव्य-बोध और आत्मनियंत्रण का विकास होता है, जो किसी भी आध्यात्मिक मार्ग की अनिवार्य शर्त है।
निष्कर्ष
क्षेत्रपालपूजन साधना की आधारशिला है। यह न तो केवल लोकाचार है और न ही औपचारिक परंपरा, बल्कि यह दर्शाता है कि जहाँ मर्यादा सुरक्षित होती है, वहीं शक्ति स्थिर होती है। क्षेत्रपाल का स्मरण साधक और साधना—दोनों को सुरक्षित, संतुलित और फलदायी बनाता है।
१. अजर
ॐ इमौ ते पक्षावजरौ पतत्त्रिणौ याब्भ्या ᳪ रक्षा ᳪ स्यपह ᳪ स्यग्ग्ने॥ ताब्भ्यां पतेम सुकृतामु लोकं यत्त्र ऽऋषयो जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अजर इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः अजराय नमः अजरामा नमः ॥१॥
हिन्दी अर्थ — हे अग्नि! ये तेरे दो पंख हैं, जो अजर और पतत्री हैं; जिनके द्वारा तू रक्षा करता है और हिंसा को दूर करता है। उन्हीं पंखों के द्वारा हम पुण्यलोक में पहुँचें, जहाँ प्रथमज और प्राचीन ऋषि गए हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अजर शक्ति का स्मरण अग्नि के अजर, रक्षक और उर्ध्वगामी तत्त्व के रूप में किया गया है। अजर पंख कालातीतता और क्षयरहित शक्ति के प्रतीक हैं, जबकि पतन से रक्षा और हिंसा-निवारण का भाव संरक्षण को दर्शाता है। ऋषियों के पुण्यलोक का उल्लेख साधना के परम लक्ष्य—ज्ञान और अमर परंपरा—की ओर संकेत करता है। अजर का ध्यान साधक को क्षय से परे स्थिरता, सुरक्षा और उच्च आध्यात्मिक लोकों की ओर उन्मुख करता है।
२. व्यापकाख्य
ॐ प्रथमा वा ᳪ सरथिना सुवर्णा देवौ पश्यन्तौ भुवनानि विश्वा ॥ अपिप्प्रयं चोदना वा मिमाना होतारा ज्ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः व्यापकाख्य इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः व्यापकाख्याय नमः ॥२॥
हिन्दी अर्थ — जो प्रथम हैं, रथ सहित सुवर्णवर्ण वाले वे दोनों देव समस्त भुवनों को देखते हैं। वे प्रेरणा देने वाले और गति प्रदान करने वाले हैं; होता के रूप में ज्योति को प्रकाशित करते हुए दिशाओं को विभक्त करते हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में व्यापकाख्य शक्ति का स्मरण सर्वदर्शी, प्रेरक और प्रकाश-विस्तारक तत्त्व के रूप में किया गया है। प्रथमत्व और सुवर्णवर्ण दिव्यता और आदित्व को सूचित करते हैं, जबकि रथ, प्रेरणा और दिशाओं का विभाजन गति, व्यवस्था और मार्गदर्शन का बोध कराता है। व्यापकाख्य का ध्यान साधक को व्यापक दृष्टि, स्पष्ट दिशा-बोध और चेतना के प्रकाश से युक्त करता है, जिससे कर्म और साधना दोनों में सम्यक् विस्तार प्राप्त होता है।
३. इन्द्रचौर
ॐ इन्द्रस्य व्वज्ज्रोऽसि मित्त्रावरुणयोस्त्वा प्प्रशास्त्रोः प्प्रशिषा युनज्मि ॥ अव्ययायै त्त्वा स्वधायै त्त्वाऽरिष्टो ऽअर्ज्जुनो मरुतां प्प्रसवेन जयापाम मनसा समिन्द्रियेण ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः इन्द्रचौर इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः इन्द्रचौराय नमः ॥३॥
हिन्दी अर्थ — तू इन्द्र का वज्र है; मित्र और वरुण के आदेश तथा शासन से तुझे जोड़ा जाता है। अव्ययता के लिए तुझे, स्वधा के लिए तुझे (समर्पित किया जाता है)। मरुतों की प्रेरणा से, मन और इन्द्रिय-बल के साथ, अजेय अर्जुन के समान हम विजय प्राप्त करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में इन्द्रचौर शक्ति का स्मरण इन्द्र के वज्रात्मक, अनुशासक और विजयदायी तत्त्व के साथ किया गया है। मित्र–वरुण के शासन और मरुतों की प्रेरणा से यह शक्ति नियम, गति और सामूहिक सामर्थ्य को एकत्र करती है। अव्ययता और स्वधा का उल्लेख स्थायित्व और पितृ–परंपरा से जुड़ी शक्ति का संकेत देता है। इन्द्रचौर का ध्यान साधक को दृढ़ संकल्प, इन्द्रिय-नियंत्रण और अवरोधों पर विजय की क्षमता प्रदान करता है।
४. इन्द्रमूर्ति
ॐ एवेदिन्द्रं वृषणं व्वज्रबाहुं व्वसिष्ठासो ऽअब्भ्यर्ज्चन्त्यर्कैः ॥ स न स्तुतो वीरवद्धातु गोमद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः इन्द्रमूर्ति इहागच्छ इहतिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः इन्द्रमूर्तये नमः ॥४॥`
हिन्दी अर्थ — इसी प्रकार वसिष्ठ आदि ऋषि वज्रबाहु, पराक्रमी इन्द्र की स्तुति मंत्रों के द्वारा करते हैं। वह स्तुत होकर हमें वीर्ययुक्त, गौसम्पन्न करे; हे देवो! तुम सदा स्वस्ति द्वारा हमारी रक्षा करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में इन्द्रमूर्ति शक्ति का स्मरण इन्द्र के वीर्य, संरक्षण और दानशील स्वरूप के साथ किया गया है। वज्रबाहु इन्द्र अजेय पराक्रम और बाधा-भेदन की क्षमता का प्रतीक है, जबकि गौसम्पत्ति पोषण, समृद्धि और स्थिर जीवन का संकेत देती है। ऋषियों की स्तुति यह दर्शाती है कि यह शक्ति मंत्र और श्रद्धा से प्रसन्न होकर फल प्रदान करती है। इन्द्रमूर्ति का ध्यान साधक को साहस, रक्षा और ऐहिक-आध्यात्मिक समृद्धि प्रदान करता है।
५. उक्षभिध
ॐ उक्षा समुद्रो ऽअरुणः सुपर्णः पूर्व्वस्य योनि पितुराविवेश ।। मद्ध्ये दिवो निहितः पृश्न्निरश्म्मा व्विचक्क्रमे रजसस्यात्यन्तौ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः उक्षभिध इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः उक्षाभिधाय नमः ॥५॥
हिन्दी अर्थ — उक्षा समुद्ररूप है, अरुणवर्ण है और सुपर्ण है; वह पूर्वकालीन पिता की योनि में प्रविष्ट हुआ। वह द्युलोक के मध्य स्थापित है, विविध रश्मियों से युक्त होकर रज (अन्तरिक्ष) के दोनों छोरों तक विचरता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में उक्षभिध शक्ति का स्मरण सृष्टि के आद्य, गतिशील और विस्तारशील तत्त्व के रूप में किया गया है। समुद्र, अरुण और सुपर्ण के प्रतीक व्यापकता, उदय और ऊर्ध्वगमन को दर्शाते हैं। द्युलोक के मध्य स्थित होकर रज के अन्तों तक विचरण करना इस शक्ति की सर्वव्यापक सक्रियता को प्रकट करता है। उक्षभिध का ध्यान साधक को सृजनशील ऊर्जा, व्यापक दृष्टि और चेतना के विस्तार की अनुभूति कराता है।
६. कूष्माण्ड
ॐ यद्देवा देवहेडनंं देवासश्रकृमा व्वयम्॥ अग्निर्म्मा तस्मादेनसो व्विश्श्वान्मुञ्चत्वᳪ हसः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कूष्माण्ड इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः कूष्माण्डाय नमः ॥६॥
हिन्दी अर्थ — हे देवो! यदि हमने देवताओं के प्रति कोई अपराध किया हो या देवताओं को कष्ट पहुँचाया हो, तो अग्नि हमें उस समस्त पाप से मुक्त कर दे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कूष्माण्ड शक्ति का स्मरण शुद्धिकरण और पाप-निवारण के तत्त्व के साथ किया गया है। देवापराध की स्वीकारोक्ति और अग्नि से विमोचन की प्रार्थना यह दर्शाती है कि यह शक्ति दोष, ग्लानि और अज्ञान से उत्पन्न बन्धनों को भस्म करने वाली है। कूष्माण्ड का स्वरूप यहाँ उग्र नहीं, बल्कि शुद्धिकारक और करुणामय है, जो साधक को आत्मस्वीकृति, प्रायश्चित्त और आध्यात्मिक शुद्धि की ओर ले जाता है।
७. वरुण
ॐ स न ऽइन्द्राय वज्ज्यवे व्वरुणाय मरुद्भ्यः ॥ व्वरिवोवित्परि स्रव ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः वरुणाय नमः॥७॥
हिन्दी अर्थ — वह हमारे लिए इन्द्र, वज्रधारी, वरुण और मरुतों के लिए कल्याणकारी हो; वह हमें समस्त ओर से प्रशस्ति और संरक्षण प्रदान करे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वरुण शक्ति का स्मरण इन्द्र, मरुत और वरुण—तीनों के संयुक्त कल्याणकारी प्रभाव के साथ किया गया है। ‘वरिवोवित्’ का भाव व्यापक अनुग्रह और सर्वतोमुखी सुरक्षा का संकेत देता है। वरुण का तत्त्व यहाँ ऋत, नियम और नैतिक संतुलन से जुड़ा हुआ है, जो इन्द्र के पराक्रम और मरुतों की गतिशील शक्ति के साथ समन्वित होकर साधक के जीवन में संरक्षण और सुव्यवस्था स्थापित करता है। वरुण का ध्यान साधक को अनुशासन, सुरक्षा और दैवी अनुकम्पा से युक्त करता है।
८. बाहुकाख्य
ॐ बाहू मे बलमिन्द्रिय हस्तौ मे कर्म वीर्य्यम् ॥ आत्मा क्षत्त्रमुरो मम ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बाहुकाख्य इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः बाहुकाख्याय नमः ॥८॥
हिन्दी अर्थ — मेरी भुजाएँ बल और इन्द्रिय-शक्ति हैं; मेरे हाथ कर्म और वीर्य हैं। मेरी आत्मा क्षात्र (शासन-सामर्थ्य) है और मेरा उरः (वक्ष) उसका आधार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में बाहुकाख्य शक्ति का स्मरण शारीरिक सामर्थ्य, कर्म-क्षमता और आत्मबल के समन्वय के रूप में किया गया है। भुजाएँ और हाथ बाह्य क्रिया तथा पराक्रम के प्रतीक हैं, जबकि आत्मा और क्षात्र अंतःस्थ शासन, धैर्य और नेतृत्व को दर्शाते हैं। बाहुकाख्य का ध्यान साधक को बल, कर्मनिष्ठा और आत्मविश्वास से युक्त कर जीवन के उत्तरदायित्वों को समर्थ रूप से वहन करने की शक्ति प्रदान करता है।
९. विमुक्त
ॐ मुञ्चतु मा शपथ्यादयो व्वरुण्यादुत । अथो यमस्य पङ्वीशात्सर्व्वस्म्माद्देवकिल्विषात्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विमुक्त इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः विमुक्ताय नमः ॥९॥
हिन्दी अर्थ — वरुण से उत्पन्न शपथ-दोष आदि से मुझे मुक्त करो। तथा यम के पाश से और समस्त दैवी अपराधों से भी मुझे मुक्त करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में विमुक्त शक्ति का स्मरण बन्धन-मोचन और अपराध-निवारण के तत्त्व के रूप में किया गया है। वरुण्य शपथ, यमपाश और देवकिल्विष—ये सभी नैतिक, कर्मिक और दैवी बन्धनों के प्रतीक हैं। उनसे मुक्ति की प्रार्थना यह दर्शाती है कि विमुक्त शक्ति साधक को दोष, भय और कर्मबन्धन से छुड़ाकर स्वतंत्र और शुद्ध चेतना में स्थापित करती है। इसका ध्यान आत्मशुद्धि, निर्भयता और आध्यात्मिक स्वातन्त्र्य की ओर ले जाता है।
१०. लिप्तक
ॐ कुर्व्वन्नेवेह कर्म्माणि भू० जिजीविषेच्छत ᳪ समाः॥ एवं त्वयि नान्न्ययेतो ऽस्ति न कस्म लिप्यते नरे॥
ॐ भूर्भुवः स्वः लिप्तक इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः लिप्तकाय नमः ॥१०॥
हिन्दी अर्थ — इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार तेरे लिए कर्म के अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं है; ऐसे करने से मनुष्य कर्म से लिप्त नहीं होता।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में लिप्तक शक्ति का स्मरण कर्मयोग के शुद्ध सिद्धान्त के रूप में किया गया है। कर्म करते हुए भी उससे अलिप्त रहने का भाव यहाँ प्रधान है। दीर्घायु की कामना कर्मत्याग से नहीं, बल्कि निष्काम कर्म से जुड़ी हुई दिखाई गई है। लिप्तक का ध्यान साधक को यह बोध कराता है कि आसक्ति रहित कर्म ही बन्धन का कारण नहीं बनता, अपितु वही जीवन, शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का साधन है।
११. लीलालोक
ॐ सन्नः सिन्धु रवभृथायोद्यतः समुद्रोऽब्भ्यवह्नियमाणः सलिलः प्प्रप्लुतो ययो रोजसा स्क्कमिता रजा ᳪ सि वीर्य्येभिर्वीरतमा शविष्ठा॥ या पत्त्येते ऽअप्प्रतीता सहाभिर्विष्णू ऽअगन्वरुणापूर्व्वहूतौ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः लीलालोक इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः लीलालोकाय नमः ॥११॥
हिन्दी अर्थ — हमारे लिए यह सिंधु अवभृथ (समापन-स्नान) के लिए उद्यत हो; यह समुद्र प्रवाहित होकर, जल से पूर्ण होकर आगे बढ़ता है। जो अपने वेग से गतिशील है, जो रज (अन्तरिक्ष) को पार करता है, जो अपने वीर्यों से अत्यन्त वीर और शीघ्रगामी है। जो अप्रतिहत होकर अपने सहचरों के साथ प्रवाहित होता है—वह विष्णु और वरुण द्वारा पूर्व से आहूत है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में लीलालोक शक्ति का स्मरण प्रवाह, गति और दिव्य क्रीड़ा के तत्त्व के रूप में किया गया है। सिंधु और समुद्र का उल्लेख निरन्तरता, विस्तार और शुद्धिकरण का बोध कराता है, जबकि वेग, वीर्य और शीघ्रता चेतना की सक्रियता को दर्शाते हैं। विष्णु और वरुण द्वारा आहूत प्रवाह यह संकेत देता है कि यह लीला अराजक नहीं, बल्कि ऋत और व्यवस्था के अंतर्गत घटित होती है। लीलालोक का ध्यान साधक को जीवन को एक दिव्य प्रवाह और लीला के रूप में स्वीकार करने की दृष्टि प्रदान करता है, जहाँ गति, शुद्धि और समरसता एक साथ विद्यमान रहती हैं।
१२. एकदंष्ट्र
ॐ नमो गणेब्भ्यो गणपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्व्रातेब्भ्यो व्व्रातपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो गृत्सेब्भ्यो गृत्सपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्विरूपेब्भ्यो व्विश्वरुपेब्भ्यश्च वो नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः एकदंष्ट्र इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः एकदंष्ट्राय नमः ॥१२॥
हिन्दी अर्थ — गणों और गणपतियों को नमस्कार है। व्रातों और व्रातपतियों को नमस्कार है। गृत्सों और गृत्सपतियों को नमस्कार है। विरूपों और विश्वरूपों को नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में एकदंष्ट्र शक्ति का स्मरण गणात्मक, सामूहिक और अधिष्ठातृ तत्त्व के रूप में किया गया है। गण, व्रात और गृत्स—ये सभी संगठित शक्तियों और उनके नायकों का द्योतक हैं, जबकि विरूप और विश्वरूप विविधता और समग्रता को सूचित करते हैं। एकदंष्ट्र का स्वरूप यहाँ नियंत्रण, व्यवस्था और समूह-चेतना का प्रतीक है, जो विघ्नों को एकाग्र दृष्टि से भेदकर सामूहिक कर्म को सफल बनाता है। इसका ध्यान साधक को संगठन, अनुशासन और विघ्न-निवारण की शक्ति प्रदान करता है।
१३. ऐरावताख्य
ॐ अर्म्मेभ्यो हस्तिपं जवायाश्वपं पुष्ट्यै गोपालं वीर्य्यायाविपालं तेजसेऽजपालमिरायै कोनाशं कीलालाय सुराकारं भद्राय गृहपᳪ श्रेयसे व्वित्तधमाद्ध्यक्ष्यायानुक्षत्तारम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ऐरावताख्य इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः ऐरावताख्याय नमः ॥१३॥
हिन्दी अर्थ — अर्म (रोग/दुःख) से रक्षा के लिए हस्तिपालक, वेग के लिए अश्वपालक, पुष्टि के लिए गोपालक, वीर्य के लिए अविपालक, तेज के लिए अजपालक, समृद्धि के लिए कोनाश, कीलाल (रस/पेय) के लिए सुराकार, कल्याण के लिए गृहपति तथा श्रेय और धन-धारण के लिए अधिष्ठाता और अनुग्राही—(उनका स्मरण किया जाता है)।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में ऐरावताख्य शक्ति का निरूपण पालन, संरक्षण और समृद्धि के बहुविध अधिष्ठातृ रूपों में किया गया है। विभिन्न पालक-तत्त्व जीवन के अलग-अलग आयामों—वेग, पोषण, वीर्य, तेज और ऐश्वर्य—को संतुलित रूप से संभालने का संकेत देते हैं। गृहपति और धनाध्यक्ष का उल्लेख सामाजिक स्थिरता और कल्याण की स्थापना को दर्शाता है। ऐरावताख्य का ध्यान साधक को सर्वांगीण संरक्षण, संसाधन-संतुलन और स्थिर समृद्धि की चेतना प्रदान करता है।
१४. ओषधीघ्न
ॐ या ऽओषधीः पूर्व्वा जाता देवेब्भ्यस्त्रियुगं पुरा ॥ मनैनु बब्भ्रूणामहᳪ शतं धामानि सप्त च॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ओषधीघ्न इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः ओषधीघ्नाय नमः ॥१४॥
हिन्दी अर्थ — जो ओषधियाँ पहले उत्पन्न हुईं, जो देवताओं से भी पूर्व तीन युग पहले प्रकट हुईं। मैं उन भूरि-शक्तिसम्पन्न ओषधियों के सौ और सात धामों को जानता हूँ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में ओषधीघ्न शक्ति का स्मरण आद्य ओषधि-तत्त्व और उनकी प्राचीन, दिव्य सत्ता के रूप में किया गया है। देवताओं से भी पूर्व उत्पत्ति का उल्लेख यह दर्शाता है कि ओषधियाँ सृष्टि की मूल जीवन-शक्ति से जुड़ी हैं। उनके अनेक धाम जीवन, चिकित्सा और संरक्षण की व्यापक क्षमता का संकेत देते हैं। ओषधीघ्न का ध्यान साधक को रोग-निवारण, प्राकृतिक उपचार और जीवन-ऊर्जा की आदिम शक्ति के प्रति जागरूक करता है।
१५. बन्धनाख्य
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कौमारि इहागच्छ इह तिष्ठ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बन्धनाख्य इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः बन्धनाख्याय नमः ॥१५॥
हिन्दी अर्थ — हम त्र्यम्बक (तीन नेत्रों वाले) की उपासना करते हैं, जो सुगन्धित हैं और पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। जैसे पक्व फल बेल से स्वतः मुक्त हो जाता है, वैसे ही हम बन्धन से मुक्त हों, मृत्यु से नहीं।
ॐ भूः भुवः स्वः — हे कौमारि, यहाँ आओ, यहाँ स्थित हो जाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में बन्धनाख्य शक्ति का स्मरण बन्धन-मोचन और जीवन-रक्षा के तत्त्व के रूप में किया गया है। त्र्यम्बक का आवाहन रोग, भय और कर्मबन्धन से मुक्ति का संकेत देता है, जबकि उर्वारुक का उपमान स्वाभाविक और अहिंसक विमोचन को दर्शाता है। यहाँ मुक्ति का आशय मृत्यु से नहीं, बल्कि दुःख, आसक्ति और अवरोधों से छुटकारा पाना है। बन्धनाख्य का ध्यान साधक को संरक्षण, पुष्टि और सहज आध्यात्मिक स्वतंत्रता की अवस्था में प्रतिष्ठित करता है।
१६. दिव्यकाय
ॐ देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्प्रसुव यज्ञपतिं भगाय ।। दिव्यो गन्धर्व्वः केतपूः केतं नः पुनातु व्वाचस्पतिर्व्वाजं नः स्वदतु स्वाहा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दिव्यकाय इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः दिव्यकायाय नमः ॥१६॥
हिन्दी अर्थ — हे देव सविता! यज्ञ को प्रेरित करो, यज्ञपति को भग के लिए प्रेरित करो। दिव्य गन्धर्व, जो केतु (प्रकाश/चिह्न) से युक्त है, हमारे केतु को शुद्ध करे। वाचस्पति हमारे लिए अन्न को मधुर करे। स्वाहा।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में दिव्यकाय शक्ति का स्मरण यज्ञ, वाणी और दिव्य प्रकाश के समन्वय के रूप में किया गया है। सविता की प्रेरणा से यज्ञ और यज्ञपति की सक्रियता कर्म की दिव्य दिशा को दर्शाती है, जबकि गन्धर्व का केतु शुद्धि और सूक्ष्म चेतना के प्रकाश का संकेत देता है। वाचस्पति द्वारा वाणी और अन्न का मधुर होना ज्ञान और पोषण—दोनों की पूर्णता को प्रकट करता है। दिव्यकाय का ध्यान साधक को शुद्ध कर्म, प्रकाशमय चेतना और वाणी-बल से युक्त दिव्य अवस्था की ओर उन्मुख करता है।
१७. कम्बलाख्य
ॐ सीसेन तन्त्रं मनसा मनीषिण ऽऊर्णात्त्रेण कवयो व्वयन्ति ॥ अश्विना यज्ञ ᳪ सविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपं व्वरुणो भिषज्ज्यन्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कम्बलाख्याय इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः कम्बलाख्य नमः ॥१७॥
हिन्दी अर्थ — मनीषी जन मन और बुद्धि से सीसे के तन्तु तथा ऊर्णा (ऊन) के आवरण से इस तन्त्र को बुनते हैं। अश्विनीकुमार, सविता, सरस्वती और इन्द्र का यह रूप है; वरुण इसे औषधि के रूप में शुद्ध करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कम्बलाख्य शक्ति का स्मरण आवरण, संरक्षण और सूक्ष्म बुनावट के तत्त्व के रूप में किया गया है। तन्त्र, ऊर्णा और बुनने का भाव यह दर्शाता है कि यह शक्ति चेतना के चारों ओर रक्षक आवरण का निर्माण करती है। अश्विनीकुमार, सविता, सरस्वती और इन्द्र—इन देवताओं का समावेश चिकित्सा, प्रेरणा, ज्ञान और सामर्थ्य के संयुक्त प्रभाव को प्रकट करता है, जबकि वरुण का भिषक् रूप शुद्धि और संतुलन को सुनिश्चित करता है। कम्बलाख्य का ध्यान साधक को मानसिक संरक्षण, सूक्ष्म स्थिरता और साधना में सुरक्षित आवरण प्रदान करता है।
१८. क्षोभणाख्य
ॐ आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । संक्रन्दनोऽनिमिष ऽएकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः क्षोभणाख्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः क्षोभणाख्याय नमः ॥१८॥
हिन्दी अर्थ — वह शीघ्रगामी है, तीव्र वेग से प्रवृत्त वृषभ के समान है, भयानक नहीं होते हुए भी मेघों को घेरने वाला और जनों को क्षुब्ध करने वाला है। वह गर्जन करने वाला, अनिमिष, एकमात्र वीर है; इन्द्र ने उसके साथ सौ सेनाओं पर विजय प्राप्त की।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में क्षोभणाख्य शक्ति का स्मरण तीव्र गति, उद्बोधन और निर्णायक पराक्रम के रूप में किया गया है। आशु, वृषभ और मेघ-घन के उपमान शक्ति की प्रचण्ड ऊर्जा और संचलन को दर्शाते हैं, जबकि संक्रन्दन और अनिमिष भाव अविचल ध्यान और भय-निवारक गर्जना का संकेत देते हैं। एकवीर इन्द्र के साथ सौ सेनाओं पर विजय का उल्लेख सामूहिक बाधाओं के भेदन और त्वरित निर्णायक कार्यवाही का प्रतीक है। क्षोभणाख्य का ध्यान साधक में जड़ता-निवारण, तीव्र संकल्प और विरोधी शक्तियों पर प्रभावी विजय की क्षमता स्थापित करता है।
१९. गव
ॐ इमᳪ साहस्रᳪ शतधारमुत्सं व्यच्च्यमानᳪ सरिरस्य मद्ध्ये ॥ घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ग्ने मा हिᳪ सीः परमे व्योमन्॥ गवयमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद॥ गवयं ते शुगृच्छतु यं द्विष्ष्मस्तं ते शुगृच्छतु।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गव इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः गवे नमः ॥१९॥
हिन्दी अर्थ — मैं इस सहस्रधारा, शतधारा स्रोत को देखता हूँ, जो नदी के मध्य में विस्तृत हो रहा है। वह घृत को दुहता हुआ अदिति को प्रजा के लिए प्रदान करता है। हे अग्ने! परम व्योम में हमारी हिंसा मत करना। मैं तुम्हें वन्य गवय (गौर) को दिशाओं की ओर सौंपता हूँ; उसके द्वारा खोज करते हुए अपने शरीर सहित यहाँ स्थित हो जाओ। जो हमें द्वेष करता है, उसी को तुम्हारी तीव्रता प्राप्त हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में गव शक्ति का स्मरण स्रोत, पोषण और दिशा-व्यवस्था के तत्त्व के साथ किया गया है। सहस्रधारा उत्स जीवन-ऊर्जा और अक्षय प्रवाह का प्रतीक है, जबकि घृत और अदिति पोषण तथा प्रजावृद्धि का संकेत देते हैं। अग्नि से अहिंसा की प्रार्थना और दिशाओं में गवय का नियोजन यह दर्शाता है कि यह शक्ति संरक्षण के साथ अनुशासन भी स्थापित करती है। गव का ध्यान साधक को प्रचुरता, सही दिशा-बोध और विरोधी तत्त्वों से रक्षा की चेतना प्रदान करता है।
२०. घण्टाभिध
ॐ कुम्भो व्वनिष्ठुर्ज्जनिता शचीभिर्य्यस्म्मिन्नग्ग्रे योन्यां गर्भो ऽअन्तः॥ प्लाशिर्व्यक्तः शतधार ऽउत्सो दुहे न कुम्भी स्वधां पितृब्भ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टाभिध इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टाभिधाय नमः ॥२०॥
हिन्दी अर्थ — यह कुम्भ श्रेष्ठ है, शची शक्तियों द्वारा उत्पन्न है, जिसमें आदि योनि में गर्भ अंतःस्थित है। यह स्पष्ट रूप से प्रकट हुआ, शतधारा स्रोत के समान है; यह कुम्भ पितरों के लिए स्वधा का दोहन करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में घण्टाभिध शक्ति का स्मरण कुम्भ, योनि और शतधारा स्रोत के प्रतीकों के माध्यम से किया गया है। कुम्भ यहाँ धारण, संरक्षण और संचित शक्ति का द्योतक है, जबकि गर्भ का उल्लेख सृजन और आन्तरिक संभाव्यता को दर्शाता है। शतधारा उत्स से अक्षय प्रवाह और निरन्तर पोषण का भाव प्रकट होता है। पितरों के लिए स्वधा का दोहन यह संकेत देता है कि यह शक्ति वंश, परंपरा और पितृऋण की तृप्ति से भी सम्बद्ध है। घण्टाभिध का ध्यान साधक को आन्तरिक समृद्धि, परंपरागत संतुलन और सूक्ष्म चेतना की स्थिरता प्रदान करता है।
२१. व्याल
ॐ आ वक्रन्दय बलमोजो न ऽआधा निष्ट्टनिहि दुरिता बाधमानः॥ अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना ऽइत ऽइन्द्रस्य मुष्टिरसि वीडयस्व॥
ॐ भूर्भुवः स्वः व्याल इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः व्यालाय नमः ॥२१॥
हिन्दी अर्थ — बल और ओज को पुकारते हुए हमारे भीतर स्थापित हो; दुःखों और बाधाओं को दबाकर नष्ट कर दे। हे दुन्दुभि! अशुभ ध्वनि को दूर कर; तू इन्द्र की मुष्टि है—प्रहार करके विजय दिला।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में व्याल शक्ति का स्मरण बल, ओज और नाद-तत्त्व के उग्र रूप में किया गया है। वक्रन्दन और दुन्दुभि का उल्लेख चेतना को झकझोरने वाली शक्ति का संकेत देता है, जो दुरित और बाधाओं को कम्पित कर नष्ट करती है। इन्द्र की मुष्टि के रूप में यह शक्ति निर्णायक प्रहार और विजय का प्रतीक है। व्याल का ध्यान साधक में साहस, आन्तरिक ओज और अवरोधों को तोड़ने वाली प्रचण्ड ऊर्जा को जाग्रत करता है।
२२. अणुस्वरूप
ॐ इन्द्रायाहि तूतुजानऽउप ब्जह्माणि हरिवः ॥ सुते दधिष्ष्व नश्श्चनः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अणुस्वरूप इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः अणुस्वरूपाय नमः ॥२२॥
हिन्दी अर्थ — हे हरिवान् इन्द्र! शीघ्रता से आओ, हमारे स्तुतियों के समीप आओ। निचोड़े हुए सोम में हमारे लिए भी अपना अंश धारण करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अणुस्वरूप शक्ति का स्मरण सूक्ष्म, शीघ्रगामी और ग्राह्य तत्त्व के रूप में किया गया है। इन्द्र का त्वरित आगमन और स्तुतियों के समीप आना यह दर्शाता है कि यह शक्ति अत्यन्त सूक्ष्म होते हुए भी तुरंत प्रभावी होती है। सोम में अंश धारण करने का भाव सूक्ष्म रूप से पोषण, आनन्द और बल के संचार का संकेत देता है। अणुस्वरूप का ध्यान साधक को सूक्ष्म साधनाओं में तत्परता, शीघ्र फलप्राप्ति और आन्तरिक ऊर्जा के सूक्ष्म प्रवाह से जोड़ता है।
२३. चन्द्रवारुण
ॐ चन्द्रमा ऽअप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि ॥ रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहᳪ हरि रेति कनिवक्रदत् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रवारुण इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्रवारुणाय नमः ॥२३॥
हिन्दी अर्थ — चन्द्रमा जलों के भीतर स्थित है; वह सुपर्ण के समान आकाश में गतिमान है। वह पीतवर्ण, प्रचुर और बहुकाम्य ऐश्वर्य प्रदान करता है; हरि (अश्व/किरण) उसे लेकर वेग से चलता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में चन्द्रवारुण शक्ति का स्मरण जल, चन्द्र और गति—इन तीनों तत्त्वों के संयुक्त रूप में किया गया है। अप्सु स्थित चन्द्र शीतलता, रस और भावनात्मक संतुलन का द्योतक है, जबकि दिवि धावमान सुपर्ण ऊर्ध्वगमन और व्यापक चेतना को दर्शाता है। प्रचुर ऐश्वर्य और हरि के वेग का उल्लेख यह संकेत देता है कि यह शक्ति सौम्यता के साथ सक्रिय समृद्धि भी प्रदान करती है। चन्द्रवारुण का ध्यान साधक को शीतल विवेक, भाव-संतुलन और नियंत्रित ऐश्वर्य की प्राप्ति की ओर उन्मुख करता है।
२४. घटाटोप
ॐ प्रतिश्रुत्काया ऽअर्त्तनं घोषाय भषमन्ताय बहुवादिनमनन्ताय मूकᳪ शब्दायाडम्बराघातं महसे व्वीणावादं क्रोशाय तूणवध्ममवरस्पराय शङ्खध्मं व्वनाय व्वनपमन्न्यतो ऽरण्याय दावपम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः घटाटोप इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः घटाटोपाय नमः ॥२४॥
हिन्दी अर्थ — प्रतिध्वनि वाले शरीर को, आर्तनाद को, घोष को; बोलने वाले, बहुवाचक, अनन्त को; मूक शब्द को, आडम्बरयुक्त प्रहार को; महिमा के लिए वीणा-वादन को; क्रन्दन को, तूण (नली) के फूँकने को; परस्पर शंख-ध्वनि को; वन को, वनप को, अन्य वन को और दावानल को (नमस्कार/समर्पण है)।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में घटाटोप शक्ति का स्मरण नाद, शब्द और ध्वनि-विस्तार के व्यापक तत्त्व के रूप में किया गया है। प्रतिध्वनि, घोष, वाद्य और आर्तनाद—ये सभी चेतना को जाग्रत करने वाले नाद-रूप हैं, जबकि वन और दावानल प्राकृतिक व्यापकता और तीव्रता का संकेत देते हैं। घटाटोप का स्वरूप यहाँ बाह्य आडम्बर नहीं, बल्कि शब्द-शक्ति के सर्वव्यापी प्रसार का प्रतीक है। इसका ध्यान साधक को नाद-बोध, सजगता और चेतना के व्यापक विस्तार से जोड़ता है।
२५.जटाल
ॐ उग्ग्रँ लोहितेन मित्रᳪ सौव्व्रत्येन रुद्रं दौर्व्व्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साद्ध्यान् प्प्रमुदा॥ भवस्य कष्ठयᳪ रुद्रस्यान्तः पार्श्वं महादेवस्य यकृच्छर्व्वस्य व्वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः जटाल इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः जटालाय नमः ॥२५॥
हिन्दी अर्थ — उग्र लोहित रूप से मित्र को, सौव्रत्य (सौम्य व्रत) से रुद्र को, दौर्व्रत्य से इन्द्र को, क्रीड़ा से मरुतों को, बल से साध्यों को प्रसन्न करो। भव का काष्ठ, रुद्र का अन्तरंग पार्श्व, महादेव का यकृत, सर्व के अधिपति पशुपति का स्थिर आधार (यह है)।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में जटाल शक्ति का स्मरण उग्रता और सौम्यता—दोनों के संतुलनकारी तत्त्व के रूप में किया गया है। विभिन्न देवताओं के गुण—उग्रता, व्रत, क्रीड़ा और बल—यह दर्शाते हैं कि यह शक्ति बहुआयामी होकर समस्त दैवी प्रवृत्तियों को एक सूत्र में बाँधती है। भव, रुद्र, महादेव और पशुपति के अंग-प्रतीकों का उल्लेख जटाल को आन्तरिक आधार, धारण और स्थिरता की शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। जटाल का ध्यान साधक को उग्र-संयम, आन्तरिक स्थैर्य और विविध शक्तियों के समन्वय की क्षमता प्रदान करता है।
२६. क्रतु
ॐ पवित्रेण पुनीहि मा शुवक्रेण देव दीद्यत् ॥ अग्ग्ने क्रत्वा वक्रतूँ२ ॥ रनु ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः क्रतु इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः क्रतवे नमः ॥२६॥
हिन्दी अर्थ — हे देव! दीप्तिमान और पवित्र करने वाले पवित्र से मुझे शुद्ध करो। हे अग्ने! अपने क्रतु (यज्ञबुद्धि/संकल्प) द्वारा हमें अनुग्रह प्रदान करो।
हे क्रतु, यहाँ आओ, यहाँ स्थित हो जाओ। क्रतु को नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में क्रतु शक्ति का स्मरण पवित्रता, संकल्प और यज्ञबुद्धि के रूप में किया गया है। पवित्र से शुद्धि और अग्नि के क्रतु का आह्वान यह दर्शाता है कि साधना की सफलता शुद्ध अंतःकरण और स्पष्ट संकल्प पर आधारित है। भूर्-भुवः-स्वः द्वारा क्रतु को त्रिलोकव्यापी मानकर आवाहित किया गया है। क्रतु का ध्यान साधक में शुद्ध उद्देश्य, दृढ़ निश्चय और यज्ञीय बुद्धि की स्थापना करता है, जिससे कर्म सुव्यवस्थित और फलदायी होते हैं।
२७. घण्टेश्वर
ॐ आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः पुनरुर्जा निवर्तस्व सा नः। सहस्रं धुक्ष्वोरु धारा पयस्वतिः पुनर्म्मा विशताद्रयिः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टेश्वर इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः घण्टेश्वराय नमः ॥२७॥
हिन्दी अर्थ — हे कलश! हमारे लिए सुगन्ध ग्रहण करो; सोमरस की धाराएँ तुझमें प्रवेश करें। तू पुनः ऊर्जा से भरकर हमारी ओर लौट आ। सहस्र धाराओं से, विस्तृत और दुग्धयुक्त होकर प्रवाहित हो; समृद्धि पुनः हमारे भीतर प्रविष्ट हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में घण्टेश्वर शक्ति का स्मरण कलश, रस और पुनर्भरण के तत्त्व के साथ किया गया है। कलश यहाँ धारक और संचित शक्ति का प्रतीक है, जिसमें सोम की धाराएँ प्रवेश कर उसे पुनः उर्जस्वित करती हैं। सहस्रधारा और पयस्वती का भाव अक्षय पोषण, समृद्धि और निरन्तर प्रवाह को दर्शाता है। घण्टेश्वर का ध्यान साधक को रिक्तता से पूर्णता, क्षय से पुनर्भरण और साधना में सतत उर्जा की स्थापना की अनुभूति कराता है।
२८. विटङ्क
ॐ व्वाय शुवक्रो ऽ अयामि ते मध्वो ऽअग्ग्रं दिविष्टिषु॥ आयाहि सोमपीतये स्प्पार्हो देव नियुत्त्वता॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विटङ्क इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः विटङ्काय नमः ॥२८॥
हिन्दी अर्थ — हे वायु! मैं तुम्हारे लिए मधु का श्रेष्ठ अंश अर्पित करता हूँ, जो दिव्य निवासों में स्थित है। हे देव! नियुतों (अश्वों) से युक्त होकर सोमपान के लिए यहाँ आओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में विटङ्क शक्ति का स्मरण वायु-तत्त्व की गति, प्राण और दिव्य संचार के रूप में किया गया है। मधु और सोम के अर्पण से पोषण तथा आनन्द का भाव प्रकट होता है, जबकि नियुतों के साथ आगमन शीघ्रता और सक्रियता का संकेत देता है। विटङ्क का ध्यान साधक को प्राणशक्ति की तीव्रता, आन्तरिक गति और साधना में उत्साहपूर्ण संचार प्रदान करता है।
२९. मणिमति
ॐ दैव्या होतारा ऽऊर्ध्वमद्ध्वरं नोऽग्नेर्ज्जिह्वामभि गृणीतम्॥ कृणुतं नः स्विष्टि्टम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मणिमति इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः मणिमतये नमः ॥२९॥
हिन्दी अर्थ — हे दिव्य होताओ! हमारे यज्ञ को ऊर्ध्वगामी बनाओ। हे अग्ने! अपनी जिह्वा से (आहुति को) स्वीकार करो। हमारे लिए यज्ञ को स्विष्ट (सफल) बनाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मणिमति शक्ति का स्मरण यज्ञ की सिद्धि और दिव्य स्वीकृति के तत्त्व के रूप में किया गया है। दिव्य होता और अग्नि की जिह्वा का उल्लेख यह दर्शाता है कि यज्ञ केवल बाह्य कर्म नहीं, बल्कि दैवी संप्रेषण की प्रक्रिया है। स्विष्टि की कामना साधना की पूर्णता और फलप्राप्ति को सूचित करती है। मणिमति का ध्यान साधक को स्पष्ट बुद्धि, यज्ञीय अनुशासन और कर्म-सफलता की सूक्ष्म समझ प्रदान करता है।
३०. गणबन्ध
ॐ त्रीणिऽ त आहुर्द्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्पसु त्रीण्यन्तः समुद्रे ॥ उतेव मे व्वरुण श्छन्त्स्यर्व्वन्यत्त्रा त आहुः परमं जनित्रम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गणबन्ध इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः गणबन्धाय नमः ॥३०॥
हिन्दी अर्थ — तेरे तीन बन्धन स्वर्ग में बताए गए हैं, तीन जलों में और तीन समुद्र के भीतर। हे वरुण! तुम मुझे अन्यत्र से मुक्त करो, क्योंकि वे कहते हैं कि वही तुम्हारा परम जन्मस्थान है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में गणबन्ध शक्ति का स्मरण बन्धन, नियम और विमोचन—तीनों तत्त्वों के समन्वय के रूप में किया गया है। द्युलोक, आपः और समुद्र में स्थित बन्धन यह दर्शाते हैं कि बन्धन स्थूल, सूक्ष्म और गहन—तीनों स्तरों पर कार्य करते हैं। वरुण का आवाहन ऋत, नियम और नैतिक व्यवस्था के अधिष्ठाता के रूप में किया गया है, जो उचित स्थान से विमोचन प्रदान करते हैं। गणबन्ध का ध्यान साधक को कर्मिक बन्धनों की पहचान, उनके संतुलन और अन्ततः नियमानुसार मुक्ति की चेतना प्रदान करता है।
३१. डामर
ॐ प्रतिश्रुत्काया ऽअर्त्तनं घोषाय भषमन्ताय बहुवादिनमनन्ताय मूकᳪ शब्दयाडम्बराघातं महसेव्वीणावादं क्रोशाय तूणवध्ममवरस्पराय शङ्खद्ध्मं व्वनाय व्वनपमन्यतोऽरण्याय दावपम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः डामर इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः डामराय नमः ॥३१॥`
हिन्दी अर्थ — प्रतिध्वनि से युक्त शरीर को, आर्तनाद को, घोष को; बोलने वाले, बहुवाचक, अनन्त को; मूक शब्द को, आडम्बरयुक्त प्रहार को; महिमा के लिए वीणा-वादन को; क्रन्दन को, तूण (नली) के फूँकने को; परस्पर शंख-ध्वनि को; वन को, वनप को, अन्य वन को और दावानल को (समर्पण है)।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में डामर शक्ति का स्मरण उग्र नाद, ध्वनि और व्यापक कम्पन के रूप में किया गया है। आर्तनाद, घोष, वाद्य और शंख-ध्वनि चेतना को झकझोरने वाली नादशक्ति के प्रतीक हैं, जबकि वन और दावानल प्रकृति की अनियंत्रित, प्रचण्ड ऊर्जा को दर्शाते हैं। डामर का स्वरूप यहाँ तीव्र, विक्षोभकारी और परिवर्तनकारी है, जो जड़ता को तोड़कर चेतना में गति और जागरण उत्पन्न करता है। इसका ध्यान साधक को निर्भीकता, सजगता और शक्तिशाली आन्तरिक परिवर्तन की क्षमता प्रदान करता है।
३२. दुण्ढिकर्ण
ॐ शुद्धव्वालः सर्व्वशुद्धवालो मणिवालस्त ऽआश्विनाः श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्तं रुद्राय पशुपतये कर्णा यामाऽअवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्ज्जन्याः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दुण्ढिकर्ण इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः दुण्ढिकर्णाय नमः ॥३२॥
हिन्दी अर्थ — जो शुद्ध केशों वाला है, सर्वथा शुद्ध केशों वाला है, मणियों से युक्त केशों वाला है; अश्विनीकुमारों के समान श्वेत है, श्वेत नेत्रों वाला है, अरुणवर्ण है। वह रुद्र और पशुपति से सम्बद्ध है; जिनके कर्ण, याम और अवलिप्त रूप रौद्र हैं, जिनका स्वरूप नभ के समान है और जो पार्जन्य (वर्षा) से सम्बद्ध हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में दुण्ढिकर्ण शक्ति का स्मरण शुद्धि, रौद्रता और दिव्य प्रकाश के संयुक्त तत्त्व के रूप में किया गया है। शुद्ध, श्वेत और अरुण—ये रंग-प्रतीक शुद्धता, तेज और सक्रिय ऊर्जा को दर्शाते हैं। रुद्र–पशुपति का संबंध उग्र संरक्षण और अनुशासन को सूचित करता है, जबकि नभ और पार्जन्य का उल्लेख व्यापकता और पोषणकारी वर्षा-शक्ति को प्रकट करता है। दुण्ढिकर्ण का ध्यान साधक को शुद्ध चेतना, उग्र-संयम और व्यापक दैवी संरक्षण की अनुभूति कराता है।
३३. स्थवीर
ॐ व्वनस्पते वीड्वङ्गो हि भूया ऽअस्मत्सखा प्प्रतरणः सुवीरः ॥ गोभिः सनद्धो ऽअसि व्वीडयस्वास्त्थाता ते जयतु जेत्वानि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्थवीर इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः स्थविराय नमः ॥३३॥
हिन्दी अर्थ — हे वनस्पते! तुम हमारे लिए दृढ़ और शक्तिशाली बनो, हमारे मित्र बनकर रक्षा करने वाले और श्रेष्ठ वीर बनो। गौओं से संयुक्त होकर प्रहार करो; तुम्हारा आघात विजयी हो और विजय प्रदान करे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में स्थवीर शक्ति का स्मरण दृढ़ता, संरक्षण और विजय के तत्त्व के साथ किया गया है। वनस्पति का उल्लेख स्थायित्व, पोषण और प्राकृतिक बल का प्रतीक है, जबकि मित्रता और प्रतरण का भाव रक्षक शक्ति को दर्शाता है। गौओं से संयुक्त प्रहार और विजय की कामना यह संकेत देती है कि यह शक्ति पोषण के साथ-साथ निर्णायक सामर्थ्य भी प्रदान करती है। स्थवीर का ध्यान साधक को स्थिरता, धैर्य और बाधाओं पर विजय पाने की दृढ़ क्षमता से युक्त करता है।
३४. दन्तुर
ॐ सुपर्ण व्वस्ते मृगो ऽअस्या दन्तो गोभिः सनद्धापतति प्रसूता ॥ यत्त्रा नरः सं च व्वि च द्रवन्ति तत्त्रास्म्मब्भ्यषिवः शर्म्म यᳪ सन् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दन्तुर इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः दन्तुराय नमः ॥३४॥
हिन्दी अर्थ — हे सुपर्ण! तुम्हारा यह दन्त मृग के समान है; गौओं से संयुक्त होकर उत्पन्न हुआ वह उड़ता है। जहाँ मनुष्य एकत्र होकर इधर-उधर विचरण करते हैं, वहाँ हमारे लिए कल्याण और आश्रय प्रदान करने वाला हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में दन्तुर शक्ति का स्मरण वेग, प्रहार और संरक्षण के संयुक्त तत्त्व के रूप में किया गया है। सुपर्ण और मृग के उपमान तीव्र गति और सजगता का संकेत देते हैं, जबकि गौओं से संयुक्त होना पोषण और स्थिर आधार को दर्शाता है। मनुष्यों के बीच विचरण के संदर्भ से यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति सामाजिक क्षेत्र में भी कल्याण और सुरक्षा प्रदान करती है। दन्तुर का ध्यान साधक को तीक्ष्ण विवेक, समयोचित प्रहार और सर्वत्र कल्याणकारी संरक्षण की क्षमता से युक्त करता है।
३५. धनद
ॐ अग्ग्ने ऽअच्छा व्वदेह नः प्रति नः सुमना भव ॥ प्प्र नो यच्छ सहस्रजित् त्वᳪ हि धनदा ऽअसि स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः धनद इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः धनदाय नमः ॥३५॥
हिन्दी अर्थ — हे अग्ने! हमारी ओर आओ, हमारे प्रति प्रसन्नचित्त होओ। हमें सहस्रों को जीतने वाला धन प्रदान करो, क्योंकि तुम ही धन देने वाले हो। स्वाहा।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में धनद शक्ति का स्मरण अग्नि के दानशील और समृद्धिदायक स्वरूप के साथ किया गया है। अग्नि का सुमना होना अनुग्रह और स्वीकार्यता का संकेत देता है, जबकि सहस्रजित् धन बहुविध संसाधनों और स्थायी ऐश्वर्य का प्रतीक है। धनद का आवाहन साधक के जीवन में परिश्रम-सम्मत समृद्धि, यज्ञीय पुण्य और आर्थिक स्थिरता की स्थापना करता है।
३६. नागकर्ण
ॐ भद्रं कर्ण्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्ष भिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ᳪ सस्तनूभिर्व्य शेमहि देवहितं यदायुः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः नागकर्ण इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः नागकर्णाय नमः ॥३६॥
हिन्दी अर्थ — हे देवो! हम कानों से कल्याणकारी वचन सुनें और नेत्रों से पूजनीय कल्याण को देखें। स्थिर अंगों और स्वस्थ शरीर के साथ स्तुति करते हुए हम वह आयु प्राप्त करें जो देवों के लिए हितकारी हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में नागकर्ण शक्ति का स्मरण श्रवण, दर्शन और दीर्घायु के कल्याणकारी तत्त्व के रूप में किया गया है। शुद्ध श्रवण और पवित्र दृष्टि साधक की चेतना को विकारों से बचाती है, जबकि स्थिर अंग और देवहित आयु जीवन में संतुलन और स्वास्थ्य का संकेत देते हैं। नागकर्ण का ध्यान साधक को सजग इन्द्रियों, सात्त्विक जीवन-दृष्टि और कल्याणमय दीर्घायु की ओर उन्मुख करता है।
३७. मारीग
ॐ बाहू मे बलमिन्द्रियᳪ हस्तौ मे कर्म्म वीर्य्यम् ॥ आत्मा क्षत्त्रमुरो मम ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मारीग इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः मारीगणाय नमः ॥३७॥
हिन्दी अर्थ — मेरी भुजाएँ बल और इन्द्रिय-शक्ति हैं; मेरे हाथ कर्म और वीर्य हैं। मेरी आत्मा क्षात्र (शासन-सामर्थ्य) है और मेरा उरः (वक्ष) उसका आधार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मारीग शक्ति का स्मरण शारीरिक सामर्थ्य, कर्मक्षमता और आत्मबल के एकीकृत स्वरूप के रूप में किया गया है। भुजाएँ और हाथ बाह्य क्रिया, परिश्रम और पराक्रम के प्रतीक हैं, जबकि आत्मा और क्षात्र आन्तरिक नेतृत्व, धैर्य और अधिकार-बोध को दर्शाते हैं। मारीग का ध्यान साधक को बल, कार्यकुशलता और आत्मविश्वास से युक्त कर कर्तव्य-पथ पर स्थिर करता है।
३८. फेत्कार
ॐ अपां फेनेन नमुचे शिर ऽइन्द्रोदवर्त्तयः ॥ व्विश्वा यदजयः स्पृधः ।
ॐ भूर्भुवः स्वः फेत्कार इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः फेत्काराय नमः ॥३८॥
हिन्दी अर्थ — जल के फेन से इन्द्र ने नमुचि का सिर गिरा दिया; उसी के द्वारा उसने समस्त संघर्षों पर विजय प्राप्त की।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में फेत्कार शक्ति का स्मरण इन्द्र की अद्भुत युद्ध-कौशल और उपायकौशल के तत्त्व के साथ किया गया है। जल के फेन जैसे साधारण माध्यम से नमुचि-वध यह दर्शाता है कि यह शक्ति असामान्य उपायों से भी महान् विजय प्राप्त कर सकती है। फेत्कार का स्वरूप यहाँ तीव्र ध्वनि, आकस्मिक प्रहार और निर्णायक परिवर्तन का प्रतीक है। इसका ध्यान साधक को चतुराई, साहस और कठिन परिस्थितियों में भी विजय के लिए उपयुक्त उपाय खोजने की क्षमता प्रदान करता है।
३९. चीकर
ॐ इदᳪ हविः प्प्रजननं मे ऽअस्तु दशवीरᳪ सर्व्वगण ᳪ स्वस्तये । आत्मसनि प्प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि। अग्निः प्प्रजां बहुलां में करोत्वन्नं पयो रेतो ऽअस्म्मासु धत्त॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चीकर इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः चीकराय नमः ॥३९॥
हिन्दी अर्थ — यह हवि मेरी प्रजा की वृद्धि का कारण बने; दस वीरों से युक्त, समस्त गणों सहित कल्याण के लिए हो। यह आत्मसिद्धि, प्रजासिद्धि, पशुसिद्धि, लोकसिद्धि और अभयसिद्धि प्रदान करे। अग्नि मेरी प्रजा को बहुल करे और हमारे भीतर अन्न, दुग्ध और वीर्य को धारण कराए।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में चीकर शक्ति का स्मरण प्रजनन, पोषण और सर्वांगीण कल्याण के तत्त्व के रूप में किया गया है। हवि के माध्यम से प्रजा, पशु और लोक—तीनों की सिद्धि की कामना जीवन की समग्र समृद्धि को दर्शाती है। अन्न, पय और रेतस् का उल्लेख देह, मन और वंश—तीनों स्तरों पर पुष्टि का संकेत देता है। चीकर का ध्यान साधक को वृद्धि, निर्भयता और सतत् जीवन-समृद्धि की चेतना में प्रतिष्ठित करता है।
४०. सिंहाकृति
ॐ या व्याघ्रं व्विषूचिकोभौ व्वृकं च रक्षति ॥ श्येनं पतत्त्रिण सिᳪ हᳪ सेमं पात्त्वᳪ हसः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सिंहाकृति इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः सिंहाकृतये नमः ॥४०॥
हिन्दी अर्थ — जो व्याघ्र और विषूचिका—दोनों से रक्षा करती है, और वृक (भेड़िया) से भी रक्षा करती है; जो श्येन (बाज) और सिंह जैसे पंखधारी एवं बलशाली प्राणियों से रक्षा करती है—वह हमें हिंसा से सुरक्षित रखे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सिंहाकृति शक्ति का स्मरण प्रचण्ड रक्षक और निर्भय सामर्थ्य के रूप में किया गया है। व्याघ्र, वृक, श्येन और सिंह—ये सभी भय, हिंसा और आकस्मिक संकटों के प्रतीक हैं, जिनसे यह शक्ति संरक्षण प्रदान करती है। सिंहाकृति का स्वरूप उग्र होते हुए भी रक्षक है, जो साधक को बाह्य आघातों और आन्तरिक भय से सुरक्षित करता है। इसका ध्यान साहस, आत्मरक्षा और निर्भीक चेतना की दृढ़ स्थापना करता है।
४१. मृग
ॐ मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत ऽआजगन्था परस्याः ॥ सृक ᳪ स ᳪ शाय पविमिन्द्र तिग्मं व्वि शत्रून् ताड्डिव्वि मृधो नुदस्व॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मृग इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः मृगाय नमः ॥४१॥
हिन्दी अर्थ — मृग के समान जो भयावह नहीं है, पर्वतों में विचरण करने वाला है; जो दूर और परे से यहाँ आया है। हे इन्द्र! अपनी तीक्ष्ण वज्रधार से शत्रुओं को तितर-बितर कर दो और संग्रामों को दूर हटा दो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मृग शक्ति का स्मरण चपलता, सजगता और रणनीतिक पराक्रम के रूप में किया गया है। मृग का उपमान भयहीन, तीव्र गति और कठिन भूभाग में निर्बाध विचरण की क्षमता को दर्शाता है। इन्द्र के तीक्ष्ण आयुध द्वारा शत्रु-निवारण का भाव यह संकेत देता है कि यह शक्ति प्रत्यक्ष उग्रता से नहीं, बल्कि चातुर्य, फुर्ती और समयोचित प्रहार से विजय दिलाती है। मृग का ध्यान साधक को सजग बुद्धि, गतिशील साहस और संघर्षों में कुशल निवारण की क्षमता प्रदान करता है।
४२. यक्ष्मप्रिय
ॐ इन्दुर्दक्षः श्येन ऽऋतावा हिरण्यपक्षः शकुनो भुरण्युः ॥ महान्त्सधस्थे ध्रुव ऽआ निषत्तो नमस्ते ऽअस्तु मा मा हिᳪ सीः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः यक्ष्मप्रिय इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः यक्ष्मप्रियाय नमः ॥४२॥
हिन्दी अर्थ — इन्दु (सोम) दक्ष है, श्येन के समान ऋत में स्थित है; स्वर्णपंखों वाला, तीव्रगामी पक्षी है। वह महान् ध्रुव आसन पर स्थित है। तुम्हें नमस्कार है—मुझे हिंसा मत पहुँचाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में यक्ष्मप्रिय शक्ति का स्मरण सोम के सौम्य, स्थिर और चिकित्सक तत्त्व के साथ किया गया है। दक्षता, ऋत और स्वर्णपंख शुद्धता, नियम और तेज का संकेत देते हैं, जबकि ध्रुव आसन स्थायित्व और संतुलन को दर्शाता है। ‘मा मा हिंसीः’ की प्रार्थना यह स्पष्ट करती है कि यह शक्ति रोग, क्षति और दुर्बलता से रक्षा करने वाली है। यक्ष्मप्रिय का ध्यान साधक को स्वास्थ्य, स्थिरता और सौम्य संरक्षण की चेतना में प्रतिष्ठित करता है।
४३.मेघवाहन
ॐ जीमूतस्येव भवति प्प्रतीकं य्यद्वर्म्मी याति समदामुपस्थे॥ अनाविद्धया तन्वा जय त्वᳪ स त्त्वा व्वर्म्मणो महिमा पिपर्त्तु॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मेघवाहन इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः मेघवाहनाय नमः ॥४३॥
हिन्दी अर्थ — जैसे मेघ का प्रतीक होता है, वैसे ही यह कवच के समान समीप आता है। अविद्ध (अक्षत) शरीर के साथ तुम विजय प्राप्त करो; कवच की महिमा तुम्हें पूर्ण रूप से आच्छादित करे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मेघवाहन शक्ति का स्मरण आवरण, संरक्षण और विजय के तत्त्व के रूप में किया गया है। मेघ का उपमान शीतलता, विस्तार और आच्छादन का संकेत देता है, जबकि कवच शरीर और चेतना की रक्षा का प्रतीक है। अविद्ध तनु के साथ विजय का भाव यह दर्शाता है कि यह शक्ति संघर्ष में क्षति से बचाते हुए सफलता प्रदान करती है। मेघवाहन का ध्यान साधक को अदृश्य सुरक्षा, आत्मविश्वास और संरक्षित विजय की भावना में प्रतिष्ठित करता है।
४४. तीक्ष्णोष्ट्र
ॐ तीव्व्रान् घोषान् कृण्ण्वते व्वृषपाणयोऽश्वा रथेभिः सह वामयन्तः ॥ अवक्र्क्रामन्तः प्प्रपदैरमित्त्रान्क्षिणन्ति शत्त्रूँ ऽ रनपव्ययन्तः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः तीक्ष्णोष्ट्र इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः तीक्ष्णोष्ट्राय नमः ॥४४॥
हिन्दी अर्थ — तीव्र घोष करते हुए, वृषपाणि अश्व रथों के साथ आगे बढ़ते हैं। वे अपने पदचाप से शत्रुओं को रौंदते हुए, बिना पीछे हटे शत्रुओं का क्षय करते हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में तीक्ष्णोष्ट्र शक्ति का स्मरण वेग, आक्रामक गति और निर्णायक प्रहार के तत्त्व के रूप में किया गया है। तीव्र घोष और रथयुक्त अश्व सामूहिक शक्ति तथा संगठित आक्रमण का संकेत देते हैं। पदचाप द्वारा शत्रु-नाश और पीछे न हटने का भाव अटल साहस और निरन्तर अग्रसरता को दर्शाता है। तीक्ष्णोष्ट्र का ध्यान साधक को तीव्र निर्णय-क्षमता, निर्भीक कर्म और अवरोधों को कुचलकर आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करता है।
४५. अनल
ॐ व्वायुष्ट्वा पचतैरवत्वसितग्ग्री वश्छागैर्न्यग्ग्रोधश्चमसौः शल्मलिर्वृद्ध्या ॥ एष स्य रात्थ्यो व्वृषा षड्भिश्चतुर्भिरेदगन्ब्रह्माऽकृष्णश्च नोऽवतु नमोऽग्ग्नये ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अनल इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः अनलाय नमः ॥४५॥
हिन्दी अर्थ — वायु के द्वारा तुझे पकाया जाए; यह तीक्ष्ण अग्रभाग वाला हो। छाग, न्यग्रोध, चमस और शल्मलि—ये वृद्धि के लिए हों। यह रथयुक्त वृषभ छह और चार (अंगों) से युक्त होकर गतिमान हो। ब्रह्मा और कृष्ण हमें सुरक्षित रखें। अग्नि को नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अनल शक्ति का स्मरण अग्नि, वायु और वृद्धि के संयुक्त तत्त्व के रूप में किया गया है। पकाने और तीक्ष्णता का भाव परिवर्तन, परिपाक और शक्ति-संवर्धन को दर्शाता है। विविध वृक्षों का उल्लेख प्राकृतिक वृद्धि और पोषण का संकेत देता है, जबकि रथयुक्त वृषभ गति, बल और वहन-क्षमता का प्रतीक है। अनल का ध्यान साधक को रूपान्तरण की अग्नि, निरन्तर ऊर्जा और संरक्षित प्रगति की चेतना में प्रतिष्ठित करता है।
४६. शुक्लतुण्ड
ॐ अदित्यास्त्वा पृष्ठे सादयाम्यऽन्तरिक्षस्य धर्त्रीं व्विष्ट्टम्भनीं दिशामधिपत्नीं भुवनानाम्॥ ऊर्मिर्द्रप्सो ऽअपामसि व्विश्वकर्म्मा त ऽऋषिरश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शुक्लतुण्ड इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः शुक्लतुण्डाय नमः ॥४६॥
हिन्दी अर्थ — मैं तुझे अदिति की पीठ पर स्थापित करता हूँ, जो अन्तरिक्ष को धारण करने वाली, दिशाओं को स्थिर करने वाली और समस्त भुवनों की अधिपत्नी है। तू जलों की ऊर्मि और बिन्दु है। विश्वकर्मा, ऋषि और अश्विनीकुमार अध्वर्यु के रूप में तुझे यहाँ प्रतिष्ठित करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में शुक्लतुण्ड शक्ति का स्मरण धारण, स्थापन और सृजनात्मक तत्त्व के रूप में किया गया है। अदिति की पीठ पर स्थापना से यह शक्ति अनन्त विस्तार और संरक्षण से जुड़ती है, जबकि अन्तरिक्ष और दिशाओं का उल्लेख स्थैर्य और व्यवस्था को दर्शाता है। ऊर्मि और द्रप्स जल-तत्त्व की सूक्ष्म जीवन-शक्ति का संकेत देते हैं। विश्वकर्मा और अश्विनों का आवाहन सृजन, चिकित्सा और यज्ञीय कुशलता के समन्वय को प्रकट करता है। शुक्लतुण्ड का ध्यान साधक को शुद्ध आधार, स्थिर दिशा-बोध और सृजनशील चेतना में प्रतिष्ठित करता है।
४७. अन्तरिक्ष
ॐ द्यौस्तै पृथिव्वयन्तरिक्षं व्वायुश्छिद्रं पृणातु ते॥ सूर्य्यस्ते नक्षत्रैः सह लोकं कृणोतु साधुया ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अन्तरिक्ष इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः अन्तरिक्षाय नमः ॥४७॥
हिन्दी अर्थ — द्यौ और पृथिवी के बीच का अन्तरिक्ष तुझे पूर्ण करे; वायु तेरे छिद्रों को भर दे। सूर्य नक्षत्रों के साथ मिलकर तेरे लिए लोक को शुभ और सिद्ध करे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अन्तरिक्ष शक्ति का स्मरण मध्य-तत्त्व, संयोग और संतुलन के रूप में किया गया है। द्यौ और पृथिवी के बीच स्थित अन्तरिक्ष स्थूल और सूक्ष्म के सेतु का कार्य करता है, जबकि वायु द्वारा छिद्रों का पूरण जीवन-प्राण और समन्वय का संकेत देता है। सूर्य और नक्षत्र लोक-व्यवस्था, काल और शुभता को स्थापित करते हैं। अन्तरिक्ष का ध्यान साधक को संतुलन, समन्वित चेतना और लोक-सम्बन्धी कर्तव्यों में सुव्यवस्था की अनुभूति कराता है।
४८. बर्बरक
ॐ सं बर्हिरङ्क्ताᳪ हविषा घृतेन समादित्यैर्वसुभिः सम्मरुद्भिः। समिन्द्रो व्विश्वदेवेभिरङ्क्तां दिव्यं नभो गच्छतु यत्स्वाहा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः बर्बरक इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः बर्बरकाय नमः ॥४८॥
हिन्दी अर्थ — घृतयुक्त हवि से बर्हि को अभिषिक्त किया जाए; आदित्यों, वसुओं और मरुतों के साथ संयुक्त हो। इन्द्र और विश्वदेवों के साथ यह अभिषेक सम्पन्न हो; यह दिव्य आहुति स्वर्गीय नभ को प्राप्त हो। स्वाहा।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में बर्बरक शक्ति का स्मरण यज्ञीय अभिषेक, दैवी समन्वय और ऊर्ध्वगमन के तत्त्व के रूप में किया गया है। बर्हि और घृत यज्ञ की पवित्र भूमि और पोषण को दर्शाते हैं, जबकि आदित्य, वसु, मरुत, इन्द्र और विश्वदेव समस्त दैवी शक्तियों के एकत्रीकरण का संकेत देते हैं। दिव्य नभ की ओर गमन यज्ञफल के सूक्ष्म लोकों में प्रतिष्ठित होने का बोध कराता है। बर्बरक का ध्यान साधक को सामूहिक दैवी अनुग्रह, कर्म की पवित्रता और आध्यात्मिक उन्नयन की चेतना से युक्त करता है।
४९. पावन
ॐ पवमानः सो ऽअद्य नः पवित्रेण व्विचर्षणिः ॥ यः पोता स पुनातु मा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पावन इहागच्छ इहतिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः पावनाय नमः ॥४९॥
हिन्दी अर्थ — आज प्रवाहित होने वाला यह सोम हमको पवित्र करने वाले पवित्र से शुद्ध करे। जो शोधक (पोता) है, वही मुझे शुद्ध करे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में पावन शक्ति का स्मरण शुद्धि और परिष्कार के तत्त्व के रूप में किया गया है। पवमान सोम का प्रवाह आन्तरिक और बाह्य मलिनताओं के निवारण का प्रतीक है, जबकि पवित्र और पोता के उल्लेख से निरन्तर शोधक प्रक्रिया का बोध होता है। पावन का ध्यान साधक को मानसिक, वाचिक और कर्मिक स्तर पर शुद्धि प्रदान कर सात्त्विक चेतना में प्रतिष्ठित करता है।
प्राणप्रतिष्ठा
ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञ ᳪ समिमं दधातु॥ विश्वेदेवा स इह मादयंतामों३ प्रतिष्ठ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अजरादि क्षेत्रपाल मण्डल देवताः इहागच्छत इह तिष्ठत।
हिन्दी अर्थ — घृत से संयुक्त मन और तेज इस यज्ञ को स्वीकार करें। बृहस्पति इस यज्ञ का विस्तार करें और इस यज्ञ को अविनाशी रूप से स्थापित करें। समस्त देवगण यहाँ आनन्दित हों — प्रतिष्ठा हो।
संक्षिप्त टीका— यह प्राणप्रतिष्ठा मंत्र यज्ञ और देवतत्त्व में चेतना के स्थापन का स्पष्ट विधान करता है। मनोजूति का उल्लेख यह दर्शाता है कि प्रतिष्ठा केवल बाह्य कर्म नहीं, बल्कि संकल्प, चेतना और भाव की सहभागिता से पूर्ण होती है। बृहस्पति यज्ञ-बुद्धि और वाणी के अधिष्ठाता हैं; उनके द्वारा यज्ञ का “अरिष्ट” होना उसकी निष्कण्टक और सफल पूर्णता का संकेत है। समस्त देवताओं का आनन्दित होना यह दर्शाता है कि प्रतिष्ठा के पश्चात् साधना, देवता और साधक — तीनों के बीच सजीव सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। इस मंत्र का प्रयोग देवप्रतिमा, योगिनी या शक्ति-तत्त्व में प्राणचेतना के स्थायी आवाहन हेतु किया जाता है।
षोडशोपचारैः पूजनम्
ॐ भूर्भुवः स्वः अजरादि क्षेत्रपाल मण्डल देवताभ्यो नमः आसनार्थेऽक्षतान समर्पयामि । पादयोः पाद्यं समर्पयामि । हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । स्नानाङ्गाचमनं समर्पयामि । वस्त्रम् समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्रं समर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । अक्षतान समर्पयामि । पुष्पमालां समर्पयामि । नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । धूपमाध्रापयामि । दीपं दर्शयामि । हस्तप्रक्षालनम् । नैवेद्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मध्ये पानीयम् उत्तरापोशनं च समर्पयामि । ताम्बूलं समर्पयामि । पूगीफलं समर्पयामि । कृतायाः पूजायाः पाड्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । अनया पूजया गणपत्यादि पञ्चदेवता: प्रीयन्ताम् न मम ।