षोडशमातृकापूजनम् : अर्थ, प्रयोजन और आध्यात्मिक आधार
षोडशमातृकापूजन सनातन परंपरा में सृजन, पोषण और संरक्षण की समन्वित उपासना है। इसमें जीवन को धारण करने वाली मातृशक्तियों का क्रमबद्ध आवाहन किया जाता है, जो व्यक्ति, परिवार और समाज के विकास में सक्रिय रूप से कार्य करती हैं। ये मातृकाएँ केवल देवीस्वरूप नहीं, बल्कि जीवन की आधारभूत शक्तियों की प्रतीक हैं।
शास्त्रों में मातृशक्ति को सृष्टि की स्थिरता और निरंतरता का मूल माना गया है। षोडशमातृकापूजन के माध्यम से साधक जीवन के भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक पक्षों में संतुलन की स्थापना करता है।
षोडश मातृकाओं का तात्त्विक भाव
षोडशमातृकाएँ जीवन के विभिन्न आयामों को संरक्षित और पोषित करती हैं। इनमें गणपति से लेकर कुलदेवता तक का आवाहन यह दर्शाता है कि जीवन का प्रत्येक चरण—आरंभ, वृद्धि, विजय, ज्ञान, पोषण और संतोष—मातृशक्ति के संरक्षण में सम्पन्न होता है।
इन देवियों के माध्यम से:
- बुद्धि और विवेक का विकास होता है
- ज्ञान, स्मृति और मेधा सुदृढ़ होती है
- विजय, धैर्य और स्थिरता का भाव उत्पन्न होता है
- पोषण, पुष्टि और तुष्टि का संतुलन स्थापित होता है
- कुल, परंपरा और वंश की निरंतरता सुरक्षित रहती है
आवाहन और क्रम का महत्व
षोडशमातृकापूजन में प्रत्येक मातृका का आवाहन निश्चित क्रम से किया जाता है। यह क्रम जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया का संकेत देता है—संकल्प से आरंभ होकर संरक्षण, विकास और पूर्णता तक।
आवाहन के द्वारा साधक मातृशक्तियों को अपने जीवन-क्षेत्र में आमंत्रित करता है और यह संकल्प करता है कि उनके गुण उसके कर्म और आचरण में प्रकट हों।
मंत्र, भाव और साधना
यह पूजन मंत्रप्रधान अवश्य है, पर इसका मूल भाव श्रद्धा, स्वीकार और कृतज्ञता में निहित है। प्रत्येक मंत्र के साथ साधक जीवन की किसी न किसी शक्ति को स्मरण करता है—मेधा, धृति, पुष्टि, तुष्टि, विजय और शान्ति।
इस साधना का उद्देश्य बाह्य अनुष्ठान तक सीमित न रहकर, आंतरिक स्थिरता और सामंजस्य को पुष्ट करना है।
सामान्य भक्तों के लिए मार्गदर्शन
यदि सभी मंत्रों का शुद्ध उच्चारण संभव न हो, तब भी श्रद्धा और शांत चित्त से किया गया षोडशमातृकापूजन फलदायी होता है। इस पूजन का सार विधि की जटिलता में नहीं, बल्कि मातृशक्ति के प्रति सम्मान और स्वीकार में निहित है।
षोडशमातृकापूजन साधक को यह बोध कराता है कि जीवन का पोषण केवल पुरुषार्थ से नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा और संतुलन से सम्पन्न होता है।
१. गणपति
ॐ लम्बोदरं महाकायं गजवक्त्रं चतुर्भुजं । आवाहयाम्यहमं देवं गणेशं सिद्धिदायकम् ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः गणपते इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः गणपतये नमः ।`
हिन्दी अर्थ -
मैं उस देव गणेश का आवाहन करता हूँ जो लम्बे उदर वाले हैं, विशाल शरीर वाले हैं, हाथी के मुख वाले हैं, चार भुजाओं से युक्त हैं और जो सिद्धि प्रदान करने वाले देव हैं।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में गणपति को सृष्टि के आरम्भकर्ता और समस्त कार्यों में सिद्धि देने वाले देव के रूप में आवाहित किया गया है, जहाँ उनका स्थूल स्वरूप बाधाओं के धारण और विनाश का तथा सिद्धिदायक भाव कर्मों की सफल पूर्णता का संकेत करता है।
२. गौरी
ॐ आयङ्गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः । पितरं च प्रयत्न्स्वः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गौरि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः गौर्यै नमः।
हिन्दी अर्थ -
यह गौः (देवी) पृश्नि से उत्पन्न होकर आगे बढ़ी, माता के समीप आई और पिता की ओर भी प्रयत्नपूर्वक अग्रसर हुई।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में गौरी को सृष्टि की उत्पत्ति करने वाली मातृशक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जो माता और पिता दोनों तत्त्वों को जोड़ते हुए सृजन की निरंतर गति को आगे बढ़ाती है और जीवन में पोषण तथा संतुलन की स्थापना करती है।
३. पद्मा
ॐ हिरण्यरूपा ऽउषसो व्विरोक ऽउभाविन्दा ऽउदिथः सूर्यश्च । आरोहतं व्वरुण मित्र गर्तं ततश्श्चक्षाथामदितिं दितिञ्च मित्रोऽसि व्वरुणोऽसि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पद्मे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पद्मायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
स्वर्णरूपिणी उषा प्रकट होती है, वह प्रकाशित होती है, उसी से सूर्य उदित होता है, वरुण और मित्र उस स्थान पर आरोहण करें और वहाँ से अदिति और दिति को देखें, क्योंकि तुम मित्र भी हो और वरुण भी हो।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में पद्मा को उषा, सूर्य, मित्र और वरुण के माध्यम से प्रकाश, व्यवस्था और संरक्षण की संयुक्त शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जहाँ उदय, नियम और संतुलन के द्वारा जीवन में समृद्धि तथा ऐश्वर्य का विस्तार होता है।
४. शची
ॐ निवेशनः सङ्गमनो व्वसूनां विश्वा रूपाभिचष्टे शचीभिः ।देवऽइव सविता सत्यधर्मेन्द्रो न तस्त्थौ समरे पथीनाम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शचि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः शच्यै नमः।
हिन्दी अर्थ -
शची के द्वारा वसुओं का निवास और उनका समागम होता है, शची विभिन्न रूपों से सबको प्रकट करती है, सत्यधर्म में स्थित सविता देव के समान इन्द्र युद्ध में मार्गों पर दृढ़तापूर्वक स्थित रहते हैं।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में शची को शक्ति, संगठन और स्थिरता प्रदान करने वाली देवी के रूप में स्मरण किया गया है, जिनकी कृपा से सामर्थ्य, धर्म और विजय का संतुलन स्थापित होता है तथा कर्मक्षेत्र में दृढ़ता और नेतृत्व का भाव उत्पन्न होता है।
५. मेधा
ॐ मेधां मे व्वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः। मेधामिन्द्रश्च व्वायुश्श्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मेधे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः मेधायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
वरुण मुझे मेधा प्रदान करें, अग्नि और प्रजापति मुझे मेधा प्रदान करें, इन्द्र और वायु भी मुझे मेधा दें, तथा धाता मुझे मेधा प्रदान करें, स्वाहा।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में मेधा को अनेक देवशक्तियों से संयुक्त होकर प्राप्त होने वाली दिव्य बुद्धि के रूप में स्मरण किया गया है, जिससे विचारशक्ति, स्मरण, विवेक और कर्म में स्पष्टता का विकास होता है।
६. सावित्री
ॐ सविता त्त्वा सवाना ᳪ सुवतामग्निर्गृहपतीना ᳪ सोमो वनस्पतीनाम् ।बृहस्पतिर्वाचऽइन्द्रो ज्ज्यैष्ठ्यायरूद्रः पशुब्भ्यो मित्रः सत्त्यो व्वरुणो धर्मपतीनाम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सावित्रि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सावित्र्यै नमः।
हिन्दी अर्थ -
सविता तुम्हें प्रेरित करें, अग्नि गृहपतियों के लिए प्रेरणा दें, सोम वनस्पतियों का अधिपति है, बृहस्पति वाणी के स्वामी हैं, इन्द्र श्रेष्ठता के लिए हैं, रुद्र पशुओं के अधिपति हैं, मित्र सत्य के लिए हैं और वरुण धर्म के स्वामी हैं।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में सावित्री को समस्त देवशक्तियों की प्रेरणास्वरूपा देवी के रूप में स्मरण किया गया है, जहाँ सृष्टि के विभिन्न कार्यक्षेत्र—गृह, अन्न, वाणी, नेतृत्व, पशु और धर्म—संतुलित रूप से संचालित होते हैं और जीवन में समन्वय व धर्मबोध की स्थापना होती है।
७. विजया
ॐ विज्ज्यन्धनुः कपर्दिनो व्विशल्यो बाणवाँ२ ऽउत । अनेशन्नस्य या ऽइषव ऽआभुरस्य निषङ्गधिः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विजये इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः विजयायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
जिनका धनुष तना हुआ है, जो जटाधारी हैं, जो बाणों से युक्त हैं, और जिनके पास तरकश है; उनकी वे बाणिकाएँ (शक्तियाँ) हमारे ऊपर प्रभुत्व न जमाएँ।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में विजया को युद्ध और संघर्ष में नियंत्रण तथा संरक्षण देने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जहाँ आक्रामक सामर्थ्य संयम में रहता है और विजय धर्म तथा संतुलन के साथ प्राप्त होती है।
८. जया
ॐ बह्वीनां पिता ब्बहुरस्य पुत्रश्चिश्श्चाकृणोति समनावगत्य।
इषुधि: सङ्काः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः जये इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः जयायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
वह अनेक शक्तियों के पिता हैं और बहुतों के पुत्र भी हैं, जो सम्यक् रूप से संगठित होकर कार्य करते हैं; जिनके पृष्ठ पर बँधे हुए तरकश हैं, जिनके पास अस्त्र-शस्त्र और समस्त सेनाएँ हैं, वे उत्पन्न होकर विजय प्राप्त करते हैं।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में जया को संगठित शक्ति, सैन्य व्यवस्था और सुनिश्चित विजय की अधिष्ठात्री देवी के रूप में स्मरण किया गया है, जहाँ अनुशासन, तैयारी और सामूहिक सामर्थ्य के द्वारा सफलता स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है।
९. देवसेना
ॐ इन्द्रऽआसान्नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर ऽएतु सोमः । देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतो यन्त्वग्रम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः देवसेने इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः देवसेनायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
इन्द्र आसन पर स्थित होकर नेता हों, बृहस्पति दक्षिणा (दान) के अधिपति हों, यज्ञ अग्रसर हो और सोम आगे बढ़ें; देवसेनाओं में विजय प्राप्त करने वाली सेनाओं के अग्रभाग में मरुद्गण आगे-आगे चलें।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में देवसेना को संगठित दैवी शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जहाँ नेतृत्व, यज्ञीय अनुशासन, दान और सामूहिक वेग एक साथ मिलकर विजय और संरक्षण को सुनिश्चित करते हैं।
१०. स्वधा
ॐ पितृभ्यः स्वायिब्भ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वायिब्भ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वायिब्भ्यः स्वधा नमः। अक्षन्न्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः, पितरो शुन्धद्ध्वम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वधे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वधायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
पितरों को स्वधा नमस्कार है, पितामहों को स्वधा नमस्कार है, प्रपितामहों को स्वधा नमस्कार है; पितरों ने अन्न का भक्षण किया, पितर तृप्त हुए, हे पितरों, आप लोग शुद्ध हों।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में स्वधा को पितृलोक से संबंध स्थापित करने वाली शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जिसके माध्यम से तर्पण, तृप्ति और शुद्धि का भाव प्रकट होता है तथा वंश, परंपरा और पूर्वजों के आशीर्वाद की निरंतरता सुनिश्चित होती है।
११. स्वाहा
ॐ स्वाहा प्राणेब्भ्यः साधिपतिकेब्भ्यः । पृथिव्यै स्वाहाग्नये स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा व्वायवे स्वाहा। दिवे स्वाहा सूर्याय स्वाहा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
प्राणों को स्वाहा, अधिपतियों को स्वाहा; पृथ्वी के लिए स्वाहा, अग्नि के लिए स्वाहा, अंतरिक्ष के लिए स्वाहा, वायु के लिए स्वाहा; आकाश के लिए स्वाहा, सूर्य के लिए स्वाहा।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में स्वाहा को आहुति-शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जिसके द्वारा प्राण, तत्त्व और लोक—पृथ्वी से लेकर सूर्य तक—यज्ञभाव से समर्पित होते हैं और जीवन-ऊर्जा का शुद्ध प्रवाह स्थापित होता है।
११. मातृ
ॐ आपोऽअसम्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन तो घृतप्वः पुनन्तु । विश्व ᳪ हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाब्भ्यः शुचिरा पूतऽएमि । दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा ᳪ शग्मां परिदधे भद्रं व्वर्णं पुष्यन्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मातर इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः मातृभ्यो नमः।
हिन्दी अर्थ -
हे जलस्वरूप मातृशक्तियाँ हमें शुद्ध करें, घृत से परिपूर्ण होकर हमें पवित्र बनाएं; ये देवियाँ समस्त अपवित्रता को बहा ले जाती हैं, जल से शुद्ध होकर मैं पवित्र हुआ हूँ; तुम दीक्षा और तप की तनु हो, उस शिवमयी, कल्याणकारी और शुभ वर्ण वाली शक्ति को मैं धारण करता हूँ जो पोषण प्रदान करती है।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में मातृशक्ति को शुद्धि, दीक्षा और तप से संयुक्त पवित्र ऊर्जा के रूप में स्मरण किया गया है, जो साधक के शरीर, मन और आचरण को शुद्ध कर शुभता और पोषण का विस्तार करती है।
१२. लोकमातृ
ॐ रयिश्च मे रायश्च मे पुष्टंचमे पुष्टिश्च मे विभुचमे प्रभुच मे पूर्ण्णं च मे पूर्णतरं च मे कुयवं चमऽक्षितं च मेऽन्नं च मेऽक्षुच्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः लोकमातर इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः लोकमातृभ्यो नमः।
हिन्दी अर्थ -
मुझे ऐश्वर्य प्राप्त हो, मुझे संपत्ति प्राप्त हो, मुझे पोषण प्राप्त हो, मुझे पुष्टि प्राप्त हो, मुझे व्यापकता प्राप्त हो, मुझे प्रभुता प्राप्त हो, मुझे पूर्णता प्राप्त हो, मुझे अधिक पूर्णता प्राप्त हो, मुझे कुयव (अन्न का साधन) प्राप्त हो, मुझे अक्षयता प्राप्त हो, मुझे अन्न प्राप्त हो, मुझे अक्षय अन्न प्राप्त हो; ये सभी यज्ञ के द्वारा सिद्ध हों।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में लोकमातृ को समस्त लोकों के पोषण, समृद्धि और पूर्णता की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जहाँ ऐश्वर्य, अन्न, पुष्टि और अक्षयता जीवन के सामूहिक कल्याण के रूप में यज्ञभाव से स्थापित होते हैं।
१३. धृति
ॐ यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ।यस्मान्नऋते किञ्च न कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्प्पमस्तु ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः धृते इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः धृत्यै नमः।
हिन्दी अर्थ -
जो प्रज्ञान है, जो चेतना है, जो धृति है, जो प्रजाओं के भीतर स्थित अमृतमय ज्योति है, जिसके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जाता, वह मेरा मन शिवसंकल्पयुक्त हो।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में धृति को चेतना, संकल्प और कर्म की आधारशिला के रूप में स्मरण किया गया है, जिससे मन स्थिर, शुभ संकल्पों से युक्त और धर्मपूर्ण कर्म में प्रवृत्त होता है।
१४. पुष्टि
ॐ अङ्गान्न्यात्मन्न्भिषजा तदश्विनात्मानमङ्गैः समधात्सरस्वती ।इन्द्रस्य रूप ᳪ शतमानमायुश्चन्द्रेण ज्योतिरमृतं दधानाः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पुष्टे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पुष्टयै नमः।
१५. तुष्टि
ॐ जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो निदहाति वेदः । सनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुन्दुरितात्यग्निः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः तुष्टे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः तुष्टयै नमः।
हिन्दी अर्थ -
अश्विनीकुमार अंगों को आत्मा के साथ औषधि के समान संयुक्त करें, सरस्वती अंगों के द्वारा आत्मा को सम्यक रूप से संयोजित करें; इन्द्र के रूप से शतमान आयु प्रदान करें और चन्द्र के द्वारा अमृतमय ज्योति धारण कराएँ।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में पुष्टि को शरीर, आयु, तेज और अमृतत्व को संयोजित करने वाली पोषण-शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है, जो साधक के शारीरिक स्वास्थ्य, दीर्घायु और आंतरिक तेज को स्थिर रूप से विकसित करती है।
१६. आत्मनः कुलदेवता
ॐ प्राणाय स्वाहाऽपानाय स्वाहा ळ्यानाय स्वाहा ।चक्षुषे स्वाहा क्षोत्राय स्वाहा व्वाचे स्वाहा मनसे स्वाहा ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः आत्मनः कुलदेवते इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः आत्मनः कुलदेवतायै नमः।
हिन्दी अर्थ -
प्राण के लिए स्वाहा, अपान के लिए स्वाहा, व्यान के लिए स्वाहा; नेत्र के लिए स्वाहा, श्रोत्र (कान) के लिए स्वाहा, वाणी के लिए स्वाहा, मन के लिए स्वाहा।
संक्षिप्त टीका -
इस मंत्र में आत्मनः कुलदेवता के माध्यम से साधक अपने प्राण, इन्द्रियाँ, वाणी और मन को समर्पित करता है, जिससे जीवन की समस्त क्रियाएँ कुलपरंपरा से प्राप्त दिव्य संरक्षण और संतुलन के साथ संचालित हों।
षोडशोपचारैः पूजनम्
आसनार्थेऽक्षतान समर्पयामि । पादयोः पाद्यं समर्पयामि । हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । स्नानाङ्गाचमनं समर्पयामि । वस्त्रम् समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्रं समर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । अक्षतान समर्पयामि । पुष्पमालां समर्पयामि । नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । धूपमाध्रापयामि । दीपं दर्शयामि । हस्तप्रक्षालनम् । नैवेद्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मध्ये पानीयम् उत्तरापोशनं च समर्पयामि । ताम्बूलं समर्पयामि । पूगीफलं समर्पयामि । कृतायाः पूजायाः पाड्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । अनया पूजया गणपत्यादि पञ्चदेवता: प्रीयन्ताम् न मम ।