वास्तुमण्डलपूजनम् : स्वरूप, तत्त्व और साधनात्मक अर्थ
वास्तुमण्डलपूजन सनातन वैदिक परंपरा में स्थान, संतुलन और स्थिर ऊर्जा की स्थापना का मूल विधान है। किसी भी निर्माण, यज्ञ, प्राणप्रतिष्ठा या दीर्घकालिक साधना से पूर्व वास्तुमण्डल का पूजन इसलिए किया जाता है, क्योंकि यह भूमि में निहित शक्तियों को जाग्रत और व्यवस्थित करने की प्रक्रिया है।
वास्तुमण्डल केवल भौतिक रचना नहीं, बल्कि ब्रह्माण्डीय व्यवस्था का लघुरूप माना जाता है।
वास्तुमण्डल का तात्त्विक स्वरूप
वास्तुमण्डल को दिशाओं, देवताओं और पंचमहाभूतों का समन्वित क्षेत्र माना गया है। इसमें—
- पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण
- ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायव्य
- तथा मध्य (ब्रह्मस्थान)
सभी का संतुलित विन्यास होता है। यह विन्यास यह दर्शाता है कि कोई भी स्थान तभी स्थिर और फलदायी होता है, जब उसमें दिशा, तत्व और चेतना का सम्यक् संतुलन हो।
ब्रह्मस्थान और मर्यादा का भाव
वास्तुमण्डल का केन्द्र ब्रह्मस्थान है, जो शून्यता, चेतना और स्थिरता का प्रतीक है। यह स्थान यह स्मरण कराता है कि किसी भी संरचना का केन्द्र अहंकार नहीं, बल्कि संतुलित चेतना होनी चाहिए।
वास्तुमण्डलपूजन द्वारा साधक यह स्वीकार करता है कि—
- भूमि केवल उपयोग की वस्तु नहीं है
- वह जीवित तत्त्वों से युक्त है
- और उस पर कर्म करने से पूर्व अनुमति और सम्मान आवश्यक है
साधना, यज्ञ और जीवन में वास्तु का महत्त्व
वास्तुमण्डलपूजन का उद्देश्य केवल वास्तुदोष-निवारण नहीं, बल्कि—
- मानसिक स्थिरता
- कर्म में निरन्तरता
- और स्थान के साथ सामंजस्य
की स्थापना है।
जहाँ वास्तु असंतुलित होता है, वहाँ साधना में भी विक्षेप उत्पन्न होता है। इस पूजन के माध्यम से स्थान को साधना के अनुकूल बनाया जाता है।
वास्तुमण्डलपूजन का साधनात्मक उद्देश्य
इस पूजन का उद्देश्य त्वरित फल नहीं, बल्कि—
- दीर्घकालिक स्थिरता
- कर्म-सफलता
- और जीवन-क्षेत्र में समरसता
की स्थापना है।
वास्तुमण्डल यह बोध कराता है कि साधक स्वयं भी उस स्थान का अंग है, और दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।
आध्यात्मिक संकेत
वास्तुमण्डलपूजन यह दर्शाता है कि—
- बाह्य व्यवस्था का प्रभाव आन्तरिक चेतना पर पड़ता है
- और आन्तरिक असंतुलन बाह्य अव्यवस्था को जन्म देता है
यह पूजन साधक को अनुशासन, सजगता और पर्यावरण के प्रति सम्मान का भाव प्रदान करता है।
निष्कर्ष
वास्तुमण्डलपूजन साधना और जीवन—दोनों के लिए स्थिर आधार प्रदान करता है।
जहाँ भूमि संतुलित होती है, वहाँ कर्म सहज होता है; और जहाँ वास्तुमण्डल प्रतिष्ठित होता है, वहाँ साधना दीर्घकाल तक फलदायी रहती है।
१. शिखि
ॐ नमः शम्भवाय च मयेभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शिखिन इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः शिखिने नमः॥
हिन्दी अर्थ — शम्भु और मयेभव को नमस्कार है। शंकर और मयस्कर को नमस्कार है। शिव और शिवतर (अत्यन्त कल्याणकारी) को नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में शिखि तत्त्व का स्मरण शिव के विविध कल्याणकारी नामों के माध्यम से किया गया है। शम्भु और शंकर दुःख-निवारण और मंगल-प्रदाता स्वरूप को दर्शाते हैं, जबकि मयेभव और मयस्कर सुख, स्वास्थ्य और मानसिक शान्ति के द्योतक हैं। ‘शिव’ और ‘शिवतर’ से यह स्पष्ट होता है कि यह शक्ति केवल कल्याण ही नहीं, बल्कि उत्तरोत्तर श्रेष्ठ कल्याण प्रदान करने वाली है। शिखि का ध्यान साधक के जीवन में शान्ति, शुभता और स्थिर कल्याण की स्थापना करता है, जो वास्तुमण्डल के प्रारम्भिक संस्कार के लिए अत्यन्त उपयुक्त है।
२. पर्जन्य
ॐ शन्नो व्वातः पवता ᳪ शन्नस्तपतु सूर्य्यः । शन्नः कनिक्क्रदद्देवः पर्जन्यो ऽअभिवर्षतु ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पर्जन्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पर्जन्याय नमः ॥
हिन्दी अर्थ — वायु हमारे लिए कल्याणकारी होकर प्रवाहित हो। सूर्य हमारे लिए शुभ रूप से तपे। गरजने वाला देव पर्जन्य हमारे लिए अनुग्रहपूर्वक वर्षा करे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में पर्जन्य तत्त्व का स्मरण वायु, सूर्य और वर्षा के समन्वित कल्याणकारी रूप में किया गया है। वायु प्राण और संचार का आधार है, सूर्य ऊर्जा और व्यवस्था का स्रोत है, तथा पर्जन्य जीवनदायी वर्षा का अधिष्ठाता है। इन तीनों की शुभता से ही भूमि, वास्तु और जीवन में संतुलन स्थापित होता है। पर्जन्य का ध्यान साधक को प्राकृतिक तत्त्वों के साथ सामंजस्य, पोषण और स्थिर उन्नति की चेतना प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
३. जयन्त
ॐ मर्म्माणि ते व्वर्म्मणा सोमस्त्वा राजा ऽमृतेननानुवस्ताम् । उरोर्व्वरीयो व्वरुवणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः जयन्त इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः जयन्ताय नमः॥
हिन्दी अर्थ — सोमराज अमृतरूप कवच से तेरे मर्मस्थलों की रक्षा करें। वरुण तेरे लिए विस्तृत और सुरक्षित आश्रय प्रदान करें। हे जयन्त! देवगण तुझे अनुग्रह देकर आनन्दित करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में जयन्त तत्त्व का स्मरण विजय, संरक्षण और दैवी अनुग्रह के रूप में किया गया है। मर्मस्थलों पर अमृतमय कवच का भाव आन्तरिक-बाह्य सुरक्षा और अक्षय बल का संकेत देता है। वरुण द्वारा विस्तृत आश्रय ऋत, नियम और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करता है, जबकि देवों का अनुग्रह विजय को वैध और कल्याणकारी बनाता है। जयन्त का ध्यान साधक को सुरक्षित प्रगति, बाधा-निवारण और धर्मसम्मत विजय की चेतना में प्रतिष्ठित करता है—जो वास्तुमण्डलपूजन के क्रम में स्थायित्व और सफलता का आधार बनता है।
४. कुलिशायुध
ॐ सजोषा इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमम्पिब वृत्रहा शूर विद्वान् जहि शत्रूँरपमृधोनुदस्वाथाभयङ्कृणुहि विश्वतो नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कुलीशायुध इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः कुलीशायुधाय नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे इन्द्र! मरुतगणों के साथ एकचित्त होकर सोमपान करो। हे वृत्रहन्, शूर और विवेकी! शत्रुओं का संहार करो, बाधाओं को दूर हटाओ और हमें चारों ओर से अभय प्रदान करो। नमस्कार है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में कुलिशायुध तत्त्व का स्मरण इन्द्र के वज्र (कुलिश) रूपी आयुध के माध्यम से किया गया है। इन्द्र यहाँ केवल युद्धकर्ता नहीं, बल्कि विवेकयुक्त रक्षक और व्यवस्था-स्थापक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। मरुतों के साथ सामंजस्य सामूहिक शक्ति और अनुशासन का संकेत देता है, जबकि सोमपान से ऊर्जा और उत्साह की पुष्टि होती है। शत्रु-नाश और अपमृध-निवारण का भाव यह दर्शाता है कि कुलिशायुध शक्ति अव्यवस्था, भय और विघ्नों को भेदकर स्थिरता स्थापित करती है। इस मंत्र का जप साधक को निर्भयता, आन्तरिक दृढ़ता और जीवन-क्षेत्र में निर्णायक संरक्षण प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के सन्दर्भ में विशेष महत्त्व रखता है।
५. सूर्य
ॐ आ कृष्णेन रजसा व्वर्तमानो निवेशयन्न मृतं मर्त्यं च । हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भूवनानि पश्यन्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सूर्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सूर्याय नमः॥
हिन्दी अर्थ — कृष्ण (अन्धकार) रूप रज के माध्यम से गतिशील होकर वह अमृत और मर्त्य—दोनों को प्रविष्ट कराता है। स्वर्ण रथ पर आरूढ़ देव सविता समस्त भुवनों को देखते हुए गमन करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सूर्य तत्त्व का स्मरण प्रकाश, गति और साक्षित्व के रूप में किया गया है। अन्धकार (कृष्ण रज) के बीच संचरण करते हुए अमृत और मर्त्य—दोनों में प्रवेश करना यह दर्शाता है कि सूर्य जीवन और चेतना का सार्वभौमिक प्रेरक है। स्वर्ण रथ तेज, व्यवस्था और कालचक्र का प्रतीक है, जबकि ‘भुवनानि पश्यन्’ सूर्य के सर्वदर्शी, साक्षी भाव को प्रकट करता है। इस मंत्र का जप साधक के जीवन-क्षेत्र में प्रकाश, नियमितता और स्पष्ट दिशा-बोध स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में ऊर्जा-संतुलन और स्थायित्व के लिए अनिवार्य है।
६. सत्य
ॐ व्व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणां दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धयासत्य माप्यते॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सत्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सत्याय नमः॥
हिन्दी अर्थ — व्रत के द्वारा दीक्षा प्राप्त होती है; दीक्षा के द्वारा दक्षिणा प्राप्त होती है। दक्षिणा से श्रद्धा प्राप्त होती है और श्रद्धा के द्वारा सत्य की प्राप्ति होती है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सत्य तत्त्व का स्मरण अनुशासन, श्रद्धा और साधनात्मक क्रम के रूप में किया गया है। व्रत से दीक्षा, दीक्षा से दक्षिणा और दक्षिणा से श्रद्धा—यह क्रम यह दर्शाता है कि सत्य कोई तात्कालिक अनुभव नहीं, बल्कि सतत् साधना से प्राप्त होने वाली अवस्था है। श्रद्धा यहाँ अंधविश्वास नहीं, बल्कि अनुभवजन्य विश्वास है, जिसके माध्यम से सत्य प्रकट होता है। इस मंत्र का जप साधक को आचरण की शुद्धता, साधना में निरन्तरता और अंततः सत्यबोध की स्थिर चेतना में प्रतिष्ठित करता है। वास्तुमण्डलपूजन के संदर्भ में यह मंत्र यह सुनिश्चित करता है कि स्थान के साथ-साथ साधक का आन्तरिक जीवन भी सत्य और मर्यादा पर आधारित हो।
७. भृश
ॐ आ त्वाहार्षमन्तरभूर्ध्रुवस्तिष्ठाव्विचाचलिः । व्विशस्ता सर्व्वा व्वाञ्छन्तु मा त्वद्रामधिभ्रशत्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भृश इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः भृशाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — मैं तुम्हें भीतर की ओर लाया हूँ; तुम ध्रुव की भाँति स्थिर रहो, विचलित न हो। समस्त दिशाएँ तुम्हारी अभिलाषा करें; तुम अपने स्थान से कभी च्युत न होओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में भृश तत्त्व का स्मरण अचलता, दृढ़ प्रतिष्ठा और स्थानिक स्थिरता के रूप में किया गया है। भीतर की ओर लाने का भाव यह दर्शाता है कि शक्ति को बाह्य विचलन से हटाकर केन्द्र में स्थापित किया जा रहा है। ध्रुव की उपमा अडिगता, निरन्तरता और कालातीत स्थिरता का प्रतीक है। दिशाओं द्वारा स्वीकार किया जाना यह संकेत देता है कि जब कोई तत्त्व अपने स्थान पर दृढ़ होता है, तब वह चारों ओर से मान्य और समर्थ बनता है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु—दोनों में स्थायित्व, अविचल संकल्प और दीर्घकालिक सुरक्षा की स्थापना करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के मूल उद्देश्य के अनुरूप है।
८. आकाश
ॐ या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावती । तया यम मिमिक्षतम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः आकाश इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः आकाशाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अश्विनीकुमारों! आपकी जो मधुर और सत्ययुक्त वाणी (कशा) है, उसके द्वारा यम को सम्यक् रूप से पोषित और स्थापित करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में आकाश तत्त्व का स्मरण व्यापकता, संचार और समन्वय के रूप में किया गया है। अश्विनीकुमार गति, चिकित्सा और संतुलन के देवता हैं, जबकि मधुमती और सूनृतावती वाणी सूक्ष्म, कल्याणकारी संप्रेषण का प्रतीक है। यम का ‘मिमिक्षण’ नियम, मर्यादा और व्यवस्था की स्थापना को दर्शाता है। आकाश का स्वरूप यहाँ वह माध्यम है, जिसमें वाणी, गति और नियम—तीनों का प्रसार होता है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र में सूक्ष्म संतुलन, स्वच्छ संचार और मर्यादित व्यवस्था की स्थापना करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के सन्दर्भ में आकाशीय तत्त्व को स्थिर और अनुकूल बनाता है।
९. वायु
ॐ व्वायो ये ते सहस्रिणो रथासस्तेभिरागहि । नियुत्वान्त्सोमपीतये॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वायो इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वायवे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वायु! तुम्हारे जो सहस्रों रथ हैं, उनके साथ यहाँ आओ। अपने नियुत् (अश्वों) से युक्त होकर सोमपान के लिए पधारो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वायु तत्त्व का स्मरण गति, प्राण और सर्वव्यापक संचार के रूप में किया गया है। सहस्र रथ वायु की तीव्रता और सर्वत्र पहुँचने की क्षमता को दर्शाते हैं, जबकि नियुत् युक्त आगमन नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण गति का संकेत देता है। सोमपान का आवाहन यह स्पष्ट करता है कि वायु केवल गति नहीं, बल्कि जीवन-रस को वहन करने वाली शक्ति है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र में प्राणप्रवाह, शुद्ध संचार और जड़ता-निवारण की स्थापना करता है, जिससे स्थान जीवंत, सक्रिय और संतुलित बना रहता है।
१०. पूष्ण
ॐ पूषन् तव व्व्रते व्वयं न रिष्येम कदाचन। स्तोतारस्त ऽइह स्मसि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पूषण इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पूष्णे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे पूषन्! तुम्हारे व्रत (नियम और संरक्षण) में रहते हुए हम कभी क्षति को प्राप्त न हों। हम यहाँ तुम्हारे स्तोता के रूप में उपस्थित हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में पूष्ण तत्त्व का स्मरण मार्गदर्शन, संरक्षण और पोषण के अधिष्ठाता के रूप में किया गया है। पूषा को पथ-प्रदर्शक देवता माना गया है, जो यात्राओं, कर्ममार्ग और जीवन-पथ की रक्षा करते हैं। उनके व्रत में स्थित रहना अनुशासन और नियमबद्ध जीवन का संकेत है, जिससे क्षति और विचलन से रक्षा होती है। ‘स्तोतारः’ का भाव यह दर्शाता है कि साधक स्वयं को पूषा के संरक्षण में समर्पित करता है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र में सुरक्षित मार्ग, सतत् पोषण और कर्म-सफलता की स्थिर चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के क्रम में संतुलन और निरन्तरता के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
११. वितथ
ॐ तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्वितत ᳪ सं जभार । यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वितथ इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वितथाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह सूर्य का देवत्व है, यही उसका महत्त्व है; जिसने कर्ता के मध्य से विस्तृत होकर इसे धारण किया। जब वह हरित (अश्वों/किरणों) को संयुक्त करता है, तब वह अपने अधिष्ठान से दिन और रात—दोनों के लिए आवरण फैलाता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वितथ तत्त्व का स्मरण विस्तार, काल-संतुलन और सार्वभौमिक व्यवस्था के रूप में किया गया है। सूर्य का देवत्व और महत्त्व प्रकाश मात्र नहीं, बल्कि दिन–रात के आवरण के रूप में समय-चक्र को सुव्यवस्थित करना है। हरितों का संयुक्त होना गति और ऊर्जा के नियमन का संकेत देता है। ‘वितत’ भाव यह स्पष्ट करता है कि यह शक्ति विस्तार करते हुए भी संतुलन बनाए रखती है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र में काल-संतुलन, नियमितता और प्रकाश–अन्धकार के सम्यक् समन्वय की स्थापना करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के उद्देश्य—स्थिर व्यवस्था—को दृढ़ करता है।
१२. गृहक्षत
ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्प्रिया ऽअधूषत। अस्तोषत स्वभानवो व्विप्रा नविष्ठया मती योजान्विन्द्र ते हरी॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गृहक्षत इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः गृहक्षताय नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह अक्षन्न, मीमदन्त और प्रिय है; अधूषित होकर भी स्थिर है। अपने स्वभान (स्वयं की महिमा) के साथ यह व्यवस्थित है; बुद्धिमान यज्ञियों के अनुसार इन्द्र के लिए यह हरी है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में गृहक्षत तत्त्व का स्मरण स्थिरता, संरचना और कल्याणकारी ऊर्जा के रूप में किया गया है। अक्षन्न और मीमदन्त का भाव यह दर्शाता है कि शक्ति पूर्ण, अविभाज्य और स्थिर है, जबकि प्रियता और हरीत्व सौम्य संरक्षण और अनुग्रह का प्रतीक हैं। योजित बुद्धिमान साधक और इन्द्र के संदर्भ से यह स्पष्ट होता है कि गृहक्षत शक्ति न केवल संरक्षक है, बल्कि नियम और विधि के अनुसार कार्य करने वाली भी है। इस मंत्र का जप साधक को गृह, वास्तु और यज्ञीय क्षेत्र में स्थायित्व, सुरक्षा और कल्याणकारी ऊर्जा का अनुभव कराता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
१३. यम
ॐ यमाय त्वांगिरस्वते पितृमते स्वाहा। स्वाहा घर्माय स्वाहा धर्मः पित्रे॥
ॐ भूर्भुवः स्वः यम इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः यमाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे यम! त्वांगिरस और पितृमते के रूप में स्वाहा। स्वाहा घर्म (उर्जा/अन्न) के लिए, स्वाहा धर्म के लिए और पित्रे के लिए।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में यम तत्त्व का स्मरण नियमन, मर्यादा और न्याय के रूप में किया गया है। त्वांगिरस और पितृमते के संदर्भ से यह स्पष्ट होता है कि यम केवल मृत्यु या दंड के देवता नहीं हैं, बल्कि वे कर्म, धर्म और जीवन-संयम के अधिष्ठाता भी हैं। घर्म और धर्म का स्मरण साधक को शक्ति और अनुशासन दोनों का संतुलन स्थापित करने का निर्देश देता है। इस मंत्र का जप साधक को यम की निगरानी में जीवन, कर्म और स्थान की स्थिरता, अनुशासन और सुरक्षा की चेतना प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
१४. गन्धर्व
ॐ गन्धर्व्वस्तं व्विश्वावसुः परिदधातु व्विश्ंस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ऽईडित॥ इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणो व्विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधरस्यग्निरिड ऽईडितः ॥मित्त्रावरुणौ त्वोत्तरतः परिधतां ध्रुवेण धर्मणा व्विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ऽईडितः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गन्धर्व इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः गन्धर्वाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे गन्धर्व! तुम सम्पूर्ण विश्व को आच्छादित करो और यजमान के लिए सभी बाधाओं को दूर रखो। अग्नि को यज्ञ के चारों ओर प्रतिष्ठित करो। इन्द्र अपने बाहु से दक्षिण दिशा की रक्षा करे और यजमान के चारों ओर किसी भी विघ्न को न आने दे। मित्र और वरुण उत्तरी दिशा से धर्म और स्थिरता के साथ यज्ञ को सुरक्षित रखें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में गन्धर्व शक्ति का स्मरण सुरक्षा, संरक्षण और यज्ञ-स्थिरता के तत्त्व के रूप में किया गया है। गन्धर्व पूरे विश्व और चारों दिशाओं में यज्ञ की सुरक्षा के अधिष्ठाता हैं। अग्नि का चारों ओर प्रतिष्ठित होना यज्ञ की पवित्रता और शक्तिशाली संरचना का प्रतीक है। इन्द्र, मित्र और वरुण के माध्यम से दिशाओं का संतुलन और धर्म-पालन सुनिश्चित होता है। इस मंत्र का जप साधक को यज्ञ और स्थान के चारों ओर सुरक्षा, स्थायित्व और बाधा-निवारण की चेतना में प्रतिष्ठित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और साधनात्मक स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।
१५. भृङ्गराज
ॐ सौरी बलाका शार्गः सृजयः शयाण्डकस्ते मैत्त्राः सरस्वत्यैशारिः पुरुषवाक् श्वाविद्भौमी शार्द्दूलो व्वृकः पृदाकुस्ते मन्यवे सरस्वते शुक्रः पुरुषांक्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भृंगराज इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः भृंगराजाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे भृङ्गराज! सौरि बल और शक्ति का रक्षण करें। मित्र और सरस्वती की सहायता से पुरुषवाक और भू-विद्या की रक्षा हो। शार्दूल (व्याघ्र) और वृक (भेड़िया) भी पुरुष और भूमि की सुरक्षा करें। मन्यवे सरस्वती और शुक्र पुरुषांग का संरक्षण करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में भृङ्गराज शक्ति का स्मरण सुरक्षा, शक्ति और पोषण के रूप में किया गया है। सौरि बल और शार्ग संरक्षण और उर्जा का प्रतीक हैं। मित्र और सरस्वती का समन्वय ज्ञान, वाणी और विधि के संरक्षण को दर्शाता है। शार्दूल और वृक बाह्य शक्ति और आक्रामक रक्षा के रूप में, जबकि मन्यवे सरस्वती और शुक्र आन्तरिक बुद्धि, विवेक और सौभाग्य के प्रतीक हैं। इस मंत्र का जप साधक और यज्ञ-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, संतुलन और स्थायित्व की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
१६. मृग
ॐ मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत ऽआजगन्था परस्याः॥ सृक ᳪ स ᳪ शायपविमिन्द्र तिग्मं व्वि शत्त्रून् ताड्ढि वि मृघो नुदस्व॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मृग इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः मृगाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — मृग के समान जो भयावह नहीं है, पर्वतों में विचरण करता है और दूर-दूर तक गतिशील है। हे इन्द्र! तू अपनी तीक्ष्ण शक्ति से शत्रुओं को नष्ट कर, उनके प्रभाव को दूर हटाओ और हमें सुरक्षित रखो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मृग शक्ति का स्मरण सजगता, गति और सुरक्षा के रूप में किया गया है। मृग का उपमान भयहीनता और प्राकृतिक चालाकी का प्रतीक है, जो कठिन परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखती है। इन्द्र की तीक्ष्ण शक्ति शत्रु और बाधाओं को भेदकर सुरक्षा सुनिश्चित करती है। मृग का ध्यान साधक को जागरूकता, साहस और बाहरी-आन्तरिक अवरोधों से रक्षा की क्षमता प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में स्थान और साधना की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
१७. पितृ
ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्तः समिधीमहि ॥ उशन्नुशत ऽआवह पितॄन्हविषे ऽअत्तवे॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पितर इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पित्रे नमः॥
हिन्दी अर्थ — आप हमारे यज्ञ में उपस्थित हो जाएँ और समिधि को स्वीकार करें। हे पितृगण! हम आपको हवि अर्पित करते हैं; कृपया हमारे अनुष्ठान को स्वीकार करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में पितृ तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, आशीर्वाद और पूर्वजों का संरक्षण के रूप में किया गया है। पितृगण यज्ञ और अनुष्ठान के साक्षी और संरक्षक हैं, जो साधक और यज्ञ को कल्याणकारी ऊर्जा प्रदान करते हैं। समिधि और हवि का अर्पण उन्हें सम्मान और सहभागिता का संकेत देता है। इस मंत्र का जप साधक को पूर्वजों के आशीर्वाद, विधिपूर्वक साधना और स्थान की स्थिरता की चेतना में प्रतिष्ठित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और यज्ञ की सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
१८. दौवारिक
ॐ द्वे व्विरूपे चरतः स्वर्थे ऽअन्यान्या व्वत्समुप धापयेते । हरिरन्यस्यां भवति स्वधावाञ्छुक्क्रो ऽअन्यस्यां ददृशे सुवर्च्चा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दौवारिक इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः दौवारिकाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — दो रूपों में जो विचरते हैं, वे अपने-अपने कार्यों में स्थित हैं और एक-दूसरे को उपयुक्त मार्ग प्रदान करते हैं। हरि (शक्ति/विवेक) अपने अनुकूल क्षेत्र में स्थित है, जबकि दूसरों के क्षेत्र में सुवर्चसा (शुभता और शक्ति) प्रदान करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में दौवारिक शक्ति का स्मरण संतुलन, समन्वय और निर्देशात्मक मार्गदर्शन के रूप में किया गया है। दो रूपों का आविर्भाव यह संकेत देता है कि शक्ति विभिन्न अवस्थाओं में सक्रिय रहती है और अपने क्षेत्र में अनुशासित होती है। हरि का अनुकूल क्षेत्र में स्थित होना निर्णय, शक्ति और नियंत्रण का प्रतीक है, जबकि दूसरों के क्षेत्र में शुभता और सहयोग की उपस्थिति सामूहिक संतुलन को दर्शाती है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में समन्वय, सुरक्षा और व्यवस्थित प्रवाह की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के उद्देश्यों के अनुरूप है।
१९. सुग्रीव
ॐ नीलग्ग्रीवाः शितिकण्ठा दिव ᳪ रुद्द्राऽउपश्श्रिताः। तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सुग्रीव इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सुग्रीवाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — नीलग्रीवा और शीतिकण्ठा रूप वाले देवता दिव में रुद्रों के अधीन स्थित हैं। सहस्रों की योजना के माध्यम से उन्होंने अपने शत्रुओं का नाश किया। यह शक्ति हमारे लिए सन्निहित और संरक्षित है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सुग्रीव शक्ति का स्मरण उग्र संरक्षण और सामूहिक शक्ति के रूप में किया गया है। नीलग्रीवा और शीतिकण्ठा का उपमान उग्रता, दृढ़ता और आत्मसंरक्षण का प्रतीक है, जबकि रुद्रों के अधीन स्थिति सामूहिक अनुशासन और शक्ति के नियंत्रित प्रयोग को दर्शाती है। सहस्रयोजने द्वारा शत्रु-विनाश यह संकेत देता है कि यह शक्ति व्यवस्थित, निर्णायक और पूर्णतया प्रभावी है। सुग्रीव का ध्यान साधक को बाधाओं से निपटने की शक्ति, निर्भयता और सामूहिक सुरक्षा की चेतना प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में स्थायित्व और सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
२०. पुष्पदन्त
ॐ नमो गणेब्भ्यो गणपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्व्रातेब्भ्यो व्व्रातपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो गृत्सेब्भ्यो गृत्सपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्विरूपेब्भ्यो व्विश्वरुपेब्भ्यश्च वो नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पुष्पदन्त इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पुष्पदन्ताय नमः॥
हिन्दी अर्थ — नमः गणेश और गणपतियों को। नमः व्रत और व्रतपतियों को। नमः गृत्स और गृत्सपतियों को। नमः विरूप और विश्वरूपों को।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में पुष्पदन्त शक्ति का स्मरण समर्पण, आराधना और बाधा-निवारण के तत्त्व के रूप में किया गया है। गणेश और गणपति विघ्ननाशक के प्रतीक हैं, व्रत और व्रतपति नियम और अनुशासन के संरक्षक हैं, गृत्स और विरूप शक्ति के विभिन्न रूप हैं जो साधक को सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करते हैं। इस मंत्र का जप साधक को साधना में बाधा-निवारण, विधिपूर्वक अनुशासन और स्थिरता की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अनुष्ठान और स्थान की सुरक्षा के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
२१. वरुण
ॐ इमम्मे व्वरुणश्श्रुधी हवमद्या च मृडय। त्वामवस्युराचके॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वरुण इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वरुणाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वरुण! इस हवि को स्वीकार करो और आज की आहुति को सम्पन्न करो। हम तुम्हें अपने अनुष्ठान में उपस्थित मानते हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में वरुण तत्त्व का स्मरण जल, नियम और संरक्षण के रूप में किया गया है। हवि का मृड़न और वरुण का स्वागत यह दर्शाता है कि यज्ञ और साधना केवल भाव और कर्म के संयोजन से प्रभावी होते हैं। वरुण जल और ऋत (संतुलन) के अधिष्ठाता हैं, जो साधना के स्थल और समय को सुरक्षित और फलदायी बनाते हैं। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में स्थायित्व, संरक्षण और विधिपूर्वक ऊर्जा प्रवाह की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के उद्देश्य के अनुरूप है।
२२. असुर
ॐ यमश्विना नमुचेरासुरादधि सरस्वत्यसुनोदिन्द्रियाय॥ इ॒मं त ᳪ शुवक्रं मधुमन्तमिन्दु ᳪ सोम ᳪ राजानमिह भक्षयामि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः असुर इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः असुराय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे यम और अश्विनीकुमार! हम असुरों के अधीन स्थित सरस्वती, उनके पुत्र और इन्द्रिय तत्त्व को नमस्कार करते हैं। मैं इस शुभ, मधुर और सोमयुक्त आहुति को यहाँ भिक्षित रूप से अर्पित करता हूँ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में असुर तत्त्व का स्मरण संरक्षण, नियंत्रण और समर्पण के रूप में किया गया है। असुरों का उल्लेख केवल राक्षसी शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि उनके अधीन व्यवस्थित तत्त्वों—सरस्वती, इन्द्रिय और शुभ आहुति के माध्यम से संतुलन स्थापित करने के प्रतीक के रूप में किया गया है। मधुमत्त और सोमयुक्त आहुति साधक के कर्म और ऊर्जा का नियंत्रित समर्पण दर्शाती है। इस मंत्र का जप साधक को साधना-क्षेत्र में नियंत्रण, समर्पण और बाधा-निवारण** की चेतना प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में स्थायित्व और सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
२३. शेष
ॐ या ऽइषवो यातुधानाना ये वा व्वन॒स्पतीं२ रनु ॥ ये वाऽवटेषु॥ शेरते तेभ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शेष इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः शेषाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे शेष! जो यातुधान हैं और जो वनस्पति में निवास करते हैं, उन्हें नियंत्रित करो। वे हमारे लिए अवरोध न उत्पन्न करें और हमें सुरक्षित रखें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में शेष तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, नियंत्रण और स्थिरता के रूप में किया गया है। यातुधान और वनस्पति का उल्लेख बाह्य और सूक्ष्म बाधाओं के प्रतिनिधित्व के रूप में है। शेष का आवाहन यह सुनिश्चित करता है कि ये शक्ति-तत्त्व साधना-क्षेत्र में व्यवधान न डालें और संतुलन बनाए रखें। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में स्थिरता, संरक्षण और बाधा-निवारण की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अनिवार्य है।
२४. पाप
ॐ एतत्ते रुद्राऽवसन्तेन परो मूजवतो ऽतीहि ॥ अवतत धन्वा पिनाकावसः कृत्तिवासा ऽअहि ᳪ स॒न्नः शिवोऽतीहि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पाप इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पापाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे रुद्र! यह पाप तुम्हारे ऊपर स्थित है। वह धन्वा, पिनाकधारी और कृत्तिवास (शिव) द्वारा नष्ट किया जाए और दूर हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में पाप तत्त्व का स्मरण निवारण, शुद्धि और सुरक्षा के रूप में किया गया है। रुद्र का आवाहन उग्र न्याय और पाप नाशक शक्ति का प्रतीक है। धन्वा और पिनाकधारी रूप इसे सक्रिय साधना और शक्ति के माध्यम से समाप्त करने का संकेत देते हैं, जबकि कृत्तिवास (शिव) शुद्धि और संरक्षण के अधिष्ठाता हैं। इस मंत्र का जप साधक को अवांछित प्रभावों, बाधाओं और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में स्थान की पवित्रता और साधना की स्थिरता सुनिश्चित करता है।
२५. रोग
ॐ द्द्रापेऽअन्धसस्प्पतेदरिद्द्रनीललोहित । आसाम्प्रजानामेषाम्पशूनाम्माभेर्म्मारोङ्मोचनः किञ्चनाममत्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः रोग इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः रोगाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह रोग अन्धकार, नीला और लाल स्वरूप धारण करता है। यह प्रजाओं और पशुओं के लिए उत्पन्न होता है। हम इसे नष्ट करने वाले हैं और मोचन प्रदान करेंगे।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में रोग तत्त्व का स्मरण निवारण, स्वास्थ्य और सुरक्षा के रूप में किया गया है। अन्धकार, नीला और लाल रूप रोग की भिन्न अवस्थाओं और प्रभावों का प्रतीक हैं। प्रजा और पशु का उल्लेख यह दर्शाता है कि रोग केवल मानव तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापक प्रभाव डालता है। रोगमोचन का आवाहन साधक को साधना-क्षेत्र और जीवन में स्वास्थ्य, सुरक्षा और बाधा-निवारण की चेतना प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के उद्देश्य—स्थिरता और कल्याण—के लिए आवश्यक है।
२६. अहिर्बुध्न्य
ॐ अहिरिव भोगै: पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमान: । हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमा ᳪ सं परि पातु विश्वत:॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अहिर्बुध्न्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः अहिर्बुध्न्याय नमः॥
हिन्दी अर्थ — अहिर्बुध्न्य अपनी भोगों (संसाधनों) के साथ फैलता है और बाहु को बढ़ाकर बाधाओं से दूर करता है। वह हाथों से सभी वायु और शक्ति को नियंत्रित करता है; बुद्धिमान पुरुषों और प्राणियों को चारों ओर से संरक्षित करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अहिर्बुध्न्य तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, नियंत्रण और व्यापक संरक्षण के रूप में किया गया है। भोग और बाहु का विस्तार शक्ति और संसाधनों के व्यापक प्रभाव का प्रतीक है, जबकि हस्तघ्न द्वारा वायु और प्राणियों का नियंत्रण यह दर्शाता है कि यह शक्ति व्यवस्थित और विवेकपूर्ण है। चारों ओर से सुरक्षा का आवाहन साधक को स्थान और साधना दोनों में बाधा-निवारण, स्थायित्व और सुरक्षित प्रवाह की चेतना प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अत्यन्त आवश्यक है।
२७. मुख्य
ॐ अवतत्त्य धनुष्ट्व ᳪ सहस्राक्षशतेषुधे। निशीर्य्यशल्ल्यानाम्मुखा शिवोनः सुमना भव॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मुख्य इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः मुख्याय नमः॥
हिन्दी अर्थ — यह शक्ति धनुष के रूप में प्रकट हुई है, हजारों नेत्रों और अन्न से युक्त। हे शिव! तुम्हारा मुख कल्याणकारी और शुभतापूर्ण हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मुख्य तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, दृष्टि और शुभ प्रभाव के रूप में किया गया है। धनुष का रूप शक्ति और नियंत्रण का प्रतीक है, हजारों नेत्र सतर्कता और व्यापक निरीक्षण का संकेत देते हैं, और अन्न से युक्त होना पोषण और स्थायित्व का प्रतीक है। शिव का शुभ मुख साधक और यज्ञ-क्षेत्र में कल्याणकारी प्रभाव और अनुकूल ऊर्जा प्रदान करता है। इस मंत्र का जप वास्तुमण्डलपूजन में सुरक्षा, दृष्टिपात और स्थिरता की चेतना स्थापित करता है।
२८. भल्लाट
ॐ इमारुद्द्रायतवसे कपर्द्दिने क्षयद्वीराय प्प्रभरामहेमतीः । यथाषमसद्द्विपदे चतुष्ष्पदे व्विश्व्म्पुष्टङ्ग्रामेऽअस्म्मिन्ननातुरम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भल्लाट इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः भल्लाटाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हम भल्लाट को समर्पित हैं, जो अरुद्र के समान वीर और क्षयकारी है। वह समस्त द्विपद और चतुष्पद प्राणियों, विश्व और पुष्टांग ग्रामों में उपस्थित होकर उनका संरक्षण करता है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में भल्लाट तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, शक्ति और संरक्षण के रूप में किया गया है। अरुद्र रूप वीरता और बाधा-निवारण का प्रतीक है। द्विपद और चतुष्पद प्राणी तथा पुष्टांग ग्राम सभी के लिए संरक्षण का भाव यह दर्शाता है कि शक्ति समग्र और व्यापक है। भल्लाट का ध्यान साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में *सुरक्षा, स्थिरता और कल्याणकारी शक्ति की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
२९. सोम
ॐ वय ᳪ सोमव्रते तव मनस्तनूषु बिब्भ्रतः। प्रजावन्तः सचेमहि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सोम इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सोमाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सोम! हम तुम्हारे व्रत में अपनी मन और शरीर को समर्पित करते हैं। हम प्रजाओं के कल्याण और उनके विकास के लिए कार्य करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सोम तत्त्व का स्मरण व्रत, समर्पण और जीवन-शक्ति के रूप में किया गया है। व्रत और मन/तन का समर्पण साधक को अनुशासन, स्थिरता और नैतिक शक्ति प्रदान करता है। प्रजाओं के कल्याण का उल्लेख यह दर्शाता है कि साधना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और सामूहिक कल्याण के लिए भी है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, समर्पण और कल्याणकारी ऊर्जा की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अनिवार्य है।
३०. सर्प
ॐ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिविमनु । ये ऽअन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सर्पाः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः सर्पेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — नमः उन सर्पों को, जो पृथ्वी पर हैं, जो अन्तरिक्ष में हैं और जो आकाश में स्थित हैं। हम उन सभी सर्पों को प्रणाम करते हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सर्प तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, संतुलन और चेतना के सूक्ष्म तत्त्व के रूप में किया गया है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष और आकाश में स्थित सर्प शक्ति, चेतना और स्थायित्व का प्रतीक हैं। उनका आवाहन यह दर्शाता है कि साधना-क्षेत्र में सूक्ष्म और सूक्ष्मतर बाधाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। इस मंत्र का जप साधक को स्थान, ऊर्जा और सूक्ष्म शक्ति के संतुलन की चेतना प्रदान करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अनिवार्य है।
३१. अदिति
ॐ अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अदिते इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः अदितये नमः ॥
हिन्दी अर्थ — अदिति आकाश है, अदिति पृथ्वी है, अदिति अन्तरिक्ष है। अदिति माता है, पिता है और पुत्र भी है। अदिति समस्त देवताओं की उत्पत्ति है। अदिति पाँचजनक, जन्म देने वाली और प्रजनन करने वाली है।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अदिति तत्त्व का स्मरण सृजन, व्यापकता और जीवन-आधार के रूप में किया गया है। आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में उसका अस्तित्व ब्रह्माण्डीय समग्रता का प्रतीक है। माता, पिता और पुत्र के रूप में अदिति जीवन के चक्र, पालन और प्रजनन का प्रतिनिधित्व करती है। पाँचजनक और जनित्व भाव यह बताते हैं कि अदिति शक्ति जीवन और सृष्टि के निरन्तर प्रवाह की अधिष्ठात्री है। इस मंत्र का जप साधक को सृष्टि-संरक्षण, जीवन-शक्ति और स्थायित्व की चेतना में प्रतिष्ठित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और साधना के क्षेत्र में अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
३२. दिति
ॐ इड ऽएह्यदित ऽएहि काम्या ऽएत । मयि वः कामधरणं भूयात्॥ ॐ भूर्भुवः स्वः दण्ड इहागच्छ इह तिष्ठ ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दिते इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः दितये नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे दिति! हे काम्या! यह शक्ति मुझमें स्थित हो। तुम हमारे लिए कामधारण (इच्छा और साधना की क्षमता) प्रदान करो।
ॐ भूः भुवः स्वः — हे दण्ड! यहाँ आओ, यहाँ प्रतिष्ठित हो जाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में दिति तत्त्व का स्मरण सृजन, इच्छा और साधनात्मक शक्ति के रूप में किया गया है। दिति का आवाहन जीवन में इच्छाओं और कर्मों के समुचित संचालन का प्रतीक है। ‘कामधरणं’ से यह स्पष्ट होता है कि साधक शक्ति के माध्यम से इच्छाओं और साधनाओं को नियंत्रण में रखते हुए उसका कल्याणकारी प्रयोग करता है। दण्ड का आवाहन स्थायित्व और नियम का प्रतीक है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सृजनात्मक ऊर्जा, अनुशासन और इच्छाओं का संतुलित प्रवाह** स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के उद्देश्य—स्थिरता और संरक्षित साधना—के अनुरूप है।
३३. अप
ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवस्तानऽऊर्जे दधातन महेरणाय चक्षसे यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः उशतीरिव मातरः। तस्माऽअरङ्गमामवो यस्य क्षयाय जिन्वथ आपो जनयथा च नः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अद्भ्यः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः अद्भ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे आप! जो उर्जा में स्थित हैं और दृष्टि प्रदान करते हैं, वे हमारे लिए कल्याणकारी रस वितरित करें। मातृतुल्य शक्ति की भाँति यह हमें पोषण और सुरक्षा प्रदान करें। जो आप क्षय और विनाश का कारण हैं, उन्हें नियंत्रित करो और हमारे लिए जीवनदायी बनाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अप तत्त्व का स्मरण जल, पोषण और नियंत्रण के रूप में किया गया है। आप (जल) जीवन और ऊर्जा का आधार हैं, जो शक्ति और चेतना का प्रवाह नियंत्रित करते हैं। मातृतुल्य उपस्थिति संरक्षण, पोषण और स्थिरता का प्रतीक है। क्षय और विनाश से मुक्ति का आवाहन यह दर्शाता है कि साधक अपनी साधना-क्षेत्र और वास्तु-क्षेत्र में सकारात्मक और कल्याणकारी प्रवाह बनाए रखता है। इस मंत्र का जप साधक को जीवन, ऊर्जा और सुरक्षा के संतुलित प्रवाह की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के लिए अनिवार्य है।
३४. आपवत्स
ॐ आ ते व्वत्सो मनो यमत्परमाञ्चित्सधस्थात्॥ अग्ने त्वां कामया गिरा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः आपवत्स इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः आपवत्साय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे आपवत्स! तुम्हारा मन यम की सर्वोच्च स्थिति में स्थित हो। हे अग्नि! हम तुम्हें अपने शब्द और वाणी से आवाहन करते हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में आपवत्स तत्त्व का स्मरण अनुशासन, चेतना और ऊर्जा का नियंत्रण के रूप में किया गया है। यम की सर्वोच्च स्थिति का उल्लेख यह दर्शाता है कि शक्ति नियम और मर्यादा के अधीन होनी चाहिए। अग्नि के माध्यम से आवाहन साधक की वाणी, संकल्प और कर्म को पवित्र और केंद्रित करता है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में नियंत्रित ऊर्जा, स्थिरता और संरक्षण की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और साधना की सफलता के लिए आवश्यक है।
३५. अर्यमण
ॐ यदद्य सूर ऽउदितेऽनागा मित्रो ऽअर्यमा । सुवाति सविता भगः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अर्यमण इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः अर्यम्णे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अर्यमण! जैसे सूर्य उदित होता है, वैसे ही मित्र और अर्यमण भी प्रकट हों। वे सुवाति, सविता और भग के रूप में कल्याणकारी हों।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में अर्यमण तत्त्व का स्मरण प्रकाश, संरक्षण और कल्याणकारी शक्ति के रूप में किया गया है। सूर्य का उदित होना उज्जवलता और मार्गदर्शन का प्रतीक है। मित्र और अर्यमण शक्ति, सुरक्षा और शुभता का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुवाति, सविता और भग का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह शक्ति जीवन में निरन्तरता, उज्ज्वलता और कल्याण प्रदान करती है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, सकारात्मक ऊर्जा और स्थायित्व की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के उद्देश्य के अनुरूप है।
३६. सावित्र
ॐ हस्त ऽआधाय सवि॒ता बिब्भ्रद्भिः हिरण्मयीम् ॥ अग्नेर्ज्ज्योतिर्न्निचाय्य पृथिव्या ऽअद्ध्याभरदानुष्टुभेनच्छन्दसाङ्गिरस्वत्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सवित्रे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सावित्राय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सावित्र! अपने हाथों के माध्यम से हिरण्मयी शक्ति को प्रदान करो। अग्नि की ज्योति पृथ्वी में फैलाकर उसे आशीर्वाद दो, और छन्दसाङ्गिरस्वत के अनुरूप यज्ञ की सिद्धि सुनिश्चित करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सावित्र तत्त्व का स्मरण प्रकाश, पोषण और यज्ञीय सिद्धि के रूप में किया गया है। हाथों द्वारा हिरण्मयी शक्ति का प्रवाह जीवन और साधना में ऊर्जा और स्थिरता का प्रतीक है। अग्नि की ज्योति का पृथ्वी में फैलना सकारात्मक ऊर्जा और संरक्षण का संकेत देता है। छन्दसाङ्गिरस्वत के अनुरूप यज्ञीय छंद का पालन यह सुनिश्चित करता है कि साधना विधिपूर्वक और प्रभावी रूप से सम्पन्न हो। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में ऊर्जा, स्थिरता और यज्ञ-फलदायिता की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अनिवार्य है।
३७. सवितृ
ॐ व्विश्वानि देव सवितर्द्दुरितानि परासुव । यद्भद्द्रं तन्न ऽआ सुव॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सविता इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सवित्रे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सवितृ! हे देव सविता! समस्त विश्व में फैले दुर्गतियों और बाधाओं को दूर करो। जो शुभ है, वह हमें प्रदान करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सवितृ तत्त्व का स्मरण प्रकाश, मार्गदर्शन और कल्याणकारी शक्ति के रूप में किया गया है। सवितृ शक्ति समस्त विश्व में फैले अराजकता और विघ्नों को दूर करने वाली है। शुभता प्रदान करने का आवाहन यह संकेत देता है कि साधक और यज्ञ-क्षेत्र में केवल कल्याणकारी ऊर्जा का संचार हो। इस मंत्र का जप साधक को स्थिरता, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और साधना की सफलता के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
३८. विवस्वान
ॐ व्विवस्वन्नादित्यैष ते सोमपीथस्तस्मिन्मत्स्व ॥ श्र्श्रदस्मै नरो व्वचसे दधातन यदाशीर्द्दा दम्पती व्वाममश्नुतः ॥ पुमान्पुत्त्रो जायते विन्दते व्वस्वधा विश्वाहारप ऽएधते गृहे॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विवस्वान इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः विवस्वते नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे विवस्वान! यह सोमपीठ तुम्हारा है। मनुष्य को तुम्हारे वचनों से श्रद्धा प्राप्त हो, और जो आशीर्वाद तुम देते हो, उसके द्वारा पति-पत्नी सुख-समृद्धि प्राप्त करें। पुत्र का जन्म हो, व्रिद्धि हो और गृह में स्वाधा (पोषण और स्थायित्व) स्थापित हो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में विवस्वान तत्त्व का स्मरण सूर्य, जीवन-शक्ति और कल्याणकारी प्रभाव के रूप में किया गया है। सोमपीठ का उल्लेख ऊर्जा और चेतना का केंद्र है। वचन से श्रद्धा, दम्पति की समृद्धि, संतान और गृहस्थ जीवन में स्थिरता का प्रतीक है। विवस्वान का ध्यान साधक और वास्तु-क्षेत्र में ऊर्जा, स्थायित्व और कल्याणकारी समृद्धि की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और साधना के उद्देश्यों के अनुरूप है।
३९: विबुधाधिप
ॐ स बोधि सूरिर्म्मघवा व्वसुपते व्वसुदावन् । युयोध्यस्मद् द्वेषा ᳪ सि व्विश्वकर्म्मणे स्वाहा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विबुधाधिप इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः विबुधाधिपाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे विबुधाधिप! यह सूरि, मघवा और वसु की सत्ता है। जो द्वेष हमारे मार्ग में आए, उसे दूर करो। हे विश्वकर्मा! स्वाहा।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में विबुधाधिप तत्त्व का स्मरण ज्ञान, शक्ति और बाधा-निवारण के रूप में किया गया है। सूरि, मघवा और वसु शक्ति के विभिन्न रूप हैं, जो साधना और वास्तु-क्षेत्र में स्थायित्व और सुरक्षा प्रदान करते हैं। द्वेष और अवरोधों का निवारण यह दर्शाता है कि यह शक्ति सक्रिय रूप से बाधाओं को भेदती है। विश्वकर्मा का ‘स्वाहा’ साधना और यज्ञीय कर्म को पवित्र और प्रभावी बनाता है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, शक्ति और स्थिरता की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के उद्देश्यों के अनुरूप है।
४०. जय
ॐ अषाढं य्युत्सु पृतनासु पप्प्रि ᳪ स्वर्षामप्सां व्वृजनस्य गोपाम्॥ भरेषुजा ᳪ सुक्षितिः सुश्र्श्रवसं जयन्तं त्वामनु मदेन सोम॥
ॐ भूर्भुवः स्वः जय इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः जयाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे जय! अषाढ़ में, जब प्रजाएँ संचित होती हैं और गोकुल (गोप) सुरक्षित रहता है, तब हमें विजय और सुरक्षा प्राप्त हो। हे सोम! हम तुम्हारा अनुसरण करते हैं और सफलता की कामना करते हैं।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में जय तत्त्व का स्मरण विजय, सुरक्षा और समृद्धि के रूप में किया गया है। अषाढ़ ऋतु और प्रजाओं का संकलन जीवन और साधना में अनुकूल समय का प्रतीक है। गोप और सुरक्षा का उल्लेख यह दर्शाता है कि सफलता केवल बाहरी कर्मों से नहीं, बल्कि संरक्षण और सुव्यवस्था से भी सुनिश्चित होती है। सोम का अनुसरण साधक को मार्गदर्शन और शुभफल प्रदान करता है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में विजय, स्थिरता और कल्याणकारी ऊर्जा की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
४१. मित्र
ॐ मित्त्रो न एहि सुमित्त्रध ऽइन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणमुशन्नुशन्त ᳪ स्योनः स्योनम्॥ स्वानब्भ्राजाङ्घरिब्बर्भारे हस्त सुहस्त कृशानवेतेवः सोमवक्रयणात्तान्रक्षद्ध्वं मा वो दभन्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मित्र इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः मित्राय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे मित्र! तुम अच्छे मित्र के समान आओ और इन्द्र के मार्ग में दक्षिण दिशा से उपस्थित हो। अपने हाथों से समर्थ और सज्ज प्राणी को सुरक्षित रखो। हे सोम! तुम अपने वक्र यत्न से उन्हें रक्षण करो और हमें क्षति न पहुँचने दो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में मित्र तत्त्व का स्मरण सहयोग, सुरक्षा और मार्गदर्शन के रूप में किया गया है। मित्र का उपमान अच्छे मित्र के रूप में सुरक्षा, विश्वास और सहकार्य का प्रतीक है। इन्द्र और दक्षिण दिशा का उल्लेख शक्ति, स्थायित्व और दिशात्मक संतुलन को दर्शाता है। हाथों से सुरक्षा और वक्र यत्न का आवाहन यह संकेत देता है कि संरक्षण विवेक और सक्रिय प्रयास के माध्यम से होना चाहिए। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, सहयोग और स्थायित्व की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और साधना के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
४२. राजयक्ष्मा
ॐ नाशयित्त्री बलासस्यार्शस ऽउपचितामसि ॥ अथो शतस्य यक्ष्माणां पाकारोरसि नाशनी॥
ॐ भूर्भुवः स्वः राजयक्ष्मा इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः राजयक्ष्मणे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे राजयक्ष्मा! तुम उस बलशाली शक्ति को नष्ट करो जो अशुभ और बाधक है। शत्रु और यक्ष्माओं का विनाश कर उन्हें दूर करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में राजयक्ष्मा तत्त्व का स्मरण निवारण, सुरक्षा और बाधा-निवारण के रूप में किया गया है। बलशाली और अशुभ शक्तियों का नाश यह दर्शाता है कि यह शक्ति साधक और यज्ञ-क्षेत्र में अवांछित प्रभावों को समाप्त करती है। शत्रु और यक्ष्माओं का विनाश केवल बाहरी बाधाओं के निवारण का प्रतीक नहीं, बल्कि साधना में आन्तरिक बाधाओं को दूर करने का भी संकेत है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, स्थिरता और बाधा-निवारण की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
४३. रुद्र
ॐ अव रुद्रमदीमह्यव द्देवं त्र्यम्बकम् ॥ यथा नो व्वस्यसस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसाययात्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः रुद्र इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः रुद्राय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे रुद्र! आप त्र्यम्बक रूप में हमारे लिए उपस्थित हों। जैसे आप कल्याणकारी कार्य करते हैं, वैसे ही हमारे लिए भी कल्याणकारी कार्य करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में रुद्र तत्त्व का स्मरण सशक्त संरक्षण, शुद्धि और कल्याण के रूप में किया गया है। त्र्यम्बक रूप उग्रता के बावजूद कल्याणकारी शक्ति का प्रतीक है। ‘यथा नो व्वस्यसस्कर’ का भाव यह दर्शाता है कि यह शक्ति हमारे जीवन और यज्ञ-क्षेत्र में सकारात्मक परिणाम सुनिश्चित करती है। इस मंत्र का जप साधक को सुरक्षा, स्थायित्व और कल्याणकारी ऊर्जा की चेतना में प्रतिष्ठित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन और साधना के उद्देश्य के अनुरूप है।
४४. पृथ्वीधर
ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरानिवेशनी यच्छा नः शर्मसप्रथाः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पृथ्वीधर इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पृथ्वीधराय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे पृथ्वीधर! तुम हमारे लिए स्थिर आधार बनो, जैसे वृक्ष भूमि में मजबूती से स्थित है। हमें सुरक्षा और स्थिरता प्रदान करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में पृथ्वीधर तत्त्व का स्मरण स्थिरता, पोषण और संरक्षण के रूप में किया गया है। वृक्ष की स्थिरता का उपमान यह संकेत देता है कि शक्ति को आधार और संरचना प्रदान करने वाला होना चाहिए। पृथ्वीधर का आवाहन साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में स्थिरता, सुरक्षा और दीर्घकालिक संतुलन स्थापित करता है। यह मंत्र वास्तुमण्डलपूजन के संदर्भ में भूमि और स्थल की सुरक्षा और स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
४५. ब्रह्मा
ॐ ब्रह्म यज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेनऽआवः। सबुध्न्या उपमाऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसश्च विवः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ब्रह्मण इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः ब्रह्मणे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे ब्रह्मा! यज्ञ की शुरुआत तुमसे होती है। पुरस्ताद्वारा और सुरचित विधियों से यज्ञ को आरंभ करो। सबुध्न्याओं और योनियों के माध्यम से इसकी स्थिरता सुनिश्चित करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में ब्रह्मा तत्त्व का स्मरण सृष्टि, प्रारम्भ और स्थायित्व के रूप में किया गया है। यज्ञ की प्रथम स्थापना ब्रह्मा द्वारा यह दर्शाती है कि सभी साधन और कर्म के क्रम का आरम्भ उच्चतम स्रोत से होना चाहिए। सबुध्न्याएँ और योनियाँ स्थायित्व, संतुलन और संरक्षण का प्रतीक हैं। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में स्थिरता, प्रारम्भिक व्यवस्था और यज्ञीय सफलता की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
प्राणप्रतिष्ठा
ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञ ᳪ समिमं दधातु॥ विश्वेदेवा स इह मादयंतामों३ प्रतिष्ठ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शिख्यादि वास्तु मण्डल देवताः इहागच्छत इह तिष्ठत।
षोडशोपचारैः पूजनम्
आसनार्थेऽक्षतान समर्पयामि । पादयोः पाद्यं समर्पयामि । हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । स्नानाङ्गाचमनं समर्पयामि । वस्त्रम् समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्रं समर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । अक्षतान समर्पयामि । पुष्पमालां समर्पयामि । नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । धूपमाध्रापयामि । दीपं दर्शयामि । हस्तप्रक्षालनम् । नैवेद्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मध्ये पानीयम् उत्तरापोशनं च समर्पयामि । ताम्बूलं समर्पयामि । पूगीफलं समर्पयामि । कृतायाः पूजायाः पाड्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । अनया पूजया गणपत्यादि पञ्चदेवता: प्रीयन्ताम् न मम ।