सर्वतोभद्रमण्डलपूजनम् : स्वरूप, तत्त्व और साधनात्मक अर्थ
सर्वतोभद्रमण्डलपूजन एक प्राचीन वैदिक परंपरा है, जिसमें संपूर्ण क्षेत्र, दिशाएँ और वातावरण को कल्याणकारी शक्तियों से पवित्र किया जाता है। यह पूजा साधक और यज्ञ-स्थल दोनों के लिए समग्र सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करने का माध्यम है।
मण्डल का तात्त्विक स्वरूप
सर्वतोभद्रमण्डल में सभी दिशाएँ और उनके अंतर्गत आने वाले तत्त्व सम्मिलित होते हैं—
- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और उनके अन्तर्वर्ती ईशान, नैऋत्य, अग्नि और वायव्य
- मध्य या ब्रह्मस्थान, जो सभी शक्तियों का केन्द्र है
- ऊपर और नीचे, आकाश और पृथ्वी के स्तरों का संतुलित समन्वय
यह मण्डल केवल भौतिक स्थान का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि ऊर्जा, चेतना और तत्वों के समग्र संतुलन का भी प्रतीक है।
पूजन का उद्देश्य
सर्वतोभद्रमण्डलपूजन का उद्देश्य है—
- स्थान और वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा स्थापित करना
- सभी दिशाओं में सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित करना
- यज्ञ और साधना के लिए संपूर्ण संरचना का कल्याणकारी अनुशासन बनाना
पूजन के दौरान प्रत्यक्ष और सूक्ष्म तत्त्वों का समन्वय साधक और स्थल दोनों में स्थायित्व और संतुलन की चेतना पैदा करता है।
दिशा-निर्देश और देवता-प्रतिनिधित्व
हर दिशा और स्तर में विभिन्न देवता और तत्त्वों का प्रतिनिधित्व होता है—
- पूर्व और उत्तर दिशा: ज्ञान, प्रगति और शुभता
- पश्चिम और दक्षिण दिशा: स्थिरता, संरक्षण और संतुलन
- आकाश और पृथ्वी: जीवनदायिनी ऊर्जा और आधार
- मध्य (ब्रह्मस्थान): सम्पूर्ण संतुलन और चेतना का केन्द्र
पूजन द्वारा इन सभी दिशाओं और तत्त्वों को सकारात्मक रूप से प्रतिष्ठित किया जाता है।
साधनात्मक दृष्टिकोण
सर्वतोभद्रमण्डलपूजन में साधक—
- चारों दिशाओं और मध्य के तत्त्वों का ध्यान करता है
- समस्त वातावरण को यज्ञीय ऊर्जा से पवित्र करता है
- बाधा, अवरोध और अशुभ प्रभावों से सुरक्षा सुनिश्चित करता है
यह प्रक्रिया केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि ऊर्जा और चेतना का समग्र समन्वय है।
पूजन का अंतिम उद्देश्य
सर्वतोभद्रमण्डलपूजन साधक और यज्ञ स्थल दोनों में—
- मानसिक, भौतिक और सूक्ष्म संतुलन
- बाधा-निवारण और सुरक्षा
- स्थायित्व और समृद्धि
की स्थापना करता है। यह पूजन यह स्पष्ट करता है कि जब स्थल, दिशा और तत्त्व सभी कल्याणकारी रूप से व्यवस्थित हों, तभी साधना दीर्घकालिक और फलदायी बनती है।
१. ब्रह्मा (मध्य वापी)
ॐ ब्रह्म यज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेनऽआवः। सबुध्न्या उपमाऽअस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसश्च विवः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ब्रह्मण इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः ब्रह्मणे नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे ब्रह्मा! यज्ञ की शुरुआत तुमसे होती है। पुरस्ताद्वारा और सुरचित विधियों से यज्ञ को प्रारम्भ करो। सबुध्न्याओं और योनियों के माध्यम से इसकी स्थिरता सुनिश्चित करो।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में ब्रह्मा तत्त्व का स्मरण सृजन, प्रारम्भ और स्थायित्व के रूप में किया गया है। यज्ञ का प्रथम आधार ब्रह्मा से ही होता है, यह दर्शाता है कि सभी कर्म और साधना का प्रारम्भ उच्चतम स्रोत और वैदिक व्यवस्था के अनुसार होना चाहिए। सबुध्न्या और योनियाँ स्थायित्व, संतुलन और सुरक्षा का प्रतीक हैं, जो यज्ञ और वास्तुमण्डलपूजन में आवश्यक हैं। इस मंत्र का जप साधक और यज्ञ-क्षेत्र दोनों में स्थिरता, प्रारम्भिक व्यवस्था और पवित्रता की चेतना स्थापित करता है, जिससे सम्पूर्ण पूजन फलदायी और संरक्षित रहता है।
२. सोम (उत्तर वापी)
ॐ वय ᳪ सोमव्रते तव मनस्तनूषु बिब्भ्रतः। प्रजावन्तः सचेमहि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सोम इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः सोमाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सोम! हम तुम्हारे व्रत में अपनी मन और शरीर को समर्पित करते हैं। हम प्रजाओं के कल्याण और उनके विकास के लिए कार्य करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में सोम तत्त्व का स्मरण व्रत, समर्पण और जीवन-शक्ति के रूप में किया गया है। व्रत और मन/तन का समर्पण साधक को अनुशासन, स्थिरता और नैतिक शक्ति प्रदान करता है। प्रजाओं के कल्याण का उल्लेख यह दर्शाता है कि साधना केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और सामूहिक कल्याण के लिए भी है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, समर्पण और कल्याणकारी ऊर्जा की चेतना स्थापित करता है, जो वास्तुमण्डलपूजन में अनिवार्य है।
३. ईशान (ईशान खण्ड)
ॐ तमीशानञ्जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयं। पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ईशान इहागच्छ, इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः ईशानाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे ईशान! तुम सम्पूर्ण जगत में स्थित हो और स्थिरता तथा मार्गदर्शन प्रदान करो। हम तुम्हारा आवाहन करते हैं। हे पूषा! जैसे वेदों में वर्णित है, वैसे ही हमारी रक्षा कर, हमें सुरक्षित और कल्याणकारी बनाओ।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में ईशान तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, मार्गदर्शन और स्थिरता के रूप में किया गया है। ईशान खण्ड की शक्ति सभी दिशाओं और तत्वों का संतुलन सुनिश्चित करती है। पूषा का आवाहन संरक्षण, कल्याण और यज्ञीय स्थायित्व का प्रतीक है। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में स्थिरता, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा की चेतना स्थापित करता है, जो सर्वतोभद्रमण्डलपूजन के उद्देश्य के अनुरूप है।
४. इन्द्र (पूर्व वापी)
ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रᳪ हवे हवे सुहव ᳪ शूरमिन्द्रम्, ह्वायामि शक्रम्पुरुहूतमिन्द्र ᳪ स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः॥
ॐ इन्द्र, इहागच्छ, इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः इन्द्राय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे इन्द्र! तुम हमारे रक्षक और मार्गदर्शक हो। हम तुम्हें हवि अर्पित करते हैं। हे शूर इन्द्र! हम तुम्हारा आवाहन करते हैं और यज्ञ के सफल संचालन की कामना करते हैं। मघवा और धातु इन्द्र हमें कल्याण और सुरक्षा प्रदान करें।
संक्षिप्त टीका— इस मंत्र में इन्द्र तत्त्व का स्मरण सुरक्षा, शक्ति और यज्ञीय सफलता के रूप में किया गया है। इन्द्र का रक्षक और शूर स्वरूप बाधाओं और अवरोधों को दूर करने का प्रतीक है। हवि अर्पण और आवाहन साधक के कार्य और यज्ञ को पवित्र और फलदायी बनाता है। मघवा और धातु कल्याणकारी ऊर्जा और स्थायित्व के प्रतीक हैं। इस मंत्र का जप साधक और वास्तु-क्षेत्र दोनों में सुरक्षा, स्थिरता और यज्ञीय सफलता** की चेतना स्थापित करता है, जो सर्वतोभद्रमण्डलपूजन में अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
५. अग्नि (अग्निकोण खण्ड )
ॐ त्वन्नोऽअग्ने तव पायुभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य। त्राता तोकस्य तनये गवामस्य निमेषᳪरक्षमाणस्तवव्व्रते॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अग्ने इहागच्छ, इह तिष्ठ।ॐ भूर्भुवः स्वः अग्नये नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे अग्नि! आपकी पूजा आपके पैरों और शरीर से की जाती है; आप सम्माननीय हैं। हे त्राता! आपकी संतान और हमारे गोवंश की रक्षा करने वाले, हमारे व्रतों की रक्षा करने वाले।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में अग्नि देवता का आवाहन किया गया है, जो जीवन और शक्ति का प्रतीक हैं। उनके द्वारा पैरों और शरीर की पूजा से साधक उनके प्रति सम्मान और भक्ति प्रकट करता है। “त्राता” शब्द अग्नि की रक्षक शक्ति को दर्शाता है, जो संतान और गोवंश की रक्षा करती है। इस मंत्र का जप साधक को सुरक्षा, स्थिरता और धर्मपालन की ऊर्जा प्रदान करता है।
६. यम (दक्षिण वापी)
ॐ यमाय त्वांगिरस्वते पितृमते स्वाहा। स्वाहा घर्माय स्वाहा धर्मः पित्रे ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः यम इहागच्छ, इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः यमाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे यम! आपके लिए अंगिरस्वत पितृगण को स्वाहा अर्पित किया जाता है। स्वाहा घर्म (अग्नि) के लिए, स्वाहा धर्म के लिए, पितरों के लिए।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में यम देवता और पितृ शक्ति का आवाहन किया गया है। अंगिरस्वत पितरों को स्वाहा अर्पित करने का संकेत जीवन में पूर्वजों के प्रति सम्मान और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए है। यहाँ “घर्म” और “धर्म” का उल्लेख कर्म और नियमों का पालन करने की महत्ता दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके पितृ अनुकंपा, धर्मपरायणता और जीवन में संतुलन प्राप्त करता है।
७. निर्ऋति (नैर्ऋत्यकोण खण्ड)
ॐ असुन्नवन्तमयजमानमिच्छस्तेनस्येत्यामन्विहितस्करस्य। अन्यमस्मदिच्छ सात ऽइत्या नमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु॥
ॐ भूर्भुवः स्वः निरृत इहागच्छ, इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः निर्ऋतये ॥
हिन्दी अर्थ — हे निर्ऋति देवी! जो यजमान की इच्छा के अनुसार हैं, उनके लिए यह अर्पित किया जाता है। हमारी अन्य इच्छाओं को भी आप पूरा करें; आपके लिए नमस्कार, हे देवी निर्ऋति, आपको यह समर्पित हो।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में निर्ऋति देवी का आवाहन किया गया है, जो मृत्यु, विनाश और नाश के तत्त्वों की शक्ति हैं। यजमान की इच्छाओं और कर्मों की पूर्ति हेतु उनकी कृपा माँगी जाती है। “अन्यमस्मदिच्छ सात” शब्द साधक की अन्य इच्छाओं और जीवन के संकटों से मुक्ति की कामना दर्शाता है। इस मंत्र का जप साधक को मृत्यु-बोध, विनाश की चेतना और जीवन के नश्वर पहलुओं की समझ प्रदान करता है।
८. वरुण (पश्चिम वापी)
ॐ तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशᳪस मा नऽआयुः प्रमोषीः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वरुण इहागच्छ, इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वरुणाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वरुण! आप तत्त्व से ज्ञात हैं और ब्रह्मणा से पूज्य हैं; यजमान के हवनों से आप वन्दनीय हैं। हे वरुण! हम आपके द्वारा ज्ञात किए जाने योग्य हैं; हमारे आयु और जीवन की सीमाएँ समाप्त न हों।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में वरुण देवता का आवाहन किया गया है, जो जल, तत्त्वज्ञान और जीवन के नियमन के प्रतीक हैं। यजमान के हवन से उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। “मा नऽआयुः प्रमोषीः” जीवन की सुरक्षा और आयु की वृद्धि की कामना दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके ज्ञान, सुरक्षा और प्राकृतिक तत्वों के सामंजस्य की प्राप्ति करता है।
९. वायु (वायुकोण खण्ड)
ॐ आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वर ᳪ सहश्रिणीभिरुपयाहि यज्ञम्। वायो ऽअस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयम्पात स्वस्तिभिः सदा नः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वायु इहागच्छ, इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः वायवे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वायु! आप शतिनियों और सहस्रिणियों द्वारा किए गए यज्ञों में हमारी सहायता करें। हे वायु! इस यज्ञ में हमारी मार्गदर्शक बनें और हमेशा हमारे लिए स्वस्ति (कल्याण) प्रदान करें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में वायु देवता का आवाहन किया गया है, जो जीवन में प्राणशक्ति और गति के प्रतीक हैं। यज्ञ के दौरान उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयोजन साधक की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुनिश्चित करना है। “स्वस्तिभिः सदा नः” भाग जीवन में कल्याण और समृद्धि की कामना दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके शुद्ध वायु, ऊर्जा और जीवन शक्ति के संतुलन की अनुभूति करता है।
१०. अष्टवसु (वायु-सोम मध्यभद्र)
ॐ वसुभ्यस्त्वा रुद्रेभ्यस्त्वाऽऽदित्येभ्यस्त्वा सञ्जानाथां द्यावापृथिवी मित्रावरुणौ त्वा वृष्ट्यावताम्। व्यन्तु व्योक्त ᳪ रिहाणा मरुतां पृषतीर्गच्छ व्वशा प्रिश्न्निर्ब्भूत्वा दिव ᳪ गच्छ ततो नो वृष्टिमावह। चक्षुष्पा ऽअग्नेऽसि चक्षुर्मे पाहि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अष्टवसवः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः अष्टवसुभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अष्टवसु! आप वसु, रुद्र, आदित्य और संजानाथों, द्यावापृथ्वी, मित्र और अरुण के लिए हैं; हे वृष्टि देने वाले! मरुतों को व्याप्त कर दें, पृथ्वी पर फैलाएँ और हमें वृष्टि प्रदान करें। हे अग्नि! आप हमारे नेत्र हैं, हमारी दृष्टि की रक्षा करें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में अष्टवसु, जो आठ प्रकार के वैदिक देवता हैं, और प्राकृतिक तत्वों का आवाहन किया गया है। वृष्टि, कृषि और जीवनोपयोगी प्राकृतिक शक्तियों की प्राप्ति हेतु उनकी कृपा माँगी जाती है। अग्नि को नेत्र मानकर दृष्टि की रक्षा की कामना की गई है। साधक इस मंत्र का जप करके प्राकृतिक शक्ति, सुरक्षा और जीवनोपयोगी ऊर्जा की प्राप्ति करता है।
११. एकादशरुद्र (सोम-ईशान मध्यभद्र)
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः॥ बाहुब्भ्यामुत ते नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः एकादशरुद्राः इहागच्छत इह तिष्ठत॥ ॐ भूर्भुवः स्वः एकादशरुद्रेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — नमस्ते रुद्र! आपके लिए सम्मान है, हे मन्यव और अन्य स्वरूपों वाले। आपके बाहुओं के लिए भी नमस्कार।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में एकादशरुद्र का आवाहन किया गया है, जो रुद्र के ग्यारह रूपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। बाहुओं का उल्लेख शक्ति और संकल्प का प्रतीक है। साधक इस मंत्र का जप करके रुद्र की शक्ति, सुरक्षा और संकल्पबद्धता का अनुभव करता है, तथा जीवन में आध्यात्मिक स्थिरता प्राप्त करता है।
१२. द्वादशादित्य (ईशानेन्द्र मध्यभद्र)
ॐ यज्ञो देवानां प्रत्येति सुम्नमादित्यासो भवता मृडयन्तः । आ वोऽर्व्वाची सुमतिर्ववृत्त्याद ᳪ होश्चिद्या व्वरिवोवित्तरासत्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः द्वादशादित्याः इहागच्छत इह तिष्ठत॥ ॐ भूर्भुवः स्वः द्वादशादित्येभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे द्वादशादित्य! आप देवताओं के यज्ञ में जाते हैं और उन्हें प्रसन्न करते हैं; आपकी कृपा से सुमति और विवेक की प्राप्ति होती है।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में द्वादशादित्य, सूर्य के बारह रूपों का आवाहन किया गया है। वे देवताओं के यज्ञों में उपस्थित होकर उनका संरक्षण और प्रसन्नता प्रदान करते हैं। साधक इस मंत्र का जप करके सुमति, विवेक और उज्ज्वल चेतना की प्राप्ति करता है, साथ ही जीवन में प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करता है।
१३. अश्विनी (इन्द्राग्नी मध्यभद्र)
ॐ अश्विना तेजसा चक्षुः प्प्राणेन सरस्वती वीर्य्यम् । व्वाचेन्द्रो बलनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अश्वनौ इहागच्छतं इह तिष्ठतं । ॐ भूर्भुवः स्वः अश्विभ्यां नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अश्विनी देवता! तेजस्विता, दृष्टि और प्राणशक्ति के लिए आपकी पूजा की जाती है; सरस्वती और वीर्य के लिए। वाच और इन्द्र की शक्ति से इन्द्रियम (इन्द्रियों) की रक्षा की जाती है।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में अश्विनी कुमारों का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, स्वास्थ्य और जीवन ऊर्जा के देवता हैं। दृष्टि, प्राण और वाणी की रक्षा की कामना की गई है। साधक इस मंत्र का जप करके शक्ति, स्वास्थ्य, जीवन ऊर्जा और इन्द्रियों के संतुलन की प्राप्ति करता है।
१४. सपैत्रिक विश्वेदेव (अग्न-यम मध्यभद्र)
ॐ विश्वेदेवास ऽआगत शृणुता म ऽइम ᳪ हवम् । एदं बर्हिर्न्नषीदत । उपयामगृहीतोऽसि व्विश्श्वेब्भ्यस्त्वा देवेभ्य ऽएष ते योनिर्व्विश्वेब्भ्यस्त्वा देवेब्भ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सपैत्रिकविश्वेदेवाः इहागच्छत इह तिष्ठत।। ॐ भूर्भुवः स्वः सपैतृकविश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सपैत्रिक विश्वेदेव! आप सभी देवताओं में उपस्थित हैं, हमारी इस हवन को स्वीकार करें। यह हवन बाह्य रूप में आपके लिए समर्पित है। आप सभी देवताओं के लिए इसका स्रोत और आधार हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में विश्वेदेवों का आवाहन किया गया है, जो सभी देवताओं के एकीकृत रूप हैं। हवन द्वारा उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयोजन साधक को सम्पूर्ण दिव्यता और सुरक्षा प्रदान करना है। “एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः” शब्द सभी देवताओं के लिए इस हवन का मूल और स्रोत होने का बोध कराता है। साधक इस मंत्र का जप करके समग्र देव शक्ति, संरक्षण और आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
१५. सप्तयक्ष (यम-निर्ऋति मध्यभद्र)
ॐ अभित्त्यं देव ᳪ सवितारमोण्योः कविक्क्रतुमर्च्चीमि सत्त्यसव ᳪ रत्नधामभि प्रियं मतिं कविम् । ऊर्ध्वा यस्याऽमतिर्भाअदिद्यु तत्सर्वामनि हिरण्यपाणिरमिमीत सुक्क्रतुः कृ॒पा स्वः । प्रजाब्भ्स्त्वा प्प्रजास्त्वाऽनुष्प्राणन्तु प्रजास्त्वमनुष्प्राणिहि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सप्तयक्षाः इहागच्छत इह तिष्ठत । ॐ भूर्भुवः स्वः सप्तयक्षेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सप्तयक्ष! आप देव हैं, सवितार और अमोण्य जैसे देवताओं के कवि और आराध्य हैं। आप सत्य, रत्नधाम और प्रिय बुद्धि वाले कवि हैं। आपकी कृपा से प्रजा जीवित रहे और प्रजा को जीवन और स्वास्थ्य प्राप्त हो।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में सप्तयक्ष का आवाहन किया गया है, जो सात प्रकार के यक्ष देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे बुद्धि, आराधना और प्रजा की रक्षा का प्रतीक हैं। साधक इस मंत्र का जप करके प्रजा की सुरक्षा, समृद्धि, और जीवन शक्ति की प्राप्ति करता है, साथ ही ज्ञान और विवेक का विकास होता है।
१६. अष्टकुलनाग (निर्ऋति-वरुण मध्यभद्र)
ॐ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु । ये ऽअन्तरिक्षे ये दिवि तेब्भ्यः सर्पेभ्यो नमः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अष्टकुलनागाः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ अष्टकुलनागेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अष्टकुलनाग! आप सभी सर्पों के लिए नमस्कार, जो पृथ्वी में हैं, जो अंतरिक्ष में हैं और जो आकाश में हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में अष्टकुलनाग का आवाहन किया गया है, जो पृथ्वी, अंतरिक्ष और आकाश में विद्यमान सर्पों के कुल देवता हैं। यह मंत्र साधक को न केवल नाग शक्ति के प्रति सम्मान और जागरूकता प्रदान करता है, बल्कि सुरक्षा, प्राचीन ज्ञान और प्राकृतिक शक्तियों के संतुलन की अनुभूति भी कराता है। साधक इस मंत्र का जप करके सुरक्षा, आध्यात्मिक संरक्षण और प्राकृतिक तत्वों की शक्ति का अनुभव करता है।
१७. गन्धर्वाप्सरा (वरुण-वायु मध्यभद्र)
ॐ ऋताषाड् ऋतधामाग्ग्निगन्धर्व्वस्तस्यौषधयोऽप्सरसो मुदो नाम । स न इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै । स्वाहा व्वाट् ताब्भ्यः स्वाहा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गन्धर्वाप्सराः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः गन्धर्वाऽप्सरोभ्यो नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे गन्धर्व और अप्सरा! आप ऋत का आवास, अग्नि, औषधियाँ और आनंद के प्रतीक हैं। यह ब्रह्म और क्षत्र का संरक्षण आपके द्वारा हो; आपको स्वाहा अर्पित की जाती है।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में गन्धर्व और अप्सरा का आवाहन किया गया है, जो आनंद, सौंदर्य, औषधि और प्राकृतिक शक्ति के प्रतिनिधि हैं। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन में उत्साह, स्वास्थ्य और प्राकृतिक शक्ति का अनुभव करता है। स्वाहा अर्पित करना इस कृपा को स्वीकार करने का प्रतीक है और साधक को आध्यात्मिक व भौतिक संतुलन प्रदान करता है।
१८. स्कन्द (ब्रह्म-सोम मध्य वापी)
ॐ यदक्क्रन्दः प्प्रथमं जायमान ऽउद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात् । श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहू ऽउपस्तुत्त्यं महि जातं ते ऽअर्व्वन्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्कन्द इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः स्कन्दाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे स्कन्द! जो पहला जन्म लेने वाला और उदित होने वाला है, चाहे वह समुद्र से उत्पन्न हुआ हो या पृथ्वी से। उसके पंख श्येन (गरुड़) जैसे हैं, और हाथ हरिण के समान; पृथ्वी पर आपके नाम की स्तुति की जाती है।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में स्कन्द (कार्तिकेय) का आवाहन किया गया है, जो वीरता, शक्ति और युद्ध कौशल के प्रतीक हैं। श्येन और हरिण के रूपक उनके तेज, गति और शक्ति को दर्शाते हैं। साधक इस मंत्र का जप करके साहस, शक्ति और जीवन में विजय की ऊर्जा प्राप्त करता है।
१९. वृषभ (तदुत्तर)
ॐ आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । संक्रन्दनोऽनिमिष ऽएकवीरः शत ᳪ सेना अजयत्साकमिन्द्रः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वृषभ इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वृषभाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वृषभ! आप शीघ्र गति वाले, शिशानों (बालकों) के रक्षक, भीम और घनघन (सुदृढ़) हैं; क्षोभण और संघर्ष करने वालों के लिए। आप एकवीर हैं, जो क्षण में विजय प्राप्त करते हैं; आपकी सेना अजय और सक्षम है, जैसे इन्द्र की सेना।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में वृषभ का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, वीरता और रक्षात्मक क्षमता के प्रतीक हैं। “एकवीर” और “शत सेना” उनकी वीरता और सामर्थ्य का बोध कराते हैं। साधक इस मंत्र का जप करके साहस, शक्ति और विजय की भावना का अनुभव करता है, साथ ही संकट और बाधाओं पर नियंत्रण की ऊर्जा प्राप्त करता है।
२०. शूल (तदुत्तर)
ॐ कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि। समापोऽअद्भिरग्मतसमोषधीभिरोषधीः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शूल इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः शूलाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे शूल! आप समुद्र के किनारे हैं; आपकी कृपा से हम उन्हें ऊँचाई देते हैं। आप अद्भुत औषधियों और उनके प्रवाह के द्वारा समाहित हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में शूल का आवाहन किया गया है, जो औषधियों, प्राकृतिक तत्वों और उनके प्रवाह के संरक्षक हैं। साधक इस मंत्र का जप करके औषधि, स्वास्थ्य और प्राकृतिक शक्ति की प्राप्ति करता है, साथ ही जीवन में संतुलन और सुरक्षा का अनुभव करता है।
२१. महाकाल (तदुत्तर)
ॐ कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि। समापो ऽअद्भिरग्मत-समोषधीभिरोषधीः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः महाकाल इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः महाकालाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे महाकाल! आप समुद्र के किनारे हैं; आपकी कृपा से हम उन्हें ऊँचाई देते हैं। आप अद्भुत औषधियों और उनके प्रवाह के द्वारा समाहित हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में महाकाल का आवाहन किया गया है, जो समय और प्राकृतिक शक्तियों का अधिपति हैं। समुद्र और औषधियों का उल्लेख उनके व्यापक नियंत्रण और जीवन के नश्वर और अमर पहलुओं की समझ दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके समय की शक्ति, सुरक्षा और जीवन में संतुलन का अनुभव करता है।
२२. दक्षादिसप्तगण (ब्रह्म-ईशान मध्यश्रृंखला)
ॐ शुक्रज्योतिश्च चित्रज्योतिश्च सत्यज्योतिश्च ज्योतिष्मांश्च। शुक्रश्च ऽऋतपाश्चात्य हाः ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दक्षादिसप्तगणाः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः दक्षादिसप्तगणेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे दक्षादि सप्तगण! आप शुक्र, चित्र, सत्य और ज्योतिष्मा जैसी ज्योतिों के रूप हैं; आप ऋत के बंधनों से जुड़े हुए हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में दक्षादि सप्तगण का आवाहन किया गया है, जो विभिन्न प्रकार की दिव्य ज्योति और नियमों के रक्षक हैं। शुक्र, चित्र, सत्य आदि का उल्लेख ज्ञान, प्रकाश और सत्य के प्रतीक के रूप में किया गया है। साधक इस मंत्र का जप करके दिव्यता, विवेक और प्राकृतिक तथा आध्यात्मिक नियमों के पालन का अनुभव करता है।
२३. दुर्गा (ब्रह्म-इन्द्र मध्यवापी)
ॐ अम्बेऽअम्बकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ॥ सस॑स्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्गे इहाऽगच्छ इह तिष्ठ ।। ॐ भूर्भुवः स्वः दुर्गायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे दुर्गा! अम्बे, अम्बके, अम्बालिके — कोई भी आपको वश में नहीं कर सकता। आप सस्सत्य, अश्वक और सुभद्रिका हैं; काम्पीलवासिनी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी दुर्गा का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, स्वतंत्रता और सुरक्षा की प्रतीक हैं। “कश्चन न मा नयति” से उनकी अपरंपरागत और अजेय शक्ति का बोध होता है। साधक इस मंत्र का जप करके साहस, आध्यात्मिक सुरक्षा और शक्ति का अनुभव करता है।
२४. विष्णु (तत्पूर्व)
ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदं। समूढमस्य पा ᳪ सुरे स्वाहा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः विष्णवे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे विष्णु! आप त्रिधा (तीन रूपों में) विचरते हुए इस पद पर विराजमान हैं। यह आपके लिए समर्पित है, हे सुर! स्वाहा।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में विष्णु देवता का आवाहन किया गया है, जो पालन और संरक्षण के प्रतीक हैं। “त्रेधा विचक्रमे” उनके तीन रूपों और व्यापक कार्य को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके सुरक्षा, स्थिरता और जीवन में संतुलन की प्राप्ति करता है, साथ ही भगवान विष्णु की कृपा अनुभव करता है।
२५. स्वधा (ब्रह्म-अग्नि मध्यश्रृंखला)
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेब्भ्यः स्वधायिब्भ्यः स्वधा नमः प्रपितामहेभ्यः स्वधायिब्भ्यः स्व॒धा नमः॥ अक्षन्न्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धद्ध्वम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वधे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः स्वधायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे स्वधा! पितरों, पितामहों और प्रपितामहों के लिए स्वधा अर्पित है; अक्षन्न पितर, अतीत पितर और अन्य पितरों को नमस्कार।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में स्वधा देवी का आवाहन किया गया है, जो पितृ शक्ति और उनके प्रति श्रद्धा का प्रतीक हैं। यह मंत्र पूर्वजों के प्रति सम्मान और उनकी कृपा प्राप्त करने का साधन है। साधक इस मंत्र का जप करके पितृ अनुकंपा, आध्यात्मिक सुरक्षा और जीवन में संतुलन का अनुभव करता है।
२६. मृत्युरोग (ब्रह्म-यम मध्यश्रृंखला)
ॐ परं मृत्यो ऽअनु परेहि पन्थां यस्ते ऽअन्यऽइतरो देवयानात्। चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजा ᳪ रीरिषो मोत वीरान्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मृत्युरोगाः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः मृत्युरोगेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे मृत्युरोग! आप परम मृत्यु के मार्ग का पालन करते हैं, जो अन्य देवों के मार्ग से भिन्न है। आप दृष्टि और श्रवणशक्ति से जानने वाले हैं; हम आपकी प्रजा और वीरों की रक्षा के लिए यह कह रहे हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में मृत्यु और रोग के देवता का आवाहन किया गया है। उनका मार्ग साधक को जीवन और मृत्यु के चक्र की चेतना देता है। साधक इस मंत्र का जप करके मृत्यु-बोध, रोगों से सुरक्षा और जीवन में सतर्कता का अनुभव करता है, साथ ही वीरता और प्रजा के संरक्षण की ऊर्जा प्राप्त करता है।
२७. गणपति (ब्रह्म-निरृति मध्यश्रृंखला)
ॐ गणानान्त्वा गणपति ᳪ हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति ᳪ हवामहे निधीनान्त्वा निधिपतिᳪ हवामहे व्वसो मम आहमजानि गर्भधमात्त्वमजासि गर्भधम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गणपते इहागच्छ इह तिष्ठ । ॐ भूर्भुवः स्वः गणपतये नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे गणपति! आप गणों के स्वामी हैं, हम आपका हवामहे करते हैं। आप प्रिय के स्वामी हैं, हम आपका हवामहे करते हैं। आप निधियों के स्वामी हैं, हम आपका हवामहे करते हैं। आप मेरे गर्भधाम से उत्पन्न हुए हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में गणपति का आवाहन किया गया है, जो गणों, प्रिय और निधियों के स्वामी हैं। उनके स्वरूप में शक्ति, संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक निहित है। साधक इस मंत्र का जप करके आध्यात्मिक सुरक्षा, समृद्धि और जीवन में सफलता का अनुभव करता है, साथ ही बुद्धि और शक्ति की वृद्धि होती है।
२८. अप (ब्रह्म-वरुण मध्यश्रृंखला)
ॐ आपो हिष्ठा मयोभुवस्तानऽऊर्जे दधातन महेरणाय चक्षसे यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः उशतीरिव मातरः। तस्माऽअरङ्गमामवो यस्य क्षयाय जिन्वथ आपो जनयथा च नः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अद्भ्यः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः अद्भ्यो नमः ॥
हिन्दी अर्थ — हे अप (जल)! आप हमारी भूमि और जीवन में विद्यमान हैं; अपनी ऊर्जा से हमें शक्ति दें और हमें शुभ रस प्रदान करें। आप हमारी मातृभूमि की तरह हैं। आप जो क्षय और जन्म का संचालन करते हैं, उसके माध्यम से हमें जीवन दें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में जल देवता (आप) का आवाहन किया गया है, जो जीवन, ऊर्जा और पोषण के स्रोत हैं। मातृभूमि और जीवन के चक्र के समान उनकी कृपा का बोध कराया गया है। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन शक्ति, प्राकृतिक संतुलन और सुरक्षा का अनुभव करता है।
२९. मरुत (ब्रह्म-वायु मध्यश्रृंखला)
ॐ मरुतो यस्य हि क्षये पाथा दिवो विमहसः। स सुगोपातमो जनः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मरुताः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः मरुद्भ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे मरुत! जिसका मार्ग दिव्य क्षेत्र में नष्ट हो जाता है, वही सुगोपातमो (श्रेष्ठ रक्षक) और जनों के रक्षक हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में मरुत देवता का आवाहन किया गया है, जो वायु और गति के देवता हैं। उनका मार्ग दिव्यता और सुरक्षा का प्रतीक है। साधक इस मंत्र का जप करके रक्षा, ऊर्जा और जीवन में गतिशीलता का अनुभव करता है, साथ ही संकटों से मुक्ति और आध्यात्मिक स्थिरता प्राप्त करता है।
३०. पृथिवी (ब्रह्मपादमूल)
ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरानिवेशनी यच्छा नः शर्मसप्रथाः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पृथिवि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पृथिव्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे पृथिवी! आप हमारे लिए भूमि प्रदान करने वाली हैं, जैसे वृक्ष अपनी शाखाओं और जड़ों में निवास प्रदान करते हैं। हमारे लिए सुरक्षित और पोषक स्थान प्रदान करें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में पृथिवी देवी का आवाहन किया गया है, जो जीवन और समृद्धि की आधारभूमि हैं। वृक्ष की तरह उनका निवास सुरक्षा और पोषण का प्रतीक है। साधक इस मंत्र का जप करके स्थिरता, सुरक्षा और जीवन में स्थायी समृद्धि का अनुभव करता है।
३१. गङ्गादिनदी (तदुत्तर)
ॐ पञ्चनद्यः सरस्वतीमपियन्ति सस्रोतसः। सरस्वती तु पञ्चधा सो देशे ऽभवत्सरित्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गङ्गादिनद्यः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः गङ्गादिनदीभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे गंगा और अन्य नदियाँ! पाँच नदियाँ अपने स्रोत से प्रवाहित होती हैं। सरस्वती नदी इन पाँच रूपों में देश में प्रवाहित हुई।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में गंगा और अन्य प्रमुख नदियों का आवाहन किया गया है, जो जीवन, शुद्धि और समृद्धि का प्रतीक हैं। सरस्वती का पाँचधा प्रवाह ज्ञान, संस्कृति और जीवन शक्ति का बोध कराता है। साधक इस मंत्र का जप करके शुद्धि, समृद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करता है।
३२. सप्तसागर (तदुत्तर)
ॐ समुद्रोऽसि नभस्वानार्द्द्रदानुः शम्भूर्म्मयोभूरभि मा व्वाहि स्वाहा । अवस्यूसि दुवस्वाञ्छम्भूर्म्मयोभूरभि मा व्वाहि स्वाहा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः सप्तसागराः इहागच्छत इह तिष्ठत। ॐ भूर्भुवः स्वः सप्तसागरेभ्यो नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे सप्तसागर! आप समुद्र हैं, आकाश में और धरती पर नम्रता देने वाले। हे शंभु! आप सभी जगहों में विद्यमान हैं; हमें आशीर्वाद दें। स्वाहा।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में सप्तसागर का आवाहन किया गया है, जो समुद्र की विशालता, शक्ति और जीवनदायिनी ऊर्जा का प्रतीक हैं। शंभु का उल्लेख उनकी सर्वव्यापकता और सुरक्षा शक्ति को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन में संरक्षण, स्थिरता और प्राकृतिक शक्तियों के संतुलन का अनुभव करता है।
३३. मेरु (कर्णिकापरिधि)
ॐ प्र पर्व्वतस्य व्वृषभस्य पृष्ट्ठान्नावरश्चरन्ति स्वसि च ऽइयानाः । ता ऽआववृन्नधरागुदक्ता अहिर्बुधन्यमनु रीयमाणाः । विष्ष्णोर्व्विक्क्रमणमसि व्विष्ष्णोर्विक्क्रान्तमसि व्विष्ष्णोः क्क्रान्तमसि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः मेरो इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः मेरवे नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे मेरु! पर्वत का वृषभ जैसी पीठभूमि है; उसकी ओर सभी मार्ग और प्रवाह फैले हुए हैं। वे पर्वत की उन्नति और स्थिरता में विद्यमान हैं। हे विष्णु! आप इसके माध्यम से विचरते और कार्य करते हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में मेरु पर्वत का आवाहन किया गया है, जो स्थिरता, केंद्रबिंदु और ब्रह्मांडीय संतुलन का प्रतीक है। विष्णु का उल्लेख उनकी सर्वव्यापकता और संरक्षण शक्ति को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके स्थिरता, सुरक्षा और जीवन में आध्यात्मिक केंद्र का अनुभव करता है।
३४. गदा (श्वेतपरिधि उत्तर)
ॐ गणानान्त्वा गणपति ᳪ हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति ᳪ हवामहे निधीनान्त्वा निधिपतिᳪ हवामहे व्वसो मम आहमजानि गर्भधमात्त्वमजासि गर्भधम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गदे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः गदायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे गदा (गणपति)! आप गणों के स्वामी हैं, हम आपका हवामहे करते हैं। आप प्रिय के स्वामी हैं, हम आपका हवामहे करते हैं। आप निधियों के स्वामी हैं, हम आपका हवामहे करते हैं। आप मेरे गर्भधाम से उत्पन्न हुए हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में गदा (गणपति) का आवाहन किया गया है, जो गणों, प्रिय और निधियों के स्वामी हैं। उनके स्वरूप में शक्ति, संरक्षण और समृद्धि का प्रतीक निहित है। साधक इस मंत्र का जप करके आध्यात्मिक सुरक्षा, समृद्धि और जीवन में सफलता का अनुभव करता है, साथ ही बुद्धि और शक्ति की वृद्धि होती है।
३५. त्रिशूल (ईशानकोण)
ॐ त्रि ᳪशद्धाम विराजति व्वाक्क्पतङ्गाय धीयते । प्रति वस्तोरह द्य भिः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः त्रिशूल इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः त्रिशूलाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे त्रिशूल! त्रि (तीन) धामों में आप विराजमान हैं; आप पंखों और बुद्धि द्वारा ज्ञात होते हैं। आप प्रत्येक वस्तु और देवताओं के लिए प्रतिष्ठित हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में त्रिशूल का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, संकल्प और दिव्यता का प्रतीक है। त्रि-धाम और पंखों का उल्लेख उनके व्यापक और सर्वव्यापी स्वरूप को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके साहस, सुरक्षा और आध्यात्मिक विवेक की अनुभूति करता है।
३६. वज्र (पूर्व)
ॐ महाँ२ इन्द्रो व्वज्रहस्तः षोडशी शर्म्म यच्छतु। हन्न्तु पाप्मानं योऽस्मान्द्वेष्टि । उपयामगृहीतोऽसि महेन्द्रायत्त्वैष ते योनिर्म्महेन्द्राय त्वा॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वज्र इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वज्राय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वज्र! महादेव इन्द्र, वज्रहस्त हैं; वे षोडशी (पूर्ण) सुरक्षा प्रदान करें। वे पापियों को नष्ट करें और हमारी रक्षा करें। आप महेन्द्र के लिए आधार और स्रोत हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में वज्र का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, रक्षा और न्याय का प्रतीक है। इन्द्र और वज्रहस्त का उल्लेख उनके सर्वोच्च सामर्थ्य और सुरक्षा शक्ति को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके पाप से सुरक्षा, आध्यात्मिक शक्ति और जीवन में स्थिरता का अनुभव करता है।
३७. शक्ति (अग्निकोण)
ॐ व्वसु च मे व्वसतिश्च मे कर्म्म च मे ऽर्थश्च म ऽएमश्च म ऽइत्या च मे गतिश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः शक्ति इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः शक्तये नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे शक्ति! आप मेरी संपत्ति, मेरे कर्म, मेरे अर्थ और मेरे अंश हैं; आप मेरी गति हैं। यज्ञ द्वारा ये सभी कल्याणकारी बनें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में शक्ति का आवाहन किया गया है, जो संपत्ति, कर्म, उद्देश्य और गति का प्रतीक हैं। यज्ञ के माध्यम से इनका कल्याण साधक के जीवन में संतुलन, समृद्धि और सफलता का मार्ग दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन शक्ति, आध्यात्मिक स्थिरता और समृद्धि का अनुभव करता है।
३८. दण्ड (दक्षिण)
ॐ इड ऽएह्यदित ऽएहि काम्या ऽएत । मयि वः कामधरणं भूयात्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः दण्ड इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः दण्डाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे दण्ड! आप यहाँ उपस्थित हैं; हे काम्या! यह हमारी कामना के अनुसार हो। आप हमारे लिए कामधारण का आधार बनें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में दण्ड का आवाहन किया गया है, जो शासन, नियंत्रण और समर्थन का प्रतीक हैं। साधक इस मंत्र का जप करके शक्ति, नियंत्रण और इच्छाओं की प्राप्ति का अनुभव करता है, साथ ही जीवन में संतुलन और सुरक्षा का अनुभव करता है।
३९. खड्ग (नैरृत्यकोण)
ॐ खड्गो व्वैश्श्वदेवः श्वा कृष्णः कर्ण्णो गर्दभस्तरक्षुस्ते रक्षसामिन्द्राय सूकरः सि ᳪ हो मारुतः कृकलासः पिप्पका शकुनिस्ते शरव्यायै विश्वेषां देवानां पृषतः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः खड्ग इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः खड्गाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे खड्ग! आप वैश्वदेव हैं, श्वा कृष्ण हैं; आपके कान, गर्दभ, और आँखें रक्षा करते हैं। आप राक्षसों के लिए इन्द्र हैं, सूकर हैं, हे मारुत! आप कृकलास, पिप्पका और शुकों के माध्यम से देवताओं की रक्षा करते हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में खड्ग का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, रक्षा और देवताओं के संरक्षण का प्रतीक हैं। विभिन्न रूपक (कान, गर्दभ, आँखें, पिप्पका आदि) उनके व्यापक संरक्षण और युद्ध शक्ति को दर्शाते हैं। साधक इस मंत्र का जप करके सुरक्षा, वीरता और दिव्य शक्ति का अनुभव करता है।
४०. पाश (पश्चिम)
ॐ उदुत्तमं व्वरुण पाशमस्स्मदवाधमं व्वि मध्यम ᳪ श्रथाय । अथा व्वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम॥
ॐ भूर्भुवः स्वः पाश इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः पाशाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे पाश! आप उत्तम वरुण हैं; आप हमारे अधम और मध्यम को बाँधते हैं। इसके बाद हम आदित्य व्रत में आपकी सेवा करेंगे, आप अदि देवी के साथ हममें समाहित हों।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में पाश का आवाहन किया गया है, जो नियंत्रण, बंधन और नियम का प्रतीक हैं। वरुण और आदित्य का उल्लेख प्राकृतिक और दिव्य शक्ति के संतुलन को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके आत्मनियंत्रण, सुरक्षा और आध्यात्मिक संतुलन का अनुभव करता है।
४१. अङ्कुश (वायव्यकोण)
ॐ अ ᳪ शुश्श्च मे रश्मिश्श्च मेऽदाब्ध्यश्च मेऽधिपतिश्श्च म ऽउपा ᳪ शुश्श्च मेऽन्तर्य्यामश्श्च मऽएन्द्रवायवश्श्च मे मैत्र्त्रावरुणश्श्च म ऽआश्वनश्श्च मे प्प्रतिप्प्रस्थानश्श्च मे शुक्क्रश्श्चमे मन्थी च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अङ्कुश इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः अङ्कुशाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अङ्कुश! आप मेरी रश्मि, मेरे अधिपति, मेरे अंतर्यामी, मेरे इन्द्र और वायु, मेरे मित्र और वरुण, मेरे अश्वन और प्रतिप्रस्थान, मेरे शुक्र और मंत्रियों के लिए हैं। आप यज्ञ द्वारा इन सभी का कल्याण करें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में अङ्कुश का आवाहन किया गया है, जो नियंत्रण, मार्गदर्शन और यज्ञ शक्ति का प्रतीक हैं। विभिन्न देवताओं और तत्वों का उल्लेख उनके व्यापक प्रभाव और संरक्षक शक्ति को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन में मार्गदर्शन, संतुलन और आध्यात्मिक सुरक्षा का अनुभव करता है।
४२. गौतम (रक्तपरिधि उत्तर)
ॐ आयङ्गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः । पितरञ्च प्रयत्न्स्वः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः गौतम इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः गौतमाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे गौतम! आप हमारे पूर्वजों और मातरों के मार्गदर्शक हैं। पितरों की रक्षा और मार्गदर्शन भी आप करें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में गौतम ऋषि का आवाहन किया गया है, जो पूर्वजों और पितृ शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका स्मरण साधक को पितृ अनुकंपा, ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। साधक इस मंत्र का जप करके पूर्वजों का आशीर्वाद, सुरक्षा और आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
४३. भरद्वाज (ईशानकोण)
ॐ अयं दक्षिणा विश्श्वकर्मा तस्य मनो व्वैश्श्वकर्मणं ग्रीष्मो मानसस्त्रिष्टुब्ग्रैष्मी त्रिष्टुभः स्वार ᳪ स्वारादन्तर्य्यामोऽन्तर्य्यामापञ्चदशः पञ्चदशाद् बृहद्भरद्वाज ऽऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वया मनो गृह्णामि प्रजाब्भ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः भरद्वाज इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः भरद्वाज नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे भरद्वाज! यह दक्षिणा विश्वकर्मा है; उसका मन और मानस आपकी ओर हैं। त्रिष्टुभ छंद और पञ्चदश स्वर में, ऋषि भरद्वाज ने प्रजापति द्वारा ग्रहित होकर मनो-गृह्णामि के माध्यम से प्रजा के लिए इसे समर्पित किया।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऋषि भरद्वाज और विश्वकर्मा का आवाहन किया गया है, जो रचनात्मक शक्ति, संरक्षण और ज्ञान का प्रतीक हैं। छंद और स्वर का उल्लेख मंत्र की दिव्यता और प्रभाव को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके रचनात्मक शक्ति, सुरक्षा और प्रजा के कल्याण का अनुभव करता है।
४४. विश्वामित्र (पूर्व)
ॐ इदमुत्तरात्स्वस्तस्य श्रोत्र्त्र ᳪ सौव ᳪ शरच्छ्रौत्र्यनुष्टुप् शारद्यनुष्टुभ ऽऐडमैडान्मन्थी मन्थिन ऽएकवि ᳪ शाद्द्वैराजं विश्श्वामित्रऽऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वया श्श्रोत्रं गृह्णामि प्प्रजाभ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः विश्वामित्र इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः विश्वमित्राय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे विश्वामित्र! यह उत्तरात् स्वस्ति, श्रुतियों और छंदों (अनुष्टुप, शारद्य) से युक्त है। ऋषि विश्वामित्र ने प्रजापति द्वारा स्वीकार कर इसे मंत्र के रूप में प्रजा के लिए समर्पित किया; हम इसके माध्यम से श्रुतियों को ग्रहण करते हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऋषि विश्वामित्र का आवाहन किया गया है, जो ज्ञान, छंद और श्रुतियों के संरक्षक हैं। विभिन्न छंद और स्वर मंत्र की शक्ति और प्रभाव को दर्शाते हैं। साधक इस मंत्र का जप करके ज्ञान, आध्यात्मिक संरक्षण और प्रजा के कल्याण का अनुभव करता है।
४५. कश्यप (अग्निकोण)
ॐ त्र्यायुषं ज्जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम् । यद्द्देवेषु त्र्यायुषं तन्नों ऽअस्तु त्र्यायुषम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कश्यप इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः कश्यपाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे कश्यप! हे अग्नि! यह त्र्यायुष (तीन प्रकार की आयु) आपकी कृपा से है। जो त्र्यायुष देवताओं में विद्यमान है, वही हमारे लिए भी त्र्यायुष बने।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऋषि कश्यप और अग्नि का आवाहन किया गया है, जो जीवन, आयु और देवताओं की शक्ति का प्रतीक हैं। त्र्यायुष का उल्लेख जीवन के तीन आयामों (शारीरिक, आध्यात्मिक और सांसारिक) की आयु को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन की दीर्घायु, सुरक्षा और आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
४६. जमदग्नि (दक्षिण)
ॐ अयं पश्श्चाद्विश्श्वव्यचास्तस्य चक्षुर्व्वैश्श्वव्व्यचसं वर्षाश्श्चाक्षुष्ष्यो जगती व्वार्षी जगत्या ऽऋक्सममृक्समाच्छुक्क्रः शुक्क्रात्सप्तदशः सप्तदशाद् जमदग्ग्नर्ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वया चक्षुर्गृह्णामि प्रजाब्भ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः जमदग्नि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः जमदग्नये नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे जमदग्नि! यह पश्चिम से आता है और विश्वव्यापी है; इसका चक्षु (दृष्टि) और वर्षा जगत पर फैलती है। सप्तदश स्वर में, ऋषि जमदग्नि ने प्रजापति द्वारा स्वीकार होकर इसे प्रजा के लिए समर्पित किया; हम इसके माध्यम से दृष्टि ग्रहण करते हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऋषि जमदग्नि का आवाहन किया गया है, जो दृष्टि, वर्षा और विश्वव्यापी शक्ति के प्रतीक हैं। सप्तदश छंद और स्वर मंत्र की दिव्यता और प्रभाव को दर्शाते हैं। साधक इस मंत्र का जप करके ज्ञान, सुरक्षा और जीवन में आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
४७. वशिष्ठ (नैरृत्यकोण)
ॐ अयं पुरो भुवस्तस्य प्राणो भौवायनो व्वसन्तः प्प्राणाय नो गायत्त्री व्वासन्ती गायत्र्यै गायत्रं गायत्त्रादुपा ᳪ शुरुपा ᳪ शोस्त्रिवृत्रिवृतो रथन्तरं व्वसिष्ठ ऽऋषि प्प्रजापतिगृहीतया त्वया प्राणं गृह्णामि प्रजाब्भ्यः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वशिष्ठ इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वशिष्ठाय नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वशिष्ठ! यह पुरो भुवन का प्राण है। वसंत प्राण हमारी ओर प्रवाहित हों। गायत्री के माध्यम से गायत्रि को हम अर्पित करते हैं। ऋषि वशिष्ठ ने प्रजापति द्वारा स्वीकार कर इसे प्रजा के लिए समर्पित किया; हम इसके माध्यम से प्राण ग्रहण करते हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऋषि वशिष्ठ का आवाहन किया गया है, जो प्राण, जीवन शक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रतीक हैं। गायत्री मंत्र और वसंत प्राण का उल्लेख जीवन, ऊर्जा और समृद्धि का बोध कराता है। साधक इस मंत्र का जप करके प्राणशक्ति, आध्यात्मिक सुरक्षा और जीवन में स्थिरता का अनुभव करता है।
४८. अत्रि (पश्चिम)
ॐ अत्त्र पितरो मादयद्ध्वं य्यथाभाग मावृषायद्ध्वम् । अमीमदन्त पितरो यथाभाग मावृषायिषत॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अत्रि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः अत्रये नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अत्रि! पितरों को उनकी भाग्य और अनुसार आशीर्वाद दें। हमारे पूर्वजों को उनकी भाग्य और अनुसार आशीर्वाद प्रदान करें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऋषि अत्रि का आवाहन किया गया है, जो पितृ शक्ति और पूर्वजों के कल्याण के प्रतीक हैं। यह मंत्र साधक को पितृ अनुकंपा और जीवन में सुरक्षा एवं संतुलन प्रदान करता है। साधक इस मंत्र का जप करके पितृ आशीर्वाद और आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
४९. अरुन्धती (वायव्यकोण)
ॐ तं पत्नीभिरनुगच्छेम देवाः पुत्रैर्भ्रातृभिरुत वा हिरण्ण्यैः । नाकं गृब्भ्णानाः सुकृतस्य लोके तृतीये पृष्ठे ऽधिरोचने दिवः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धति इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः अरुन्धत्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे अरुंधती! देवताओं के साथ हम आपके पीछे चलें, पुत्रों और भाइयों के साथ या हिरण्य (संपत्ति) के साथ। अच्छे कर्म करने वालों के लिए लोक में आपका प्रभाव तीसरे पृष्ठ पर आकाश में प्रकट हो।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में अरुंधती का आवाहन किया गया है, जो परिवार, समृद्धि और नैतिकता के प्रतीक हैं। उनका अनुसरण करना साधक को आशीर्वाद, सुरक्षा और सामाजिक-सांस्कृतिक संतुलन की अनुभूति कराता है। साधक इस मंत्र का जप करके परिवारिक कल्याण, आध्यात्मिक स्थिरता और सामाजिक सद्भाव का अनुभव करता है।
५०. ऐन्द्री (कृष्णपरिधि पूर्व)
ॐ अदित्यै रास्स्नासीन्द्राण्ण्या ऽउष्ष्णीषः । पूषासि घर्म्माय दीष्ष्व॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ऐन्द्रि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः ऐन्द्रयै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे ऐन्द्री! आप अदित्य की ऊर्जा हैं, आप इन्द्र की शक्ति से युक्त हैं। हे पूषा! आप घर्म (अग्नि) के लिए दीश्व हैं। हे ऐन्द्री! आप यहाँ उपस्थित हों; आपको नमस्कार।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में ऐन्द्री का आवाहन किया गया है, जो सूर्य, इन्द्र और अग्नि की शक्ति का प्रतीक हैं। उनके माध्यम से जीवन में ऊर्जा, सुरक्षा और प्रकृति की शक्ति प्राप्त होती है। साधक इस मंत्र का जप करके शक्ति, सुरक्षा और आध्यात्मिक जागरूकता का अनुभव करता है।
५१. कौमारी (अग्निकोण)
ॐ अम्बेऽअम्बकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ॥ सस॑स्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः कौमारि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः कौमार्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे कौमारी (अम्बा, अम्बके, अम्बालिके)! कोई भी आपको वश में नहीं कर सकता। आप सस्सत्य, अश्वक और सुभद्रिका हैं; काम्पीलवासिनी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी कौमारी का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, स्वतंत्रता और सुरक्षा की प्रतीक हैं। “कश्चन न मा नयति” उनके अजेय और अपरंपरागत स्वरूप को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके साहस, आध्यात्मिक सुरक्षा और शक्ति का अनुभव करता है।
५२. ब्राह्मी (दक्षिण)
ॐ इन्द्रायाहि धियेषितो व्विप्प्रजूतः सुतावतः उप ब्ब्रह्माणि व्वाग्घतः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः ब्राह्मि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः ब्राह्म्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे ब्राह्मी! आप इन्द्र के लिए हैं; आपके द्वारा उत्पन्न पुत्र और उप-ब्रह्मा विद्यमान हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी ब्राह्मी का आवाहन किया गया है, जो ज्ञान, रचनात्मक शक्ति और आध्यात्मिक विद्या की देवी हैं। इन्द्र और उप-ब्रह्मा का उल्लेख उनके व्यापक प्रभाव और संरक्षण शक्ति को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके ज्ञान, बुद्धि और जीवन में स्थिरता का अनुभव करता है।
५३. वाराही (नैरृत्यकोण)
ॐ आयङ्गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः । पितरञ्च प्रयत्न्स्वः॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वाराहि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वाराह्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वाराही! आप हमारे पूर्वजों और माताओं के मार्गदर्शक हैं। पितरों की रक्षा और मार्गदर्शन भी आप करें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी वाराही का आवाहन किया गया है, जो पितृ शक्ति और पूर्वजों के कल्याण के प्रतीक हैं। साधक इस मंत्र का जप करके पितृ आशीर्वाद, सुरक्षा और आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
५४. चामुण्डा (पश्चिम)
ॐ अम्बेऽअम्बकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ॥ सस॑स्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्॥
ॐ भूर्भुवः स्वः चामुण्डे इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः चामुण्डायै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे चामुण्डा! अम्बे, अम्बके, अम्बालिके — कोई भी आपको वश में नहीं कर सकता। आप सस्सत्य, अश्वक और सुभद्रिका हैं; काम्पीलवासिनी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी चामुण्डा का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, स्वतंत्रता और सुरक्षा की प्रतीक हैं। “कश्चन न मा नयति” उनके अजेय और अपरंपरागत स्वरूप को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके साहस, आध्यात्मिक सुरक्षा और शक्ति का अनुभव करता है।
५५. वैष्णवी (वायव्यकोण)
ॐ आप्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्। भवा व्वाजस्य सङ्गथे॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वैष्णवि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वैष्णव्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वैष्णवी! आप समस्त विश्व से उत्पन्न हो; सोम और वृष्णि के साथ आप हमारे साथ रहें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी वैष्णवी का आवाहन किया गया है, जो समृद्धि, संरक्षण और दिव्यता की शक्ति का प्रतीक हैं। सोम और वृष्णि का उल्लेख उनके व्यापक प्रभाव और सहकार्य को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन में सुरक्षा, समृद्धि और आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
५६. माहेश्वरी (उत्तर)
ॐ या ते रुद्द्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी । तया नस्तन्न्वा शन्न्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः माहेश्वरि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः माहेश्वर्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे माहेश्वरी! आप रुद्र और शिव के समान हैं; आपका शरीर भयंकर और पापों का नाश करने वाला है। आप हमें शांति प्रदान करें और गिरिश के समान दृष्टि दें।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी माहेश्वरी का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, पाप नाश और शांति की देवी हैं। रुद्र और शिव का उल्लेख उनके प्रचंड स्वरूप और नाशक क्षमता को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके आध्यात्मिक सुरक्षा, पापों से मुक्ति और जीवन में स्थिरता का अनुभव करता है।
५७. वैनायकी (ईशानकोण)
ॐ समख्ये देव्या धिया सन्दक्षिणयोरुचक्षसा । मा मऽआयुः प्प्रमोषीर्म्मो ऽअहं तव व्वीरं व्विदेय तव देवि सन्दृशि॥
ॐ भूर्भुवः स्वः वैनायकि इहागच्छ इह तिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः वैनायक्यै नमः॥
हिन्दी अर्थ — हे वैनायकी! आप समक्ष देवियों में हैं; आपकी दृष्टि से दक्षिण और अन्य दिशाएँ प्रकाशित होती हैं। हे देवी! हमारी आयु समाप्त न हो; मैं आपकी वीरता और शक्ति को देखूँ।
संक्षिप्त टीका — इस मंत्र में देवी वैनायकी का आवाहन किया गया है, जो शक्ति, सुरक्षा और दीर्घायु की प्रतीक हैं। दक्षिण और अन्य दिशाओं का उल्लेख उनकी व्यापक दृष्टि और प्रभुत्व को दर्शाता है। साधक इस मंत्र का जप करके जीवन में सुरक्षा, ऊर्जा और आध्यात्मिक स्थिरता का अनुभव करता है।
प्राणप्रतिष्ठा
ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं यज्ञ ᳪ समिमं दधातु॥
विश्वेदेवा स इह मादयंतामों३ प्रतिष्ठ॥
प्रतिष्ठा सर्वदेवानां मित्रावरुणनिर्मिता ।
प्रतिष्ठां ते करोम्यत्र मण्डले दैवते सह ।।
ॐ ब्रह्माद्यारभ्य वैनायकी पर्यंत देवताः इहागच्छत सर्वतोभद्रोपरि तिष्ठत ।
षोडशोपचारैः पूजनम्
ॐ भूर्भुवः स्वः सर्वतोभद्रस्थ ब्रह्मादि देवताभ्यो नमः आसनार्थेऽक्षतान समर्पयामि । पादयोः पाद्यं समर्पयामि । हस्तयोः अर्घ्यं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । स्नानाङ्गाचमनं समर्पयामि । वस्त्रम् समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । यज्ञोपवीतं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । उपवस्त्रं समर्पयामि । गन्धं समर्पयामि । अक्षतान समर्पयामि । पुष्पमालां समर्पयामि । नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि । धूपमाध्रापयामि । दीपं दर्शयामि । हस्तप्रक्षालनम् । नैवेद्यं समर्पयामि । आचमनीयं समर्पयामि । मध्ये पानीयम् उत्तरापोशनं च समर्पयामि । ताम्बूलं समर्पयामि । पूगीफलं समर्पयामि । कृतायाः पूजायाः पाड्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि । मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि । अनया पूजया गणपत्यादि पञ्चदेवता: प्रीयन्ताम् न मम ।