श्री सत्यनारायण पूजा एवं कथा : परिचय, विधि और महत्व
श्री सत्यनारायण पूजा भगवान विष्णु के सत्य, धर्म और करुणा स्वरूप की उपासना है। यह पूजा जीवन में सत्यनिष्ठा, संतुलन और शांति स्थापित करने के उद्देश्य से की जाती है। ‘सत्य’ का अर्थ केवल सत्य वचन नहीं, बल्कि सत्य आचरण और सत्य मार्ग पर चलने का संकल्प भी है।
यह पूजा विशेष रूप से गृहस्थ जीवन से जुड़ी मानी जाती है, क्योंकि इसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत इच्छापूर्ति नहीं, बल्कि परिवार में सौहार्द, विश्वास और समृद्धि बनाए रखना है। सत्यनारायण कथा के माध्यम से भगवान विष्णु यह संदेश देते हैं कि जब जीवन सत्य और श्रद्धा पर आधारित होता है, तब साधारण कर्म भी मंगलमय बन जाते हैं।
श्री सत्यनारायण पूजा की विधि (संक्षेप में)
सत्यनारायण पूजा प्रायः सरल विधि से सम्पन्न की जाती है, ताकि प्रत्येक भक्त इसे श्रद्धा के साथ कर सके। पूजा का आरंभ स्वस्तिवाचन और गणपति स्मरण से किया जाता है, जिससे विघ्नों का शमन हो। इसके पश्चात संकल्प लेकर भगवान सत्यनारायण का आवाहन किया जाता है।
कथा पाठ इस पूजा का मुख्य अंग है। कथा के प्रत्येक प्रसंग में सत्य, वचनपालन और कर्तव्यबोध का संदेश निहित होता है। अंत में आरती और प्रसाद वितरण के साथ पूजा पूर्ण होती है।
श्री सत्यनारायण पूजा का महत्व
सत्यनारायण पूजा का मूल भाव यह है कि ईश्वर सत्य के साथ हैं। यह पूजा यह स्मरण कराती है कि जब मनुष्य अपने वचन, कर्म और विचार में सत्य का पालन करता है, तब ईश्वर की कृपा स्वतः प्राप्त होती है।
यह पूजा केवल संकट निवारण के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने के लिए की जाती है। कथा के पात्र यह सिखाते हैं कि आस्था के साथ किया गया साधारण कर्म भी असाधारण फल प्रदान कर सकता है।
श्री सत्यनारायण पूजा के लाभ
- पारिवारिक शांति और सौहार्द की स्थापना
- मानसिक स्थिरता और विश्वास की वृद्धि
- आर्थिक असंतुलन और अनिश्चितता में संतुलन
- वचन और कर्म में अनुशासन का विकास
- जीवन में सत्यनिष्ठा और संतोष की भावना
श्री सत्यनारायण पूजा के माध्यम से भगवान विष्णु की शुद्ध और निष्काम भक्ति प्राप्त होती है। साधक इस लोक में सुख, शांति और संतुलित जीवन का अनुभव करता है तथा जीवन के अंत में भगवान विष्णु के परम धाम वैकुण्ठ को प्राप्त करने का अधिकारी बनता है।
सत्यनारायण कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण और पाठ करने से संचित पापों का क्षय होता है और मनुष्य धर्म के मार्ग पर स्थिर होता है। यह पूजा साधक को केवल भौतिक लाभ तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करती है, जहाँ जीवन का परम उद्देश्य—आत्मिक शुद्धि और ईश्वर-सान्निध्य—साकार होता है।
श्री सत्यनारायण पूजा कब करें
सत्यनारायण पूजा किसी भी शुभ दिन की जा सकती है। पूर्णिमा तिथि को यह पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है, किंतु आवश्यकता पड़ने पर किसी भी दिन श्रद्धा के साथ इसका आयोजन किया जा सकता है।
गृहप्रवेश, विवाह, संतान जन्म, व्यवसाय आरंभ या किसी मनोकामना की पूर्ति के उपरांत यह पूजा विशेष रूप से की जाती है।
सामान्य भक्तों के लिए विशेष सुझाव
इस पृष्ठ पर आगे दिए गए संस्कृत मंत्र पूजा विधि का शास्त्रीय आधार हैं। प्रत्येक मंत्र के साथ दिया गया हिन्दी अर्थ और भावार्थ यह समझाने के लिए है कि वह मंत्र क्यों पढ़ा जाता है और उसका उद्देश्य क्या है।
यदि आप संस्कृत से परिचित नहीं हैं, तब भी आप इस पृष्ठ के माध्यम से पूजा के भाव और महत्व को समझकर श्रद्धा के साथ सत्यनारायण कथा कर सकते हैं। पूजा का सार विधि में नहीं, बल्कि भाव, सत्य और समर्पण में निहित है।
आचमन
ॐ केशवाय नमः ॐ नारायणाय नमः ॐ माधवाय नमः
इस आचमन में भगवान सत्यनारायण को केशव, नारायण और माधव नामों से स्मरण किया जाता है, जो भगवान विष्णु के पालन और संरक्षण स्वरूप को प्रकट करते हैं। इस मंत्र के उच्चारण के साथ साधक अपने मन, वाणी और संकल्प को सत्य तथा सात्त्विक भाव से शुद्ध करता है। सत्यनारायण पूजा में आचमन का उद्देश्य केवल बाहरी शुद्धि नहीं, बल्कि जीवन में संतुलन, मर्यादा और धर्म के प्रति निष्ठा को जाग्रत करना है। इस शुद्धि के उपरांत साधक पूजा को स्थिर मन और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाने के लिए स्वयं को तैयार करता है।
‘गोविन्दाय नमः’ कहकर होठ पोंछ लें और ‘हृषीकेशाय नमः’ बोलकर हाथ धो लें ।
हस्त प्रक्षालन के इस मंत्र में भगवान सत्यनारायण को हृषीकेश और गोविंद नामों से स्मरण किया जाता है, जो इंद्रियों के नियंत्रण और समस्त सृष्टि के पालनकर्ता स्वरूप को दर्शाते हैं। हाथों की शुद्धि के साथ साधक यह भाव स्थापित करता है कि उसके कर्म पवित्र, संयमित और धर्मसम्मत हों। सत्यनारायण पूजा में यह चरण यह स्मरण कराता है कि जब कर्म शुद्ध होते हैं, तभी सत्य और धर्म का पालन संभव होता है, और उसी भाव से आगे की पूजा फलदायी बनती है।
पवित्रीकरण
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु। ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु।
हिन्दी अर्थ
चाहे मनुष्य अपवित्र हो या पवित्र, चाहे वह किसी भी अवस्था में क्यों न हो, जो भगवान विष्णु (पुण्डरीकाक्ष) का स्मरण करता है, वह बाह्य और आंतरिक दोनों रूपों से शुद्ध हो जाता है। भगवान पुण्डरीकाक्ष हमें पवित्र करें—भगवान पुण्डरीकाक्ष हमें पवित्र करें—भगवान पुण्डरीकाक्ष हमें पवित्र करें।
भावार्थ
पवित्रीकरण के इस मंत्र में भगवान सत्यनारायण को पुण्डरीकाक्ष स्वरूप में स्मरण किया गया है, जो पूर्ण शुद्धता और करुणा का प्रतीक है। इस मंत्र का मूल भाव यह स्थापित करता है कि शुद्धि केवल कर्मकाण्ड या बाहरी अवस्था पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ईश्वर-स्मरण से उत्पन्न होती है। सत्यनारायण पूजा में यह चरण साधक को यह आश्वासन देता है कि यदि मन में सत्य और श्रद्धा का भाव है, तो पूर्व की अशुद्धियाँ या त्रुटियाँ पूजा में बाधक नहीं बनतीं। यह मंत्र साधक के भीतर आत्मविश्वास और समर्पण उत्पन्न करता है, जिससे आगे की समस्त पूजा स्थिर मन और सात्त्विक भाव से सम्पन्न हो सके।
आसन शुद्धि
ॐ पृथिवी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम् ॥
हिन्दी अर्थ
हे देवी पृथ्वी, आप सम्पूर्ण लोकों को धारण करती हैं और स्वयं भगवान विष्णु द्वारा धारण की गई हैं। हे देवी, आप मुझे भी धारण करें और मेरे इस आसन को पवित्र करें।
भावार्थ
आसन शुद्धि के इस मंत्र में पृथ्वी को देवी रूप में स्मरण करते हुए भगवान सत्यनारायण के विष्णु-तत्त्व से उसका संबंध स्थापित किया गया है। इसका भाव यह है कि जिस आधार पर साधक बैठकर पूजा करता है, वह भी शुद्ध, स्थिर और धर्मसम्मत हो। सत्यनारायण पूजा में यह चरण साधक को विनम्रता का बोध कराता है कि वह पृथ्वी के आश्रय से ही पूजा कर पा रहा है, और यह आश्रय भी ईश्वर की कृपा से प्राप्त है। आसन की शुद्धि का अर्थ केवल स्थान की पवित्रता नहीं, बल्कि मन की स्थिरता और अहंकार का त्याग भी है, जिससे साधक सत्य और श्रद्धा के साथ पूजा में स्थित हो सके।
तिलक
चंदनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनं। आपदां हरते नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा।।
हिन्दी अर्थ
चंदन अत्यंत पुण्यकारी, पवित्र और पापों का नाश करने वाला है। यह नित्य आपदाओं को दूर करता है और जहाँ चंदन का तिलक होता है, वहाँ लक्ष्मी सदा निवास करती हैं।
भावार्थ
तिलक के इस मंत्र में चंदन को शुद्धता, शांति और सौभाग्य का प्रतीक बताया गया है। सत्यनारायण पूजा में तिलक का उद्देश्य साधक के मस्तिष्क को पवित्र कर उसे सत्य और धर्म के मार्ग पर स्थिर करना है। चंदन की शीतलता यह संकेत देती है कि पूजा अहंकार या उतावलेपन से नहीं, बल्कि शांत और संतुलित मन से की जानी चाहिए। लक्ष्मी के निवास का उल्लेख यह दर्शाता है कि जहाँ विचार शुद्ध और आचरण संयमित होता है, वहाँ समृद्धि और सौभाग्य स्वतः टिके रहते हैं। यह तिलक साधक को यह स्मरण कराता है कि सत्यनारायण की कृपा जीवन में बाहरी ही नहीं, बल्कि आंतरिक समृद्धि भी प्रदान करती है।
दिग्बन्धन रक्षा स्तोत्र
ॐ पूर्वे रक्षतु वाराहः आग्नेयां गरुड़ध्वजः । दक्षिणे पदमनाभस्तु नैऋत्यां मधुसूदनः ॥ पश्चिमे चैव गोविन्दो वायव्यां तु जनार्दनः । उत्तरे श्री पति रक्षेदेशान्यां हि महेश्वरः ॥
ऊर्ध्व रक्षतु धातावो ह्यधोऽनन्तश्च रक्षतु । अनुक्तमपियत्स्थानं रक्षत्वीशो ममाद्रिधृक् ॥ अपसर्पन्तु ये भूताः, ये भूताः भुवि संस्थिताः ये भूताः विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ॥
अपक्रमंतु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशम् । सर्वेषाम् विरोधेन यज्ञकर्म समारम्भे ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्व दिशा में वराह अवतार हमारी रक्षा करें, आग्नेय दिशा में गरुड़ध्वज भगवान विष्णु रक्षा करें। दक्षिण दिशा में पद्मनाभ, नैऋत्य दिशा में मधुसूदन हमारी रक्षा करें। पश्चिम में गोविंद, वायव्य में जनार्दन तथा उत्तर दिशा में श्रीपति हमारी रक्षा करें और ईशान दिशा में महेश्वर रक्षा करें। ऊपर से धाता और नीचे से अनंत हमारी रक्षा करें। जो स्थान उल्लेखित न हों, उनकी भी ईश्वर रक्षा करें। जो भी भूत, विघ्नकर्ता या बाधा उत्पन्न करने वाली शक्तियाँ हों, वे शिव की आज्ञा से दूर हो जाएँ। सभी दिशाओं से पिशाच आदि बाधक शक्तियाँ हट जाएँ और यज्ञ एवं पूजा निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो।
भावार्थ
दिग्बन्धन रक्षा स्तोत्र का उद्देश्य पूजा-स्थल और साधक को सभी दिशाओं से आध्यात्मिक संरक्षण प्रदान करना है। सत्यनारायण पूजा में इस स्तोत्र का पाठ यह भाव स्थापित करता है कि भगवान विष्णु अपने विभिन्न नाम और स्वरूपों से संपूर्ण दिशाओं में व्याप्त होकर साधक की रक्षा कर रहे हैं। यहाँ प्रत्येक दिशा में विष्णु के किसी न किसी स्वरूप का स्मरण यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा सीमित नहीं, बल्कि सर्वव्यापक है। भूत, पिशाच और विघ्नकर्ता शक्तियों के निवारण का उल्लेख यह संकेत देता है कि बाधाएँ केवल बाहरी नहीं होतीं, बल्कि मन के भीतर उत्पन्न भय और अस्थिरता भी हो सकती हैं। इस स्तोत्र के माध्यम से साधक अपने मन और वातावरण दोनों को सुरक्षित और शुद्ध कर लेता है, जिससे सत्यनारायण पूजा एकाग्रता, श्रद्धा और निर्भय भाव के साथ सम्पन्न हो सके।
रक्षासूत्र
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
हिन्दी अर्थ
जिस रक्षासूत्र से महाबलशाली दानवेंद्र राजा बलि भी बंधे थे, उसी रक्षासूत्र से मैं तुम्हें बाँधता हूँ। हे रक्षासूत्र, तुम स्थिर रहो, डिगो नहीं और मेरी रक्षा करो।
भावार्थ
रक्षासूत्र के इस मंत्र में भगवान सत्यनारायण की संरक्षण शक्ति का स्मरण किया जाता है। राजा बलि का उदाहरण यह दर्शाता है कि ईश्वर की मर्यादा और नियम के सामने अपार शक्ति भी विनम्र हो जाती है। सत्यनारायण पूजा में रक्षासूत्र धारण करना साधक के लिए एक आध्यात्मिक कवच के समान है, जो उसे भय, अस्थिरता और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रखता है। यह सूत्र साधक को यह भी स्मरण कराता है कि रक्षा केवल बाहरी वस्तु से नहीं, बल्कि ईश्वर में अटूट विश्वास और धर्म के पालन से प्राप्त होती है। इस भाव के साथ रक्षासूत्र पूजा के संकल्प को स्थिर और सुरक्षित बनाए रखता है।
अखंड दीपक
भो दीप देव-रूपस्त्वं कर्मसाक्षि ह्यविघ्नकृत । यावत् कर्म-समाप्तिः स्यात् तावत् त्वं सुस्थिरो भवः॥
हिन्दी अर्थ
हे दीप, आप देवस्वरूप हैं और समस्त कर्मों के साक्षी हैं। आप विघ्नों को दूर करने वाले हैं। जब तक यह पूजा-कर्म पूर्ण न हो जाए, तब तक आप स्थिर रूप से प्रज्वलित रहें।
भावार्थ
अखंड दीपक का प्रज्वलन सत्यनारायण पूजा में निरंतरता और जागरूकता का प्रतीक है। दीप को देवस्वरूप और कर्मसाक्षी कहकर यह भाव स्थापित किया जाता है कि पूजा केवल मंत्रोच्चार नहीं, बल्कि सचेत और उत्तरदायी कर्म है। अखंड रूप से जलता हुआ दीप यह संकेत देता है कि साधक की श्रद्धा, एकाग्रता और सत्य के प्रति निष्ठा पूजा के आरंभ से अंत तक समान बनी रहे। सत्यनारायण पूजा में दीप का स्थिर रहना इस बात का प्रतीक है कि जब मन विचलित नहीं होता और भाव अखंड रहता है, तब ईश्वर की कृपा भी बिना बाधा के प्रवाहित होती है। यह दीप साधक को यह स्मरण कराता है कि सत्य और प्रकाश का मार्ग निरंतरता से ही फलदायी बनता है।
👉 कृपया क्रम से नीचे दिए गए चरणों का पालन करें। प्रत्येक चरण पर क्लिक करके पूजा विधि पढ़ें और करें।
- स्वस्तिवाचन एवं सङ्कल्प
- गौरी गणेश पूजा
- कलश पूजा
- नवग्रह पूजा
- पंचदेव पूजा
भगवान् श्रीसत्यनारायणाय ध्यान
ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
जो शांत स्वरूप वाले हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ है, जो देवताओं के भी स्वामी हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के आधार हैं, आकाश के समान व्यापक और मेघ के समान श्यामवर्ण तथा शुभ अंगों वाले हैं। जो लक्ष्मी के स्वामी हैं, कमल के समान नेत्रों वाले हैं और जिनका ध्यान योगीजन करते हैं—ऐसे संसार के भय को हरने वाले, समस्त लोकों के एकमात्र नाथ भगवान विष्णु का मैं वंदन करता हूँ। इस ध्यान के लिए मैं श्री सत्यनारायण भगवान को पुष्प अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
इस ध्यान मंत्र में भगवान सत्यनारायण को विष्णु के पूर्ण और शांत स्वरूप में स्मरण किया गया है। शान्ताकार और भुजगशयन रूप यह दर्शाता है कि भगवान सृष्टि के समस्त क्रियाकलापों के बीच भी पूर्णतः स्थिर और संतुलित हैं। पद्मनाभ और विश्वाधार रूप यह भाव स्थापित करता है कि सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और पालन सभी उन्हीं पर आधारित हैं। लक्ष्मीकान्त स्वरूप यह संकेत देता है कि जहाँ सत्य और धर्म होते हैं, वहीं स्थायी समृद्धि और सौभाग्य निवास करते हैं। योगियों द्वारा ध्यान किए जाने का उल्लेख यह दर्शाता है कि सत्यनारायण केवल गृहस्थों के आराध्य ही नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति के भी परम आधार हैं। इस ध्यान के माध्यम से साधक अपने मन को सांसारिक भय से मुक्त कर भगवान सत्यनारायण में स्थिर करता है, जिससे आगे की पूजा गहन श्रद्धा और एकाग्रता के साथ सम्पन्न हो सके।
आवाहन
ॐ आगच्छ भगवन् देव स्थाने चात्र स्थिरो भवः । यावत् पुजां करिष्यामि तावत् त्वं संनिधौ भवः ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे भगवन्, आप पधारिए और इस स्थान पर स्थिर होकर विराजमान हों। जब तक मैं यह पूजा करता रहूँ, तब तक आप यहाँ सन्निधि बनाए रखें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को आवाहन के लिए पुष्प अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
आवाहन मंत्र के माध्यम से साधक भगवान सत्यनारायण को श्रद्धापूर्वक अपने पूजन स्थल पर आमंत्रित करता है। इसका भाव यह है कि ईश्वर को किसी स्थान पर लाना नहीं, बल्कि अपने मन और कर्म में उनका साक्षात अनुभव करना है। सत्यनारायण पूजा में आवाहन यह संकेत देता है कि साधक पूजा के समय अपने समस्त सांसारिक विचारों को त्यागकर ईश्वर-सान्निध्य के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। पुष्प अर्पण के साथ किया गया यह आवाहन यह दर्शाता है कि जब मन पवित्र और भाव समर्पित होता है, तब ईश्वर की कृपा स्थिर रूप से साधक के जीवन में प्रवेश करती है और पूजा सार्थक बनती है।
आसन
अनेक रत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम् । भावितं स्वर्णिमं दिव्य मासनं प्रतिगृहताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, आसनार्थें पुष्पंणि समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे भगवान, अनेक रत्नों और मणियों से युक्त, स्वर्ण के समान दिव्य और पवित्र इस आसन को आप स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को आसन के लिए पुष्प अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
आसन अर्पण के इस मंत्र में साधक भगवान सत्यनारायण को सम्मानपूर्वक विराजमान होने का स्थान प्रदान करता है। इसका भाव यह है कि ईश्वर को केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया जा रहा है। सत्यनारायण पूजा में आसन का अर्पण यह संकेत देता है कि साधक अपने हृदय में भगवान को स्थायी रूप से स्थापित करने का संकल्प करता है। रत्नों और स्वर्ण का उल्लेख यह दर्शाता है कि ईश्वर को अर्पित किया गया स्थान भौतिक वैभव से नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान से दिव्य बनता है। इस भाव के साथ किया गया आसन अर्पण पूजा को स्थिरता, मर्यादा और पूर्णता प्रदान करता है।
प्रतिष्ठा
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च । अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः! सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम् ।
हिन्दी अर्थ
इस प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठित हों और इनमें दिव्य चेतना का प्रवाह हो। यह पूजित स्वरूप देवत्व को प्राप्त करे। हे श्री सत्यनारायण भगवान, आप यहाँ भली-भाँति प्रतिष्ठित होकर वर प्रदान करने वाले बनें।
भावार्थ
प्रतिष्ठा मंत्र के माध्यम से साधक भगवान सत्यनारायण की सजीव उपस्थिति का भाव स्थापित करता है। इसका आशय यह नहीं है कि ईश्वर कहीं से आकर मूर्ति में प्रवेश करते हैं, बल्कि यह कि साधक का मन उस स्वरूप में ईश्वर-चेतना को पूर्ण रूप से अनुभव करने लगता है। सत्यनारायण पूजा में प्रतिष्ठा का अर्थ है पूजा को औपचारिक कर्म से ऊपर उठाकर सजीव साधना में परिवर्तित करना। ‘सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्’ का भाव यह दर्शाता है कि जब पूजा श्रद्धा और सत्यभाव से की जाती है, तब भगवान केवल साक्षी नहीं रहते, बल्कि जीवन में मार्गदर्शक और कृपादाता बनकर प्रतिष्ठित होते हैं। इस प्रतिष्ठा के साथ साधक और ईश्वर के बीच भावात्मक संबंध दृढ़ होता है, जिससे आगे की पूजा अधिक फलदायी बनती है।
पाद्य
ॐ सर्वतीर्थसमुदभूतं पाद्यं गन्धादिभिर्युतम्। विघ्नराज ! गृहाणेमं भगवन् ! भक्तवत्सलः।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे भक्तवत्सल भगवान, समस्त तीर्थों से उत्पन्न, सुगंध आदि से युक्त यह पाद्य आप स्वीकार करें। हे विघ्नों का नाश करने वाले प्रभु, मैं श्री सत्यनारायण भगवान के चरणों में पाद्य अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
पाद्य अर्पण का भाव भगवान सत्यनारायण के चरणों में विनम्रता और कृतज्ञता व्यक्त करना है। चरणों की सेवा का अर्थ केवल अतिथि-सत्कार नहीं, बल्कि अपने अहंकार और दंभ को त्यागकर ईश्वर के समक्ष समर्पित होना है। सत्यनारायण पूजा में पाद्य यह संकेत देता है कि साधक अपने जीवन-पथ को भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है और उनसे मार्गदर्शन की कामना करता है। समस्त तीर्थों का उल्लेख यह दर्शाता है कि जहाँ सत्य और श्रद्धा होती है, वहीं तीर्थ का भाव स्वयं प्रकट हो जाता है। इस पाद्य अर्पण के साथ साधक यह स्वीकार करता है कि ईश्वर की कृपा से ही जीवन के विघ्न दूर होते हैं और कर्म शुद्ध दिशा प्राप्त करते हैं।
अर्घ्य
ॐ गंधपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्घ्यं सम्पादितं मया । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं प्रसन्नों वरदो भवः ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, हस्तयोर्घ्यं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे भगवान, मैंने गंध, पुष्प और अक्षत से युक्त यह अर्घ्य आपके लिए तैयार किया है। आप इसे स्वीकार करें, प्रसन्न हों और वर प्रदान करने वाले बनें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान के हाथों में अर्घ्य अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
अर्घ्य अर्पण के माध्यम से साधक भगवान सत्यनारायण के प्रति सम्मान, आदर और समर्पण प्रकट करता है। यह अर्पण उस भाव का प्रतीक है जिसमें भक्त ईश्वर को अपने कर्मों और साधनों का सर्वोत्तम अंश अर्पित करता है। सत्यनारायण पूजा में अर्घ्य का अर्थ यह है कि साधक अपने जीवन के कर्मफलों को भगवान के चरणों में समर्पित कर उनकी कृपा की कामना करता है। गंध, पुष्प और अक्षत यह संकेत देते हैं कि जब कर्म शुद्ध, भाव पवित्र और श्रद्धा स्थिर होती है, तब ईश्वर प्रसन्न होकर साधक के जीवन में मंगल और संतुलन प्रदान करते हैं।
आचमन
ॐ गंगाजल समानीतं सुवर्णकलशे स्थितं। आचम्यतां हृषीकेश त्रैलोक्यव्याधिनाशन ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, मुखे आचमनीयं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे हृषीकेश भगवान, त्रिलोक के रोगों का नाश करने वाले, सुवर्ण कलश में स्थित यह गंगाजल आप आचमन के रूप में स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान के मुख में आचमनीयं अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
इस आचमन मंत्र में गंगाजल के माध्यम से भगवान सत्यनारायण की शुद्धि और करुणा शक्ति का स्मरण किया गया है। गंगाजल यहाँ केवल जल नहीं, बल्कि पवित्रता, क्षमा और नवजीवन का प्रतीक है। सत्यनारायण पूजा में यह आचमन यह भाव स्थापित करता है कि साधक अपने विचार, वाणी और संकल्प को सत्य तथा सात्त्विकता से शुद्ध करना चाहता है। ‘त्रैलोक्यव्याधिनाशन’ का उल्लेख यह संकेत देता है कि ईश्वर की कृपा केवल शारीरिक रोगों तक सीमित नहीं, बल्कि मानसिक अशांति और आध्यात्मिक क्लेशों का भी शमन करती है। इस आचमन के साथ साधक पूजा के मध्य भी अपने भाव को शुद्ध और स्थिर बनाए रखने का संकल्प करता है, जिससे आगे की पूजा पूर्ण श्रद्धा और एकाग्रता के साथ सम्पन्न हो सके।
स्नान
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति, नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, स्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे भगवान, गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी—इन सभी पवित्र नदियों की पवित्रता इस जल में उपस्थित हो। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को स्नान अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
स्नान मंत्र में समस्त पवित्र नदियों का आवाहन यह दर्शाता है कि साधक भगवान सत्यनारायण को सर्वतीर्थमय स्वरूप में स्मरण कर रहा है। इसका भाव यह है कि ईश्वर की उपासना के लिए बाहरी तीर्थों की यात्रा आवश्यक नहीं, बल्कि श्रद्धा और सत्यभाव के साथ किया गया पूजन ही तीर्थ-समान हो जाता है। सत्यनारायण पूजा में स्नान का अर्थ केवल जल से शुद्धि नहीं, बल्कि जीवन में संचित क्लेश, अशांति और असंतुलन का परिमार्जन भी है। यह चरण साधक को यह बोध कराता है कि जैसे नदियाँ निरंतर प्रवाहित होकर स्वयं को शुद्ध रखती हैं, वैसे ही मनुष्य को भी सत्य और धर्म के मार्ग पर निरंतर प्रवाहित रहना चाहिए। इस स्नान अर्पण के साथ पूजा में सात्त्विकता और पवित्रता की स्थापना होती है।
दुग्धस्नान
कामधेनुसमुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम् । पावनं यज्ञहेतुश्च पयःस्नानार्थमर्पितम्
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, पयः स्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
कामधेनु से उत्पन्न, समस्त प्राणियों के जीवन का आधार, पवित्र और यज्ञ के लिए उपयोगी यह दूध स्नान के रूप में अर्पित किया जाता है। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को दुग्धस्नान अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
दुग्धस्नान में दूध को जीवन, पोषण और शुद्धता का प्रतीक माना गया है। सत्यनारायण पूजा में यह स्नान भगवान विष्णु के पालनकर्ता स्वरूप का स्मरण कराता है, जो समस्त सृष्टि का पोषण करते हैं। दूध की श्वेतता यह संकेत देती है कि साधक अपने मन और कर्म को निर्मल तथा निष्कपट बनाना चाहता है। यह अर्पण यह भाव स्थापित करता है कि जैसे दूध सभी को जीवन देता है, वैसे ही सत्यनारायण की कृपा साधक के जीवन में संतुलन, शांति और स्थायित्व प्रदान करती है। दुग्धस्नान के साथ पूजा में करुणा, पोषण और सात्त्विकता के गुणों का आवाहन होता है।
दधिस्नान
पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम् । दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, दधिस्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
दूध से उत्पन्न, मधुर और अम्ल स्वाद वाला, चंद्रमा के समान उज्ज्वल यह दही मैं स्नान के लिए अर्पित करता हूँ। हे देव, आप इसे स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को दधिस्नान समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
दधिस्नान में दही को स्थिरता, पुष्टि और संतुलन का प्रतीक माना गया है। सत्यनारायण पूजा में यह स्नान यह भाव स्थापित करता है कि साधक अपने जीवन में चंचलता के स्थान पर स्थायित्व और संयम चाहता है। दही का स्वरूप यह दर्शाता है कि जैसे दूध परिवर्तन के बाद भी पोषण प्रदान करता है, वैसे ही जीवन के अनुभव और परिवर्तन अंततः साधक को परिपक्वता और संतुलन की ओर ले जाते हैं। यह स्नान भगवान विष्णु के पालनकारी स्वरूप से जुड़कर यह संकेत देता है कि सत्यनारायण की कृपा से जीवन में स्थिर सुख और मानसिक दृढ़ता प्राप्त होती है।
घृतस्नान
नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम् ॥ घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, घृतस्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
नवनीत से उत्पन्न, समस्त संतोष प्रदान करने वाला यह घृत मैं स्नान के लिए अर्पित करता हूँ। हे भगवान, आप इसे स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को घृतस्नान समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
घृतस्नान में घी को तेज, पुष्टि और आंतरिक संतोष का प्रतीक माना गया है। सत्यनारायण पूजा में यह स्नान भगवान विष्णु के ऐश्वर्य और तेजस्वी स्वरूप का स्मरण कराता है। घृत यज्ञ का प्रधान तत्त्व है, जो यह संकेत देता है कि साधक अपने जीवन की ऊर्जा और सामर्थ्य को ईश्वर के चरणों में अर्पित कर रहा है। यह स्नान यह भाव स्थापित करता है कि सत्यनारायण की कृपा से जीवन में केवल भौतिक समृद्धि ही नहीं, बल्कि मानसिक तृप्ति और आंतरिक संतुलन भी प्राप्त होता है। घृतस्नान साधक को यह स्मरण कराता है कि सच्चा संतोष बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि ईश्वर-समर्पण से उत्पन्न होता है।
मधुस्नान
पुष्परेणुसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु । तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, मधुस्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
पुष्पों के रस से उत्पन्न, अत्यंत मधुर और स्वादिष्ट, तेज और पुष्टि प्रदान करने वाला यह दिव्य मधु स्नान के लिए स्वीकार किया जाए। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को मधुस्नान अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
मधुस्नान में मधु को मधुरता, आनंद और जीवन-रस का प्रतीक माना गया है। सत्यनारायण पूजा में यह स्नान यह भाव स्थापित करता है कि साधक अपने जीवन को कटुता और कठोरता से मुक्त कर मधुर और संतुलित बनाना चाहता है। मधु का तेजस्वी और पुष्टिकर स्वरूप यह दर्शाता है कि सत्यनारायण की कृपा से जीवन में आनंद के साथ शक्ति और उत्साह भी प्राप्त होता है। यह स्नान यह स्मरण कराता है कि जब कर्म, वाणी और व्यवहार में मधुरता होती है, तब ईश्वर की कृपा सहज रूप से साधक के जीवन में प्रवाहित होती है।
शर्करास्नान
इक्षुरससमुद्भूतां शर्करां पुष्टिदां शुभाम् । मलापहारिकां दिव्यां स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, शर्करास्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
ईख के रस से उत्पन्न, पुष्टिदायक, शुभ और मलिनता को दूर करने वाली यह दिव्य शर्करा स्नान के लिए स्वीकार की जाए। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को शर्करास्नान अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
शर्करास्नान में शर्करा को शुद्धता, सरलता और शुभता का प्रतीक माना गया है। सत्यनारायण पूजा में यह स्नान यह भाव स्थापित करता है कि साधक अपने जीवन से कटुता, कठोरता और अशुद्धि को दूर कर मधुर और पवित्र आचरण अपनाना चाहता है। शर्करा का मलापहारिक गुण यह संकेत देता है कि सत्यनारायण की कृपा से न केवल बाहरी अशुद्धियाँ, बल्कि मन में संचित नकारात्मक भाव भी दूर होते हैं। यह स्नान साधक को यह स्मरण कराता है कि जब जीवन में सरलता और मधुरता आती है, तब ईश्वर की कृपा सहज रूप से स्थिर हो जाती है और पूजा का फल अधिक प्रभावशाली बनता है।
पञ्चामृतस्नान
पञ्चामृतं मयानीतं पयो दधि घृतं मधु । शर्करया समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
दूध, दही, घृत, मधु और शर्करा से युक्त यह पञ्चामृत स्नान के लिए अर्पित किया जाता है। हे भगवान, आप इसे स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को पञ्चामृतस्नान समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
पञ्चामृतस्नान में पाँचों द्रव्यों का संयुक्त अर्पण जीवन के संतुलन और पूर्णता का प्रतीक है। सत्यनारायण पूजा में यह स्नान यह भाव स्थापित करता है कि साधक अपने जीवन के सभी पक्ष—शरीर, मन, बुद्धि, भाव और कर्म—ईश्वर को समर्पित कर रहा है। दूध, दही, घृत, मधु और शर्करा क्रमशः शुद्धता, स्थिरता, तेज, मधुरता और सरलता का संकेत देते हैं। इस समन्वय के माध्यम से साधक यह कामना करता है कि सत्यनारायण की कृपा से उसका जीवन संतुलित, सात्त्विक और मंगलमय बने। पञ्चामृतस्नान यह स्मरण कराता है कि जब जीवन के विविध तत्व एकसाथ समर्पित होते हैं, तभी पूर्ण शांति और तृप्ति की अनुभूति होती है।
गन्धोदकस्नान
मलयाचलसम्भूतचन्दनेन विनिःसृतम् ।इदं गन्धोदकस्नानं कुङ्कुमाक्तं च गृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, गन्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
मलयाचल से उत्पन्न चंदन से युक्त, कुंकुम से सुशोभित यह गंधोदक स्नान के लिए स्वीकार किया जाए। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को गंधोदकस्नान अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
गंधोदकस्नान में सुगंधित जल को शांति, सौम्यता और मानसिक प्रसन्नता का प्रतीक माना गया है। सत्यनारायण पूजा में यह स्नान यह भाव स्थापित करता है कि साधक अपने मन और वातावरण को पवित्र तथा सात्त्विक बनाना चाहता है। चंदन और कुंकुम का प्रयोग यह दर्शाता है कि पूजा केवल विधि नहीं, बल्कि सौंदर्य, शुद्धता और श्रद्धा का समन्वय है। यह स्नान यह स्मरण कराता है कि जब विचार और वातावरण दोनों शुद्ध होते हैं, तब सत्यनारायण की कृपा सहज रूप से स्थिर होती है और साधक के जीवन में शांति तथा संतुलन का विस्तार होता है।
शुद्धोदकस्नान
ॐ मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरं शुभम्। तदिदं कल्पितं देव ! स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
मन्दाकिनी (गंगा) का जो पवित्र जल समस्त पापों को हरने वाला और मंगलकारी है, वही यह जल स्नान के लिए अर्पित किया गया है। हे देव, आप इसे स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को शुद्धोदकस्नान अर्पित करता हूँ और स्नान के पश्चात आचमनीयं जल समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
शुद्धोदकस्नान के माध्यम से साधक समस्त अभिषेक कर्मों का समापन शुद्ध और सरल जल से करता है। सत्यनारायण पूजा में इसका भाव यह है कि अंततः ईश्वर को भौतिक द्रव्यों से नहीं, बल्कि शुद्ध भाव और सरल समर्पण से प्रसन्न किया जाता है। मन्दाकिनी जल का स्मरण यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा पाप, दोष और अशुद्धियों का शमन कर मन को पुनः स्वच्छ और स्थिर बना देती है। स्नान के पश्चात आचमन यह संकेत देता है कि साधक केवल भगवान के स्वरूप को ही नहीं, बल्कि स्वयं को भी सात्त्विक और संयमित अवस्था में स्थापित करता है। इस शुद्धोदकस्नान के साथ पूजा एक शुद्ध, संतुलित और पूर्ण भाव में आगे बढ़ती है।
वस्त्र
शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम् । देहालङ्करणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, वस्त्रं च उपवस्त्रं समर्पयामि । वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
वस्त्र शीत, वायु और उष्णता से रक्षा करने वाले, लज्जा की रक्षा करने वाले तथा शरीर को सुशोभित करने वाले होते हैं। हे भगवान, इन वस्त्रों के अर्पण से मुझे शांति प्रदान करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को वस्त्र और उपवस्त्र समर्पित करता हूँ तथा अंत में आचमनीयं जल अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
वस्त्र अर्पण का भाव भगवान सत्यनारायण के प्रति सम्मान और मर्यादा की अभिव्यक्ति है। सत्यनारायण पूजा में वस्त्र केवल सजावट का साधन नहीं, बल्कि शालीनता, संयम और धर्म की रक्षा का प्रतीक हैं। यह अर्पण यह संकेत देता है कि साधक अपने जीवन में भी मर्यादा और संतुलन को धारण करने का संकल्प करता है। वस्त्रान्ते आचमन यह दर्शाता है कि बाहरी सम्मान के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि भी आवश्यक है। इस भाव के साथ किया गया वस्त्र अर्पण पूजा में स्थिरता, शांति और सौम्यता की स्थापना करता है।
यज्ञोपवीत
नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम् । उपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि । यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
नौ तन्तुओं से युक्त, तीन गुणों से युक्त और देवस्वरूप यह यज्ञोपवीत मैंने अर्पित किया है। हे परमेश्वर, आप इसे स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को यज्ञोपवीत समर्पित करता हूँ तथा अंत में आचमनीयं जल अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
यज्ञोपवीत अर्पण साधक के लिए धर्म, अनुशासन और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। सत्यनारायण पूजा में इसका भाव यह है कि साधक अपने जीवन को सात्त्विक आचरण, संयम और कर्तव्यबोध से जोड़ना चाहता है। त्रिगुण का उल्लेख यह संकेत देता है कि साधक अपने भीतर सत्त्व को जाग्रत कर रज और तम के असंतुलन को नियंत्रित करने का संकल्प करता है। यज्ञोपवीतान्ते आचमन यह स्मरण कराता है कि बाहरी प्रतीकों के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि और विनम्रता भी आवश्यक है। इस अर्पण के माध्यम से साधक सत्यनारायण के समक्ष अपने जीवन को धर्मपथ पर समर्पित करता है, जिससे पूजा अधिक अर्थपूर्ण और फलदायी बनती है।
चन्दन
श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।विलेपनं सुरश्रेष्ठ! चन्दनं चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, चन्दनानुलेपनं समर्पयामि।
हिन्दी अर्थ
दिव्य, सुगंध से परिपूर्ण और मन को प्रसन्न करने वाला श्रीखण्ड चंदन—हे देवश्रेष्ठ, इस चंदन लेपन को स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को चंदन का लेपन अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
चंदन लेपन का भाव शांति, शीतलता और पवित्रता की स्थापना करना है। सत्यनारायण पूजा में चंदन भगवान विष्णु के सौम्य और संतुलित स्वरूप का प्रतीक है। इसकी शीतलता यह संकेत देती है कि साधक अपने मन के विकार, क्रोध और अशांति को शांत कर सत्य और संयम के मार्ग पर चलना चाहता है। सुगंध का उल्लेख यह दर्शाता है कि जब विचार शुद्ध और भाव मधुर होते हैं, तब साधक का आचरण भी सुगंध की भाँति चारों ओर शुभ प्रभाव फैलाता है। इस चंदनानुलेपन के साथ पूजा में सौम्यता, स्थिरता और सात्त्विक भाव की स्थापना होती है।
अक्षत (तिल)
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुङ्कुमाक्ता: सुशोभिताः । मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, अक्षतान् समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे देवश्रेष्ठ, कुंकुम से सुशोभित, अखंड और पवित्र अक्षत मैंने भक्तिभाव से अर्पित किए हैं। हे परमेश्वर, आप इन्हें स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को अक्षत समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
अक्षत अर्पण का भाव अखंडता, समृद्धि और शुभ संकल्प का प्रतीक है। सत्यनारायण पूजा में अक्षत यह दर्शाते हैं कि साधक अपने संकल्प को खंडित न होने देने की कामना करता है। कुंकुम से युक्त अक्षत शुभता और मंगल का संकेत देते हैं, जो यह बताते हैं कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने से जीवन में स्थिर समृद्धि प्राप्त होती है। इस अर्पण के माध्यम से साधक भगवान सत्यनारायण के समक्ष अपने कर्मों और इच्छाओं को पवित्र भाव से प्रस्तुत करता है, जिससे पूजा में निरंतरता और विश्वास की स्थापना होती है।
पुष्पमाला
माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो । मयाहृतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, पुष्पमालां समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे प्रभु, सुगंधित पुष्पों से बनी यह माला, जो मैंने पूजा के लिए लाई है, आप स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को पुष्पमाला अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
पुष्पमाला अर्पण का भाव प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की अभिव्यक्ति है। सत्यनारायण पूजा में पुष्पों की सुगंध यह दर्शाती है कि साधक के विचार और भाव पवित्र तथा प्रसन्न हों। पुष्पमाला का आकार यह संकेत देता है कि जैसे अनेक पुष्प एक सूत्र में बंधकर सुंदर बनते हैं, वैसे ही जीवन के विविध कर्म और अनुभव जब सत्य और भक्ति से जुड़ते हैं, तब वे मंगलमय बन जाते हैं। इस अर्पण के माध्यम से साधक भगवान सत्यनारायण के प्रति अपने हृदय के भावों को साकार रूप देता है, जिससे पूजा में प्रेम और सौम्यता की स्थापना होती है।
तुलसी
ॐ तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम् । भवमोक्षप्रदां तुभ्यमर्पयामि हरिप्रियाम्
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, एतानि तुलसीदलानि समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे हरिप्रिये तुलसी, आप स्वर्ण और रत्न के समान मूल्यवान हैं तथा भवबंधन से मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। मैं आपको भगवान के चरणों में अर्पित करता हूँ। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को ये तुलसी दल अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
तुलसी अर्पण का भाव भगवान सत्यनारायण के प्रति शुद्ध और निष्काम भक्ति की अभिव्यक्ति है। तुलसी को हरि की अत्यंत प्रिय माना गया है, इसलिए इसके अर्पण से पूजा को विशेष स्वीकार्यता प्राप्त होती है। सत्यनारायण पूजा में तुलसी यह संकेत देती है कि साधक भौतिक लाभ से ऊपर उठकर आत्मिक शुद्धि और मोक्ष की कामना करता है। भवमोक्षप्रदा शब्द यह स्मरण कराता है कि सत्य और भक्ति के मार्ग पर चलने से संसार के बंधन शिथिल होते हैं। इस अर्पण के साथ साधक अपने जीवन को भगवान विष्णु के चरणों में समर्पित कर देता है, जिससे पूजा का भाव और अधिक गहन हो जाता है।
दूर्वा
दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान् । आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हरे-भरे, अमृत के समान गुणों वाले और मंगल प्रदान करने वाले दूर्वा अंकुर मैं आपकी पूजा के लिए लाया हूँ। हे प्रभु, आप इन्हें स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को दूर्वा अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
दूर्वा अर्पण का भाव जीवन में निरंतरता, शांति और मंगल की कामना से जुड़ा है। दूर्वा सदैव हरी-भरी रहने वाली घास है, जो यह संकेत देती है कि साधक अपने जीवन में भी स्थिरता और नित्य शुभता चाहता है। सत्यनारायण पूजा में दूर्वा का अर्पण यह भाव स्थापित करता है कि भगवान की कृपा से जीवन में बाधाएँ शांत हों और मंगल निरंतर बना रहे। अमृत समान गुण का उल्लेख यह दर्शाता है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने से जीवन में दीर्घकालिक सुख और संतुलन प्राप्त होता है। इस अर्पण के साथ साधक भगवान सत्यनारायण से अपने जीवन में शांति और समृद्धि की निरंतरता की प्रार्थना करता है।
शमीपत्र
ॐ शमी शमय मे पापं शमी लोहितकंटका। धारिण्यर्जुनबाणानां रामस्य प्रियवादिनी।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, इदं शमीपत्रं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे शमी, आप मेरे पापों का शमन करें। आप तीक्ष्ण कांटों वाली हैं, अर्जुन के बाणों को धारण करने वाली तथा भगवान राम को प्रिय हैं। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को यह शमीपत्र अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
शमीपत्र अर्पण का भाव पापशमन, साहस और संरक्षण से जुड़ा है। शमी का स्मरण यहाँ इस अर्थ में किया गया है कि जैसे यह वृक्ष कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर रहता है, वैसे ही साधक अपने जीवन में धर्म और सत्य के मार्ग पर अडिग बना रहे। सत्यनारायण पूजा में शमीपत्र का अर्पण यह संकेत देता है कि साधक अपने पूर्वकृत दोषों और नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति की कामना करता है। अर्जुन और भगवान राम से जुड़ा उल्लेख यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा से साहस, विवेक और धर्मबल प्राप्त होता है। इस अर्पण के साथ साधक भगवान सत्यनारायण से यह प्रार्थना करता है कि उसका जीवन पापरहित, निर्भय और सत्यनिष्ठ बना रहे।
आभूषण
ॐ वज्रमाणिक्यवैदूर्यमुक्ताविद्रुममण्डितम् । पुष्परागसमायुक्तं भूषणं प्रतिगृह्यताम् ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः,आभूषणानि समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
वज्र, माणिक्य, वैदूर्य, मोती, विद्रुम और पुष्पराग से अलंकृत ये आभूषण आप स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को आभूषण अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
आभूषण अर्पण का भाव भगवान सत्यनारायण के दिव्य ऐश्वर्य और सौंदर्य का सम्मान करना है। सत्यनारायण पूजा में आभूषण यह संकेत देते हैं कि ईश्वर समस्त गुणों और वैभव के अधिष्ठाता हैं, और उनका स्मरण जीवन में गरिमा तथा संतुलन लाता है। विभिन्न रत्नों का उल्लेख यह दर्शाता है कि जैसे अनेक गुण मिलकर आभूषण को पूर्ण बनाते हैं, वैसे ही सत्य, धर्म और श्रद्धा के समन्वय से जीवन सार्थक होता है। इस अर्पण के माध्यम से साधक यह स्वीकार करता है कि वास्तविक शोभा बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि ईश्वर-स्मरण से उत्पन्न आंतरिक दिव्यता में निहित है।
सुगन्धिद्रव्य
दिव्यगन्धसमायुक्तं महापरिमलाद्भुतम् । गन्धद्रव्यमिदं भक्त्या दत्तं वै परिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
दिव्य सुगंध से युक्त, अत्यंत मनोहर और श्रेष्ठ परिमल वाला यह गंधद्रव्य मैंने भक्तिभाव से अर्पित किया है। हे भगवान, आप इसे स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को सुगंधिद्रव्य अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
सुगंधिद्रव्य अर्पण का भाव पूजा में पवित्रता, सौम्यता और प्रसन्नता की स्थापना करना है। सत्यनारायण पूजा में सुगंध यह संकेत देती है कि जैसे सुगंध अदृश्य होते हुए भी वातावरण को प्रभावित करती है, वैसे ही शुद्ध भाव और सत्यनिष्ठ आचरण जीवन को सूक्ष्म रूप से मंगलमय बनाते हैं। यह अर्पण यह स्मरण कराता है कि ईश्वर को भौतिक वस्तु से अधिक भाव की सुगंध प्रिय होती है। जब मन निर्मल और श्रद्धा स्थिर होती है, तब साधक का जीवन भी सुगंध की भाँति समाज और परिवार में शुभ प्रभाव फैलाता है।
अबीर-गुलाल आदि नाना परिमल द्रव्य
अबीरं च गुलालं च हरिद्रादिसमन्वितम् । नाना परिमलं द्रव्यं गृहाण परमेश्वर ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि।
हिन्दी अर्थ
हे परमेश्वर, अबीर, गुलाल, हरिद्रा आदि से युक्त ये विविध सुगंधित द्रव्य आप स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को नाना प्रकार के परिमल द्रव्य अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
अबीर-गुलाल आदि परिमल द्रव्यों का अर्पण पूजा में आनंद, उल्लास और प्रसन्नता के भाव को प्रकट करता है। सत्यनारायण पूजा में इन द्रव्यों का प्रयोग यह संकेत देता है कि भक्ति केवल गंभीरता तक सीमित नहीं, बल्कि उसमें हर्ष, संतोष और कृतज्ञता का भाव भी निहित है। विविध परिमलों का उल्लेख यह दर्शाता है कि साधक अपने जीवन के सभी रंग—सुख, अनुभव और भाव—ईश्वर को समर्पित कर रहा है। इस अर्पण के साथ साधक यह कामना करता है कि सत्यनारायण की कृपा से उसका जीवन भी सौम्य, मंगलमय और प्रसन्नता से परिपूर्ण बना रहे।
धूप
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः। आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, धूपमाघ्रापयामि ।
हिन्दी अर्थ
वनस्पतियों के रस से उत्पन्न, उत्तम और सुगंध से युक्त यह धूप समस्त देवताओं के लिए ग्राह्य है। हे भगवान, आप इस धूप को स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को धूप अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
धूप अर्पण का भाव वातावरण की शुद्धि और नकारात्मकता के शमन से जुड़ा है। सत्यनारायण पूजा में धूप का धुआँ यह संकेत देता है कि जैसे सुगंध चारों दिशाओं में फैलती है, वैसे ही साधक की श्रद्धा और सत्यभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रसारित हों। वनस्पति रस से उत्पन्न धूप यह स्मरण कराती है कि प्रकृति भी ईश्वर-उपासना में सहभागी है। इस अर्पण के माध्यम से साधक यह कामना करता है कि भगवान सत्यनारायण की कृपा से उसके जीवन से अशांति और बाधाएँ दूर हों और वातावरण सात्त्विक तथा शांत बना रहे।
दीप
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया । दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥ भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने ।
त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, दीपं दर्शयामि ।
हिन्दी अर्थ
घृत और बाती से युक्त, अग्नि से प्रज्वलित यह दीप मैं अर्पित करता हूँ। हे देवेश, आप इस दीप को स्वीकार करें, जो त्रिलोक के अंधकार को दूर करने वाला है। भक्तिभाव से मैं यह दीप परमात्मा को समर्पित करता हूँ। हे दीपज्योति, मुझे भयंकर अंधकार और दुःख से मुक्त करें—आपको नमस्कार है। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को दीप प्रदर्शित करता हूँ।
भावार्थ
दीप अर्पण का भाव ज्ञान, विवेक और सत्य के प्रकाश से जुड़ा है। सत्यनारायण पूजा में दीप अज्ञान, भय और मोह के अंधकार को दूर करने का प्रतीक है। घृत और अग्नि का संयोजन यह दर्शाता है कि जब ऊर्जा और प्रयास सही दिशा में लगाए जाते हैं, तब प्रकाश उत्पन्न होता है। ‘त्रैलोक्यतिमिरापहम्’ का अर्थ यह संकेत देता है कि सत्य और धर्म का प्रकाश केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समस्त वातावरण को आलोकित करता है। इस दीप दर्शन के साथ साधक यह कामना करता है कि भगवान सत्यनारायण का ज्ञान-प्रकाश उसके जीवन को मार्गदर्शन, साहस और स्थिरता प्रदान करे।
हस्तप्रक्षालन
ॐ हृषीकेशाय नमः
नैवेद्य
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्मेव समर्पये । गृहाण सुमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, नैवेद्यं निवेदयामि । नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे गोविंद, यह समस्त वस्तुएँ आपकी ही हैं, मैं इन्हें आपको ही समर्पित करता हूँ। आप प्रसन्न होकर इन्हें स्वीकार करें। हे परमेश्वर, कृपा करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को नैवेद्य अर्पित करता हूँ और अंत में आचमनीयं जल समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
नैवेद्य अर्पण का भाव पूर्ण समर्पण और कृतज्ञता का प्रतीक है। सत्यनारायण पूजा में यह अर्पण यह स्मरण कराता है कि जो कुछ भी हमारे पास है, वह ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त है। भोजन को भगवान को अर्पित करना यह दर्शाता है कि साधक अपने भोग को त्यागकर उसे प्रसाद रूप में स्वीकार करना चाहता है। नैवेद्यान्ते आचमन यह संकेत देता है कि भोग के बाद भी संयम और शुद्धि बनाए रखना आवश्यक है। इस अर्पण के साथ साधक भगवान सत्यनारायण से यह प्रार्थना करता है कि उसका जीवन भी इसी प्रकार संतुलित, कृतज्ञ और सत्यनिष्ठ बना रहे।
ऋतुफल
इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव । तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, ऋतुफलानि समर्पयामि। फलान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
हे देव, यह फल मैंने आपके समक्ष अर्पित किया है। इसके फलस्वरूप मुझे जन्म-जन्म में सफलता की प्राप्ति हो। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को ऋतु के अनुसार फल अर्पित करता हूँ और अंत में आचमनीयं जल समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
ऋतुफल अर्पण का भाव प्रकृति के साथ सामंजस्य और कृतज्ञता को प्रकट करता है। सत्यनारायण पूजा में ऋतु के अनुसार फल अर्पित करना यह दर्शाता है कि साधक प्रकृति द्वारा प्रदत्त वरदानों को ईश्वर को समर्पित कर रहा है। फल का प्रतीक यह भी है कि जैसे वृक्ष अपने समय पर फल देता है, वैसे ही सत्य और धर्म के मार्ग पर किए गए कर्म भी समय आने पर शुभ फल प्रदान करते हैं। फलान्ते आचमन यह स्मरण कराता है कि सफलता के बाद भी विनम्रता और शुद्ध भाव बनाए रखना आवश्यक है। इस अर्पण के साथ साधक भगवान सत्यनारायण से यह कामना करता है कि उसका जीवन सदैव सत्कर्मों के शुभ फलों से सम्पन्न रहे।
ताम्बूल
पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् । एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, मुखवासार्थम् एलालवंग - पूगीफलसहितं ताम्बूलं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
पूगीफल (सुपारी) से युक्त, नागवल्ली के पत्तों से आवृत और इलायची आदि चूर्ण से संयुक्त यह दिव्य ताम्बूल आप स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को मुखवास के लिए ताम्बूल अर्पित करता हूँ।
भावार्थ
ताम्बूल अर्पण का भाव पूजा की पूर्णता और संतोष की अभिव्यक्ति है। सत्यनारायण पूजा में ताम्बूल मुख की शुद्धि और प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। यह अर्पण यह संकेत देता है कि साधक पूजा के समापन पर भी आदर, मर्यादा और संतुलन बनाए रखता है। ताम्बूल में प्रयुक्त विविध द्रव्यों का संयोजन यह दर्शाता है कि जीवन की पूर्णता विविध अनुभवों के समन्वय से प्राप्त होती है। इस अर्पण के साथ साधक भगवान सत्यनारायण से यह कामना करता है कि उसकी वाणी, आचरण और व्यवहार सदैव शुद्ध, मधुर और मंगलमय बने रहें।
दक्षिणा
हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः । अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे ॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, कृताया: पूजायाः साद्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि।
हिन्दी अर्थ
अग्नि से उत्पन्न, हिरण्यगर्भ में स्थित, स्वर्ण के समान तेजस्वी यह द्रव्य दक्षिणा रूप में अर्पित की जाती है, जो अनंत पुण्य फल प्रदान करने वाली है। हे भगवान, इसके द्वारा मुझे शांति प्रदान करें। मैं की गई पूजा की पूर्णता और सद्गुणों की वृद्धि के लिए श्री सत्यनारायण भगवान को द्रव्य दक्षिणा समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
दक्षिणा अर्पण का भाव कृतज्ञता, विनम्रता और उत्तरदायित्व से जुड़ा है। सत्यनारायण पूजा में दक्षिणा केवल द्रव्य अर्पण नहीं, बल्कि यह स्वीकारोक्ति है कि साधक ने जो भी ज्ञान, साधन और सामर्थ्य प्राप्त की है, वह ईश्वर की कृपा से ही संभव हुई है। यह अर्पण यह दर्शाता है कि पूजा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सद्गुणों की वृद्धि और धर्म के प्रति निष्ठा है। ‘अनन्तपुण्यफलदम्’ का भाव यह संकेत देता है कि जब कर्म निष्काम और सत्यभाव से किए जाते हैं, तब उनका फल भी दीर्घकालिक और मंगलमय होता है। इस दक्षिणा के साथ साधक भगवान सत्यनारायण से जीवन में शांति, संतुलन और धर्मबुद्धि की प्रार्थना करता है।
प्रार्थना
सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्। सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥
हिन्दी अर्थ
शंख और चक्र धारण किए हुए, मुकुट और कुंडलों से सुशोभित, पीत वस्त्र पहने हुए, कमल के समान नेत्रों वाले, हार से युक्त वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि से विभूषित, चार भुजाओं वाले भगवान विष्णु को मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ।
भावार्थ
इस प्रार्थना में भगवान सत्यनारायण को विष्णु के पूर्ण ऐश्वर्य और संरक्षण स्वरूप में नमन किया गया है। शंख और चक्र धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के प्रतीक हैं, जबकि पीत वस्त्र सात्त्विकता और प्रकाश का संकेत देते हैं। कमलनयन स्वरूप यह दर्शाता है कि भगवान की दृष्टि करुणा और समत्व से युक्त है। वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि का उल्लेख यह स्मरण कराता है कि दिव्यता और सौंदर्य ईश्वर के गुणों में स्वाभाविक रूप से निहित हैं। इस प्रार्थना के माध्यम से साधक अहंकार को त्यागकर भगवान सत्यनारायण के चरणों में पूर्ण विनम्रता के साथ समर्पित होता है, जिससे पूजा का समापन श्रद्धा, संतुलन और शांति के भाव से सम्पन्न हो।
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- सत्यनारायण कथा
- सत्यनारायण जी की आरती
पुष्पाञ्जलि
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च । पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर ||
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः, पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ।
हिन्दी अर्थ
विभिन्न प्रकार के सुगंधित और समयानुसार उत्पन्न पुष्पों की यह अंजलि मैंने अर्पित की है। हे परमेश्वर, आप इसे स्वीकार करें। मैं श्री सत्यनारायण भगवान को पुष्पाञ्जलि समर्पित करता हूँ।
भावार्थ
पुष्पाञ्जलि अर्पण पूजा के समापन से पूर्व कृतज्ञता और समर्पण का भाव प्रकट करता है। सत्यनारायण पूजा में यह अंजलि यह संकेत देती है कि साधक ने अपने मन, कर्म और भाव—तीनों को भगवान के चरणों में अर्पित कर दिया है। विविध पुष्प जीवन के विविध अनुभवों का प्रतीक हैं, जिन्हें साधक बिना भेदभाव ईश्वर को समर्पित करता है। इस अर्पण के माध्यम से साधक यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन के प्रत्येक शुभ कर्म और मंगल अवसर भगवान सत्यनारायण की कृपा से ही संभव हुए हैं। पुष्पाञ्जलि के साथ पूजा श्रद्धा, संतोष और आंतरिक शांति के भाव में पूर्ण होती है।
क्षमा प्रार्थना
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
हिन्दी अर्थ
हे पुरुषोत्तम, मुझसे दिन-रात असंख्य अपराध होते रहते हैं। मुझे अपना दास समझकर मेरे सभी अपराधों को क्षमा करें।
हे जनार्दन, यदि मेरी पूजा में मंत्र, विधि या भक्ति की कोई कमी रह गई हो, तो हे देव, आप उसे पूर्ण मानकर स्वीकार करें।
भावार्थ
क्षमा प्रार्थना सत्यनारायण पूजा का अत्यंत महत्वपूर्ण और विनम्र चरण है। इसके माध्यम से साधक यह स्वीकार करता है कि पूजा केवल शास्त्रीय शुद्धता से नहीं, बल्कि ईमानदार भाव से पूर्ण होती है। यहाँ स्वयं को दास कहकर संबोधित करना अहंकार के त्याग और पूर्ण शरणागति का प्रतीक है। सत्यनारायण पूजा में यह प्रार्थना यह भाव स्थापित करती है कि मानव सीमित है और त्रुटियाँ स्वाभाविक हैं, किंतु ईश्वर की करुणा असीम है। मंत्र, विधि या भक्ति में कमी होने पर भी यदि भाव शुद्ध है, तो भगवान सत्यनारायण उसे स्वीकार करते हैं। इस क्षमा याचना के साथ साधक अपने मन को हल्का कर, पूर्ण विश्वास और शांति के भाव से पूजा का समापन करता है।
नमस्कार
नमस्ते नारायण देव नमस्ते भक्तवत्सल।
त्राहि मां भवसागरात् संसारार्णवपातितम्॥
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥
विसर्जन
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय पार्थिवीम्।
इष्टकामप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥
गच्छ गच्छ परं स्थानं स्वस्थानं परमेश्वर।
पूजाकाले पुनरागच्छ यावत् तिष्ठ सुखं मम॥
हिन्दी अर्थ
हे नारायण देव, भक्तों पर स्नेह रखने वाले प्रभु, आपको नमस्कार है। मुझे इस संसाररूपी सागर से उबारिए, जिसमें मैं गिर पड़ा हूँ।
ब्राह्मणों और धर्म की रक्षा करने वाले, गौ और ब्राह्मणों के हितैषी, समस्त जगत के कल्याणकर्ता भगवान कृष्ण, गोविंद—आपको बार-बार नमस्कार है।
भावार्थ
नमस्कार मंत्र के माध्यम से साधक भगवान सत्यनारायण के चरणों में पूर्ण शरणागति प्रकट करता है। संसार को भवसागर और संसारार्णव कहकर यह भाव व्यक्त किया गया है कि जीवन के दुःख, मोह और अस्थिरता से मुक्ति केवल ईश्वर की कृपा से ही संभव है। भक्तवत्सल का संबोधन यह स्मरण कराता है कि भगवान अपने भक्तों की पुकार को कभी अनसुना नहीं करते। ब्रह्मण्यदेव और गोब्राह्मणहिताय जैसे विशेषण यह दर्शाते हैं कि सत्यनारायण धर्म, मर्यादा और समाज के कल्याण के अधिष्ठाता हैं। इस नमस्कार के साथ साधक अहंकार, भय और आसक्ति को त्यागकर भगवान के चरणों में स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर देता है, जिससे पूजा का समापन गहन विश्वास और आंतरिक शांति के भाव में होता है।
शान्ति पाठ
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
हिन्दी अर्थ
सभी लोग सुखी हों, सभी निरोग हों। सभी मंगलमय दृश्य देखें और कोई भी दुःखी न हो।
ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति।
भावार्थ
शान्ति पाठ सत्यनारायण पूजा का सार्वभौमिक और करुणामय समापन है। इसमें साधक केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण की कामना करता है। यह भाव सत्यनारायण के उस स्वरूप को प्रकट करता है जिसमें सत्य केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समष्टि के हित में परिवर्तित हो जाता है। ‘शान्तिः’ का तीन बार उच्चारण आध्यात्मिक, मानसिक और भौतिक—तीनों स्तरों पर शांति की कामना का प्रतीक है। इस शान्ति पाठ के साथ साधक पूजा के फल को संपूर्ण जगत के लिए अर्पित करता है और अपने मन को करुणा, संतुलन और व्यापक दृष्टि से भर लेता है।