भावार्थ एवं उद्देश्य
कलश पूजन किसी भी वैदिक या पौराणिक अनुष्ठान का आधारभूत और अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग है। लगभग प्रत्येक पूजा, व्रत, हवन या अभिषेक में कलश की स्थापना अनिवार्य मानी जाती है, क्योंकि कलश को साक्षात् ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है। यह केवल जल से भरा हुआ पात्र नहीं, बल्कि सृष्टि, जीवन और दिव्य चेतना का संकेंद्रित रूप है।
कलश में स्थापित जल को जीवन-तत्त्व का प्रतीक माना जाता है। जल के बिना न सृष्टि संभव है, न ही जीवन। इसलिए कलश पूजन के माध्यम से साधक सर्वप्रथम जीवन-शक्ति का आवाहन करता है। कलश के मुख पर रखा गया नारियल सृजन और पूर्णता का संकेत देता है, जबकि आम या अश्वत्थ के पत्ते पंचमहाभूतों और पंचप्राणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार कलश स्वयं में एक पूर्ण तात्त्विक संरचना बन जाता है।
कलश पूजन का मुख्य उद्देश्य यह है कि पूजा-स्थल को साधारण स्थान से देवस्थान में रूपांतरित किया जाए। जब कलश में देवताओं का आवाहन किया जाता है, तब वह स्थान दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण हो जाता है। यह ऊर्जा न केवल पूजा के समय कार्य करती है, बल्कि साधक के मन, वातावरण और गृह-परिसर में भी शुद्धता और स्थिरता स्थापित करती है।
कलश को समस्त देवताओं का निवास-स्थान माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी जैसी पवित्र नदियाँ कलश के जल में निवास करती हैं। इसी कारण कलश पूजन के पश्चात् उसका जल अत्यंत पवित्र और संस्कारित माना जाता है।
व्यावहारिक दृष्टि से भी कलश पूजन का महत्त्व स्पष्ट है। यह साधक को पूजा की प्रक्रिया में मानसिक रूप से स्थिर करता है। जब साधक कलश के समक्ष बैठकर आवाहन करता है, तब उसका मन बाह्य विषयों से हटकर पूजा में एकाग्र होता है। यही एकाग्रता आगे की समस्त पूजा को सार्थक बनाती है।
आज के समय में, जब पूजा-पाठ को केवल औपचारिक मान लिया जाता है, तब कलश पूजन यह स्मरण कराता है कि पूजा का वास्तविक उद्देश्य बाह्य कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि आन्तरिक शुद्धि और संतुलन है। यह साधक को प्रकृति, देवतत्त्व और स्वयं के भीतर विद्यमान चेतना से जोड़ता है।
इस प्रकार कलश पूजन किसी एक देवता की पूजा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण देवमण्डल और सृष्टि-तत्त्व का सम्मान है। यही कारण है कि इसे हर अनुष्ठान का प्रारम्भिक और अनिवार्य संस्कार माना गया है।
भूमि स्पर्श
ॐ मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। पिपृतान्नों भरीमभि:।।
हिन्दी अर्थ
आकाश और यह पृथ्वी हमारे इस यज्ञ को स्वीकार करें।
वे हमें अन्न, पोषण और समृद्धि से परिपूर्ण करें तथा हमारे जीवन का भार धारण करें।
भावार्थ
भूमि स्पर्श का यह मंत्र पूजा के प्रारम्भ में साधक और पृथ्वी के बीच संबंध को स्थापित करता है। यहाँ पृथ्वी को केवल भौतिक धरातल नहीं, बल्कि माता के रूप में स्मरण किया गया है, जो समस्त यज्ञ, कर्म और जीवन को धारण करती है। आकाश और पृथ्वी दोनों को साक्षी बनाकर साधक यह निवेदन करता है कि उसका अनुष्ठान प्रकृति के विधान के अनुरूप और मंगलकारी हो।
‘यज्ञं मिमिक्षताम्’ का भाव यह है कि पूजा केवल व्यक्तिगत कर्म न रहकर एक व्यापक दैवी प्रक्रिया बन जाए, जिसमें प्रकृति स्वयं सहभागी हो। पृथ्वी से यह प्रार्थना की जाती है कि वह यज्ञ को स्वीकार करे, क्योंकि उसी के आधार पर सभी कर्म सम्पन्न होते हैं।
‘पिपृतान्नः’ द्वारा अन्न और पोषण की कामना की गई है। इसका संकेत यह है कि आध्यात्मिक साधना और भौतिक जीवन परस्पर विरोधी नहीं हैं। धर्म का वास्तविक स्वरूप वही है जिसमें साधक को जीवन-निर्वाह के साधन भी सहज रूप से प्राप्त हों।
भूमि स्पर्श के माध्यम से साधक अपने अहंकार को त्याग कर विनम्रता की स्थिति में आता है। वह यह स्वीकार करता है कि उसका अस्तित्व पृथ्वी पर आश्रित है और इसलिए प्रत्येक कर्म कृतज्ञता के भाव से किया जाना चाहिए। यही भाव आगे की सम्पूर्ण पूजा को स्थिरता, पवित्रता और फलप्रदता प्रदान करता है।
सप्तधान्य
ॐ औषधय: समवदन्त सोमेन सह राज्ञा। यसमै क्रिणोति ब्राह्मणस्तर्ठ० राजन्पारयामसि।।
हिन्दी अर्थ
औषधियाँ राजा सोम के साथ एकत्र होकर यह घोषणा करती हैं—
जिसके लिए ब्राह्मण यज्ञ और कर्म करता है, हे राजन् सोम! उसे हम समृद्धि और कल्याण से पार लगा देते हैं।
भावार्थ
सप्तधान्य का यह मंत्र जीवन में पोषण, वृद्धि और स्थायित्व की भावना को स्थापित करता है। सप्तधान्य में प्रयुक्त अन्न केवल भोजन के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि की पोषक शक्ति के प्रतीक के रूप में माने जाते हैं। यहाँ औषधियों का स्मरण यह दर्शाता है कि प्रकृति की प्रत्येक वनस्पति मानव जीवन के संरक्षण और संतुलन के लिए कार्य करती है।
सोम को औषधियों का राजा कहा गया है, क्योंकि वही वनस्पति-तत्त्व में जीवन-रस का संचार करता है। इस मंत्र में यह भाव निहित है कि जब साधक विधिपूर्वक ब्राह्मण के माध्यम से यज्ञ और पूजन करता है, तब प्रकृति की समस्त पोषण-शक्तियाँ उसके पक्ष में सक्रिय हो जाती हैं।
‘पारयामसि’ शब्द विशेष अर्थ रखता है। इसका तात्पर्य केवल धन या अन्न की प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों से उबरकर स्थिर और संतुलित अवस्था में पहुँचना है। सप्तधान्य इस बात का संकेत हैं कि साधक का जीवन केवल आध्यात्मिक रूप से नहीं, बल्कि भौतिक रूप से भी पुष्ट हो।
कलश पूजन में सप्तधान्य का स्थान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पूजा को वास्तविक जीवन से जोड़ता है। यह स्मरण कराता है कि देवपूजा का उद्देश्य केवल आकाशीय फल नहीं, बल्कि पृथ्वी पर संतुलित, स्वस्थ और समृद्ध जीवन की स्थापना भी है।
इस मंत्र के माध्यम से साधक यह भावना करता है कि प्रकृति, देवता और मानव—तीनों के सामंजस्य से ही सच्ची समृद्धि संभव है। यही सामंजस्य आगे की सम्पूर्ण पूजा को फलदायी औ
कलश स्थापना
ॐ आजिग्घ्न कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरुर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधार पयस्वती पुनर्माविशताद्रयि:।।
हिन्दी अर्थ
हे कलश! मैं तुम्हें आदरपूर्वक स्पर्श करता हूँ।
सोमस्वरूप दिव्य शक्तियाँ तुम्हारे भीतर प्रवेश करें।
हे कलश! तुम पुनः ऊर्जा और जीवन-शक्ति से परिपूर्ण हो जाओ।
तुम हमें सहस्रों प्रकार की समृद्धि प्रदान करो,
बहुल धाराओं से युक्त, पोषण देने वाले और ऐश्वर्य से परिपूर्ण होकर हमारे जीवन में पुनः प्रतिष्ठित हो जाओ।
भावार्थ
कलश स्थापना का यह मंत्र कलश को साधारण पात्र से देवतत्त्व के आवास में रूपांतरित करने का माध्यम है। यहाँ कलश से प्रत्यक्ष संवाद किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि पूजा में कलश को चेतन और जीवंत सत्ता के रूप में स्वीकार किया जाता है।
‘इन्दवः’ अर्थात् सोमस्वरूप शक्तियों के प्रवेश का भाव यह दर्शाता है कि कलश में केवल जल नहीं, बल्कि जीवन-रस और दिव्य चेतना का आवाहन किया जा रहा है। सोम को शान्ति, पोषण और अमृतत्व का प्रतीक माना गया है, अतः उसका कलश में प्रवेश सम्पूर्ण पूजा को सौम्य और फलदायी बनाता है।
‘पुनरुर्जा निवर्तस्व’ के द्वारा साधक यह कामना करता है कि कलश निरन्तर ऊर्जा का स्रोत बना रहे। यह संकेत करता है कि पूजा केवल एक क्षणिक क्रिया न होकर जीवन में निरन्तर शक्ति और उत्साह प्रदान करने वाली प्रक्रिया है।
‘सहस्रं धुक्ष्व’ और ‘उरुधार पयस्वती’ जैसे शब्द समृद्धि की बहुलता को दर्शाते हैं। यहाँ समृद्धि का अर्थ केवल धन तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्न, स्वास्थ्य, सन्तान, ज्ञान और मानसिक संतुलन—इन सभी का समावेश है।
कलश स्थापना के माध्यम से साधक यह भावना करता है कि जिस प्रकार कलश में देवशक्ति स्थिर होती है, उसी प्रकार उसके जीवन में भी स्थिरता, पूर्णता और संतुलन स्थापित हो। यही भाव आगे की सम्पूर्ण पूजा को आधार प्रदान करता है और कलश को सम्पूर्ण अनुष्ठान का केन्द्र बना देता है।
जल
ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्ज्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदनयसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद।।
हिन्दी अर्थ
तुम वरुण देव का आधार और स्तम्भ हो।
तुम वरुण के ऋत अर्थात् सत्य और नियम के सदन तक पहुँचाने वाले हो।
तुम स्वयं ही वरुण के ऋत-सदन के रूप में प्रतिष्ठित हो।
भावार्थ
इस मंत्र में जल को वरुण तत्त्व का प्रतिनिधि माना गया है। वरुण सत्य, नियम और मर्यादा के अधिष्ठाता हैं, इसलिए जल पूजा में शुद्धि और अनुशासन का प्रतीक बनता है। कलश में स्थित यह जल साधक के कर्म, वाणी और मन को ऋत—अर्थात् सत्य और संतुलन—के मार्ग पर स्थापित करने का भाव उत्पन्न करता है।
गन्ध
ॐ त्वां गन्धर्वाअखनंस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पति:। त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान्यक्ष्मादमुच्यत।।
हिन्दी अर्थ
गन्धर्वों ने तुम्हें उत्पन्न किया, इन्द्र ने तुम्हें प्रतिष्ठित किया और बृहस्पति ने तुम्हें पवित्र किया।
हे औषधि! सोमराजा के प्रभाव से तुम विद्वानों को रोगों से मुक्त करने वाली हो।
भावार्थ
गन्ध का यह मंत्र सुगन्ध को दिव्य और औषधीय तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यहाँ गन्ध को रोग-नाशक, मन को प्रसन्न करने वाली और वातावरण को शुद्ध करने वाली शक्ति माना गया है। कलश पूजन में गन्ध का प्रयोग यह संकेत देता है कि पूजा केवल बाह्य विधि नहीं, बल्कि शरीर, मन और वातावरण—तीनों की शुद्धि का साधन है।
सर्वौषधि
ॐ या ओषधी: पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पूरा। मनैनु बभ्रूणामहर्ठ० शतं धमानी सप्त च।।
हिन्दी अर्थ
जो औषधियाँ देवताओं से पूर्व तीन युगों में उत्पन्न हुईं,
वे भूरे रंग वाली (पृथ्वी से उत्पन्न) औषधियाँ मनुष्य के लिए सौ और सात प्रकार के रोगों को दूर करने वाली हैं।
भावार्थ
इस मंत्र में समस्त औषधियों का स्मरण कर उन्हें पूजित किया गया है। औषधियाँ यहाँ केवल वनस्पति नहीं, बल्कि जीवन-रक्षक और संतुलनकारी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। कलश पूजन में सर्वौषधि का आवाहन यह भाव उत्पन्न करता है कि साधक का जीवन स्वास्थ्य, दीर्घायु और प्राकृतिक संरक्षण से युक्त रहे।
दूर्वा
ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परूष:परूषस्परि। एवा नो दूर्वे प्रतनू सहस्त्रेण शतेन च।।
हिन्दी अर्थ
हे दूर्वा! तुम काण्ड से काण्ड में फैलते हुए, गाँठ-गाँठ से पुनः अंकुरित होती हो।
उसी प्रकार तुम हमें सहस्रों और सैकड़ों रूपों में वृद्धि, शक्ति और दीर्घायु प्रदान करो।
भावार्थ
दूर्वा को निरन्तर वृद्धि, अक्षयता और पुनर्जनन का प्रतीक माना गया है। यह मंत्र साधक के जीवन में अविराम उन्नति, स्थायित्व और संकटों से उबरने की क्षमता की कामना करता है। कलश पूजन में दूर्वा का प्रयोग यह संकेत देता है कि जैसे दूर्वा कटने पर भी फिर उग आती है, वैसे ही साधक का जीवन भी बाधाओं के बीच निरन्तर प्रगतिशील बना रहे।
पञ्चपल्लव
ॐ अश्वत्थे वो निषदनं पर्णे वो वसतिष्कृता। गोभाज इत्किलासथ यत्सनवथ पूरुषम्।।
हिन्दी अर्थ
हे पञ्चपल्लव! अश्वत्थ वृक्ष में तुम्हारा निवास है और पत्तों में तुम्हारी प्रतिष्ठा है।
तुम गो, अन्न और मनुष्य को पोषण देने वाले हो तथा जीवन को सुरक्षित और समर्थ बनाते हो।
भावार्थ
पञ्चपल्लव के माध्यम से वृक्ष-तत्त्व और प्रकृति की पोषण-शक्ति का आवाहन किया जाता है। यह मंत्र संकेत देता है कि पत्तियाँ केवल सजावट नहीं, बल्कि जीवनदायिनी ऊर्जा का स्रोत हैं। कलश पूजन में पञ्चपल्लव का प्रयोग साधक के जीवन में स्वास्थ्य, स्थिरता और प्राकृतिक संतुलन की स्थापना का भाव प्रकट करता है।
सप्तमृत्तिका
ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म स प्रथा:।।
हिन्दी अर्थ
हे पृथ्वी माता! तुम हमारे लिए सुखद और कल्याणकारी बनो।
तुम बिना कष्ट देने वाली हो और हमें आश्रय प्रदान करने वाली हो।
हम पर अपना विस्तृत कल्याण और संरक्षण प्रदान करो।
भावार्थ
सप्तमृत्तिका का यह मंत्र पृथ्वी को माता के रूप में नमन करता है। इसमें पृथ्वी से स्थिरता, सुरक्षा और कल्याण की कामना की जाती है। कलश पूजन में सप्तमृत्तिका का प्रयोग यह भाव उत्पन्न करता है कि साधक का जीवन आधारयुक्त, सुरक्षित और संतुलित बना रहे।
पूगीफल
ॐ याः फलिनीर्य्या अफला अपुष्पा याच्श्र पुष्पिणी:। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुच्ज्ञन्त्वर्ठ० हस:।।
हिन्दी अर्थ
जो लताएँ फलयुक्त हैं, जो फलरहित हैं और जो पुष्पयुक्त हैं—
वे सभी बृहस्पति की प्रेरणा से उत्पन्न हुई हैं।
वे हमें कष्ट, अभाव और दुःख से मुक्त करें।
भावार्थ
पूगीफल का यह मंत्र फल-तत्त्व और समृद्धि की शक्ति का आवाहन करता है। यहाँ फल, पुष्प और लताओं के माध्यम से जीवन की पूर्णता और संतुलन का भाव व्यक्त किया गया है। कलश पूजन में पूगीफल का प्रयोग यह संकेत देता है कि साधक का जीवन फलदायी हो, उसके कर्म पूर्ण हों और अभाव व बाधाएँ उससे दूर रहें।
पञ्चरत्न
ॐ परि वाजपति: कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्। दधद्रत्नानि दाशुषे।।
हिन्दी अर्थ
अग्नि, जो यज्ञ का स्वामी और ज्ञानी है, हव्यों को चारों ओर से ग्रहण करता है
और यज्ञ करने वाले को रत्नों और समृद्धि से युक्त करता है।
भावार्थ
पञ्चरत्न का यह मंत्र यज्ञ और दान के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली समृद्धि का संकेत देता है। यहाँ रत्न ज्ञान, वैभव और स्थायित्व के प्रतीक हैं। कलश पूजन में पञ्चरत्न अर्पण का भाव यह है कि साधक के जीवन में शुभ गुण, वैभव और संतुलन स्थिर रूप से स्थापित हों।
स्वर्ण
ॐ हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्ने भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्। स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
हिन्दी अर्थ
हिरण्यगर्भ के रूप में अग्नि उत्पन्न हुए, वही समस्त भूतों के एकमात्र स्वामी थे।
उन्होंने इस पृथ्वी और आकाश को धारण किया।
हम उस देवता के लिए हवन द्वारा आहुति अर्पित करते हैं।
भावार्थ
स्वर्ण के इस मंत्र में हिरण्यगर्भ को सृष्टि का मूल तत्त्व माना गया है। स्वर्ण यहाँ प्रकाश, शुद्धता और दिव्यता का प्रतीक है। कलश पूजन में स्वर्ण का अर्पण यह भाव प्रकट करता है कि साधक अपने कर्म और जीवन को तेज, स्थिरता और पवित्रता से युक्त करना चाहता है।
वस्त्र
ॐ सुजातों ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः। वासों अग्ने विश्वरूपर्ठ० सम्व्ययस्व विभावसो।।
हिन्दी अर्थ
हे अग्नि! तुम दिव्य प्रकाश के साथ उत्तम रूप से उत्पन्न हुए हो।
तुम स्वर्ग में स्थित होकर हमें संरक्षण और शरण प्रदान करते हो।
हे तेजस्वी अग्नि! तुम विश्वरूप वस्त्र से स्वयं को आच्छादित करो।
भावार्थ
वस्त्र का यह मंत्र अग्नि को तेज और संरक्षण का प्रतीक मानता है। वस्त्र यहाँ आवरण, मर्यादा और सम्मान का संकेत देता है। कलश पूजन में वस्त्र अर्पण का भाव यह है कि देवतत्त्व और साधक—दोनों का जीवन तेजस्विता, सुरक्षा और पवित्रता से आच्छादित रहे।
पूर्णपात्र
ॐ पूर्णा दर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत। वस्नेव व्विक्रीणावहा इषमूर्ज़्जर्ठ० शतक्रतो।।
हिन्दी अर्थ
हे पूर्ण पात्र! तुम पूर्ण रूप से अर्पित होकर पुनः पूर्णता के साथ हमारे पास लौट आओ।
जिस प्रकार क्रय–विक्रय में वस्तु लौटकर समृद्धि देती है,
उसी प्रकार हे शक्तिशाली देव! हमें अन्न और ऊर्जा प्रदान करो।
भावार्थ
पूर्णपात्र का यह मंत्र पूर्णता और अक्षयता का प्रतीक है। इसमें यह भाव निहित है कि जो कुछ श्रद्धा से अर्पित किया जाता है, वह नष्ट नहीं होता, बल्कि और अधिक सामर्थ्य के साथ लौटता है। कलश पूजन में पूर्णपात्र अर्पण यह संकेत देता है कि साधक का जीवन अन्न, ऊर्जा और समृद्धि से निरन्तर परिपूर्ण बना रहे।
नारियल
ॐ या: फलिनीर्य्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणी:। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुच्ज्ञन्त्वर्ठ० हस:॥
हिन्दी अर्थ
जो लताएँ फलयुक्त हैं, जो फलरहित हैं और जो पुष्पयुक्त हैं—
वे सभी बृहस्पति की प्रेरणा से उत्पन्न हुई हैं।
वे हमें कष्ट, अभाव और दुःख से मुक्त करें।
भावार्थ
नारियल को पूर्णता, शुद्धता और मंगल का प्रतीक माना गया है। इस मंत्र द्वारा फल-तत्त्व की समग्र शक्ति का आवाहन होता है। कलश पूजन में नारियल अर्पण का भाव यह है कि साधक के कर्म फलदायी हों, बाधाएँ दूर हों और जीवन में शुभता स्थिर रूप से स्थापित रहे।
कलश मे वरुण का ध्यान और आवाहन
ॐ तत्त्वा यामि ब्रम्हणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भि:।
अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशर्ठ० स मा न आयु: प्रमोषी:।।
अस्मिन् कलशे वरुणं साङ्ग् सपरिवरं सायुधं सशक्तिक-मावाहयामि स्थापयामि।
हिन्दी अर्थ
मैं ब्रह्मभाव से नम्र होकर तुम्हारी उपासना करता हूँ और हवन द्वारा तुम्हें आमंत्रित करता हूँ।
हे वरुण देव! हमारे प्रति अप्रसन्न न होकर हमें जानो और स्वीकार करो।
हमारे आयुष्य को क्षीण न करो, बल्कि उसे विस्तृत और सुरक्षित रखो।
इस कलश में मैं वरुण देव को उनके अंगों, परिवार, आयुध और शक्तियों सहित आवाहित एवं स्थापित करता हूँ।
भावार्थ
इस मंत्र द्वारा कलश में वरुण देव का ध्यान और आवाहन किया जाता है। वरुण सत्य, नियम, मर्यादा और जल-तत्त्व के अधिष्ठाता हैं। कलश में उनका आवाहन यह सुनिश्चित करता है कि सम्पूर्ण पूजा ऋत—अर्थात् सत्य और अनुशासन—के अनुसार सम्पन्न हो। यह मंत्र साधक के जीवन में दीर्घायु, शुद्धि और स्थिरता की भावना को स्थापित करता है।
कलश मे देवी-देवताओं का आवाहन
कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थतो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥ कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधराः। अर्जुनी गोमती चैव चंद्रभागा सरस्वती ॥ कावेरी कृष्णवेणी च गंगा चैव महानदी। ताप्ती गोदावरी चैव माहेन्द्री नर्मदा तथा॥ नदाश्च विविधा जाता नद्यः सर्वास्तथापराः । पृथिव्यां यान तीर्थानि कलशस्थानि तानि वैः ॥ सर्वे समुद्राः सरितस्तीथर्यानि जलदा नदाः। आयान्तु मम कामस्य दुरितक्षयकारकाः ॥ ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः। अंगैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः॥ अत्र गायत्री सावित्री शांति पुष्टिकरी तथा । आयान्तु मम शान्त्यर्थं दुरितक्षयकारकाः॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिंधु कावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥ नमो नमस्ते स्फटिक प्रभाय सुश्वेतहाराय सुमंगलाय। सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधनाथाय नमो नमस्ते॥ ॐ अपां पतये वरुणाय नमः। ॐ वरुणाद्यावाहित देवताभ्यो नमः।
हिन्दी अर्थ
कलश के मुख में भगवान विष्णु, कंठ में भगवान रुद्र और मूल में ब्रह्मा विराजमान हैं।
इसके मध्य में मातृगण स्थित हैं।
कलश के भीतर समस्त सागर, सप्तद्वीपों सहित पृथ्वी तथा अर्जुनी, गोमती, चंद्रभागा, सरस्वती, कावेरी, कृष्णवेणी, गंगा, महानदी, ताप्ती, गोदावरी, नर्मदा आदि सभी पवित्र नदियाँ निवास करती हैं।
पृथ्वी पर स्थित सभी तीर्थ, समुद्र, नदियाँ और सरिताएँ इस कलश में प्रतिष्ठित हों।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद अपने अंगों सहित इस कलश में स्थित हों।
गायत्री, सावित्री तथा शान्ति और पुष्टि प्रदान करने वाली देवियाँ यहाँ आकर हमारे पापों का क्षय करें।
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी! आप सब इस जल में निवास करें।
हे जलाधिपति वरुण देव! आपको बार-बार नमस्कार है।
मैं वरुण सहित इस कलश में आवाहित समस्त देवताओं को नमन करता हूँ।
भावार्थ
इस आवाहन में कलश को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक माना गया है। त्रिदेव, मातृशक्ति, समस्त नदियाँ, तीर्थ, वेद और देवियाँ—सभी को कलश में प्रतिष्ठित कर पूजा-स्थल को पूर्ण देवालय का स्वरूप दिया जाता है। इसका भाव यह है कि साधक की पूजा किसी एक देवता तक सीमित न रहकर सम्पूर्ण दैवी व्यवस्था से जुड़ जाए। कलश में देवताओं का यह आवाहन पूजा को पूर्ण, शुद्ध और फलदायी बनाता है तथा जीवन में शान्ति, पवित्रता और मंगल की स्थापना करता है।
ध्यान
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, ध्यानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि।
आवाहन
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि।
आसन
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, आसनार्थें पुष्पंणि समर्पयामि।
प्रतिष्ठा
अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु च । अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति च कश्चन॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्रीसत्यनारायणाय नमः! सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्।
पाद्य
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि।
अर्घ्य
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, हस्तयोर्घ्यं समर्पयामि।
आचमन
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, मुखे आचमनीयं समर्पयामि।
स्नान
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, स्नानं समर्पयामि।
पञ्चामृतस्नान
पञ्चामृतं मयानीतं पयो दधि घृतं मधु। शर्करया समायुक्तं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि।
गन्धोदकस्नान
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, गन्धोदकस्नानं समर्पयामि।
शुद्धोदकस्नान
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
वस्त्र
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, वस्त्रं च उपवस्त्रं समर्पयामि। वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
यज्ञोपवीत
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि। यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
चन्दन
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, चन्दनानुलेपनं समर्पयामि।
अक्षत (तिल)
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, अक्षतान् समर्पयामि।
पुष्पमाला
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, पुष्पमालां समर्पयामि।
अबीर-गुलाल आदि नानापरिमल-द्रव्य
अबीरं च गुलालं च हरिद्रादिसमन्वितम् । नाना परिमलं द्रव्यं गृहाण परमेश्वर॥
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि।`
धूप
वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः। आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, धूपमाघ्रापयामि।
दीप
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया। दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्॥ भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।
त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते ॥ ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, दीपं दर्शयामि।
हस्तप्रक्षालन
ॐ हृषीकेशाय नमः
नैवेद्य
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, नैवेद्यं निवेदयामि । नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ऋतुफल
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, ऋतुफलानि समर्पयामि। फलान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।
ताम्बूल
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, मुखवासार्थम् एलालवंग - पूगीफलसहितं ताम्बूलं समर्पयामि।
दक्षिणा
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, कृताया: पूजायाः साद्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि।
पुष्पाञ्जलि
नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि च। पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तो गृहाण परमेश्वर।।
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ।
प्रार्थना
देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ। उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम्॥ त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः। त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः॥ शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः। आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे देवाः सपैतृकाः॥ त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः। त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भव, सांनिध्यं कुरु देवेश प्रसन्नो भव सर्वदा॥ नमो नमस्ते स्फटिक प्रभाय सुश्वेतहाराय सुमंगलाय। सुपाशहस्ताय झषासनाय जलाधनाथाय नमो नमस्ते॥ पाशपाने नमस्तुभ्यं पद्मिनीजीवनायक। पुण्याहवाचनं यावत् तावत्त्वं सन्निधो भवः॥ ॐ अपां पतये वरुणाय नमः।
हिन्दी अर्थ
हे कलश! देवों और दानवों द्वारा समुद्र-मंथन के समय तुम उत्पन्न हुए थे और स्वयं भगवान विष्णु ने तुम्हें धारण किया था।
तुम्हारे जल में सभी तीर्थ विद्यमान हैं और समस्त देवता तुम्हारे भीतर स्थित हैं।
सभी भूत और प्राण तुममें प्रतिष्ठित हैं।
तुम स्वयं शिव हो, विष्णु हो और प्रजापति भी हो।
आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वदेव और पितृगण—सभी तुममें स्थित हैं और कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
हे जल से उत्पन्न देवेश! तुम्हारी कृपा से इस यज्ञ को सम्पन्न करने की इच्छा करता हूँ।
सदैव यहाँ सन्निहित रहो और प्रसन्न रहो।
हे जलाधिपति वरुण! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।
पुण्याहवाचन पूर्ण होने तक तुम यहाँ उपस्थित रहो।
भावार्थ
यह प्रार्थना कलश को साक्षात् अमृत-कलश और ब्रह्माण्ड का केन्द्र मानकर की जाती है। इसमें कलश को सभी देवताओं, तीर्थों और प्राणशक्ति का आश्रय बताया गया है। इस प्रार्थना का भाव यह है कि पूजा केवल विधि न रहकर देवताओं की प्रत्यक्ष उपस्थिति में सम्पन्न हो। वरुण देव से यह विनय की जाती है कि वे पुण्याहवाचन तक कलश में स्थिर रहें और अनुष्ठान को निर्विघ्न, शुद्ध और फलदायी बनाएँ।
नमस्कार
ॐ वरुणाधावाहितदेवताभ्यो नमः, प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि।