जय लक्ष्मी रमणा, श्री लक्ष्मी रमणा...
श्री सत्यनारायण जी की आरती भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की उपासना का महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती है।
यह आरती विशेष रूप से सत्यनारायण व्रत एवं कथा के समापन पर गाई जाती है, जिसमें सत्य, श्रद्धा और धर्म के महत्व को दर्शाया गया है।
आरती के पदों में भगवान सत्यनारायण के दिव्य स्वरूप, उनकी करुणा तथा भक्तों पर की जाने वाली कृपा का भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
इस आरती का पाठ करने से जीवन में सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है और सांसारिक कष्टों से मुक्ति का भाव उत्पन्न होता है।
श्रद्धा और नियमपूर्वक इस आरती का गायन पारिवारिक सुख-शांति एवं आध्यात्मिक उन्नति में सहायक माना जाता है।
जय लक्ष्मी रमणा, श्री लक्ष्मी रमणा, सत्यनारायण स्वामी जन-पातक-हरणा।। जय.।।
रत्नजटित सिंहासन अद्भुत छबि राजै । नारद करत निराजन घंटा ध्वनि बाजै।। जय.।।
प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दरस दियो।बूढ़े ब्राह्मण बनकर कंचन-महल कियो।। जय.।।
दुर्बल भील कठारो, जिनपर कृपा करी। चन्द्रचूड़ एक राजा, जिनकी बिपति हरी।। जय.।।
वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्हीं। सो फल भोग्यो प्रभुजी फिर अस्तुति कीन्हीं।। जय.।।
भाव-भक्ति के कारण छिन-छिन रूप धरयो। श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सरयो।। जय.।।
ग्वाल-बाल संग राजा वन में भक्ति करी। मनवांछित फल दीन्हों दीनदयालु हरी।। जय.।।
चढ़त प्रसाद सवायो कदलीफल, मेवा। धूप-दीप-तुलसी से राजी सत्यदेवा।। जय.।।
श्री सत्यनारायण जी की आरती जो कोई नर गावै। तन-मन-सुख-संपत्ति मन-वांछित फल पावै।। जय.।।
इस आरती के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि भगवान सत्यनारायण भाव और भक्ति से प्रसन्न होते हैं, न कि केवल बाह्य आडंबर से।
कथा के पात्रों के उदाहरण यह दर्शाते हैं कि श्रद्धा रखने वालों की रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं, जबकि श्रद्धा से विमुख होने पर जीवन में कष्ट उत्पन्न होते हैं।
आरती में प्रसाद, तुलसी, धूप-दीप आदि का उल्लेख शुद्धता, नियम और भक्ति भाव का प्रतीक है।
नियमित रूप से इस आरती का पाठ करने से मन की अशांति दूर होती है तथा जीवन में संतुलन, समृद्धि और विश्वास की वृद्धि होती है।
सत्यनारायण जी की आरती श्रद्धालु के तन, मन और जीवन को सत्य एवं धर्म के मार्ग पर अग्रसर करने का साधन मानी जाती है।
🙏 सत्यनारायण जी की आरती 🙏