नींव पूजन विधि (शिलान्यास)

शुद्धासन पर पूर्वाभिमुख बैठकर कुशा या आम्रपल्लव से पूजक तथा पूजन सामग्री के ऊपर निम्न मन्त्रोच्चार के साथ जल छिड़कें

पवित्रीकरण

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षम् स वाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥

आचमन

ॐ केशवाय नमः। ॐ नारायणाय नमः। ॐ माधवाय नमः।

(ॐ हृषीकेशाय नमः, बोलकर हाथ धो लें)

पवित्री धारण

ॐ पवित्रेस्थो वैष्णव्यो सवितुर्वः प्रसव उत्पुना-म्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः। तस्यते पवित्रपते पवित्र पूतस्य यत्कामः पुनेतच्छकेयम्।

👉 कृपया क्रम से नीचे दिए गए चरणों का पालन करें। प्रत्येक चरण पर क्लिक करके पूजा विधि पढ़ें और करें।
  1. स्वस्तिवाचन एवं सङ्कल्प
  2. गौरी गणेश पूजा
  3. कलश पूजा
  4. नवग्रह पूजा
  5. पंचदेव पूजा

- नाग व कच्छप पूजन -

नवग्रह से ईशान कोण में रोली से अष्टदल कमल बनाकर एक ताँबे की लोटिया (कण्ठ में रक्षा सूत्र बँधी हुई) को स्थापित करें। लोटिया के भीतर सोने का सर्प तथा चाँदी का कछुआ रख दें, अक्षत लेकर नाग व कच्छप का आवाहन करें -

१- ॐ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवी मनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः।।

२- ॐ वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान-स्वावेशा अनमीणो भवानः यत्वे। महे पतितन्नायुष सुशन्नो भवद् द्विपदे शं चतुष्पदे।।

३- ॐ यस्य कुर्मो गृहे हविस्तमग्ने वर्धया त्वम्। तस्मै देवा अधिब्रुवन् नयश्च ब्रह्मणस्पतिः।। ॐ कूर्माय नमः।।

४- ॐ खड्गो वैश्वदैवः श्वा कृष्णः कर्णो गर्दभस्तरक्षुस्ते। रक्षसामिन्द्राय सूकरः सि गुँ हो मारुतः कृकलासः पिप्पका शकुनिस्ते शरव्यायै विष्वेषां देवानां पृषतः।। ॐ वाराहाय नमः।।

५- ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं। यज्ञ गुँ समिमंदधातु । विश्वेदेवा स इह मादयन्तामोम् प्रतिष्ठ ॥

हाथ का अक्षत लोटिया में छोड़ दें, लोटिया में स्थित नाग व कच्छप का यथा विधि पंचोपचार पूजन करें व लोटिया में पंचरत्न छोड़ें

एक कटोरी में दूध घी, लावा, सेवार लेकर निम्न मंत्रोच्चार करें—

ॐ सर्वलक्षण सम्पन्न सर्वेश कमलाधिप । अर्घ्यं गृहाण देवेश विष्णुरूप नमोऽस्तुते ।।

हिमकुन्द प्रतीकाश नागानन्त महाफणीन् । शंखचूड़ महापद्म गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते ।।

कटोरी का दूध, लावा आदि लोटिया में छोड़ दें

प्रार्थना

ॐ वास्तोष्पतिम् जगद्देवं सर्व सिद्धि विधायकम् । स्थापयामि देवेशं वास्तुदेवं महाबलम् ।।

देवदेवं गणाध्यक्षं पाताल तल वासिनम् । शान्तिकर्तार मीशानं तं वास्तुं प्रणतोऽस्म्यहं ।।

कूर्मदेवं नमस्तुभ्यं सर्वकामफलप्रद । गृहेऽस्मिन् स्थिरोभूत्वा मम स्वस्तिकरौ भव ।।

त्रिविक्रमाया-मित विक्रमाय महावराहाय सुरोत्तमाय । श्रीशाङ्ग्र्चक्रासिगदाधराय नमोऽस्तुते देववर प्रसीद ।।

अक्षत-पुष्प लोटिया पर चढ़ा दें तथा लोटिया का मुँह ताँबे की कटोरी से ढक दें

- ईंट की पूजा -

पाँच नया ईंट धोकर सामने अलग-२ रख लें, बायें हाथ में अक्षत लेकर दाहिने हाथ से ईंटो पर थोड़ा-थोड़ा अक्षत छोड़ते हुये क्रमशः आवाहन करें-

प्रथम ईंट को नन्दा, द्वितीय ईंट को भद्रा, तृतीय ईंट को जया, चतुर्थ ईंट को रिक्ता तथा पंचम ईंट को पूर्णा मानें ।

ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं । तनो त्वरिष्टं यज्ञ गुँ समिमंदधातु । विश्वे देवा स इह मादयन्तामो- ३ म्प्रातिष्ठ ।।

ॐ भूर्भुवः स्वः इष्टकान् आवाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि च ।।

क्रमशः पाँचो ईंटों पर कुशा से गंगाजल छिड़कते हुये निम्न मंत्रों का उच्चारण करें-

१- नन्दा

ॐ आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर इषव्योऽति व्याधी महारथो जायताम् दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रिर्योषा जिष्णूरथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो न ओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ।।

२- भद्रा

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरै रंगैस्तुष्टुवा गुँ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः।।

३- जया

ॐ जातवेदसे सुन वामसो म मरातीयतो निदहातिवेदः सनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वानानेवसिन्धुदुरितात्यग्निः।।

४- रिक्ता

ॐ यमाय त्वाऽङ्गिरस्वतोपितृमते स्वाहा । स्वाहा घर्माय स्वाहा घर्मः पित्रे ।।

५- पूर्णा

ॐ पूर्णादर्विपरापत सुपूर्णा पुनरापत । वस्नेव विक्रीणा वहा इषमूर्जं गुँ शतक्रतोः।।

अब पाँचों ईंटो पर स्वस्तिक बना दें व पंचोपचार पूजन करें

पुनः प्रत्येक ईंटों पर अलग-अलग कपड़ा बिछाएं या रक्षा सूत्र रख कर फिर से ईंटों के ऊपर अक्षत छोड़कर ब्रह्मा, विष्णु आदि की पूजा करें और निम्नलिखित मंत्र पढ़े।

१- ॐ ब्रह्मणे नमः। २- ॐ विष्णवे नमः। ३- ॐ रुद्राय नमः। ४- ॐ ईश्वराय नमः। ५- ॐ सदाशिवाय नमः।

हाथ में जल लेकर बोलें-

अनेन पूजनेन देवाः प्रीयन्ताम् न मम। क्षेम कर्तारः पुष्टि कर्तारः वरदा भवन्तु।।

- स्थल पूजन -

(जिस स्थान पर नींव रखना हो उस स्थान पर कुशा या पल्लव से जल छिड़कते हुए निम्न लिखित मंत्र बोलें)

१- नन्दा का आवाहन

ॐ नन्दे नन्दय वाशिष्ठे वसुभिः प्रजया सह। समुद्र परिवारे त्वं देवि गर्भम् समाश्रय। ॐ भूर्भुवः स्वः नन्दायै नमः। नन्दामावाहयामि।।

२- भद्रा का आवाहन

ॐ सर्वबीज समायुक्ते सर्वरत्नैौषधीवृते। भद्रे काश्यप दायादे कुरु भद्रां मतिं मम। ॐ भूर्भुवः स्वः भद्रायै नमः। भद्रामावाहयामि।।

३- जया का आवाहन

ॐ प्रजापति सते देवि चतुरस्त्रे महीयसि। जये सुरुचिरे देवि वाशिष्ठे रम्यतामिह । ॐ भूर्भुवः स्वः जयायै नमः। जयामावाहयामि ।।

४- रिक्ता का आवाहन

ॐ पूजिते परमाचार्यैः गन्धमाल्यैरलंकृते । सुभगे सुप्रमे रिक्ते गृहे काश्यपि रम्यताम् । ॐ भूर्भुवः स्वः रिक्तायै नमः। रिक्तामावाहयामि ।।

५- पूर्णा का आवाहन

ॐ एकान्ते सर्वभूतेशे पर्वतासन मण्डिते । भवभूतिकरे देवि गृहे पूर्णे तु रम्यताम् । ॐ भूर्भुवः स्वः पूर्णायै नमः। पूर्णामावाहयामि ।।

प्रतिष्ठा

पाँचो ईंटो पर अक्षत छोड़ते हुये निम्नलिखित मंत्र से प्रतिष्ठा करें-

ॐ आपोहिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महेरणाय चक्षसे । यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेहनः।। उशतीरिव मातरः। तस्माअरङ्ग मामवो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपोजन यथा च नः।।

भूमि की प्रार्थना

ॐ स्योना पृथिवी नो भवानृक्षरा निवेशनी । यच्छानः शर्म सप्रथाः।।

ॐ आगच्छ सर्व कल्याणि वसुधे लोकधारिणि । उद्धृतासि वराहेण सशैल वन कानने ।। कूर्म पृष्ठो परिस्थाम् च शुक्ल वर्णां चतुर्भुजाम् । शंख पद्मधरां चक्र शूल युक्तां धरां भजे ।।

तीन बार जल छोड़कर भूमि की पंचोपचार पूजन करें तथा ताम्बूल और दक्षिणा चढ़ाएं

अर्घ्य

ताम्र पात्र में गंध, अक्षत, जल, पुष्प द्रव्य लेकर निम्न मंत्र पढ़ते हुए अर्घ्य प्रदान करें

ॐ पृथिवी ब्रह्म दत्तासि काश्यपेनाभिवन्दिता । गृहाणार्घ्यमिमं देवि प्रसन्ना वरदा भव ।। वसुधे हेमगर्भासि शेषस्योपरि शायिनि । तव पृष्ठे वसाम्येतत् गृहाणार्घ्यं धरित्रि मे ।।

प्रार्थना

ॐ उपचाराणि माँस्तुभ्यं ददामि परमेश्वरि । भक्त्या गृहाण देवेशि त्वामहम् शरणं गतः।। ब्रह्मणा निर्मिते देवि विष्णुना शंकरेण च । पार्वत्या चैव गायत्र्या स्कंदम् वै श्रवणेन च ।। देवेन पूजिते देवि धर्मस्य विजिगीषया । सौभाग्यम् देहि पुत्रांश्च धन वृद्धि करी भव ।। यथाचलो गिरिर्मेरु रावासमचलं कुरु । आरोपितं गृहाधारम् तथा त्वमचला भव ।। क्षेम कर्त्री तुष्टि कर्त्री पुष्टि कर्त्री वरदात्री भव ।

हाथ का अक्षत-पुष्प भूमि पर चढ़ा दें

खैर की एक खूँटी लेकर गृह स्वामी अपने सामने रखे व पंचोपचार पूजन करें

प्रार्थना

ॐ यथांचलो गुरुर्मेरु रावा समचलम् मम । आरोपितं गृह-स्तम्भम् तथा त्वमचलम् कुरु ।।

- कन्नी-बसुलि की पूजा —

कन्नी- वसुली को गंगाजल से धोकर उसमें रक्षासूत्र बांध कर गृहस्वामी अपने सामने रखे

हाथ में अक्षत लेकर दाहिने हाथ से अक्षत छोड़ते हुए प्रतिष्ठा करे ।

ॐ अज्ञानात् ज्ञानततो वापि दोषा स्युश्च यदुद्भवाः। नाशयत्वम् हितान्सर्वान् विश्वकर्मन् नमोऽस्तुते ।।

कन्नी-वसुली की पंचोपचार पूजन करे
ॐ त्वष्टा त्वम् निर्मितः पूर्वम् लोकानां हितकाम्यया । पूजितोऽसि खनित्रि त्वम् सिद्धिदो भव नो ध्रुवम् ।।
मिस्त्री को तिलक लगाये व नेग देकर कन्नी-वसुली प्रयोग करने की आज्ञा मांगे

पूजन की हुई जमीन पर बीचो-बीच पूर्व पूजित खैर की खूँटी गाड़ दे, खूँटी बिल्कुल जमीन के भीतर चली जाय ।

पुनः इस खूँटी के ऊपर ताँबे की ढँकी हुई लुटिया ज्यों की त्यों उठाकर रख दे ।

कटोरी के ऊपर लावा, सतुआ, व सेवार रख दे । अब गारा या सीमेण्ट मशाले से लोटिया को ढक्कर उसी के ऊपर पूजन किये हुए पाँचों ईंटों की जोड़ाई गृह स्वामी अपने से करे । ध्यान रहे कि लुटिया किसी भी तरह से बाहर न निकल सके । जोड़ाई के बाद ईंटो के ऊपर सीमेण्ट लगाकर चबूतरा बनाकर उसके ऊपर रोली से स्वस्तिक बनाये व अक्षत-पुष्प चढ़ाए ।

प्रार्थना

ॐ स्थिरोभव वीड्वंग आशुर्भव वाज्यवन । पृथुर्भव सुखदस्त्वमग्ने पुरीष वाहनः ।। नन्दे त्वम् नन्दिनी पुंसां त्वामत्र स्थापयाम्यहम् । वेश्मनि त्विह संविष्ठा यावच् चन्द्रार्क तारकाः ।। आयुः कामम् श्रियं देहि देव वासिनि नन्दिनी । अस्मिन् रक्षा त्वया कार्या सदा वेश्मनि यत्नतः ।। भद्रे त्वं सर्वदा भद्रं लोकानां कुरु काश्यपि । आयुर्दा कामदा देवि सुखदा च सदा भव ।। गर्ग गोत्र समुद्भूतां त्रिनेत्रो च चतुर्भुजाम् । गृहेऽस्मिन् स्थापयाम्यद्य जयां चारु विलोचनम् ।। रिक्ते त्वम् रिक्तदोषघ्ने सिद्धि-मुक्ति प्रदे शुभे । सर्वदा सर्व दोषघ्नि तिष्ठास्मिन् विश्वरूपिणि ।। पूर्णे त्वम् सर्वदा पूर्णान् लोकाँश्च कुरु काश्यपि । आयुर्दा कामदा देवि धनदा सुतदा तथा ।। गृह धारा वास्तुमयी वास्तु दीपेन संयुता । त्वामृते नास्ति जगतामाधारश्च जगत्प्रिये ।।

आरती — (कर्पूर की आरती करें)

ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । श्रोत्राद् वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ।। भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने । त्राहि माम् निरयाद् घोरात् दीप ज्योतिर्नमोऽस्तुते ।।

(गृह स्वामी ब्राह्मण को तिलक लगावे)
ॐ नमो ब्रह्मण्य देवाय गो ब्राह्मण हिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः।।

दक्षिणा संकल्प

अद्य विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य तिथौ अमुक गोत्रोत्पन्नः अमुकनामाहम् कृतैतत् शिलान्यास कर्मणः दक्षिणां गोत्राय शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहम् सम्प्रददे ।

भूयसी दान

गरीबों को बाँटने के लिए कुछ द्रव्य लेकर गृह स्वामी संकल्प करे तथा उसे गरीबों में बाँट दे ।

यथा शक्ति गो दान, स्वर्ण दान आदि कर सके तो करे दे ।

भूयसी दक्षिणादान का संकल्प निम्नवत करे—

संकल्प

अद्य कृतैतत् शिलान्यास कर्मणः तन्मध्ये न्यूनातिरिक्त दोष परिहारार्थम् इमां भूयसी दक्षिणां दीन, अनाथेभ्योः ब्राह्मणेभ्योः दातुमहमुत्सृजे ।।

यजमान को तिलक— (पुरोहित तिलक करें)

ॐ आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे देवा मरुद्गणः । तिलकं तु प्रयच्छन्तु धर्म कामार्थ सिद्धये ।।

पुरोहित यजमान को रक्षासूत्र बाँधे

ॐ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः । तेनत्वाम् प्रतिबध्नामि रक्षे माचल माचल ।।

पुष्पाञ्जलि

ॐ यज्ञेन यज्ञमय जन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । तेह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।।

क्षमा प्रार्थना

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व पुरुषोत्तम॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥

विसर्जन मंत्र

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय पार्थिवीम्। इष्टकामप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥

गच्छ गच्छ परं स्थानं स्वस्थानं परमेश्वर। पूजाकाले पुनरागच्छ यावत् तिष्ठ सुखं मम॥

मंत्राक्षत

पुरोहित यजमान को फल-फूल एवं अक्षत निम्न मंत्रोच्चार के साथ प्रदान करे

ॐ मंत्रार्थाः सफलाः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव ।।

(यजमान अपने आसन के नीचे जल छोड़कर माथे लगावे व आसन से उठकर ब्राह्मणों व बड़ों का चरण स्पर्श करे)

तत्पश्चात् राजगीर निर्माण कार्य प्रारम्भ करें ।

पूजा की आवश्यक सामग्री / Puja Essentials

इन वस्तुओं का प्रयोग ऊपर वर्णित अनुष्ठान में परंपरागत रूप से किया जाता है।

बाँस रहित धूप कोन

पूजा और ध्यान के दौरान सुगंध के लिए सामान्य रूप से उपयोग किए जाने वाले धूप कोन।

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सुगंधित अगरबत्ती (विविध सुगंध)

पूजा के समय वातावरण को सुगंधित रखने के लिए उपयोग की जाने वाली अगरबत्ती।

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कपूर सुगंधित तिल का पूजा तेल

दीया जलाने के लिए पूजा में उपयोग किया जाने वाला कपूर सुगंधित तिल का तेल।

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कपूर की गोलियाँ (Camphor)

पूजा, हवन और आरती के दौरान कपूर जलाने के लिए उपयोग की जाने वाली कपूर की गोलियाँ।

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प्रसाद दाना (सकरिया)

पूजा और भोग के लिए प्रसाद रूप में अर्पित की जाने वाली सकरिया।

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सूती दीया बत्ती (Jyot Batti)

दीपक और दीया प्रज्वलन के लिए पूजा और आरती में उपयोग की जाने वाली सूती बत्ती।

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पीतल का अखंड ज्योति दीया

घी या तेल से दीपक प्रज्वलन के लिए पूजा और आरती में उपयोग किया जाने वाला पीतल का दीया।

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पंचमुखी रुद्राक्ष जप माला (108 मनके)

जप, ध्यान और पूजा के दौरान मंत्र जाप के लिए उपयोग की जाने वाली रुद्राक्ष माला।

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श्री सत्यनारायण स्वामी फोटो फ्रेम

घर या पूजा स्थल में दर्शन और पूजा के लिए उपयोग की जाने वाली श्री सत्यनारायण स्वामी की छवि।

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पूजा आसन

पूजा, जप और ध्यान के समय बैठने के लिए उपयोग किया जाने वाला आसन।

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पूजा घंटी (Ghanti)

पूजा और आरती के समय ध्वनि के माध्यम से ध्यान केंद्रित करने के लिए उपयोग की जाने वाली घंटी।

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इलेक्ट्रिक कपूर दानी (गणेश-ॐ डिजाइन)

पूजा, आरती एवं ध्यान के समय कपूर प्रज्वलन हेतु उपयोग की जाने वाली विद्युत कपूर दानी। यह सुगंध प्रसार के साथ नाइट लैंप के रूप में भी कार्य करती है तथा घर, मंदिर एवं पूजा कक्ष में सकारात्मक वातावरण बनाती है।

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सूती फूल बत्ती (हस्तनिर्मित)

दीपक एवं दीया प्रज्वलन हेतु उपयोग की जाने वाली हस्तनिर्मित सूती फूल बत्ती। यह पूजा, आरती, नवरात्रि एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में नियमित रूप से प्रयुक्त होती है तथा स्थिर व शुद्ध ज्योति प्रदान करती है।

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