जय हनुमान ज्ञान गुन सागर...
॥ दोहा ॥
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार
श्रीगुरु के चरणों के कमल रज से अपने मन के दर्पण को सुधारकर मैं रघुबर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चार प्रकार के फल देने वाला है। अपनी बुद्धिहीन देह को जानकर मैं पवन कुमार का स्मरण करता हूँ। हे हनुमान, मुझे बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करो और मेरे मोह तथा कलेशों को हर दो।
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुं लोक उजागर
रामदूत अतुलित बल धामा, अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा
महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा
हे हनुमान! आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे कपिश (वानरराज), आप तीनों लोकों में प्रसिद्ध और उज्जवल हैं।
हे राम के दूत! आप अपार शक्ति के धनी हैं। अंजनी के पुत्र और पवन के संतान के रूप में आप जाने जाते हैं।
महाबीर! आप वीर और पराक्रमी हैं। बजरंग (सशक्त) होने के कारण आप बुराई को दूर कर भलाई के संग चलते हैं।
आपका रूप सोने के समान सुंदर है। कानों में कुंडल और घुँघराले केशों से आपका आकर्षक स्वरूप जगमगाता है।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै, कांधे मूँज जनेउ साजे
शंकर सुवन केसरीनंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन
बिद्यावान गुनी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया
आपके हाथ में बज्र और ध्वजा हैं। कांधे पर मूँज का जनेऊ सजता है।
हे शंकर के पुत्र, केसरी नंदन! आपका तेज और पराक्रम इतना महान है कि सम्पूर्ण जगत आपका वंदन करता है।
आप विद्या और गुणों के धनी, अत्यंत चतुर हैं और राम के कार्य करने में हमेशा उत्सुक रहते हैं।
आप प्रभु के चरित्र सुनने में रस लेने वाले हैं और राम, लक्ष्मण और सीता का मन में वास है।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रूप धरि लंक जरावा
भीम रूप धरि असुर संहारे, रामचंद्र के काज संवारे
लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुबीर हरषि उर लाये
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई
आपने सूक्ष्म रूप धारण कर सीता को दिखाया और विकट रूप धारण कर लंका को जला दिया।
भीम रूप में असुरों का संहार किया और रामचंद्र के कार्य पूरे किए।
आपने लखन को सजीवन लाया और श्री रघुबीर के हृदय में हर्ष भर दिया।
रघुपति ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि आप मेरे प्रिय हैं, भरत के समान भाई हैं।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद सारद सहित अहीसा
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते
आपके अनंत मुखों वाले गुनों की स्तुति सहस्त्र रूप में की जाती है। यही कहकर भगवान श्रीपति आपका गले लगाते हैं।
सनकादि, ब्रह्मा और अन्य मुनियों सहित नारद और सारदा भी आपकी स्तुति करते हैं।
यम, कुबेर और सभी दिशाओं के दिगपाल हैं, लेकिन कवि और विद्वान भी आपके गौरव का पूरा वर्णन नहीं कर सकते।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राज पद दीन्हा
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना
जुग सहस्र जोजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानू
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं
आपने सुग्रीव की बहुत सहायता की और उन्हें राम से मिलवाकर राजपद दिलाया।
आपके द्वारा दिया गया मंत्र विभीषण ने माना और वह लंकेश्वर बन गए, यह पूरी दुनिया जानती है।
आपने हजारों योजन की दूरी से सूर्य को देखा और उसका मधुर फल समझा।
प्रभु की मुद्रिका अपने मुख में लेकर समुद्र को पार करना आपके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।
दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते
राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डर ना
आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हांक तें कांपै
इस जगत के सभी कठिन कार्य आपके अनुग्रह से सहज हो जाते हैं।
आप राम के द्वार के रखवाले हैं, आपकी अनुमति के बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता।
जो भी आपकी शरण में आता है, उसे सब सुख प्राप्त होते हैं और कोई डर नहीं रहता।
आप अपनी शक्ति को स्वयं संभालते हैं, और आपकी हँकती आवाज़ से तीनों लोक कांप उठते हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै, महाबीर जब नाम सुनावै
नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा
संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै
सब पर राम तपस्वी राजा, तिन के काज सकल तुम साजा
महाबीर हनुमान का नाम सुनते ही भूत और पिशाच पास नहीं आते।
आप रोगों और सभी कष्टों को दूर करते हैं, और निरंतर हनुमान का जाप करने वाला वीर सभी पीड़ा से मुक्त होता है।
जो हनुमान का स्मरण, मन, वचन और ध्यान करता है, उसे आप संकट से छुड़ाते हैं।
राम तपस्वी राजा सभी पर हैं, और उनके सभी कार्यों को आप पूर्ण करते हैं।
और मनोरथ जो कोई लावै, सोई अमित जीवन फल पावै
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा
साधु-संत के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता
जो कोई भी हनुमान से अपनी मनोकामना माँगता है, वह अपार जीवन फल प्राप्त करता है।
आपका पराक्रम चारों युगों में प्रसिद्ध है और आपका नाम पूरे जगत में उजागर है।
आप साधु-संतों के रक्षक हैं और असुरों का संहार करने वाले राम के प्रिय हैं।
आप अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता हैं, और इसी वरदान को जानकी माता ने आपको दिया।
राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा
तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम-जनम के दुख बिसरावै
अन्तकाल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई
और देवता चित्त न धरई, हनुमत सेइ सर्ब सुख करई
आपके पास राम रसायन है, हमेशा रघुपति के दास बने रहें।
आपके भजन से लोग राम को प्राप्त करते हैं और जन्म-जन्म के दुख भूल जाते हैं।
अंत समय में भक्त हनुमान के नाम से रघुबर के पास जाते हैं और हरिभक्त कहाए जाते हैं।
देवता भी अपने मन में स्थान नहीं रखते, हनुमान के माध्यम से ही सभी सुख प्राप्त करते हैं।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा
जय, जय, जय, हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरुदेव की नाईं
जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बंदि महा सुख होई
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होए सिद्धि साखी गौरीसा
तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मंह डेरा॥
जो कोई हनुमान के बलवीर का स्मरण करता है, उसके सारे संकट दूर होते हैं और पीड़ा मिट जाती है।
जय, जय, जय हनुमान गोसाईं! आप कृपा करें जैसे गुरुदेव करते हैं।
जो कोई इसे सौ बार पढ़ता है, वह सभी बंधनों से मुक्त होकर महान सुख पाता है।
जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसके सिद्धि की पुष्टि होती है।
तुलसीदास हमेशा भगवान के सेवक हैं, हे हनुमान, कृपया मेरे हृदय में निवास कीजिए।
॥ दोहा ॥
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरती रूप
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हे पवनतनय हनुमान, आप संकट हरने वाले और मंगल रूप हैं।
हे हनुमान, राम, लक्ष्मण और सीता सहित आप हमारे हृदय में निवास करें, हे देवताओं के स्वामी।