॥ छठ पूजा व्रत कथा (रविषष्ठि कथा) ॥
कथा
श्रीजनमेजय जी ने वैशम्पायन जी से पूछा कि, दुरात्मा दुर्योधन आदि द्वारा कपट रूप जुआ से परास्त पाण्डव लोग वनवास के लिए भेजे गए तो जंगल में जाकर उन्होंने क्या किया? वैशम्पायन जी बोले - हे जनमेजय ! सुनो, वह पाण्डु के पुत्र पाण्डव लोग अत्यंत दुःख सागर में डूबे हुए वनवास के लिए घोर जंगल में जाकर दुःख और चिंता से चिंतित हो वन में रहने लगे। राजकन्या, गजगामिनी द्रौपदी भी पतियों के साथ वन को गई थी। जिस स्थान पर द्रौपदी सहित पाण्डव लोग थे वहाँ पर ब्रह्मवेत्ता, तपोरूप अठासी हज़ार मुनि लोग जा पहुँचे। ऋषियों को आए हुए जानकर महाराज युधिष्ठिर अत्यंत चिंता से घबरा उठे कि इन महात्माओं के भोजन के लिए क्या प्रबंध करें। द्रौपदी अपने स्वामी की चिंता को देखकर अत्यंत व्याकुल हो गई। उसी क्षण द्रौपदी ने निज पुरोहित महाराज धौम्य जी को पवित्र आसन पर बिठाकर प्रदक्षिणा पूर्वक नमस्कार करके, नेत्रों में आँसू भरकर बोली, हे धौम्य! हे महाभाग! इन दुखी पाण्डु पुत्रों को देखिए, इनके दुःख को देखकर क्या आपका हृदय द्रवित नहीं होता? इस दुःख को दूर करने का कोई व्रत मुझसे कहिए जिससे हमारे पति इस लोक में सुखी हों! द्रौपदी के इन वचनों को सुन ब्राह्मणों में श्रेष्ठ धौम्य जी द्रौपदी से बोले - हे महाभागे! स्त्रियों के साथ तुम अनेक विघ्नों को शांत करने वाले रविषष्ठि व्रत को करो। द्रौपदी बोली हे विप्र! आपका कहा हुआ व्रत कैसा है, और उसका विधि क्या है? इस व्रत में किसकी पूजा की जाती है और इस व्रत को किसने किया, कृपा पूर्वक बताइए। द्रौपदी के प्रश्नों को सुनकर धौम्य जी बोले - हे देवी! सत्ययुग में एक शर्याति नामक राजा थे, उनकी एक हज़ार स्त्रियाँ थीं, जिनसे एक ही कन्या उत्पन्न हुई थी। उस राजा की कन्या को छोड़कर दूसरी संतान न होने के कारण वह कन्या अति प्रिय थी और वह पिता के घर में वृद्धि को प्राप्त होने लगी। कुछ समय के बाद वह कन्या चंद्रवत् मुख, कमलवत् नेत्रा होती हुई युवा अवस्था को प्राप्त हुई। बाल्यावस्था से ही चंचला वह कन्या पिता को प्राण के समान थी, इस पृथ्वी लोक में उसके समान कोई और कन्या नहीं थी जिसे हमने देखा हो। उससे उसका सुकन्या नाम पड़ा। एक समय राजा शर्याति शिकार के लिए गए, शिकार करते हुए राजा को जंगल में वास करते हुए दस दिन हो गए। एक समय सखियों के साथ सुकन्या फूल लेने जंगल में गई, वहाँ पर च्यवन मुनि का स्थान था। सुकन्या, मुनि के देह में दीमक लगा देखकर, क्या देखती है कि मिट्टी के मध्य में मुनि के दोनों नेत्र जुगनू की भाँति चमक रहे हैं, उसने विस्मित होकर उनकी दोनों आँखें फोड़ दीं, तब मुनि के दोनों नेत्रों से रुधिर की धारा बहने लगी, वह चकोराक्षी कन्या फूलों को लेकर सखियों के साथ गृह को चली गई। च्यवन मुनि के आँखें जो सुकन्या द्वारा फोड़े गए थे, इसके परिणामस्वरूप राजा और उनकी सेना का मल-मूत्र आदि सब बंद हो गया और सभी हाहाकार करने लगे। जब तीन दिन और रात्रि व्यतीत हो गई तो व्याकुल होकर अपने पुरोहित से राजा ने पूछा - हे मुनिश्रेष्ठ! किस हेतु हमारा मल-मूत्र बंद हो गया सो आप दिव्य दृष्टि से देखकर कहिए। पुरोहित जी बोले - हे राजन! भार्गववंशी च्यवन नामक एक ऋषि इसी वन में घोर तपस्या कर रहे हैं, जिनके शरीर में दीमक लगकर उनके मांस खा गए हैं तथा हड्डी मात्र मिट्टी से लिपटी है। हे राजन! आपकी कन्या अज्ञानता वश उनके दोनों नेत्र कांटों से फोड़ दिए हैं, जिससे रुधिर बह रहा है। उन्हीं के क्रोध से यह कष्ट उपस्थित हुआ है, सो हे राजन! आप उनको प्रसन्न करिए और अपनी कन्या का विवाह उनसे कर दीजिए। कन्यादान से च्यवन मुनि अवश्य ही प्रसन्न हो जाएंगे। पुरोहित के वचन सुनकर, राजा शर्याति सुकन्या को लेकर ऋषि के पास गए और जल छिड़कने पर हड्डी मात्र के दर्शन हुए। नेत्रहीन ऋषि को देखकर राजा बोले - हे प्रभु! मेरी कन्या से अज्ञान में यह अपराध हुआ है, जिससे आपके ये नेत्र फूट गए हैं, हे मुनिवर्य! आपकी सेवा के हेतु हम अपनी कन्या आपको देते हैं, जिससे आपको कष्ट न हो। राजा के वचन सुनकर च्यवन मुनि प्रसन्न हुए और उनका क्रोध शांत हो गया। तब राजा को मल-मूत्र हुआ और सेना सहित प्रसन्नचित्त होकर राजा अपने देश को गए। वह सुकन्या, च्यवन मुनि जी की सेवा करने लगी। वह सुकन्या कार्तिक मास में एक दिन जल के हेतु छोटे तालाब में गई, वहाँ पर उसने अनेक आभूषणों से युक्त नागकन्या को देखा। श्री कश्यप जी के यज्ञमंडप में सूर्य भगवान का पूजन करती हुई नाग कन्या को देखकर उसके पास जाकर पूछती है - हे महाभागे! आप क्या करती हैं? किस कारण यहाँ आई हैं? सुकन्या के वचन सुनकर नागकन्या बोली - हे साधवि! मैं नागकन्या हूँ, व्रत धारण कर कश्यप जी के पूजनार्थ यहाँ आई हूँ। सुकन्या बोली - इस व्रत और पूजा का क्या प्रभाव है? क्या फल है? इस पूजा की विधि क्या है? किस महीने और किस तिथि को यह उत्तम व्रत किया जाता है? नागकन्या ने कहा - कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सप्तमी युक्त होने पर सर्व मनोरथ सिद्धि के लिए यह व्रत किया जाता है। व्रती को चाहिए कि पंचमी के दिन नियम से व्रत को धारण करे। सायंकाल में खीर का भोजन करके पृथ्वी पर सोएँ। छठ के दिन व्रत में रहे। दिन में चार रंगों से सुषोभित मंडप में सूर्यनारायण का पूजन करे और रात्रि में जागरण करे। अनेक प्रकार के फल और पकवान आदि का नैवेद्य और सूर्यनारायण की प्रीति के लिए गीत और वाद्य आदि से उत्सव मनावे। जब तक सूर्यनारायण का दर्शन न हो जाए तब तक व्रत धारण किए रहें, प्रातःकाल सप्तमी को सूर्यनारायण का दर्शन करके अर्घ्य दे। दूध, नारियल, केलेफल, पुष्प, चंदन आदि से सूर्य के बारह नामों का उच्चारण करते हुए और प्रत्येक नाम से दंडवत प्रणाम करते हुए, अर्घ्य दे। इस प्रकार इस व्रत को करने से सूर्यनारायण महाघोर कष्ट को दूर करके मनोवांछित फल को देते हैं। हे सुव्रते! हमें यह रविषष्ठी व्रत तुमसे कहा है। श्री धौम्य जी ने कहा - हे द्रौपदी! नागकन्या के इस वचन को सुनकर सुकन्या ने इस उत्तम व्रत को किया, इसी व्रत के प्रभाव से च्यवन मुनि के नेत्र पुनः पूर्ववत् हो गए। ऋषि च्यवन जी का शरीर निरोग हो गया और सुकन्या के साथ लक्ष्मीनारायण की भाँति राज्ययुक्त होकर सुख भोगने लगे। इससे हे पंचालनंदिनी! तुम भी इस उत्तम व्रत को करो, इसी व्रत के प्रभाव से तुम्हारे पति पुनः राज्यलक्ष्मी को पाएँगे और निःसंदेह तुम्हारा कल्याण होगा। तब द्रौपदी ने धौम्य जी की आज्ञा से यह यथाविधि व्रत किया तो युधिष्ठिर जी ने अतिथि रूप में आए ब्राह्मणों को भोजन देकर प्रणाम किया। वैशम्पायन जी ने कहा - हे जनमेजय! धौम्य जी से यह उत्तम व्रत को जानकर द्रौपदी ने यह व्रत किया और इस व्रत के प्रभाव से द्रौपदी पाण्डवों सहित पुनः राज्यलक्ष्मी को प्राप्त हुई। जो कोई स्त्री इस पवित्र व्रत को करेगी उसके समस्त पाप नष्ट होकर सुकन्या की भाँति पति सहित सुख को पावेगी। इस व्रत का विधिवत् उद्यापन करे, विधि-विधान से प्रत्येक वर्ष व्रत करते हुए कथा को सुने, ब्राह्मण को दक्षिणा दे तो उसका मनोरथ सिद्ध होता है। जो कोई भक्तियुक्त इस कथा को सुनता है उसको पुत्र, धन-संपत्ति तथा अक्षय सुख मिलता है।
पूजा की आवश्यक सामग्री / Puja Essentials
इन वस्तुओं का प्रयोग ऊपर वर्णित अनुष्ठान में परंपरागत रूप से किया जाता है।
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