जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा...
“जय श्री विश्वकर्मा प्रभु” सृष्टि के रचनाकार और दिव्य शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा की प्रमुख आरती मानी जाती है।
भगवान विश्वकर्मा को समस्त निर्माण, कला, तकनीक और कौशल के अधिष्ठाता देव के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।
इस आरती में उन्हें आदि सृष्टि से ही ज्ञान और विद्या का प्रकाश फैलाने वाला बताया गया है।
विश्वकर्मा तत्त्व का मूल भाव है—कर्म में निष्ठा, सृजन में शुद्धता और श्रम के माध्यम से धर्म की स्थापना।
यह आरती विशेष रूप से विश्वकर्मा पूजा, कर्मकांड, औद्योगिक प्रतिष्ठानों, शिल्प एवं निर्माण कार्यों के आरंभ में श्रद्धा से गाई जाती है।
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
सकल सृष्टि के करता, रक्षक स्तुति धर्मा ॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
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आदि सृष्टि मे विधि को, श्रुति उपदेश दिया।
जीव मात्र का जग में, ज्ञान विकास किया॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
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ऋषि अंगीरा तप से, शांति नहीं पाई।
ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
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रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना।
संकट मोचन बनकर, दूर दुःखा कीना॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
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जब रथकार दंपति, तुम्हारी टेर करी।
सुनकर दीन प्रार्थना, विपत सगरी हरी॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
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एकानन चतुरानन, पंचानन राजे।
त्रिभुज चतुर्भुज दशभुज, सकल रूप साजे॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
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ध्यान धरे तब पद का, सकल सिद्धि आवे।
मन द्विविधा मिट जावे, अटल शक्ति पावे॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
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श्री विश्वकर्मा की आरती, जो कोई गावे।
भजत गजानांद स्वामी, सुख संपति पावे॥
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा।
जय श्री विश्वकर्मा प्रभु, जय श्री विश्वकर्मा॥
इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान विश्वकर्मा से अपने कार्य में कुशलता, विवेक और सफलता की प्रार्थना करता है।
ऋषि, राजा और शिल्पकारों की कथाओं का उल्लेख यह दर्शाता है कि प्रभु सच्चे श्रम और एकाग्रता से प्रसन्न होते हैं।
आरती यह संदेश देती है कि सृजन और निर्माण केवल भौतिक कर्म नहीं, बल्कि साधना का ही एक रूप है।
जो व्यक्ति ईमानदारी, अनुशासन और सेवा भाव के साथ अपने कार्य को करता है, उसे स्थिर प्रगति और संतोष प्राप्त होता है।
नियमित रूप से “जय श्री विश्वकर्मा प्रभु” आरती का पाठ करने से कार्य में निपुणता, मन की एकाग्रता और जीवन में स्थायित्व की वृद्धि होती है।
🙏 विश्वकर्मा जी की आरती 🙏