जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे...
“ॐ जय जगदीश हरे” भगवान विष्णु के सार्वभौमिक स्वरूप की अत्यंत प्रसिद्ध एवं सर्वप्रिय आरती मानी जाती है।
यह आरती ईश्वर को जगत के पालनकर्ता, करुणा के सागर और सभी प्राणियों के आश्रयदाता के रूप में स्मरण करती है।
आरती के प्रत्येक पद में भक्त की पूर्ण शरणागति का भाव प्रकट होता है, जहाँ वह अपने समस्त दुःख, भय और आशाओं को प्रभु चरणों में समर्पित करता है।
भगवान जगदीश्वर को यहाँ परमात्मा, अंतर्यामी और पारब्रह्म के रूप में स्वीकार किया गया है।
नित्य पूजन, एकादशी, संध्या आरती तथा सभी वैष्णव अनुष्ठानों में इस आरती का विशेष महत्व माना जाता है।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे, भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, सुख सम्पति घर आवे,कष्ट मिटे तन का ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, पारब्रह्म परमेश्वर,तुम सब के स्वामी ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, मैं मूरख फलकामी, कृपा करो भर्ता ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
श्री जगदीशजी की आरती, जो कोई नर गावे, कहत शिवानन्द स्वामी, सुख संपत्ति पावे ॥
ॐ जय जगदीश हरे ।
भगवान विष्णु की जय... माता लक्ष्मी की जय...
इस आरती के माध्यम से भक्त यह स्वीकार करता है कि संसार के समस्त सुख-दुःख का निवारण केवल भगवान की कृपा से ही संभव है।
ईश्वर को माता, पिता, स्वामी और रक्षक मानकर उनकी शरण में जाना वैष्णव भक्ति की मूल भावना है।
आरती में विषय-विकारों के त्याग, पापों के क्षय और श्रद्धा-भक्ति की वृद्धि की प्रार्थना की गई है, जो साधक को आत्मिक शुद्धि की ओर प्रेरित करती है।
यह भाव दर्शाता है कि सच्ची भक्ति अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता और सेवा से परिपूर्ण होती है।
नियमित रूप से “ॐ जय जगदीश हरे” आरती का पाठ करने से मन को शांति, जीवन में संतुलन और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास की प्राप्ति होती है।
🙏 भगवान् जगदीश्वर जी की आरती 🙏