जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन...
“ऊँ जय कश्यप नन्दन” भगवान सूर्य के तेजस्वी, जीवनदायी और अज्ञान-नाशक स्वरूप की प्रमुख आरती मानी जाती है।
सूर्य देव को अदिति-पुत्र, सविता और दिवाकर के रूप में समस्त सृष्टि को प्रकाश, ऊर्जा और गति प्रदान करने वाला देव माना गया है।
इस आरती में सूर्य के सप्ताश्वरथ, दिव्य किरणों और त्रिभुवन को प्रकाशित करने वाले स्वरूप का भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
यह दर्शाया गया है कि सूर्य तत्त्व केवल भौतिक प्रकाश नहीं, बल्कि चेतना, विवेक और ज्ञान का स्रोत भी है।
यह आरती विशेष रूप से प्रातःकाल, अर्घ्य-दान, रविवार, सूर्य उपासना तथा नित्य वैदिक साधना में श्रद्धा से गाई जाती है।
ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
ऊँ जय कश्यप...॥
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सप्त अश्वरथ राजित, एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी, मानस मलहारी॥
ऊँ जय कश्यप...॥
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सुर मुनि भूसुर वन्दित, विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर, दिव्य किरण माली॥
ऊँ जय कश्यप...॥
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सकल सुकर्म प्रसविता, सविता शुभकारी।
विश्व विलोचन मोचन, भव-बंधन भारी॥
ऊँ जय कश्यप...॥
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कमल समूह विकासक, नाशक त्रय तापा।
सेवत सहज हरत अति, मनसिज संतापा॥
ऊँ जय कश्यप...॥
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नेत्र व्याधि हर सुरवर, भू-पीड़ा हारी।
वृष्टि विमोचन संतत, परहित व्रतधारी॥
ऊँ जय कश्यप...॥
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सूर्यदेव करुणाकर, अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान मोह सब, तत्वज्ञान दीजै॥
ऊँ जय कश्यप नन्दन, प्रभु जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन तिमिर निकंदन, भक्त हृदय चन्दन॥
ऊँ जय कश्यप...॥
इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान सूर्य से शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्पष्टता और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा की कामना करता है।
सूर्य को दुःख-हारी और सुख-कारी कहकर यह संकेत दिया गया है कि उनकी उपासना से आलस्य, अज्ञान और निराशा का क्षय होता है।
आरती में नेत्र-व्याधि, ताप और कष्टों के नाश का उल्लेख सूर्य की जीवनरक्षक और उपचारक शक्ति का प्रतीक है।
भक्त जब नियम, संयम और श्रद्धा से सूर्य देव का स्मरण करता है, तब उसके कर्म, विचार और आचरण में शुद्धता आती है।
नियमित रूप से “ऊँ जय कश्यप नन्दन” आरती का पाठ करने से आत्मबल, तेज, अनुशासन और तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है।
🙏 श्री सूर्य देव जी की आरती 🙏