जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा...
“ॐ जय शिव ओंकारा” भगवान शिव की अत्यंत प्राचीन एवं प्रतिष्ठित आरती मानी जाती है।
यह आरती शिव को ओंकार स्वरूप, त्रिदेवों के आधार तथा सृष्टि के संहार और संरक्षण दोनों के अधिष्ठाता रूप में स्मरण करती है।
आरती के पदों में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों—एकमुख, पंचमुख, अर्धनारीश्वर, और त्रिगुणातीत रूप—का भावपूर्ण वर्णन किया गया है।
यह दर्शाया गया है कि शिव न केवल तपस्वी और वैराग्य के प्रतीक हैं, बल्कि करुणा, कल्याण और जगत-पालन के भी केंद्र हैं।
इस आरती का पाठ विशेष रूप से प्रातः-संध्या, सोमवार, प्रदोष व्रत एवं महाशिवरात्रि जैसे पावन अवसरों पर किया जाता है।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,अर्द्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
एकानन चतुरानन पंचानन राजे । हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे । त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी । चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे । सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
कर के मध्य कमंडल चक्र त्रिशूलधारी । सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका । प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा
इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान शिव को समस्त दुखों के नाशक और सुख-शांति के दाता के रूप में नमन करता है।
शिव को त्रिगुणस्वामी और प्रणव (ॐ) में स्थित बताकर यह संकेत दिया गया है कि समस्त सृष्टि उन्हीं से उद्भूत है।
आरती में वैराग्य, तप, करुणा और संतुलन—इन सभी तत्वों का समन्वय दिखाई देता है, जो साधक को आत्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करता है।
भक्त जब अहंकार त्यागकर शिव-शरणागति स्वीकार करता है, तब उसके जीवन में स्थिरता और मानसिक शांति का अनुभव होता है।
नियमित रूप से “ॐ जय शिव ओंकारा” आरती का पाठ करने से मन की अशांति दूर होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
🙏 भगवान् शिव जी की आरती 🙏