जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी...
“जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी” भगवान शनि के न्यायप्रिय, कर्मफलदाता और अनुशासन के अधिष्ठाता स्वरूप की प्रमुख आरती मानी जाती है।
शनि देव को सूर्यपुत्र, छाया नंदन और कर्मों के अनुसार फल प्रदान करने वाले देवता के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।
इस आरती में शनि देव के श्यामवर्ण, वक्र दृष्टि और गंभीर स्वरूप का उल्लेख है, जो यह दर्शाता है कि वे किसी के पक्ष या विरोध में नहीं, बल्कि धर्म और कर्म के अनुसार न्याय करते हैं।
उनका स्वरूप मानव को संयम, धैर्य और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
यह आरती विशेष रूप से शनिवार, शनि अमावस्या, शनि प्रदोष तथा नित्य कर्म-साधना में श्रद्धा से गाई जाती है।
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी । सूरज के पुत्र प्रभु छाया महतारी ॥
जय जय श्री शनिदेव..॥
श्याम अंक वक्र दृष्ट चतुर्भुजा धारी । नीलाम्बर धार नाथ गज की असवारी ॥
जय जय श्री शनिदेव..॥
क्रीट मुकुट शीश रजित दिपत है लिलारी । मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी ॥
जय जय श्री शनिदेव..॥
मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी । लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी ॥
जय जय श्री शनिदेव..॥
देव दनुज ऋषि मुनि सुमरिन नर नारी । विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी ॥
जय जय श्री शनिदेव..॥
इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान शनि से अपने कर्मों की शुद्धि, बाधाओं के निवारण और जीवन में स्थिरता की प्रार्थना करता है।
आरती में लोहे, तिल, तेल और उड़द का उल्लेख त्याग, तप और कर्मशुद्धि के प्रतीक के रूप में किया गया है।
शनि देव का स्मरण यह सिखाता है कि कठिन समय भी आत्मसंयम और धैर्य से पार किया जा सकता है।
जो भक्त नियम, सत्य और सेवा भाव के साथ शनि देव की उपासना करता है, उसे अंततः शुभ फल की प्राप्ति होती है।
नियमित रूप से “जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी” आरती का पाठ करने से मन में धैर्य, कर्मों में सुधार और जीवन में संतुलन का विकास होता है।
🙏 श्री शनि देव जी की आरती 🙏