जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता...
“ॐ जय गंगे माता” माँ गंगा के पावन, करुणामयी और मोक्षदायिनी स्वरूप की अत्यंत प्रसिद्ध आरती मानी जाती है।
माँ गंगा को लोकमाता, पापनाशिनी और जीवनदायिनी नदी के रूप में श्रद्धा से पूजित किया जाता है।
इस आरती में गंगा जल की निर्मलता, शीतलता और आध्यात्मिक शक्ति का भावपूर्ण वर्णन मिलता है।
यह दर्शाया गया है कि माँ गंगा की शरण में आने से मनुष्य के पाप, भय और सांसारिक बंधन धीरे-धीरे क्षीण होते हैं।
यह आरती विशेष रूप से गंगा दशहरा, कार्तिक पूर्णिमा, स्नान-दान पर्वों तथा नित्य गंगा स्मरण में श्रद्धा से गाई जाती है।
ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता । जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता ॥
ॐ जय गंगे माता..॥
चंद्र सी जोत तुम्हारी, जल निर्मल आता । शरण पडें जो तेरी, सो नर तर जाता ॥
ॐ जय गंगे माता..॥
पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता । कृपा दृष्टि तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता ॥
ॐ जय गंगे माता..॥
एक ही बार जो तेरी, शारणागति आता । यम की त्रास मिटा कर, परमगति पाता ॥
ॐ जय गंगे माता..॥
आरती मात तुम्हारी, जो जन नित्य गाता । दास वही सहज में, मुक्त्ति को पाता ॥
ॐ जय गंगे माता..॥
ॐ जय गंगे माता, श्री जय गंगे माता । जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता ॥
ॐ जय गंगे माता..॥
इस आरती के माध्यम से भक्त माँ गंगा से शुद्धि, सद्बुद्धि और जीवन की पवित्र दिशा की कामना करता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार माँ गंगा की कृपा से सगर पुत्रों का उद्धार हुआ, जो उनकी मोक्षदायिनी शक्ति का प्रतीक है।
आरती यह संदेश देती है कि माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करुणा, तप और त्याग की जीवंत धारा हैं।
जो भक्त श्रद्धा से उनकी शरणागति स्वीकार करता है, उसके जीवन से भय, अशांति और पापबोध का क्षय होता है।
नियमित रूप से “ॐ जय गंगे माता” आरती का पाठ करने से मन की निर्मलता, आचरण की पवित्रता और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।