जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा...
यह श्री गणेश जी की आरती भारतीय सनातन परंपरा में अत्यंत प्रचलित एवं श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है।
आरती का आरंभ गणेश जी की वंदना से किया जाता है क्योंकि वे विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता और शुभारंभ के अधिष्ठाता देवता हैं।
इस आरती में भगवान गणेश के स्वरूप, उनके माता-पिता, वाहन, तथा भक्तों पर की जाने वाली कृपा का भावपूर्ण वर्णन है।
श्रद्धा एवं विश्वास के साथ इसका पाठ करने से साधक के जीवन में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
यह आरती विशेष रूप से पूजा, व्रत, मंगल कार्य, एवं किसी भी शुभ अवसर पर गाई जाती है।
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी, माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा, लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया, बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी, कामना को पूर्ण करो, जाऊं बलिहारी ॥
जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा, माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान गणेश से जीवन के कष्टों के निवारण, बुद्धि-विवेक की प्राप्ति और पारिवारिक सुख-शांति की कामना करता है।
आरती में वर्णित भाव यह दर्शाते हैं कि गणेश जी दीन-दुखियों की रक्षा करते हैं, संतानहीनों को संतान सुख देते हैं तथा निर्धनों को समृद्धि प्रदान करते हैं।
भक्त जब पूर्ण श्रद्धा से उनका स्मरण करता है, तब भगवान उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
नित्य प्रातः या संध्या समय इस आरती का पाठ करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा एवं भक्ति भाव में वृद्धि होती है।