जय चित्रगुप्त हरे, स्वामीजय चित्रगुप्त हरे...
“ॐ जय चित्रगुप्त हरे” भगवान चित्रगुप्त जी के न्यायकारी, कर्मफल-लेखक और धर्मराज के सहायक स्वरूप की प्रमुख आरती मानी जाती है।
भगवान चित्रगुप्त को समस्त जीवों के कर्मों का लेखा रखने वाले, सत्य और न्याय के अधिष्ठाता देव के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।
इस आरती में उन्हें चतुर्भुज, श्यामल स्वरूप तथा कलम, दवात और पत्रिका धारण किए हुए बताया गया है, जो यह दर्शाता है कि सृष्टि में प्रत्येक कर्म का सूक्ष्म लेखा रखा जाता है।
चित्रगुप्त तत्त्व का मूल भाव है—उत्तरदायित्व, सत्यनिष्ठा और कर्म के प्रति सजगता।
यह आरती विशेष रूप से चित्रगुप्त जयंती, दीपावली के बाद के दिनों, तथा धर्म–कर्म की शुद्धि हेतु श्रद्धा से गाई जाती है।
ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामीजय चित्रगुप्त हरे । भक्तजनों के इच्छित, फलको पूर्ण करे॥
विघ्न विनाशक मंगलकर्ता, सन्तनसुखदायी । भक्तों के प्रतिपालक, त्रिभुवनयश छायी ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
रूप चतुर्भुज, श्यामल मूरत, पीताम्बरराजै । मातु इरावती, दक्षिणा, वामअंग साजै ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
कष्ट निवारक, दुष्ट संहारक, प्रभुअंतर्यामी । सृष्टि सम्हारन, जन दु:ख हारन, प्रकटभये स्वामी ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
कलम, दवात, शंख, पत्रिका, करमें अति सोहै । वैजयन्ती वनमाला, त्रिभुवनमन मोहै ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
विश्व न्याय का कार्य सम्भाला, ब्रम्हाहर्षाये । कोटि कोटि देवता तुम्हारे, चरणनमें धाये ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
नृप सुदास अरू भीष्म पितामह, यादतुम्हें कीन्हा । वेग, विलम्ब न कीन्हौं, इच्छितफल दीन्हा ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
दारा, सुत, भगिनी, सबअपने स्वास्थ के कर्ता । जाऊँ कहाँ शरण में किसकी, तुमतज मैं भर्ता ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
बन्धु, पिता तुम स्वामी, शरणगहूँ किसकी । तुम बिन और न दूजा, आसकरूँ जिसकी ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
जो जन चित्रगुप्त जी की आरती, प्रेम सहित गावैं । चौरासी से निश्चित छूटैं, इच्छित फल पावैं ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे...॥
न्यायाधीश बैंकुंठ निवासी, पापपुण्य लिखते । 'नानक' शरण तिहारे, आसन दूजी करते ॥
ॐ जय चित्रगुप्त हरे, स्वामीजय चित्रगुप्त हरे । भक्तजनों के इच्छित, फलको पूर्ण करे ॥
इस आरती के माध्यम से भक्त भगवान चित्रगुप्त से अपने कर्मों की शुद्धि, न्यायपूर्ण जीवन और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करता है।
आरती यह स्मरण कराती है कि मनुष्य का प्रत्येक विचार, वाणी और कर्म उसके भविष्य का निर्माण करता है।
कलम और लेखा का प्रतीक यह संदेश देता है कि ईश्वर का न्याय अटल है, किंतु सच्ची भक्ति, पश्चाताप और सत्कर्म से जीवन की दिशा बदली जा सकती है।
भक्त जब श्रद्धा से चित्रगुप्त जी का स्मरण करता है, तब उसके मन से भय, संशय और अन्याय का भाव दूर होता है।
नियमित रूप से “ॐ जय चित्रगुप्त हरे” आरती का पाठ करने से जीवन में अनुशासन, सत्य के प्रति निष्ठा और कर्मों में संतुलन की वृद्धि होती है।
🙏 भगवान चित्रगुप्त जी की आरती 🙏