जय वृहस्पति देवा, ऊँ जय वृहस्पति देवा...
“जय वृहस्पति देवा” देवगुरु बृहस्पति के ज्ञान, विवेक और धर्मबुद्धि के अधिष्ठाता स्वरूप की प्रमुख आरती मानी जाती है।
बृहस्पति देव को देवताओं के गुरु, सदाचार के मार्गदर्शक और जीवन में शुभता प्रदान करने वाले देव के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।
इस आरती में उन्हें परमात्मा के अंश, अंतर्यामी और समस्त जगत के कल्याणकर्ता के रूप में नमन किया गया है।
बृहस्पति तत्त्व का मूल भाव है—ज्ञान के द्वारा अज्ञान का नाश, तथा धर्म, नीति और सद्बुद्धि की स्थापना।
यह आरती विशेष रूप से गुरुवार, गुरु व्रत, बृहस्पति पूजा तथा नित्य साधना में श्रद्धा से गाई जाती है।
जय वृहस्पति देवा, ऊँ जय वृहस्पति देवा । छिन छिन भोग लगाऊँ, कदली फल मेवा ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी । जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता । सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण पड़े । प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्घार खड़े ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥
दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी । पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥
सकल मनोरथ दायक, सब संशय हारो । विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥
जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे । जेठानन्द आनन्दकर, सो निश्चय पावे ॥
ऊँ जय वृहस्पति देवा, जय वृहस्पति देवा ॥
इस आरती के माध्यम से भक्त श्री बृहस्पति देव से जीवन के संशयों के निवारण, सद्बुद्धि की प्राप्ति और शुभ मार्गदर्शन की प्रार्थना करता है।
आरती में चरणामृत, समर्पण और शरणागति का उल्लेख यह दर्शाता है कि गुरु-कृपा से ही पाप-दोष और भव-बंधन का क्षय होता है।
बृहस्पति देव का स्मरण मन, वाणी और कर्म की शुद्धि की ओर प्रेरित करता है।
जो साधक प्रेम, नियम और श्रद्धा के साथ उनकी उपासना करता है, उसके जीवन में स्थिरता, संतुलन और सत्कर्मों की वृद्धि होती है।
नियमित रूप से “जय वृहस्पति देवा” आरती का पाठ करने से ज्ञान में स्पष्टता, निर्णयों में विवेक और जीवन में शुभता का संचार होता है।
🙏 श्री बृहस्पति देव की आरती 🙏