जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा...
“जय भैरव देवा” भगवान शिव के उग्र एवं रक्षक स्वरूप भैरव की प्रमुख आरती मानी जाती है।
भैरव देव को काल-तत्त्व के अधिष्ठाता, पाप-नाशक और भक्तों की रक्षा करने वाले देव के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।
इस आरती में भैरव देव के भीषण किन्तु करुणामय स्वरूप का वर्णन है—जहाँ वे अधर्म का दमन करते हैं, वहीं शरणागत भक्तों को भयमुक्त करते हैं।
वाहन श्वान, त्रिशूल और डमरू उनके अनुशासन, सजगता और न्यायप्रियता के प्रतीक हैं।
यह आरती विशेष रूप से कालाष्टमी, रविवार-रात्रि, काशी भैरव पूजन तथा शैव साधना में श्रद्धा से गाई जाती है।
जय भैरव देवा, प्रभु जय भैरव देवा ।
जय काली और गौर देवी कृत सेवा ॥
जय भैरव देवा...॥
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तुम्ही पाप उद्धारक दुःख सिन्धु तारक ।
भक्तो के सुख कारक भीषण वपु धारक ॥
जय भैरव देवा...॥
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वाहन श्वान विराजत कर त्रिशूल धारी ।
महिमा अमित तुम्हारी जय जय भयहारी ॥
जय भैरव देवा...॥
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तुम बिन देवा सेवा सफल नहीं होवे ।
चौमुख दीपक दर्शन दुःख खोवे ॥
जय भैरव देवा...॥
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तेल चटकी दधि मिश्रित भाषावाली तेरी ।
कृपा कीजिये भैरव, करिए नहीं देरी ॥
जय भैरव देवा...॥
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पाँव घुँघरू बाजत अरु डमरू दम्कावत ।
बटुकनाथ बन बालक जल मन हरषावत ॥
जय भैरव देवा...॥
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बटुकनाथ जी की आरती जो कोई नर गावे ।
कहे धरनी धर नर मनवांछित फल पावे ॥
जय भैरव देवा...॥
इस आरती के माध्यम से भक्त भैरव देव से भय, बाधा और पाप-बोध के निवारण की प्रार्थना करता है।
भैरव को दुःख-सिन्धु से तारने वाला और भक्तों के सुख का कारण बताकर यह संदेश दिया गया है कि कठोर अनुशासन भी करुणा से जुड़ा होता है।
आरती में बटुकनाथ रूप का उल्लेख यह दर्शाता है कि भैरव तत्त्व में उग्रता के साथ सरलता और वात्सल्य भी विद्यमान है।
जो भक्त श्रद्धा, नियम और संयम के साथ भैरव देव की उपासना करता है, उसके जीवन में सुरक्षा, साहस और मानसिक दृढ़ता का विकास होता है।
नियमित रूप से “जय भैरव देवा” आरती का पाठ करने से भय, अस्थिरता और नकारात्मकता का क्षय होता है तथा जीवन में संरक्षण और संतुलन की अनुभूति होती है।