जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते...
“जय भगवद् गीते” केवल एक आरती नहीं, बल्कि श्रीमद्भगवद् गीता रूपी दिव्य ग्रंथ की उपासना है।
गीता को भगवान श्रीकृष्ण की अमृतवाणी, जीवन-दर्शन का सार और कर्मयोग का शाश्वत मार्गदर्शक माना गया है।
इस आरती में गीता को कर्म के रहस्य को प्रकाशित करने वाली, आसक्ति का नाश करने वाली और तत्त्वज्ञान का विकास करने वाली कहा गया है।
यह दर्शाता है कि गीता मनुष्य को कर्तव्य, विवेक और आत्मज्ञान के मार्ग पर स्थिर करती है।
यह आरती विशेष रूप से गीता जयंती, गीता पाठ, अध्ययन-साधना तथा नित्य आत्मचिंतन में श्रद्धा से गाई जाती है।
जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते ।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते ॥
कर्म-सुमर्म-प्रकाशिनि, कामासक्तिहरा ।
तत्त्वज्ञान-विकाशिनि, विद्या ब्रह्म परा ॥
जय भगवद् गीते...॥
निश्चल-भक्ति-विधायिनि, निर्मल मलहारी ।
शरण-सहस्य-प्रदायिनि, सब विधि सुखकारी ॥
जय भगवद् गीते...॥
राग-द्वेष-विदारिणि, कारिणि मोद सदा ।
भव-भय-हारिणि, तारिणि परमानन्दप्रदा ॥
जय भगवद् गीते...॥
आसुर-भाव-विनाशिनि, नाशिनि तम रजनी ।
दैवी सद् गुणदायिनि, हरि-रसिका सजनी ॥
जय भगवद् गीते...॥
समता, त्याग सिखावनि, हरि-मुख की बानी ।
सकल शास्त्र की स्वामिनी, श्रुतियों की रानी ॥
जय भगवद् गीते...॥
दया-सुधा बरसावनि, मातु! कृपा कीजै ।
हरिपद-प्रेम दान कर, अपनो कर लीजै ॥
जय भगवद् गीते...॥
जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते ।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि, सुन्दर सुपुनीते ॥
जय भगवद् गीते, जय भगवद् गीते ॥
इस आरती के माध्यम से साधक भगवद् गीता से राग-द्वेष, भय और अज्ञान के नाश की प्रार्थना करता है।
गीता को समता, त्याग और निष्काम कर्म का उपदेश देने वाली बताकर जीवन को संतुलित करने का संदेश दिया गया है।
आरती यह स्पष्ट करती है कि गीता केवल शास्त्र नहीं, बल्कि आचरण की विद्या है—जो मनुष्य को दैवी गुणों की ओर प्रेरित करती है।
जो व्यक्ति श्रद्धा, मनन और अभ्यास के साथ गीता के उपदेशों को अपनाता है, उसके जीवन में शांति और स्थिर आनंद का उदय होता है।
नियमित रूप से “जय भगवद् गीते” आरती का पाठ करने से कर्मों में शुद्धता, विचारों में स्पष्टता और ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम की वृद्धि होती है।