श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं...
श्री बांके बिहारी जी की आरती ब्रज भक्ति परंपरा की मधुरतम आरतियों में से एक मानी जाती है।
बांके बिहारी जी भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसमें प्रेम, सरलता और वात्सल्य का विशेष भाव प्रकट होता है।
इस आरती में भक्त अपने आराध्य को श्यामसुंदर, गिरिधर और मोहन के रूप में स्मरण करते हुए उनके सौंदर्य एवं करुणा का गुणगान करता है।
मोर मुकुट, मधुर बंसी और मनोहर छवि के माध्यम से वृंदावन की लीलामयी अनुभूति कराई गई है।
यह आरती विशेष रूप से नित्य पूजन, एकादशी, जन्माष्टमी तथा वृंदावन परंपरा में अत्यंत श्रद्धा से गाई जाती है।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं,
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं ।
आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं,
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं ।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥
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मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे,
प्यारी बंसी मेरो मन मोहे ।
देख छवि बलिहारी मैं जाऊं ।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥
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चरणों से निकली गंगा प्यारी,
जिसने सारी दुनिया तारी ।
मैं उन चरणों के दर्शन पाऊं ।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥
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दास अनाथ के नाथ आप हो,
दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो ।
हरी चरणों में शीश झुकाऊं ।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥
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श्री हरीदास के प्यारे तुम हो ।
मेरे मोहन जीवन धन हो।
देख युगल छवि बलि बलि जाऊं ।
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥
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श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं,
हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं ।
आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं,
श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं ।
इस आरती के भाव यह दर्शाते हैं कि श्री बांके बिहारी जी दीन-दुखियों के रक्षक और अपने भक्तों के सच्चे सहचर हैं।
भक्त उनके चरणों में शीश झुकाकर अपने जीवन के सुख-दुःख उन्हें समर्पित करता है।
आरती में चरणों से प्रवाहित गंगा, युगल स्वरूप और गुरु परंपरा का उल्लेख भक्ति, पवित्रता और सेवा भाव का प्रतीक है।
यह भाव बताता है कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम, समर्पण और विश्वास से होकर जाता है।
नियमित रूप से इस आरती का पाठ करने से मन में विनम्रता, जीवन में संतुलन और भगवान के प्रति अटूट प्रेम की वृद्धि होती है।
🙏 श्री बांके बिहारी आरती 🙏